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| चित्र-साभार गूगल |
एक गीत -हाशिए पर नीम ,पीपल
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| चित्र-साभार गूगल |
एक गीत -हाशिए पर नीम ,पीपल
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| चित्र साभार गूगल |
एक ग़ज़ल
मौसम भी वही माली भी बेकार नहीं है
पर फूल में खुशबू कहीं इस बार नहीं है
इस बार लिखा उसने न मिलने का बहाना
इस बार भी खाली कोई इतवार नहीं है
दिखने में तो ये घर भी महल जैसा बना है
पर खिड़की कहीं कोई हवादार नहीं है
शोहरत की बुलन्दी पे है ये वक्त है उसका
वो मंच विदूषक कोई किरदार नहीं है
अब गाँव में बिक जाते हैं आमों के बगीचे
अब सोच रहा हूँ कहाँ बाजार नहीं है
एक आस मोहब्बत की लिए फूल खड़ी है
ऑंखें भी मेरी उससे दो चार नहीं है
मुझको भी निभाना पड़ा इक रस्म से रिश्ता
अब मेरा क़रीबी ही वफ़ादार नहीं है
जंगल को हिरन छोड़ के क्यों भाग रहा है
लोगों से सुना था यहाँ गुलदार नहीं है
होंठों पे हँसी नकली है आँखों मे उदासी
दिल थाम के हँसने का समाचार नहीं है
जयकृष्ण राय तुषार
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| चित्र साभार गूगल |
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| चित्र साभार गूगल |
एक गीत-बासमती के धान हरे हैं
नहरों,नदियों
तालों वाले
बासमती के धान हरे हैं ।
जो मेघों की
छाया में थे
उनके पत्ते फूल झरे हैं ।
बौछारों से
पेड़ भींगते
देहरी पर गौरैया बोले,
देवदास का
मन उदास है
खिड़की बन्द न पारो खोले,
बेला, गुड़हल
चम्पा महके
पर कनेर पर ज़हर फरे हैं ।
चाक कुम्हारों के
चुप बैठे
धागा टूटा मिट्टी गीली,
झील किनारे
सोई हिरनी
हिरन देखता आँख नशीली,
बाघों की
आहट से
सारे पशु पक्षी वाचाल डरे हैं
जयकृष्ण राय तुषार
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| चित्र साभार गूगल |
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| चित्र साभार गूगल |
एक गीत-
इस पठार पर
फूलों वाला
मौसम लाऊँगा ।
मैं अगीत के
साथ नहीं हूँ
गीत सुनाऊँगा ।
तुलसी की
चौपाई
मीरा के पद पढ़ता हूँ,
आम आदमी
की मूरत
कविता में गढ़ता हूँ,
ताज़ा
उपमानों से
अपने छन्द सजाऊँगा ।
एक उबासी
गंध हवा में
दिन भर बहती है,
क़िस्सागोई से
हर संध्या
वंचित रहती है,
नदी
ढूँढकर मैं
हिरनी की प्यास बुझाऊँगा ।
मौन लोक में
लोकरंग का
स्वर फिर उभरेगा,
ठुमरी भूला
मगर
कभी तो मौसम सुधरेगा,
मैं गोकुल
बरसाने
जाकर वंशी लाऊँगा ।
कवि जयकृष्ण राय तुषार
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| चित्र साभार गूगल |
एक गीत-सारंगी जोगी मत छोड़ना
सारंगी
जोगी मत छोड़ना ।
अच्छे पथ पर
सबको मोड़ना ।
जीवन के तार
जहाँ ढीले हों
दुःख से जब नयन
कभी गीले हों
तार सभी कसकर
के बाँधना
गोरखवाणी
मन को साधना
सुर की यह वंशी
मत तोड़ना ।
माटी की देह
देह नश्वर है
गीता का श्लोक
मन्त्र ईश्वर है
माया की कैद में
मछन्दर है
तिरिया के देश
महल अन्दर है
गुरु के टूटे
मनके जोड़ना ।
जयकृष्ण राय तुषार
एक होली गीत
एक रंग
होली का
फागुन के आने का ।
एक रंग
साँवरिया
गोकुल,बरसाने का ।
टेसू के
फूलों से
ऋतु का श्रृंगार हुआ,
खुशबू के
दिन लौटे
फूलों से प्यार हुआ,
चुप्पियाँ
हँसेंगी फिर
डर है हर्जाने का ।
कंचन तन
मन रंगना
गीत के गुलालों से,
इस रंग को
छूना मत
इत्र की रूमालों से ,
कजरौटा
गायब है
कल से सिरहाने का।
होरी के
गीतों में
चैत के शिवाले हैं,
आम्र बौर
महके हैं
पंछी मतवाले हैं,
मिलने का
मौसम यह
मौसम तरसाने का।
जयकृष्ण राय तुषार
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| चित्र साभार गूगल |
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| चित्र -साभार गूगल |
एक ग़ज़ल -
मेरी क़िस्मत में नहीं इस झील का शतदल रहा
मेरी क़िस्मत में नहीं इस झील का शतदल रहा
मैं भी हातिम था मगर हर रास्ता दलदल रहा
एक ही दरिया से निकले थे सभी पानी लिए
आसमां में मेरे पानी के बिना बादल रहा
सिद्धियाँ थी दास उसकी वह तो परमहंस था
मूर्ति से संवाद उसका,कहते सब पागल रहा
नायिका को काव्य में लिखते थे मृगनयनी सभी
गाय के घी से बना उस दौर में काजल रहा
मैं कुशल तैराक था पर भाग्य पर निर्भर रहा
एक छोटी सी नदी की धार में असफ़ल रहा
सच परखने के लिए सीता को किसने अग्नि दी
थी नहीं गीता मगर दरिया में गंगाजल रहा
राम जी तम्बू में थे सरयू बहुत लाचार थी
पर अदालत की किताबों में सुनहरा हल रहा
जयकृष्ण राय तुषार
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| चित्र -साभार गूगल |
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| चित्र -साभार गूगल |