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शुक्रवार, 15 अप्रैल 2022

दो ग़ज़लें-भारतीय संस्कृति

 

चित्र साभार गूगल

दो ग़ज़लें-भारतीय धर्म-दर्शन पर
विदेशी भौतिकता छोड़कर हमारी संस्कृति में शांति तलाश रहे हैं और हम पाश्चात्य संस्कृति में अशांति ढूंढ रहे हैं।
एक-
हरे रामा-हरे कृष्णा सुखदायी है गाने में
कण कण में अमृत धारा है गोकुल में बरसाने में

भौतिकता की पगडण्डी पर इच्छाओं का अंत कहाँ
भक्ति मार्ग पर समय न लगता सूरदास को आने में

भूखे को दो रोटी देने वाला घर भी मन्दिर है
अहंकार धन-दौलत लेकर बैठा है मयख़ाने में

बच्चों के सिरहाने माँ भी ईश्वर जैसी लगती है
अमृत सुख है लोरी गाकर माथे को सहलाने में

सच्चा सन्त वही है जिसका मन भी गोमुख गंगा हो
कुछ ही सत्य समझ पाए हैं वल्कल ताने बाने में

दो
नींद से उठिए सनातन की कथाओं के लिए
धर्म-दर्शन के लिए वेद ऋचाओं के लिए

पश्चिमी संस्कृति को भा रही राधा रानी
हम परेशान है पेरिस की अदाओं के लिए

वेद उपनिषदों में है विश्व का जीवन दर्शन
पंच तत्वों का सृजन मंत्र दिशाओं के लिए

सबको पुत्रों की तरह देखती भारत माता
बुद्ध का ज्ञान भी है धम्म सभाओं के लिए

ग्रन्थ ऋषियों ने लिखे शुभता औ मंगल के लिए
योग,औषधि के लिए,लोक कलाओं के लिए

वक्त के साथ सभी होमो हवन भूल गए
यज्ञ के धूम्र की खुशबू है फ़ज़ाओं के लिए

ज्ञान,विज्ञान,तरक्की भी जरूरी है मगर
वक्त भी दीजिए कुछ अच्छी प्रथाओं के लिए

चित्र साभार गूगल


जयकृष्ण राय तुषार


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