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शनिवार, 3 अप्रैल 2021

एक ग़ज़ल -ये इश्क नहीं ख़त था किसी काम के लिए

 


एक ग़ज़ल -ये इश्क नहीं ख़त था किसी काम
चित्र -साभार गूगल 

एक ग़ज़ल -
ये इश्क नहीं ख़त था किसी काम के लिए 

 ये इश्क नहीं ख़त था किसी काम के लिए   
जादूभरी निगाह थी इक शाम के लिए 

होठों पे तबस्सुम को सलीके से सजाना 
आँसू न रहे आरिज़ -ए -गुलफाम के लिए 

साक़ी की अदाओं का दीवाना हूँ सच है 
पै उसकी क़सम तोड़ दूँ क्या जाम के लिए 

मुद्दत पे मिले हैं तो चलो छत पे खुले में 
मसनद न लगाना अभी आराम के लिए 

शोहरत के दिनों के हैं फ़साने मेरे कितने 
अफ़साना कौन लिखता है नाकाम के लिए 

जयकृष्ण राय तुषार 

बुधवार, 17 मार्च 2021

एक ग़ज़ल-इस बार लिखा उसने न मिलने का बहाना

 

चित्र साभार गूगल


एक ग़ज़ल


मौसम भी वही माली भी बेकार नहीं है

पर फूल में खुशबू कहीं इस बार नहीं है


इस बार लिखा उसने न मिलने का बहाना

इस बार भी खाली कोई इतवार नहीं है


दिखने में तो ये घर भी महल जैसा बना है

पर खिड़की कहीं कोई हवादार नहीं है


शोहरत की बुलन्दी पे है ये वक्त है उसका

वो मंच विदूषक कोई किरदार नहीं है


अब गाँव में बिक जाते हैं आमों के बगीचे

अब सोच रहा हूँ कहाँ बाजार नहीं है


एक आस मोहब्बत की लिए फूल खड़ी है

ऑंखें भी मेरी उससे दो चार नहीं है


मुझको भी निभाना पड़ा इक रस्म से रिश्ता

अब मेरा क़रीबी ही वफ़ादार नहीं है


जंगल को हिरन छोड़ के क्यों भाग रहा है

लोगों से सुना था यहाँ गुलदार नहीं है


होंठों पे हँसी नकली है आँखों मे उदासी

दिल थाम के हँसने का समाचार नहीं है


जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साभार गूगल



शनिवार, 13 मार्च 2021

एक गीत-बासमती के धान हरे हैं

 

चित्र साभार गूगल


एक गीत-बासमती के धान हरे हैं


नहरों,नदियों

तालों वाले

बासमती के धान हरे हैं ।

जो मेघों की

छाया में थे

उनके पत्ते फूल झरे हैं ।


बौछारों से

पेड़ भींगते

देहरी पर गौरैया बोले,

देवदास का

मन उदास है

खिड़की बन्द न पारो खोले,

बेला, गुड़हल

चम्पा महके

पर कनेर पर ज़हर फरे हैं ।


चाक कुम्हारों के

चुप बैठे

 धागा टूटा मिट्टी गीली,

झील किनारे

सोई हिरनी

हिरन देखता आँख नशीली,

बाघों की

आहट से

सारे पशु पक्षी वाचाल डरे हैं

जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साभार गूगल