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मंगलवार, 12 अक्तूबर 2021

एक गीत -यह पुण्य देवभूमि है | राज्यगीत

  

 

काशी



यह पुण्य देवभूमि है

यह पुण्य देवभूमि है
यहाँ न कोई क्लेश है ।
ध्वज लिए विकास का
यह अग्रणी प्रदेश है
यह उत्तर प्रदेश है, यह उत्तर प्रदेश है ।

सुबहे काशी है यहीं
यहीं अवध की शाम है,
यह संत,ऋषि,विचारकों
औ ज्ञानियों का धाम है,
कला,कौशल विकास
हेतु पूँजी का निवेश है।
यह उत्तर प्रदेश है ,यह उत्तर प्रदेश है।

गंगा,जमुना,सरयू
पुण्य नदियों का प्रवाह है,
अनेकता में एकता का
प्रेम से निबाह है,
सारनाथ,कुशीनगर
बुद्ध का उपदेश है,
यह उत्तर प्रदेश है,यह उत्तर प्रदेश है।

काशी ,मथुरा,वृंदावन
गुरु गोरख यहीं मिले,
राम की अयोध्या में
अखण्ड दीप लौ जले,
परम्परा, नवीनता का
इसमें समावेश है ।
यह उत्तर प्रदेश है,यह उत्तर प्रदेश है।

चौरी-चौरा,झाँसी, मेरठ की
जमीन लाल है,
तीर्थ ये शहीदों का
ये क्रांति की मशाल है,
गौ माता का रक्षक है
ये किसानों का सुदेस है।
यह उत्तर प्रदेश है,यह उत्तर प्रदेश है।

चित्रकूट,श्रृंगवेरपुर
यहीं प्रयाग है,
विश्व पर्व कुम्भ 
इसमें धूनियों की आग है,
शिक्षा,ज्ञान,योग औ
अध्यात्म में विशेष है।
यह उत्तर प्रदेश है,यह उत्तर प्रदेश है।

रक्षक है सर्वधर्म की
माँ भारती महान है,
तुलसी के संग कबीर
औ रविदास जी का मान है,
माँ विन्ध्वासिनी की
दिव्य शक्ति भी अशेष है।
यह उत्तर प्रदेश है,यह उत्तर प्रदेश है।

स्वदेश के लिए यहाँ
बलिदान एक पर्व है,
झलकारी बाई,झाँसी
की रानी पर इसको गर्व है,
यह मंगल पांडे,बिस्मिल
और आज़ाद का प्रदेश है।
यह उत्तर प्रदेश है,यह उत्तर प्रदेश है।

यह विश्व राजनीति का
महान एक केंद्र है,
यहाँ का वीर सरहदों पे
बज्र ले महेंद्र है,
विभिन्न भाषा,बोलियाँ
विभिन्न भूषा-वेश है।
यह उत्तर प्रदेश है,यह उत्तर प्रदेश है।

बिरहा, कजरी ,आल्हा
इसके मौसमों का गीत है,
धान-पान धानी-हरे
गेहूँ स्वर्ण-पीत है,
झील-ताल खिलते कमल
खुशबुओं का देश है।
यह उत्तर प्रदेश है,यह उत्तर प्रदेश है।

राज्य का प्रतीक चिन्ह
मत्स्य और तीर है,
वृक्ष है अशोक, पुष्प
टेसू ज्यों अबीर है,
स्त्रियों के मान और
सम्मान का आदेश है।
यह उत्तर प्रदेश है,यह उत्तर प्रदेश है।

कवि जयकृष्ण राय तुषार




कवि-जयकृष्ण राय तुषार


एक ग़ज़ल-फ़साना ग़ज़ल में था

 


चित्र साभार गूगल


एक ग़ज़ल-फ़साना ग़ज़ल में था


तन्हाइयों में क़ैद था आँसू भी जल में था

ग़म भी तमाम रंग में खिलते कमल में था


महफ़िल में सबके दिल को कोई शेर छू गया

शायर का इश्क,ग़म का फ़साना ग़ज़ल में था 


घर के दिए हवा की शरारत से बुझ गए

जलता रहा वो शौक से गंगा के जल में था


राजा के साथ कीमती परदे बदल गए

दरबार में पुराना रवैया अमल में था


बासी हवा के साथ धुँआ रास्तों में था

कहने को मौसमों का नज़ारा बदल में था


महफ़िल में उसके नाम क़सीदे पढ़े गए

जिसका रदीफ़,काफ़िया, मतला हज़ल में था


भूखे थे आसमां में परिन्दे उदास थे

दाने जहाँ-जहाँ थे बिजूखा फसल में था


जब भी चुनाव आया ग़रीबों में वो दिखा

वैसे तो उसका ठौर-ठिकाना महल में था

जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साभार गूगल

शुक्रवार, 21 मई 2021

एक गीत -मेड़ों पर वसन्त

 

चित्र -साभार गूगल 
एक गीत -मेड़ों पर वसन्त 
लोकरंग 
में वंशी लेकर 
गीत सुनाता है |
मेड़ों पर 
वसन्त का 
मौसम स्वप्न सजाता है |

सुबह -सुबह
उठकर आँखों 
का काजल मलता  है ,
संध्याओं को 
जुगनू बनकर 
घर -घर जलता है ,
नदियों के 
जूड़े -तितली 
के पंख सजाता है |

हल्दी के 
छापे -कोहबर
में रंग इसी का है ,,
कोई भी 
हो फूल 
फूल में रंग इसी का है ,
आँखों की 
भाषा पढ़ने का 
हुनर सिखाता है |

पीला कुर्ता 
पहने सूरज 
डूबे झीलों में ,
यादों की 
खुशबू फैली है 
कोसों -मीलों में ,
यह जीवन 
का सबसे  
अच्छा राग सुनाता है |

कवि -जयकृष्ण राय तुषार 
चित्र -साभार गूगल