![]() |
| चित्र साभार गूगल |
एक गीत -नदी किनारे मौसम का
जंगल काटे गए
धुंआ
शहरों के नाम हुआ.
अंधाधुंध
तरक्की का
कैसा अंजाम हुआ.
वन -बस्ती में
सन्नाटा
चिड़ियों के गीत नहीं,
नदी किनारे
मौसम का अब
कोई मीत नहीं,
चौड़ी सड़के
फिर भी हर दिन
रस्ता जाम हुआ.
कथा सुनाती
शामें
महुआ चुनती भोर नहीं,
कोहबर
गाते मौन
कहीं गीतों का शोर नहीं.
याद नहीं
कब गली
मोहल्लों से जै राम हुआ.
कवि
जयकृष्ण राय तुषार
![]() |
| चित्र साभार गूगल |

