
श्री रामेश्वर प्रसाद शुक्ल
शोध छात्र जबलपुर
*राष्ट्रीय चेतना और भारतीय संस्कृति के काव्य-साधक:जयकृष्ण राय 'तुषार'*
1."जाति व्यवस्था के प्रति सबसे बड़ी आपत्ति जो इसके तथाकथित वकीलों के किसी सदस्य द्वारा प्रति-संतुलित नहीं की जा सकती, यह है कि इसने स्तरबद्ध वर्गों और सोपानिक श्रेणियों में मनुष्यों का कठोर अनम्य विभाजन कर दिया। जाति ने वर्ग-भावना और वर्ग-अहंकार को पोषित किया है जो यदि उलटा नहीं गया तो भारतीय संस्कृति और शिष्टता, राष्ट्रीयता और देशभक्ति की पूर्णतया मृत्यु है।"
आचार्य रामचंद्र शुक्ल( निबंध संग्रह- चिंतामणि भाग-4,पृष्ठ-181)
यह बात तो पूर्णतया सत्य है कि साहित्य किसी राष्ट्र की आत्मा का प्रतिबिंब होता है। वह केवल शब्दों का संयोजन और कल्पनाओं का संसार नहीं है, बल्कि किसी भी समाज की ऐतिहासिक स्मृतियों, सांस्कृतिक परंपराओं और राष्ट्रीय आकांक्षाओं से युक्त होता है। जिस साहित्य में राष्ट्र के प्रति समर्पण, अपनी संस्कृति के प्रति अनुराग और समाज के उत्थान की आकांक्षा विद्यमान होती है, वह साहित्य अपने वर्तमान समय के साथ युगों तक प्रासंगिक बना रहता है। भारतीय साहित्यिक परंपरा में ऐसे अनेक कवि और साहित्यकार हुए हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी को व्यक्तिगत यश अथवा मनोरंजन का साधन न बनाकर राष्ट्र, समाज, संस्कृति और मानवता की सेवा का माध्यम बनाया, उन्हीं कवियों में से प्रयागराज में सक्रिय गीतकार- नवगीतकार जयकृष्ण राय तुषार जी हैं।
2."राष्ट्रधर्म से
बड़ा कुछ नहीं
मत बेंचो ईमान को।
जाति-धर्म से
ऊपर उठकर
बदलो हिंदुस्तान को।"
मेड़ों पर वसंत( गीत/ नवगीत संग्रह, पृष्ठ-61)
श्री तुषार राष्ट्रीय चेतना और भारतीय संस्कृति के ऐसे काव्य-साधक हैं, जिनकी रचनाओं में मातृभूमि के प्रति श्रद्धा, भारतीय सभ्यता के प्रति गौरव, धर्म और अध्यात्म के प्रति आस्था तथा सामाजिक जीवन को श्रेष्ठ बनाने की आकांक्षा एक साथ अभिव्यक्त होती है। उनके लिए कविता केवल सौंदर्य का माध्यम नहीं , बल्कि विचारों की अभिव्यक्ति, संस्कारों का संचार और जनमानस को जागृत करने का माध्यम है।
श्री तुषार की काव्य-साधना का मूल उद्देश्य अपनी सांस्कृतिक जड़ों से समाज का परिचय कराना, राष्ट्रीय स्वाभिमान को जागृत करना और कविता के माध्यम से जीवन को उचित दिशा प्रदान करना है। यदि उनकी कविता में अतीत की गौरवशाली स्मृतियाँ होती हैं, तो वर्तमान की चुनौतियों का समाजबोध भी होता है और भविष्य के लिए संकल्प का संदेश भी दिखाई देता है।
3."धुन्ध को
फिर से पराजित
सूर्य का स्यंदन करे।
अब अयोध्या
और सरयू
राम का वंदन करे
वर्ष नूतन
आ रहा तो
आचरण भी नव्य हो,
देश के
उत्थान का
वातावरण भी भव्य हो"
मेड़ों पर वसंत( गीत/ नवगीत संग्रह, पृष्ठ -59)
भारतीय संस्कृति दुनिया की प्राचीन परंपराओं में से एक है। इसकी विशेषता में जो प्रमुख बातें निहित हैं उनमें विविधता, समन्वयशीलता और आत्मचिंतन की प्रवृत्ति है। यहाँ संस्कृति का अर्थ केवल रीति-रिवाजों, त्योहारों और धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन को समझने और जीने की एक व्यापक दृष्टि है।
भारतीय संस्कृति ने वर्षों से सत्य, अहिंसा, करुणा, तपस्या, सहिष्णुता और लोकमंगल जैसे मूल्यों को महत्त्व प्रदान किया है। वेदों, उपनिषदों, रामायण, महाभारत, भगवद्गीता, बौद्ध साहित्य, जैन दर्शन, और संत परंपरा ने भारतीय मानस के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है। इन परंपराओं ने मनुष्य को केवल अपने व्यक्तिगत कल्याण तक सीमित न रहकर समाज, प्रकृति और समस्त मानवता के कल्याण की दिशा में विचार करने की प्रेरणा दी है।
भारतीय संस्कृति की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि उसने विविधताओं के बीच सह-अस्तित्व और संवाद की संभावनाओं को विकसित किया। विभिन्न भाषाओं, क्षेत्रों, परंपराओं और जीवन-पद्धतियों के बावजूद भारतीय समाज को जोड़ने वाले अनेक सांस्कृतिक सूत्र विद्यमान रहे हैं।
राष्ट्रीय चेतना से संपन्न कवि श्री तुषार जी भी इसी व्यापक सांस्कृतिक परंपरा से प्रेरणा ग्रहण करते हैं। वे भारतीय संस्कृति को केवल अतीत की धरोहर के रूप में नहीं देखते, बल्कि वर्तमान जीवन में उसकी उपयोगिता और भविष्य के निर्माण में उसकी भूमिका को भी रेखांकित करते हैं। उनकी दृष्टि में संस्कृति का वास्तविक संरक्षण तभी संभव है, जब उसके श्रेष्ठ मूल्यों को व्यवहार में उतारा जाए।
4."मजहब नहीं
राष्ट्र से ऊपर
प्यारे हिंदुस्तान है।
यह सोने की
मिट्टी इसमें
वीरों का बलिदान है।"
मेड़ों पर वसंत ( गीत/नवगीत संग्रह, पृष्ठ-43)
राष्ट्रीय और सांस्कृतिक चेतना का अर्थ केवल राष्ट्र के प्रति भावनात्मक लगाव या देश के गौरव का वर्णन करना नहीं है। यह अपने देश के इतिहास, संस्कृति, विविधता, सामाजिक समस्याओं और संभावनाओं के प्रति जागरूक होने की विस्तृत भावना है। राष्ट्रीय और सांस्कृतिक चेतना व्यक्ति को यह अनुभव कराती है कि वह एक ऐसे समुदाय का हिस्सा है, जिसकी उपलब्धियों और संघर्षों से उसका गहरा संबंध है।
भारतवर्ष जैसे विस्तृत और विविधतापूर्ण देश में राष्ट्रीय और सांस्कृतिक चेतना का विशेष महत्त्व है। यहाँ अनेक भाषाएँ, बोलियाँ, धार्मिक परंपराएँ और क्षेत्रीय संस्कृतियाँ पायी जाती हैं। इन विविधताओं के बीच संवैधानिक मूल्यों, साझा ऐतिहासिक अनुभवों, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और पारस्परिक सम्मान की भावना राष्ट्रीय और सांस्कृतिक एकता को मजबूत बनाती है।
राष्ट्रीय और सांस्कृतिक चेतना का सच्चा स्वरूप तभी प्रकट होता है, जब राष्ट्रप्रेम के साथ नागरिक कर्तव्यों का बोध भी जुड़ा हो। देश के प्रति प्रेम का अर्थ उसके समाज की समस्याओं के प्रति संवेदनशील होना, सार्वजनिक संपत्ति का उचित देखभाल , सामाजिक न्याय का समर्थन , पर्यावरण की रक्षा करना और प्रत्येक नागरिक की गरिमा को स्वीकार करना भी है।
राष्ट्र औरं संस्कृति के प्रति समर्पित कवि श्री तुषार जी भी अपनी रचनाओं के माध्यम से इन्हीं भावनाओं को जागृत करने का प्रयास करते हैं। वे देश के गौरवशाली इतिहास का स्मरण कराते हैं,स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग को रेखांकित करते हैं और नागरिकों को अपने कर्तव्यों के प्रति सजग होने की प्रेरणा देते हैं। उनकी कविता में राष्ट्रप्रेम और सांस्कृतिक प्रेम केवल भावुक उद्घोष नहीं रहता, बल्कि वह उत्तरदायित्व और कर्मशीलता का आह्वान बन जाता है।
5."मातृभूमि की
निंदा करते
वस्त्र पहनते खादी का,
सोते-जगते
स्वप्न देखते
भारत की बर्बादी का,
जिसे तिरंगे
से नफरत हो
समझो वह शैतान है।"
मेड़ों पर वसंत ( गीत/नवगीत संग्रह, पृष्ठ-43,44)
भारतीय साहित्य के इतिहास में कविता ने सांस्कृतिक और राष्ट्रीय जागरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कविता की विशेषता यह है कि वह जटिल विचारों को भी संवेदनशील भाषा,प्रतीक और बिंबों के माध्यम से जनसामान्य तक पहुँचाने की क्षमता रखती है। यही कारण है कि विभिन्न ऐतिहासिक कालखंडों में कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से सामाजिक चेतना, धार्मिक सुधार, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और राष्ट्रीय स्वाधीनता की भावनाओं को अभिव्यक्ति दी।हिंदी साहित्य में भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने आधुनिक चेतना के विकास में योगदान दिया। मैथिलीशरण गुप्त की रचनाओं में राष्ट्रीयता, सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक जागरण के स्वर दिखाई देते हैं। इसके अलावा माखनलाल चतुर्वेदी की कविताओं में मातृभूमि के प्रति समर्पण की मनमोहक अभिव्यक्ति मिलती है। रामधारी सिंह 'दिनकर' के काव्य में राष्ट्रीय चेतना,संघर्ष और सांस्कृतिक चेतना का बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान है। सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपनी कविताओं के माध्यम से स्वतंत्रता-संग्राम की वीरांगनाओं और राष्ट्रीय संघर्ष को जनमानस तक पहुँचाया।
इन साहित्यकारों की परंपरा यह स्पष्ट करती है कि कविता केवल भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने वाली रचनात्मक शक्ति भी हो सकती है।राष्ट्रीय और सांस्कृतिक चेतना के काव्य-साधक श्री तुषार भी इसी परंपरा से प्रेरणा प्राप्त करते हैं। उनकी कविता में शब्दों की साज-सज्जा से अधिक विचारों की स्पष्टता, भावों की प्रामाणिकता और जीवन-मूल्यों की प्रतिष्ठा महत्त्वपूर्ण दिखती है। वे काव्य-प्रेमियों को केवल प्रभावित नहीं करना चाहते, बल्कि उन्हें अपने दायित्वों को समझने और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए प्रेरित करना चाहते हैं। इस संदर्भ में आचार्य शुक्ल का एक कथन बहुत ही महत्वपूर्ण है, "जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की यह मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आई है, उसे कविता कहते हैं।"
आचार्य रामचंद्र शुक्ल( चिंतामणि भाग 1, निबंध - कविता क्या है, पृष्ठ-82)
भारतीय संस्कृति में धर्म और अध्यात्म की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही है। भारतीय परंपरा में धर्म का एक व्यापक अर्थ नैतिकता,सदाचार और जीवन को व्यवस्थित करने वाले मूल्यों से भी जुड़ा रहा है। इसी प्रकार अध्यात्म व्यक्ति को आत्मानुशासन और जीवन के गहरे अर्थों की खोज के लिए प्रेरित करता है।
धार्मिक और आध्यात्मिक विषयों पर काव्य-रचना करने वाला साहित्यकार जब इन मूल्यों को मानवीय संवेदना से जोड़ता है, तब उसकी रचना केवल धार्मिक उपदेश तक सीमित नहीं रहती। वह मनुष्य के भीतर नैतिक विवेक, करुणा,संयम और आत्मबोध की भावना विकसित करने का माध्यम बन जाती है।
भगवद्गीता में कर्म, कर्तव्य और आत्मानुशासन का जो महत्त्व प्रतिपादित किया गया है, वह भारतीय चिंतन की एक प्रमुख धारा का प्रतिनिधित्व करता है। रामायण में मर्यादा, त्याग, संबंधों की गरिमा और लोककल्याण से जुड़े अनेक प्रसंग मिलते हैं। उपनिषदों में आत्मज्ञान, सत्य की खोज और अस्तित्व संबंधी प्रश्नों पर गंभीर चिंतन मिलता है। संत साहित्य ने प्रेम, भक्ति, आडंबर-विरोध और मानवीय समानता जैसे विषयों को व्यापक जनमानस तक पहुँचाया।इन परंपराओं से प्रेरित कवि श्री तुषार भी धार्मिक आस्था को जीवन के नैतिक पक्ष से जोड़ने का प्रयास करते हैं। वे धर्म को केवल बाहरी अनुष्ठानों में बाँधने के बजाय उसके मानवीय और नैतिक पक्ष को महत्त्व देते हैं। उनकी रचनाओं में आस्था के साथ तर्क,परंपरा के साथ आत्मचिंतन और श्रद्धा के साथ कर्तव्यबोध का भी समन्वय दिखाई देता है। ऐसी काव्य-साधना का महत्त्व इस बात में है कि वह धर्म को सामाजिक सद्भाव,सेवा और मानवकल्याण से जोड़ सकती है। भारतीय संस्कृति की जीवंतता भी इसी में है कि उसकी परंपराओं का अध्ययन केवल अतीत के गौरव के लिए नहीं, बल्कि वर्तमान जीवन को अधिक उत्तरदायी और नैतिक बनाने के लिए किया जाए। श्री तुषार इसी परंपरा के कवियों में आते हैं -
6."सन्ध्या को मन्दिरों में
नगाडे भी शंख भी
भूली न आरती कभी
गंगा के तीर की
इसमें प्रसाद प्रेमचंद
भारतेन्दु हैं
बिस्मिल्ला खाँ की शहनाई
गजलें नजीर की"
सियासत भी इलाहाबाद में संगम नहाती है ( ग़ज़ल-संग्रह, पृष्ठ - 34)
किसी भी समाज की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय चेतना उसके इतिहास और सामूहिक स्मृतियों से गहरे रुप में जुड़ी होती है। इतिहास समाज को यह समझने में सहायता करता है कि उसकी वर्तमान स्थिति किन अनुभवों, संघर्षों और परिवर्तनों के परिणामस्वरूप निर्मित हुई है।
भारतीय इतिहास में ज्ञान-विज्ञान, दर्शन, गणित, चिकित्सा, साहित्य, कला, संगीत और भाषाओं के विकास की अनेक महत्त्वपूर्ण परंपराएँ रही हैं। नालंदा और तक्षशिला जैसे प्राचीन शिक्षा-केंद्र, भारतीय गणित की उपलब्धियाँ, मंदिरों और स्मारकों की स्थापत्य परंपराएँ, शास्त्रीय संगीत की विविध धाराएँ तथा भक्ति और लोकसाहित्य की समृद्ध विरासत भारतीय सांस्कृतिक इतिहास के महत्त्वपूर्ण स्तम्भ हैं।राष्ट्रीय और सांस्कृतिक चेतना का कवि इन उपलब्धियों का स्मरण कराते हुए समाज में आत्मविश्वास उत्पन्न करता है। वह यह बताता है कि किसी राष्ट्र की शक्ति केवल उसकी भौतिक संपन्नता में ही नहीं, बल्कि उसकी ज्ञान-परंपरा, ,सांस्कृतिक- सृजनशीलता और सामाजिक सामर्थ्य में भी निहित होती है।हालाँकि सांस्कृतिक गौरव का वास्तविक अर्थ इतिहास के प्रत्येक पक्ष को निर्विवाद रूप से आदर्श मान लेना नहीं है। किसी भी परंपरा का तर्कपूर्ण अध्ययन उसकी उपलब्धियों के साथ-साथ उसकी सीमाओं और ऐतिहासिक परिवर्तनों को समझने से ही संभव होता है। अतीत से प्रेरणा ग्रहण करना और वर्तमान की आवश्यकताओं के अनुरूप उसका मूल्यांकन करना परस्पर विरोधी कार्य नहीं हैं।
एक जागरूक साहित्यकार इतिहास को न तो विस्मृत करता है और न ही उसे वर्तमान से अलग किसी स्थिर स्मारक में बदलने का प्रयास करता है। वह इतिहास की स्मृतियों को वर्तमान के प्रश्नों से जोड़ता है और भविष्य के लिए नई संभावनाओं का मार्ग दिखाता है। इसी परंपरा में श्री तुषार भी आते हैं-
7."सनातन धर्म के माथे का
चंदन अब नहीं छूटे
यशस्वी हो ये भारत भूमि
सबकी प्रार्थनाएँ हैं
निगाहें साफ कर देखो
तो मेरे राम सबके हैं
उन्हीं से सृष्टि का सौंदर्य
वेदों की ऋचाएँ हैं "
सियासत भी इलाहाबाद में संगम नहाती है( ग़ज़ल-संग्रह, पृष्ठ - 57)
भाषा किसी समाज की सांस्कृतिक पहचान का बहुत ही महत्त्वपूर्ण आधार होती है। भाषा के माध्यम से ही लोकस्मृतियाँ, परंपराएँ, कहावतें, लोकगीत, धार्मिक आख्यानऔर सामूहिक भावनाएँ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचती हैं। इसलिए साहित्यकार के लिए भाषा केवल अभिव्यक्ति का उपकरण नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संवाद का जीवंत माध्यम भी होती है।
हिंदी साहित्य की विकास-यात्रा में अनेक भाषिक धाराओं और साहित्यिक परंपराओं का योगदान रहा है। संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, अवधी, ब्रजभाषा और विभिन्न लोकभाषाओं ने हिंदी की अभिव्यक्ति को समृद्ध किया है। हिंदी साहित्य में आदिकालीन,भक्तिकालीन, रीतिकालीन, आधुनिक साहित्य में भारतीय समाज के विविध अनुभवों का व्यापक चित्रण मिलता है।
राष्ट्रीय और सांस्कृतिक चेतना से संपन्न कवि अपनी भाषा को जनसामान्य के अनुभवों से जोड़ता है। वह लोकजीवन की शब्दावली, सांस्कृतिक प्रतीकों और ऐतिहासिक संदर्भों का उपयोग करके कविता को अधिक मार्मिक बनाता है। उसकी भाषा में परंपरा की स्मृति के साथ वर्तमान जीवन की संवेदना भी उपस्थित रहती है।
भारतीय राष्ट्रीय और सांस्कृतिक चेतना के संदर्भ में हिंदी का महत्त्व स्वीकार करते हुए अन्य भारतीय भाषाओं की समृद्धि और स्वतंत्र सांस्कृतिक पहचान का सम्मान करना भी बहुत ही महत्वपूर्ण है। भारत की भाषिक विविधता उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक और राष्ट्रीय संपन्नता का प्रमाण है।
एक सच्चा सांस्कृतिक और राष्ट्रीय साधक भाषा के माध्यम से समाज को जोड़ने का कार्य करता है। वह अपनी भाषा के प्रति प्रेम रखते हुए दूसरी भाषाओं की साहित्यिक उपलब्धियों के प्रति भी सम्मान की भावना विकसित करता है। इस प्रकार उसकी साहित्यिक साधना सांस्कृतिक आत्मीयता और राष्ट्रीय एकता दोनों को मजबूत बनाने में सहायक होती है। इस परंपरा को श्री तुषार बहुत ही ईमानदारी से निभाते हैं -
8."तहजीब और अदब के हैं
किस्से जहाँ तमाम
कितनी हसीन है ये
मियाँ लखनऊ की शाम
पूजा, नमाज़, प्रार्थना
सूफी, सबद के रंग
सबका यहाँ पे होता
जमाने से एहतराम"
सियासत भी इलाहाबाद में संगम नहाती है( ग़ज़ल-संग्रह, पृष्ठ -35)
भारतीय सभ्यता और संस्कृति का वास्तविक स्वरूप केवल ग्रंथों, मंदिरों, और शास्त्रीय कलाओं में ही नहीं, बल्कि गाँवों, नगरों और सामान्य जनजीवन में भी भलीभांति है। लोकगीत, लोकनृत्य, पारंपरिक कलाएँ, हस्तशिल्प, कृषि-जीवन, और सामुदायिक उत्सव भारतीय संस्कृति के बहुत ही मार्मिक एवं जीवंत पक्ष हैं।लोकसंस्कृति में समाज की सामूहिक स्मृतियाँ और जीवन के यादगार अनुभव सुरक्षित रहते हैं। इसमें श्रम का महत्व,प्रकृति के साथ रागात्मक संबंध, सामाजिक सहयोग और जीवन की कठिनाइयों के बीच आशा बनाए रखने की उम्मीद दिखाई देती है। सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय चेतना का कवि जब लोकजीवन की ओर दृष्टि डालता है, तो उसकी कविता केवल बड़े ऐतिहासिक प्रसंगों अथवा महान व्यक्तित्वों तक सीमित नहीं रहती। वह किसान के श्रम, श्रमिक के संघर्ष, ग्रामीण जीवन की सरलता, लोककलाकार की साधना और सामान्य नागरिक के सपनों को भी अभिव्यक्ति देता है।इस दृष्टि से राष्ट्रीय-सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक संवेदना एक-दूसरे के पूरक नजर आते हैं। यदि साहित्य संस्कृति की चर्चा तो करे, लेकिन समाज के साधारण लोगों की पीड़ा से विमुख रहे, तो उसकी सांस्कृतिक और राष्ट्रीय दृष्टि अधूरी रह जाती है।
सच्चा काव्य-साधक लोकजीवन की गरिमा को पहचानता है। श्री तुषार यह समझते हैं कि संस्कृति किसी एक वर्ग, क्षेत्र अथवा समुदाय की निजी संपत्ति नहीं , बल्कि अनेक पीढ़ियों के श्रम और रचनात्मक योगदान से विकसित होने वाली सामूहिक धरोहर है। श्री तुषार लिखते भी हैं -
9."गले में क्रास पहने है
मगर चंदन लगाती है
सियासत भी इलाहाबाद में
संगम नहाती है
सनातन संस्कृति कितनी
निराली और पुरानी है
हमारी आस्था चिडियों को भी
दाना खिलाती है"
सियासत भी इलाहाबाद में संगम नहाती है( ग़ज़ल-संग्रह, पृष्ठ -14)
संस्कृति और राष्ट्र का समृद्धिकरण केवल राजनीतिक संस्थाओं, प्रशासनिक व्यवस्थाओं और आर्थिक विकास से नहीं होता बल्कि वहाँ के नागरिकों के विचार, सामाजिक सद्भाव , शिक्षा, सांस्कृतिक दृष्टि और सामूहिक उत्तरदायित्व की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। कविता इन सभी पक्षों को प्रभावित करने की क्षमता रखती है।कवि तुषार जी समाज के भीतर उपस्थित प्रश्नों को पहचानते हैं और उन्हें संवेदनशील अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं। वे अन्याय, शोषण, सामाजिक विभाजन और नैतिक पतन जैसी समस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं। इसके साथ ही वे सद्भाव, सहयोग, परिश्रम, सेवा और सामाजिक उत्तरदायित्व के मूल्यों को भी प्रतिष्ठित करते नजर आते हैं।राष्ट्रीय और सांस्कृतिक चेतना का कवि अपनी लेखनी से समाज को यह संदेश देता है कि राष्ट्र और संस्कृति प्रेम केवल भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि दैनिक जीवन में निभाए जाने वाले कर्तव्यों का नाम भी है। ईमानदारी से कार्य करना, सार्वजनिक जीवन में नैतिकता बनाए रखना, विविधताओं का सम्मान करना, शिक्षा को बढ़ावा देना और समाज के कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशील होना मजबूत संस्कृति और राष्ट्रनिर्माण के महत्त्वपूर्ण आधार हैं।साहित्यकार का दायित्व केवल प्रशंसा करना नहीं, बल्कि आवश्यक होने पर प्रश्न उठाना भी है। किसी समाज के प्रति सच्ची निष्ठा का अर्थ उसकी समस्याओं को छिपाना नहीं, बल्कि उनके समाधान के लिए विवेकपूर्ण चिंतन को प्रस्तुत करना है।इस प्रकार राष्ट्रीय और सांस्कृतिक चेतना से युक्त काव्य समाज में आत्ममंथन और आत्मविश्वास दोनों की भूमिका निभाता है। वह लोगों को अपनी उपलब्धियों पर गर्व करना सिखाता है, लेकिन साथ ही अपनी कमियों को पहचानकर उन्हें दूर करने का साहस भी प्रदान करता है। परंपराप्राप्त ग्रंथों में इसे कुछ इस प्रकार समझाया गया है-
10."कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः। लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि॥"
यथार्थ गीता( अध्याय-3, श्लोक-20, पृष्ठ-78)
समकालीन समय में भारतीय समाज अनेक परिवर्तनों से गुजर रहा है। विज्ञान और तकनीक का विकास, वैश्वीकरण, बदलती जीवन-शैली और नई पीढ़ी की आकांक्षाएँ समाज के वैचारकी को प्रभावित कर रही हैं। ऐसे समय में परंपरा और आधुनिकता के संबंध पर विचार करना विशेष रूप से आवश्यक हो जाता है।
परंपरा मनुष्य को ऐतिहासिक निरंतरता, सांस्कृतिक पहचान और सामूहिक अनुभव प्रदान करती है तो आधुनिकता उसे नए प्रश्न पूछने, वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने, सामाजिक संरचनाओं का पुनर्मूल्यांकन करने और जीवन की समस्याओं के नए समाधान खोजने के लिए प्रेरित करती है।राष्ट्रीय और सांस्कृतिक चेतना के कवि श्री तुषार इन दोनों के बीच सार्थक संवाद स्थापित करने का प्रयास करते हैं। वे अपनी राष्ट्रीय और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहते हुए वर्तमान युग की चुनौतियों को समझते हैं। वे परंपरा के उन मूल्यों को स्वीकार करते हैं, जो सामाजिक सद्भाव और जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाते हैं; साथ ही उन रिवाजों और धारणाओं की आलोचनात्मक समीक्षा के लिए भी स्थान बनाते हैं, जिनसे असमानता अथवा अन्याय को बढ़ावा मिलता है।
ऐसी दृष्टि सांस्कृतिक और राष्ट्रीय संरक्षण को जड़ता में बदलने से बचाती है। संस्कृति तभी जीवित रहती है, जब वह बदलते समय के साथ संवाद करती है और नई पीढ़ियों के अनुभवों को आत्मसात करने की क्षमता बनाए रखती है।कवि का कार्य केवल पुरानी स्मृतियों को दोहराना नहीं, बल्कि उन स्मृतियों में निहित मूल्यों को वर्तमान जीवन में अर्थपूर्ण बनाना भी है। यही परंपरा की रचनात्मक पुनर्व्याख्या है। परंपरा प्राप्त ग्रंथो में इसे कुछ इस प्रकार समझाया गया है-
11."यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।"
यथार्थ गीता( अध्याय -3, श्लोक -21, पृष्ठ -79)
भारत की राष्ट्रीय और सांस्कृतिक पहचान उसकी विविधताओं और साझे अनुभवों के बीच विकसित हुई है। विभिन्न धार्मिक समुदायों,क्षेत्रीय संस्कृतियों और सामाजिक परंपराओं के बीच संवाद तथा सहयोग ने भारतीय समाज को अनेक स्तरों पर समृद्ध बनाया है।
राष्ट्रीय और सांस्कृतिक चेतना का व्यापक और सकारात्मक स्वरूप सामाजिक समरसता और नागरिक समानता को महत्त्वपूर्ण मानता है। राष्ट्र के प्रति निष्ठा का अर्थ केवल यह नहीं होता कि समाज की विविधताओं को ही समाप्त कर दिया जाए। इसके विपरीत, एक सशक्त राष्ट्र वह होता है, जहाँ नागरिक अपनी विविध सांस्कृतिक आयामों के साथ समान अधिकारों, साझी संस्कृतियों और संवैधानिक मूल्यों से जुड़े रहें।कवि तुषार अपनी रचनाओं के माध्यम से सामाजिक विभाजनों के बीच संवाद की संभावनाएँ विकसित करते हैं। वे मनुष्य की गरिमा, करुणा और न्याय की प्रतिष्ठा करके समाज को अधिक संवेदनशील बनाने में योगदान देने का प्रयास करते हैं।भारतीय संस्कृति की समृद्ध परंपराओं में विभिन्न धार्मिक और साहित्यिक आयामों का योगदान रहा है। इन विविध आयामों का अध्ययन यह समझने में सहायता करता है कि संस्कृति एक निरंतर विकसित होने वाली क्रियाविधि है, जिसमें संवाद, और रचनात्मक परिवर्तन का महत्त्वपूर्ण स्थान है।राष्ट्रीय और सांस्कृतिक चेतना के काव्य-साधक श्री तुषार इसी व्यापक दृष्टि के साथ राष्ट्रप्रेम को मानवीय मूल्यों से जोड़ते हैं । उनकी रचनाओं में मातृभूमि के प्रति अनुराग के साथ-साथ विभिन्न संस्कृतियों के लोगों के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता की भावना भी उपस्थित रहती है।
12."आजादी का पर्व बड़ा है,
मजहब के त्योहारों से।
आसमान को भर दो अपनी,
खुशियों के गुब्बारों से।
अनगिनत फूलों का उपवन,
यहाँ किसी से बैर नहीं।
जो सरहद पर आँख दिखाए,
समझो उसकी खैर नहीं।"
मेड़ों पर वसंत( गीत/नवगीत संग्रह, पृष्ठ - 69)
कविता लिखना केवल भावनाओं के सहज प्रवाह का फल नहीं है। इसके पीछे निरंतर अध्ययन, जीवन के अनुभवों का अवलोकन और अभिव्यक्ति के प्रति सजगता भी बहुत ही महत्वपूर्ण होती है। काव्य-साधना एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें रचनाकार अपने अनुभवों को परिष्कृत करता है और उन्हें कलात्मक रूप प्रदान करता है।
राष्ट्रीय तथा सांस्कृतिक विषयों पर लेखन करने वाले कवि के लिए यह आवश्यकता और भी बढ़ जाती है। उसे इतिहास, दर्शन, धर्म,और साहित्य के विविध पक्षों का अध्ययन करना पड़ता है। सांस्कृतिक संदर्भों का उचित ज्ञान रचना को गहराई प्रदान करता है, जबकि तथ्यात्मक सावधानी उसे विश्वसनीय बनाती है।श्री तुषार की काव्य-सफलता केवल इस बात पर निर्भर नहीं करती कि वे कितने प्रभावशाली शब्दों का प्रयोग करते हैं, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करती है कि उनके विचार कितने स्पष्ट, भाव कितने प्रामाणिक और अभिव्यक्ति कितनी सृजनात्मक है।काव्य-साधना का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष आत्मानुशासन भी है। निरंतर लेखन, अध्ययन, संशोधन और मूल्यांकन के माध्यम से श्री तुषार अपनी अभिव्यक्ति को परिष्कृत करते हैं। वे अपने समय की समस्याओं को समझने का प्रयास करते हैं और अपने विचारों को साहित्यिक रूप देने के लिए भाषा तथा शिल्प के नए प्रयोग करते हैं।
इस प्रकार काव्य-साधना व्यक्तिगत प्रतिभा के साथ-साथ निरंतर परिश्रम और बौद्धिक ईमानदारी की भी माँग करती है। राष्ट्रीय चेतना और भारतीय संस्कृति पर आधारित साहित्य तभी स्थायी प्रभाव उत्पन्न करता है, जब उसमें भावनात्मक ऊर्जा के साथ साहित्यिक गुणवत्ता और वैचारिक गहराई भी विद्यमान हो।
श्री तुषार की कविताओं पर गहरी दृष्टि डालने पर हम देखते हैं कि उनकी कविता में राष्ट्रीय भावनाओं का प्रबल आवेग दिखाई देता है और यह भावुकता कहीं-कहीं आक्रामक राष्ट्रवाद का स्वरूप ग्रहण कर लेती है। ‘हिंद महासागर उबलेगा’ और ‘धरती थर-थर काँपेगी’ जैसे बिंब राष्ट्र की शक्ति और प्रतिरोध की क्षमता को व्यक्त करते हैं, लेकिन इनसे कविता में संवाद, कूटनीति और शांतिपूर्ण समाधान की संभावनाएँ अपेक्षाकृत पीछे छूट जाती हैं। इस प्रकार श्री तुषार की कविताओं में राष्ट्रीय स्वाभिमान की प्रभावशाली अभिव्यक्ति तो है लेकिन उसका वैचारिक विस्तार तब और भी विस्तृत हो सकता है जब वीरता के साथ विवेकपूर्ण कूटनीति तथा शांति और सह-अस्तित्व के मूल्यों को भी समान रूप से महत्त्व दिया जाए।-
13. " छेंड़ो मत
लद्दाख, हिमालय
घाटी हिंदुस्तान की।
सन् बासठ की नहीं रही
अब माटी हिंदुस्तान की।
हिंद महासागर उबलेगा
धरती थर- थर कांपेगी
बीजिंग अबकी बार
तुम्हारा कद भी
दिल्ली नापेगी।
टूटेगी दीवार चीन की
अब तेरे अभिमान की।"
मेड़ों पर वसंत( गीत/ नवगीत संग्रह, पृष्ठ - 33)
इसके अलावा श्री तुषार की कविताओं पर थोड़ी और पैनी दृष्टि डालने पर पता चलता है कि उनकी कविताओं में प्रतीकात्मकता की सहजता उसकी प्रमुख शक्ति है। 'फूलों का चमन है मेरा' नामक कविता में परिचित बिंब के माध्यम से जटिल सांस्कृतिक प्रश्न को सरल एवं ग्राह्य बनाया गया है और साथ ही साथ भाषा में सहजता, कथ्य में स्पष्टता और भावाभिव्यक्ति में आत्मीयता भी है। श्री तुषार अपने विचारों को दुरूह दार्शनिक विमर्श में उलझाने के बजाय परिचित धार्मिक प्रतीकों के सहारे प्रस्तुत करते है। इससे कविता सामान्य पाठक तक आसानी से पहुँचती तो है, लेकिन कविता की वैचारिक सीमाएँ भी हैं। जैसे- धार्मिक ग्रंथों और प्रतीकों को एक साथ रख देना अपने आप में राष्ट्रीय और सांस्कृतिक समन्वय की पूर्ण स्थापना नहीं है। वास्तविक समन्वय के लिए विभिन्न परंपराओं के बीच संवाद, समानता और परस्पर सम्मान की स्थितियों को भी समझना बहुत ही आवश्यक है। कविता में विविधता का उत्सव तो दिखाई देता है, लेकिन धार्मिक-सामाजिक तनावों, असमानताओं तथा सांप्रदायिकता जैसी चुनौतियों का गहरा विश्लेषण अपेक्षाकृत कम है। इसी कारण इसकी वैचारिक अभिव्यक्ति अधिकतर आदर्शवादी और भावनात्मक धरातल पर स्थित दिखाई देती है।इसके अतिरिक्त, कविता में धार्मिक प्रतीकों की उपस्थिति व्यापक सांस्कृतिक दृष्टि तो निर्मित करती है लेकिन यदि भारतीय समाज की भाषायी, क्षेत्रीय और लोक-सांस्कृतिक विविधताओं को भी समान रुप से विस्तार दे दिया जाता तो इसकी समावेशी चेतना और अधिक व्यापक हो जाती।
14. " अनगिनत रंग के
फूलों का चमन है मेरा।
कौन है मुल्क बता
जैसा वतन है मेरा?
आरती पूजा बिना
जिसकी कोई शाम नहीं,
पूरी दुनिया में कहीं
कृष्ण नहीं, राम नहीं,
इसकी खुशबू नहीं कम
हो ये जतन है मेरा।
बाइबिल, ग्रंथ है
कुरआन है, गीता जिसमें,
राम की गाथा में
हनुमान हैं,सीता जिसमें
सारे रंगों को
समेटे ये गगन है मेरा। "
मेड़ों पर वसंत( गीत/नवगीत संग्रह, पृष्ठ - 41)
निष्कर्ष -
राष्ट्रीय चेतना और भारतीय संस्कृति की काव्य-साधना भारतीय साहित्यिक परंपरा का एक महत्त्वपूर्ण प्रवाह है। यह प्रवाह राष्ट्र के प्रति आत्मीयता, संस्कृति के प्रति सम्मान, इतिहास के प्रति जागरूकता और मानवीय मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता को साहित्यिक अभिव्यक्ति प्रदान करती है। इसके माध्यम से कवि तुषार समाज को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से परिचित कराते हैं और वर्तमान जीवन की चुनौतियों के प्रति सजग रहने की प्रेरणा देते हैं।श्री तुषार के काव्य- साधना की विशेषता केवल यह नहीं है कि वे राष्ट्र की महिमा का गान करते हैं या केवल सांस्कृतिक परंपराओं का वर्णन करते हैं। उनकी वास्तविक विशेषता यह है कि वे अपनी रचनाओं के माध्यम से मनुष्य के भीतर उत्तरदायित्व, संवेदनशीलता, नैतिक विवेक और रचनात्मक चेतना का विकास करने का प्रयास करते हैं।
संदर्भ सूची-
1.लेखक- आचार्य रामचंद्र शुक्ल।, पुस्तक- चिंतामणि भाग4(निबंध संग्रह), प्रकाशक - मनीष पब्लिकेशन्स, वर्ष- 2022, पृष्ठ-संख्या- 181
2. लेखक- जयकृष्ण राय 'तुषार', पुस्तक- मेड़ों पर वसंत(गीत/नवगीत संग्रह), प्रकाशक- साहित्य भंडार, वर्ष- 2021, पृष्ठ-संख्या - 61
3.वही, पृष्ठ-संख्या - 59
4.वही, पृष्ठ-संख्य-43
5.वही, पृष्ठ-संख्या - 43,44
6.लेखक- वही, पुस्तक - सियासत भी इलाहाबाद में संगम नहाती है(ग़ज़ल संग्रह),प्रकाशक- लोकभारती प्रकाशन, वर्ष- 2025, पृष्ठ-संख्या - 34
7.वही, पृष्ठ-संख्या- 57
8.वही, पृष्ठ-संख्या-35
9.वही, पृष्ठ-संख्या-14
10.लेखक- स्वामी श्री अड़गड़ानन्द जी, पुस्तक- यथार्थ गीता, प्रकाशक- श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट, वर्ष- नवंबर सन् 2018, पृष्ठ-संख्या-78
11.वही, पृष्ठ-संख्या-79
12. लेखक- जयकृष्ण राय 'तुषार', पुस्तक- मेड़ों पर वसंत(गीत/नवगीत संग्रह), प्रकाशक- साहित्य भंडार, वर्ष - 2021, पृष्ठ-संख्या-69
13.वही, पृष्ठ- संख्या-33
14. वही, पृष्ठ-संख्या-41
नाम - रामेश्वर प्रसाद।
शोधार्थी - रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जबलपुर, मध्य- प्रदेश ( भारत)
पता - anushree homeopathy medical college,Kasodhan Nagar, Karmeta, Madhotal, Jabalpur, Madhya Pradesh
pin code -482002
ईमेल- rameshwargarg1008@gmail. Com
मोबाईल -, 9026613579,8756945330






