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मंगलवार, 16 फ़रवरी 2021

कुछ दोहे -हल्दी के छापे लगें कोहबर गाये गीत

 

चित्र -साभार गूगल 

आस्था और प्रेम के दोहे 

तम के आँगन को मिले पावन ज्योति अमन्द  

केसर ,चन्दन शुभ लिखें घर -घर हो मकरंद 


हे मैहर की शारदा हे विन्ध्याचल धाम 

मेरी पावन आस्था करती रहे प्रणाम 


सरयू उठकर भोर में जपती सीताराम 

वंशी पर मोहित हुई वृन्दावन की शाम 


निर्मल हो आकाश यह धरा ,नदी के कूल 

जन गण मन गाते रहें बच्चों के स्कूल 


हल्दी के छापे लगें कोहबर गाये गीत 

अनब्याहे हर स्वप्न को मिले सलोने मीत 


बंजर धरती ,खेत की लौटे फिर मुस्कान 

काशी अस्सी घाट पर खाये मघई पान 


तन -मन सब निर्मल करे पावन धूनी आग 

गंगा माँ की आरती करता रहे प्रयाग 


पूजा संध्या प्रार्थना संतों का उपदेश 

आते अनगिन भक्त जन बिन चिट्ठी सन्देश 


जूड़े सोये गाल पर इतर लगे रूमाल 

नदियों में फिर पड़ गए मछुआरों के जाल 


वातायन खुलने लगे लगे सुहानी भोर 

नींद  न आती रात में देखे चाँद चकोर 


नाव किनारे आ गई लेकर ताजे फूल 

मन के माफ़िक बह रहीं धाराएँ प्रतिकूल 


धरती रति के वेश में मौसम हुआ अनंग 

जोगन आँखों में भरे जाने कितने रंग 

कवि -जयकृष्ण राय तुषार 

चित्र -साभार गूगल 


सोमवार, 15 फ़रवरी 2021

एक ग़ज़ल -मढ़ेंगे किस तरह इस मुल्क की तस्वीर सोने में

 

चित्र -साभार गूगल 

एक ग़ज़ल -

मढ़ेंगे किस तरह इस मुल्क की तस्वीर सोने में 


मढ़ेंगे किस तरह भारत की हम तस्वीर सोने में 

लगे हैं मुल्क के गद्दार सब जादू औ टोने में 


यहाँ हड़ताल और धरना भी प्रायोजित विदेशों से 

पड़ोसी मुल्क से आती है बिरयानी भगोने में 


सफ़र में हम चले जब से अपशकुन हो रहे हर दिन 

बड़ी गहरी है साज़िश टूल किट बिल्ली के रोने में 


जो दरिया पी गए ,पानी का कतरा भी नहीं छोड़े 

वही मल्लाह शामिल हैं नयी कश्ती डुबोने में 


कई धृतराष्ट्र ,संजय ,शकुनि फिर  पासे लिए बैठे 

कोई अख़बार ,चैनल और कोई टी0वी0 के कोने में 


बहुत मुश्किल से कोई एक पृथ्वी राज होता है 

कई राजा यहाँ फिर से लगे जयचंद  होने में 


वतन को लूटने वालों के घर  चाँदी के बर्तन हैं 

वतन पर मरने वाले खाते हैं पत्तल औ दोने में 


मिली केसर की खुशबू धुन्ध में खोये चिनारों को 

जहाँ मौसम भी शामिल था कभी काँटों को बोने में 

कवि /शायर -जयकृष्ण राय तुषार 

चित्र -साभार गूगल 


एक गीत -अबकी शाखों पर वसंत तुम

 

चित्र -साभार गूगल 

एक गीत -अबकी शाखों पर वसंत तुम 

अबकी शाखों पर 

वसंत तुम 

फूल नहीं रोटियाँ खिलाना |

युगों -युगों से 

प्यासे होठों को 

अपना मकरंद पिलाना |


धूसर मिट्टी की 

महिमा पर 

कालजयी कविताएं लिखना ,

राजभवन 

जाने से पहले

 होरी के आँगन में दिखना ,

सूखी टहनी 

पीले पत्तों पर 

मत अपना रौब जमाना |


जंगल ,खेतों 

और पठारों को 

मोहक हरियाली देना ,

बच्चों को 

अनकही कहानी 

फूल -तितलियों वाली देना ,

चिंगारी -लू 

लपटों वाला 

मौसम अपने  साथ न लाना |


सुनो दिहाड़ी 

मज़दूरन को 

फूलों के गुलदस्ते देना ,

बंद गली 

फिर राह न रोके 

खुली सड़क चौरस्ते देना ,

साँझ ढले 

स्लम की देहरी पर 

उम्मीदों के दिए जलाना |

कवि -जयकृष्ण राय तुषार 

चित्र -गूगल से साभार 

सोमवार, 8 फ़रवरी 2021

एक आस्था का गीत-यहाँ जन्म लेती हैं मंगल ऋचाएँ

चित्र -साभार गूगल
संगम प्रयागराज


एक आस्था का गीत -संगम/कुम्भ


मिलन हो दोबारा

हमारा तुम्हारा ।

ओ संगम की रेती

ओ गंगा की धारा ।


ये यमुना की लहरें

किले की कहानी,

यहाँ संत ,साधू

यहाँ ब्रह्म ज्ञानी,

ये भक्ति का रंग

सारे रंगों से प्यारा ।


यहाँ लेटे हनुमान

की वन्दना है,

त्रिधारा से नदियों के

संगम बना है,

है इनकी कृपा से

हवन-यज्ञ सारा ।


सभा इंद्र की

इसकी महिमा को गाती,

छटा कुम्भ की

देव,मनुजों को भाती ,

कहीं भी नहा लो

है अमृत की धारा ।


ये तम्बू ये प्रवचन

अमौसा का मेला,

यहाँ भूला-बिसरा

न रहता अकेला,

जो खोया सभी ने

उसी को पुकारा ।

चित्र साभार गूगल


भारद्वाज ऋषि

राम सिय की कथाएँ,

यहाँ जन्म लेती हैं

मंगल ऋचाएँ,

इसे योगियों ने

सजाया सँवारा ।

कवि -जयकृष्ण राय तुषार

रविवार, 31 जनवरी 2021

एक ग़ज़ल -मगर संगम के लिए जल की त्रिधारा चाहिए

 

 



एक ग़ज़ल -

मगर संगम के लिए जल की त्रिधारा चाहिए 


उसको धरती ,चाँद ,सूरज और सितारा चाहिए 

मुझको कुछ कागज ,कलम और दोस्त प्यारा चाहिए 


डूबने वाला नदी में शेर हो या आदमी 

बच निकलने के लिए सबको किनारा चाहिए 


मौसमों की मापनी हीरे की हो या स्वर्ण की 

सच बताने के लिए उसको भी पारा चाहिए 


हर नदी का जल है पावन हर नदी में पुण्य है 

मगर संगम के लिए जल की त्रिधारा चाहिए 


प्लास्टिक की स्लेट पर आलेख का सौंदर्य क्या 

काठ की पट्टी है मेरी बस पचारा चाहिए 


सिर्फ़ कुर्सी के लिए षड्यन्त्र और - जलसे जुलूस 

अब देश की समृद्धि हो जिससे वो नारा चाहिए 

कवि /शायर 

जयकृष्ण राय तुषार 

संगम प्रयागराज चित्र साभार गूगल 



बुधवार, 27 जनवरी 2021

एक ग़ज़ल -पूनम की रात चाँद बहुत सादगी में है

 

चित्र -साभार गूगल 

चित्र साभार गूगल 

एक ग़ज़ल -

पूनम की रात चाँद बहुत सादगी में है 


ये सारा आसमान  आज दिल्लगी में है 

पूनम की रात चाँद बहुत सादगी में है 


लिखता हूँ ,फाड़ता हूँ ,मिटाता हूँ हर्फ़ को 

कागज ,कलम ,दवात मेरी ज़िंदगी में है 


आँखें किसी की नम हो तो अपनी रूमाल दे 

इतनी तमीज़  आज कहाँ आदमी में है 


कोशिश  है मेरा शेर जमाने को याद हो 

शायर की  शायरी तो इसी तिश्नगी में है 


कवि /शायर जयकृष्ण राय तुषार 

रविवार, 17 जनवरी 2021

एक ग़ज़ल -यह मुल्क सभी का है देखभाल कीजिए

 

चित्र -साभार गूगल 


एक ताज़ा ग़ज़ल -

यह देश सभी का है देखभाल कीजिए 

यह मुल्क सभी का है देखभाल कीजिए 
हर बात पे मियाँ नहीं हड़ताल कीजिए 

पहले जब संविधान था खतरे में, थे कहाँ 
बासठ ,आपातकाल की पड़ताल कीजिए 

दुश्मन के साथ मिलके तमाशा न कीजिए 
पगड़ी को फाड़कर न अब रूमाल कीजिए 

सब अपने घर में चैन से तम्बू में राम थे 
उस दौर का भी आप जरा ख़्याल कीजिए 

कश्मीर में अब देखिये जन्नत के नज़ारे 
अब आबोहवा फिर से न बदहाल कीजिए 

सड़कें बनी हैं खूब ,दलाली भी कम हुई 
घर बैठे गैस मिल रही बस काल कीजिए 

जो आप कहें सच है जो हम कह दें बुरा है 
कुर्सी के लिए चेहरा नहीं लाल कीजिए 

कवि /शायर-जयकृष्ण राय तुषार 

चित्र -साभार गूगल 


शनिवार, 16 जनवरी 2021

एक ताज़ा ग़ज़ल -मगर मतला तुम्हारे हुस्न के दीदार से निकला

 

चित्र -साभार गूगल 

एक ताज़ा ग़ज़ल -

मगर मतला तुम्हारे हुस्न के दीदार से निकला 

महल,परिवार सबकुछ छोड़कर घर-बार से निकला
दोबारा बुद्ध बनने कौन फिर दरबार से निकला

फ़क़ीरों की तरह मैं भी जमाना छोड़ आया हूँ
बड़ी मुश्किल से माया मोह के किरदार से निकला

चुनौती रेस की जब हो तो आहिस्ता चलो भाई
वही हारा जो कुछ सोचे बिना रफ़्तार से निकला

ग़ज़ल के शेर तो दुश्वारियों के बीच कह डाले
मगर मतला तुम्हारे हुस्न के दीदार से निकला

मैं अपने ही किले में कैद था तुमसे कहाँ मिलता
मेरा सबसे बड़ा दुश्मन मेरे परिवार से निकला

मैं शायर हूँ, कलेक्टर हूँ, या मैं कप्तान हूँ, तो क्या
मेरे होने का मतलब तो मेरे आधार से निकला

किसी महफ़िल का हिस्सा मैं कभी भी हो नहीं सकता
जहाँ मौसम था जैसा बस वही अशआर से निकला

वही डूबा जो मल्लाहों के कन्धों पर नदी में था
जो खुद से तैरकर डूबा वही मझधार से निकला
चित्र -साभार गूगल 


एक ग़ज़ल -खौफ़ मौसम का नहीं अब डर नहीं हिमपात का

 

 

चित्र -साभार गूगल 



रदीफ़ काफ़िए और मुश्किल विषय पर ग़ज़ल कहना /लिखना कठिन था इसलिए आँख को मजबूरन रखना पड़ा |

यह ग़ज़ल देश के शीर्ष नेतृत्व और तीनों सेनाओं के साथ सभी तरह के सुरक्षा बलों को समर्पित है ,जिनके अदम्य साहस और बलिदान से यह देश और हम सभी सुरक्षित हैं | जय हिन्द जय भारत !

एक ग़ज़ल -
खौफ़  मौसम का  नहीं  अब डर नहीं हिमपात का 

शकुनि का षड्यंत्र सारा जल गया खुद लाख में 
चीन का हर दाव  उल्टा पड़  गया लद्दाख में 

खौफ़  मौसम का  नहीं  अब डर नहीं हिमपात का 
अटल टनल के संग बनी सड़कें सभी लद्दाख  में

देश के गद्दार सेना का मनोबल तोड़ते 
अक्ल के अन्धे ये सावन ढूंढते वैशाख में 

बनके पोरस जो सिकन्दर से लड़ा इस  दौर  में 
क्यों वही सेवक खटकता है सभी की आँख में 

सरहदों पर देश की रक्षा में जो होते शहीद 
इक दिया  उनके  लिए हो  मंदिरों की ताख में 

दूर तक आकाश में अब गर्जना राफेल  की 
अब कहाँ  घुसपैठ का दम है किसी गुस्ताख़ में 

बिहार रेजीमेंट के जाबांज वीरों को नमन 
दुश्मनों को मारकर जो मिले पावन राख़  में 

कवि -जयकृष्ण राय तुषार 

चित्र -साभार गूगल 

शनिवार, 1 फ़रवरी 2020

एक गीत -यह जरा सी बात

चित्र -गूगल से साभार 
एक गीत -यह जरा सी बात 
फिर गुलाबी 
धूप -तीखे 
मोड़ पर मिलने लगी है |
यह 
जरा सी बात पूरे 
शहर को खलने लगी है |

रेशमी 
जूड़े बिखर कर 
गाल पर सोने लगे हैं ,
गुनगुने 
जल एड़ियों को 
रगड़कर धोने लगे हैं ,
बिना माचिस 
के प्रणय की 
आग फिर जलने लगी है |

खेत में 
पीताम्बरा सरसों 
तितलियों को बुलाये ,
फूल पर 
बैठा हुआ भौंरा 
रफ़ी के गीत गाये ,
सुबह -
उठकर, हलद -
चन्दन देह पर मलने लगी है |

हवा में 
हर फूल की 
खुशबू इतर सी लग रही है ,
मिलन में 
बाधा अबोली 
खिलखिलाकर जग रही है ,
विवश होकर 
डायरी पर 
फिर कलम चलने लगी है |

कुछ हुआ है 
ख़्वाब दिन में 
ही हमें आने लगे हैं ,
पेड़ पर 
बैठे परिन्दे 
जोर से गाने लगे हैं ,
सुरमई 
सी शाम 
अब कुछ देर से ढलने लगी है |
चित्र -गूगल से साभार