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शनिवार, 6 मार्च 2021

एक ग़ज़ल - मेरी क़िस्मत में नहीं इस झील का शतदल रहा

 

 



चित्र -साभार गूगल 

क ग़ज़ल -

मेरी क़िस्मत में नहीं इस झील का शतदल रहा

मेरी क़िस्मत में नहीं इस झील का शतदल रहा

मैं भी हातिम था मगर हर रास्ता दलदल रहा


एक ही दरिया से निकले थे सभी पानी लिए

आसमां में मेरे पानी के बिना बादल रहा


सिद्धियाँ थी दास उसकी वह तो परमहंस था 

मूर्ति से संवाद उसका,कहते सब पागल रहा 


नायिका को काव्य में लिखते थे मृगनयनी सभी

गाय के घी से बना उस दौर में काजल रहा


मैं कुशल तैराक था पर भाग्य पर निर्भर रहा

एक छोटी सी नदी की धार में असफ़ल रहा


सच परखने के लिए सीता को किसने अग्नि दी

थी नहीं गीता मगर दरिया में गंगाजल रहा


राम जी तम्बू में थे सरयू बहुत लाचार थी

पर अदालत की किताबों में सुनहरा हल रहा

जयकृष्ण राय तुषार



चित्र -साभार गूगल 

मंगलवार, 2 मार्च 2021

एक गज़ल -हर दिन डूबे सूरज इसमें चाँद को हर दिन आना है

 

विशेष -
प्रोफ़ेसर सदानन्दप्रसाद गुप्त 
कार्यकारी अध्यक्ष 
उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान 


आप सभी को प्रणाम करते हुए एक ग़ज़ल पोस्ट कर रहा हूँ |इस ग़ज़ल कुछ नामों की प्रशंसा भी है इसका स्पष्टीकरण भी दे रहा हूँ |जीवन के किसी मोड पर कुछ गुरू ,शुभचिंतक मिल जाते हैं जो बिना परिचय के भी आपको बहुत कुछ आशीष दे जाते हैं |प्रोफ़ेसर सदानंद प्रसाद गुप्त जिनके द्वारा पुरस्कार सम्मान के साथ हिन्दी संस्थान में काव्य पाठ का अवसर मिला |डॉ0 उदय प्रताप सिंह अध्यक्ष हिंदुस्तानी एकेडमी ने मुझ पर भरोसा किया और एकेडमी का कुलगीत मुझसे लिखवाया |प्रोफ़ेसर ईश्वर शरण विश्वकर्मा जी ने मुझे सहज भाव से उच्चतर शिक्षा सेवा चयन आयोग का पैनल एडवोकेट बनाया |इन सभी गुरुजनों से जोडने वाला एक नाम है महन्थ दिग्विजय नाथ कालेज में हिन्दी के अध्यापक डॉ 0 नित्यानन्द श्रीवास्तव जी का |
प्रोफ़ेसर ईश्वर शरण विश्वकर्मा
अध्यक्ष
उच्चतर शिक्षा सेवा चयन 
आयोग



मेरी छत पर इन चिड़ियों का हर दिन पानी -दाना है
यह भी तो एक प्यार -मोहब्बत जैसा ही अफ़साना है

झील का पानी ,पेड़ का साया मिल जाए तो अच्छा है
वरना पाँव में छाले लेकर राह में चलते जाना है

एक तिलस्मी जादूगर सा अपना यह आकाश भी है
हर दिन डूबे सूरज इसमें चाँद को हर दिन आना है

सदानन्द जी राष्ट्रधर्म और हिन्दी के उद्गाता हैं
उनका मन तो राष्ट्रप्रेम की झील में तालमखाना है

उदय प्रताप सिंह ने प्रयाग का गौरव मान बढ़ाया है
गुरु गोरख के संग हिन्दी का इनको मान बढ़ाना है

ईश्वर शरण विश्वकर्मा जी का उज्ज्वल इतिहास रहा
शत-प्रतिशत ईमान ही जिनके जीवन का पैमाना है

कोई रिश्ता नहीं है जिससे वह मेरा शुभ चिंतक है
नित्यानन्द जी से तो अपना काशी का याराना है

निर्गुण गाओ सबसे अच्छा यदि मौसम का गीत न हो
उसकी महफ़िल जैसे -तैसे हमको आज सजाना है

जयकृष्ण राय तुषार
डॉ 0 उदय प्रताप सिंह 
अध्यक्ष
हिन्दुस्तानी  एकेडमी प्रयागराज 


एक ग़ज़ल -मैं तो मिट्टी का दिया हूँ कहीं जल सकता हूँ

 

चित्र -साभार गूगल 

एक ग़ज़ल-
उड़ भी सकता हूँ मैं ,पानी पे भी चल सकता हूँ
सिद्ध हूँ ख़्वाब हक़ीकत में बदल सकता हूँ

कुछ भी मेरा हैं कहाँ, घर नहीं, असबाब नहीं
जब भी वो कह दे मैं घर छोड़ के चल सकता हूँ

पानियों पर, मुझे मन्दिर में, या घर में रख दो
मैं तो मिट्टी का दिया हूँ कहीं जल सकता हूँ

शौक मेरा ये नहीं पाँव में चुभता हूँ मगर
एक काँटा हूँ कहाँ फूल सा खिल सकता हूँ

मैं भी सूरज हूँ मगर कृष्ण के द्वापर वाला
दिन के रहते हुए भी शाम सा ढल सकता हूँ
जयकृष्ण राय तुषार
चित्र -साभार गूगल