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| चित्र साभार गूगल |
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| चित्र साभार गूगल |
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| चित्र साभार गूगल |
दिए बुझाती रही हैं सभी दिशाएं यहाँ
उजाले किसकी अदालत में सच बताएँ यहाँ
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| चित्र साभार गूगल |
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| मेलाधिकारी महाकुम्भ श्री विजय किरण आनंद |
मेलाधिकारी कुम्भ श्री विजय किरण आनंद जी को फ्रेम किया कुम्भ गीत और कुछ पुस्तकें भेंट किया. मुलाक़ात काफी सहृदयता से हुईं. श्री विजय किरण आनंद जी होनहार I. A. S. हैं और महत्वपूर्ण सुधार के लिए जाने जाते हैं.
महाकुम्भ नगर का प्रथम जिलाधिकारी भी आदरणीय श्री विजय किरण आनंद जी को बनाया गया है.महाकुम्भ की निर्विघ्न सफलता हेतु हार्दिक शुभकामनायें.
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| चित्र साभार गूगल |
एक ग़ज़ल -आगाज़ नए साल का भगवान नया हो
मौसम की कहानी नई उनवान नया हो
आगाज़ नए साल का भगवान नया हो
फूलों पे तितलियाँ हों बहारें हों चमन में
महफ़िल में ग़ज़ल -गीत का दीवान नया हो
बेटी हो या बेटा रहे रस्ते में सुरक्षित
इस अबोहवा में यही एहसान नया हो
खुशहाली हो हर पर्व में रंगोली नई हो
रिश्तों का भरोसा लिए मेहमान नया हो
आँखों में अगर ख़्वाब हो दुनिया के लिए हो
सुख चैन का परचम लिए इंसान नया हो
ख़ामोश अगर शाख पे बैठे हों परिंदे
सूरज से कहो उनका निगहबान नया हो
इस भीड़ से हटकर चलो मिलते हैं कहीं पर
खुशबू हो हवाओं में बियाबान नया हो
जयकृष्ण राय तुषार
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| चित्र साभार गूगल |
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| कवि जयकृष्ण राय तुषार |
| चित्र -साभार गूगल |
एक ग़ज़ल-
सियासत भी इलाहाबाद में संगम नहाती है
गले में क्रॉस पहने है मगर चन्दन लगाती है
सियासत भी इलाहाबाद में संगम नहाती है
कोई बजरे पे कोई रेत में धँसकर नहाता है
ये गंगा माँ निमन्त्रण के बिना सबको बुलाती है
सनातन संस्कृति कितनी निराली और पुरानी है
हमारी आस्था चिड़ियों को भी दाना खिलाती है
खिलौने आ गए बाजार से लेकिन हुनर का क्या
मेरी बेटी कहाँ अब शौक से गुड़िया बनाती है
वो राजा क्या बनेगा अश्व की टापों से डरता है
उसे दासी महल में शेर का किस्सा सुनाती है
ये हाथों की सफ़ाई है इसे जादू भी कहते हैं
नज़र से देखने वालों को यह अन्धा बनाती है
खिले हैं फूल जब तक तितलियों से बात मत करना
जरूरत पेड़ से गिरते हुए पत्ते उठाती है
कवि/शायर जयकृष्ण राय तुषार
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| चित्र साभार गूगल |
कवि /शायर जयकृष्ण राय तुषार
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| चित्र साभार गूगल |
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| डॉ नित्यानंद श्रीवास्तव |
हिंदी ग़ज़ल पर आलोचना की महत्वपूर्ण किताब
हिंदी का अक्षर पथ -
लेखक डॉ नित्यानंद श्रीवास्तव
अभी अभी डाक से हिंदी ग़ज़ल आलोचना पर एक अद्भुत शोधपरक किताब"हिंदी ग़ज़ल का अक्षर पथ *मिली. डॉ नित्यानंद श्रीवास्तव गोरखपुर के महंत दिग्विजय नाथ कालेज में हिंदी के प्राध्यापक हैं. निरंतर गूढ विषयों पर लिखते रहते हैं और मेरे प्रेरणास्त्रोत भी हैं. यह किताब ग़ज़ल के उद्भव की प्रचलित धारणाओं को ख़ारिज के उनकी नई स्थापना करती है. ग़ज़ल विधा पर शोध के लिए बहुत उपयोगी पुस्तक को प्रकाशित किया है सर्व भाषा ट्रस्ट ने. मूल्य 499 रूपये पेज 184 हैं.पुस्तक में कुल 9 अध्याय हैं.सर्व भाषा ट्रस्ट का प्रकाशन अद्भुत है. बेहतरीन छपायी बेहतरीन कवर. आदरणीय केशव पाण्डेय जी को बहुत बहुत बधाई और हार्दिक शुभकामनायें.
मैं इस पुस्तक के लेखक और प्रकाशक दोनों को बधाई और शुभकामनायें देता हूँ. साहित्य मनीषयों के बीच यह लोकप्रिय होगी और उपयोगी भी.
सादर
पुस्तक का नाम -हिंदी ग़ज़ल का अक्षर पथ (आलोचना )
लेखक -श्री नित्यानंद श्रीवास्तव
प्रकाशक -सर्व भाषा ट्रस्ट
प्रथम संस्करण 2024
मूल्य 499 सजिल्द
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| चित्र साभार गूगल |
एक ग़ज़ल -हर खिड़की में धूप -चाँदनी
शाम को दादी किस्से कई सुनाती है
बच्चों को भी सोनपरी ही भाती है
अपनी -अपनी नज़रों से सब देख रहे
हर खिड़की में धूप -चाँदनी आती है
किसी घाट पर फूल चढ़ाओ पुण्य वही
गंगा काशी से ही पटना जाती है
गुरुद्वारा, गिरिजाघर, और शिवाले में
एक ज्योति है, एक दिए की बाती है
तितली का फूलों से केवल रिश्ता है
चिड़िया तो हर मौसम गाना गाती है
यात्री को सच राह बताने वाला हो
पगडंडी भी मंज़िल तक पहुँचाती है
खतरा तो खतरा है चाहे छोटा हो
बीड़ी भी जंगल में आग लगाती है
कवि जयकृष्ण राय तुषार
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| चित्र साभार गूगल |
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| चित्र साभार गूगल |
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| चित्र साभार गूगल |
एक ग़ज़ल -बाज़ से डरती अगर चिड़िया
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| चित्र साभार गूगल |
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| चित्र साभार गूगल |
एक ग़ज़ल -चाँदनी, धूपमें, बारिश में
चाँदनी, धूप में, बारिश में यूँ खिलते -खिलते
शाख से फूल बिछड़ जायेंगे मिलते -मिलते
सिर्फ़ कुछ देर उजाला है चलो बात करें
वक़्त का दीप ये बुझ जायेगा जलते -जलते
आज मौसम में हवा, पानी है, खुशबू भी है
पाँव थक जायेंगे फिर राह में चलते -चलते
ये तो दिन रात इक खेल है खेलो हँसकर
चाँद उग जायेगा फिर शाम के ढलते -ढलते
मुझको चुप रहने की तुम कितनी हिदायत दे दो
सच मैं कह दूँगा कभी होंठों को सिलते- सिलते
कवि जयकृष्ण राय तुषार
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| चित्र साभार गूगल |
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| चित्र साभार गूगल |
ये मत पूछो किधर से देखते हैं