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शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

हिन्दी के गौरव -डॉ० लक्ष्मीशंकर मिश्र 'निशंक 'का रचना संसार

कवि -लक्ष्मीशंकर मिश्र 'निशंक '
समय [21-10-1918से 30-12-2011]
सम्पर्क -अनिल मिश्र [निशंक जी के सुपुत्र ]
09415914322
परिचय -
उस महान कवि के रचना संसार पर कलम चलाना मेरे जैसे युवा कवि के लिए कितना मुश्किल ,कितना दुरूह कार्य है ,जिस कवि ने ब्रिटिश भारत से लेकर आजाद हिंदुस्तान का खाका अपनी कविताओं में खींचा है |आज मैं उसी हिन्दी के महान और लोकप्रिय कवि के बारे में अपनी क्षमता के अनुसार कुछ लिखने जा रहा हूँ |उत्तर प्रदेश के सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान भारत -भारती से सम्मानित इस कवि का नाम हैपंडित  लक्ष्मी शंकर मिश्र निशंक |निशंक जी का विगत 30-12-2011निधन हो गया |निशंक जी का जन्म 21अक्टूबर  1918 को भागवत नगर हरदोई में हुआ था |निशंक जी के पिता का नाम पंडित रामशंकर मिश्र और माता का नाम श्रीमती रामप्यारी था |निशंक जी ने 1948 में लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक और 1950 में आगरा विश्व विद्यालय से हिन्दी में स्नातकोत्तर की उपाधि [साहित्य रत्न हिन्दी ] हासिल किया |सन 1964 डॉ० भागीरथ मिश्र जी के निर्देशन में हिन्दी में सवैया साहित्य पर अपना शोध प्रबन्ध पूर्ण किया | जीविका के लिए इस कवि ने अध्यापन के पेशे को चुना |प्रारम्भ में कान्यकुब्ज और बाद में जे० एन० पी० जी० कालेज [1956-से 1979]तक अध्यापन किया | निशंक जी का व्यापक परिचय ब्लॉग पर दे पाना कठिन कार्य है ,इनका काव्य संसार विविधताओं से परिपूर्ण है|लम्बे समय तक हिन्दी कवि सम्मेलनों में भी अपनी धाक जमाये रहे  |इनके गीतों में छायावादी तेवर और कलेवर दिखाई देते हैं |प्रेम और दर्शन भी इनके गीतों की प्रमुख विशेषताएं हैं |लेकिन यही कवि दोहों में समकालीन चेतना ,पर्यावरण की चिंता राजनीति ,भ्रष्टाचार और व्यवस्था पर कटाक्ष करता नज़र आता है |निशंक जी हिन्दी ब्रज और अवधी  भाषाओँ के समर्थ कवि हैं इनकी रचना के विविध आयाम हैं जैसे गीत ,छन्द ,दोहे व्यंग्य ,मुक्त छन्द गद्य आदि |निशंक जी की कुछ कृतियाँ पाठ्यक्रमों में भी स्वीकृत हैं |साहित्य लेखन के अतिरिक्त निशंक जी ने कई पत्रिकाओं और पुस्तकों का सम्पादन भी किया है माधुरी पत्रिका के कवि अंक [विशेषांक जनवरी 1947]के संयुक्त सम्पादक ,ज्योति पत्रिका के जागरण अंक [1963]के सम्पादक ,कवि सम्राट सनेही जी की स्मृति में प्रकाशित सुकवि विनोद काव्य -मासिक का सम्पादन [अगस्त 1973 से 1983 तक ]यू० पी० बोर्ड द्वारा हाई स्कूल पाठ्यक्रम के लिए प्रकाशित एकांकी नाटक संग्रह 'रंग भारती 'के संपादक इसके अतिरिक्त अन्य कई पुस्तकों का संपादन |पंडित लक्ष्मीशंकर मिश्र निशंक जी को अपने जीवन काल में कई पुरस्कार और सम्मान मिले जिनमे उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा दिया जाने वाला साहित्य भूषण [1997]और भारत -भारती सम्मान [1999]प्रमुख हैं ,इसके अतिरिक्त लखनऊ विश्व विद्यालय के हिन्दी विभाग के स्वर्ण जयंती के अवसर पर इन्हें विभागीय गौरव के रूप में सम्मानित किया गया |कृतियाँ- -प्रबन्धकाव्य -सुमित्रा[1989] ,खंडकाव्य -सिद्धार्थ का गृह त्याग [1950]शांति दूत [1970]जयभारत [1971]कर्मवीर भारत [1976]संकल्प की विजय [1997]आत्मकथा काव्य -प्रज्ञा उद्भास[ विभीषण की आत्मकथा]मुक्तक काव्य शतदल [1952]उत्तर प्रदेश शासन से पुरस्कृत ,क्रांतिदूत राना बेनी माधव 1971,साधना के स्वर [गीत काव्य ]1976,अनुपमा [छन्द मुक्तक ]1977,शंख की साँस कविता संग्रह [1982]दर्पण[ दोहावली 1992 ] रामलला की किलकारी [छन्द मुक्तक 1995 ]मेरी आरम्भिक कविताएँ 1998] तुणीर[ व्यंग्य काव्य 1999]ब्रज भाषा काव्य प्रेम पियूष 1971,बांसुरी 1983,अवधी काव्य पुरवाई 2004,गद्य साहित्य साहित्यकार का दायित्व [निबंध संग्रह 1985,और संस्मरणों के दीप [संस्मरण 1996] इसके अतिरिक्त एक पुस्तक पत्रों पर भी हिंदी साहित्यकारों के पत्र मेरे नाम भी प्रकाशित है जिसमें हिंदी के दुर्लभ पत्र प्रकाशित हैं |सभी सामग्री निशंक जी के सुपुत्र अग्रज श्री अनिल मिश्र जी [उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान में प्रशासनिक अधिकारी ] ने हमें उपलब्ध कराई है ,हम उनके प्रति आभारी हैं |
तत्कालीन महामहिम राज्यपाल और साहित्यकार विष्णुकान्त शास्त्री से
भारत भारती सम्मान ग्रहण करते  कवि लक्ष्मीशंकर मिश्र निशंक  बाएं
 बगल में श्री केशरीनाथ त्रिपाठी पूर्व विधान सभा अध्यक्ष 
डॉ० लक्ष्मीशंकर मिश्र निशंक का काव्य संसार 
एक 
श्रम में शक्ति सृजन की होती 
श्रम की बूँदें बनती मोती ,
श्रम के रस की पावन धारा 
सारा कलुष अपावन धोती |
श्रम के गीत जागते युग को 
श्रम का होता अभिनन्दन है |

श्रम जीवन का रंग महल है 
श्रम ही जाग्रति की हलचल है ,
श्रम जग में परिवर्तन लाता 
श्रम संस्कृति का गंगाजल है |
श्रम में श्री के साथ हृदय में 
ममता का होता स्पन्दन है |

श्रम ही पूँजी का सहचर है 
श्रम की वाणी बड़ी मुखर है ,
श्रम की सीढ़ी पर चढ़कर ही 
मिला प्रगति का उच्च शिखर है |
विद्युत निज प्रकाश बिखराकर 
करती निज श्रम का वन्दन है |
दो 
मैंने एक किरन माँगी थी तुमने नीलगगन दे डाला 
मैंने दो मधु -कण माँगे थे तुमने सावन घन दे डाला |

स्वप्न सजा भींगी पलकों पर ,मन में क्वांरी पीर बसाकर ,
साधों के मन्दिर में बैठा ,आशा का लघु दीप जलाकर ,
एकाकीपन खले न मन को 
रूप तुम्हारा छले न मन को ,
मैंने मधुर मिलन माँगा था ,तुमने यह बंधन दे डाला |

विस्मृति की मधुमय घड़ियों में मादक सपने लगे सुहाने ,
पुलक उठी मन की आशाएँ स्वप्न लगे श्रृंगार सजाने ,
गीतों के वंशी के स्वर में 
पीर न अंतर की सो जाये ,
मैंने अपनापन माँगा था ,तुमने पागलपन दे डाला |

तुमको पाकर लगा कि मेरा माधव ही मुझमें मुसकाया ,
तुम रूठे तो लगा कि मेरा पीड़ा से अंतर भर आया ,
फैले सुख की मधुर चाँदनी 
मिलन यामिनी युग बन जाये ,
मैंने तो यौवन माँगा था ,तुमने यह दर्शन दे डाला |
तीन 
जब से तुमने दिशा मोड़ दी राह बहुत आसान हो गयी 
जुही फूल सा प्यार तुम्हारा 
मन्द -मन्द महका जीवन में |
उषा सदृश तुम्हारी चितवन 
जगा गयी नव ज्योति नयन में |
जब से तुम प्राणों में पुलके ,पीड़ा से पहचान हो गई |

विहँस उठे रजनीगन्धा ज्यों 
अपने बासन्ती यौवन में ,
जैसे प्रातः किरण जगाये 
सोया प्यार मधुप के मन में |
वैसे तुम गीतों में विलसे ,मेरी प्रीति जवान हो गई |

शीश महल सा जग लगता है 
हर दर्पण में रूप तुम्हारा |
जेठ दुपहरी में छाया सा 
प्यार बन गया एक सहारा |
जब से तुम कण -कण में बिखरे ,मेरी दृष्टि महान हो गई |
चार 
माँ ,मुझको भी अपना वर दो |
मेरी इस कंचन -काया को 
रूप और रस- गन्ध अमर दो |

भावुकता से विह्वल मन में 
मेरे मुकुलित काव्य सुमन में 
भावों के मादक मधुवन में 
विश्वासों के मलय पवन में 
प्राणों के पुलकित अर्पण में 
चरण -कमल -केसर -रज भर दो |

उतर धरा पर आये अम्बर 
इन्द्रधनुष लहरें लहरों पर 
धन की करुणा बरसे झर -झर 
गूंज उठे समता का मृदु स्वर 
जितनी तृषा भरी नयनों में 
उतने सरस अधर तुम कर दो |

छन्द -विहग को अविरल गति दो 
शब्दों को लय की परिणति दो 
पीड़ा दो पर पावन रति दो 
प्रणयी मन को सहज प्रणति दो 
मृगजल छल न सके जीवन को 
कविता को निज छवि -अक्षर दो |


पांच -निशंक जी के कुछ दोहे 
नदिया कहती जा रही दिया न जी भर प्यार |
मैं आगे बढ़ती रही गिरते रहे कगार ||

चेहरे से लगते भले ,चलते गहरी चाल |
वाणी सरस रसाल है ,चितवन है मधुबाल ||

स्वामी जी अपना रहे भौतिकवादी ढंग |
वसन जोगिया पर चढ़ा राजनीति का रंग ||

बिरहा 'निर्गुण की जगह अपने -अपने राग |
दुर्लभ होते जा रहे आल्हा -चैती -फाग ||

यांत्रिकता ने प्रकृति को कर डाला विद्रूप |
नदियों में विष बह रहा सुख गए हैं कूप ||

वायु -अन्न -फल -नीर में गया प्रदूषण व्याप |
सड़कों पर उड़ता धुवाँ कल -युग का अभिशाप ||

कनक -प्रभा किंजल्क की मधु -मकरन्द सुवास |
फिर भी चम्पा -पुष्प के भ्रमर न जाता पास ||

सावन जूही- चाँदनी भादों हर -सिंगार |
गेंदा फूले माघ में फागुन में कचनार ||

बाग और वन कट गये  सभी हो गये  खेत |
रूठे बादल उड़ गये धरती होगी रेत ||

व्याकुल अब न शकुन्तला पल -पल मिलन -वसन्त |
कली -कली रस में ढली गली -गली दुष्यन्त ||

अंधकार -उर चीर कर उगता है आदित्य |
आशा -ज्योति विखेरता सत्कवि का साहित्य ||

पश्चिम के रंग में रँगे नहीं पूर्व का ज्ञान |
स्वयं भूलते जा रहे हम अपनी पहचान ||

भौतिकता की होड़ में सदाचार बेकार |
जलकुम्भी सा जम गया जगमें भ्रष्टाचार ||

पीड़ा का अनुभव नहीं मन सुख से भरपूर |
बातें करें गरीब की रहकर उनसे दूर ||
छः डॉ० लक्ष्मीशंकर मिश्र निशंक की हस्तलिपि में एक गीत -

मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

सुप्रसिद्ध कवि यश मालवीय का काव्य संसार

कवि -यश मालवीय 
सम्पर्क -09839792402
परिचय -
हिन्दी कविता के जिस लयविहीन दौर में हम जी रहे हैं ,उस दौर में भी अगर कहीं छान्द्सिकता के बाँसुरी मधुर आवाज हमारे कानों तक पहुँच रही है तो इसका बहुत बड़ा श्रेय हमारे दौर के चर्चित कवि भाई यश मालवीय को जाता है |यश मालवीय आज के दौर में सबसे अधिक लोकप्रिय नवगीतकार हैं |यश मालवीय के गीतों में समकालीन कविता के सारे तत्व मौजूद हैं |देश की सभी प्रतिस्ठित पत्र -पत्रिकाओं में इनके गीत /नवगीत प्रकाशित होते रहते हैं |मुक्त छन्द के नाम पर आज कविता को भी आम जन से दूर करने का जो षड्यंत्र आलोचकों /कवियों द्वारा किया जा रहा है उन सबके विरुद्ध यह कवि बहुत मुस्तैदी से ताल ठोककर खड़ा है |यह कवि इन दिनों संघर्ष कर रहा है |महालेखाकार कार्यालय प्रशासन ने इनको निलम्बित कर दिया है देश के कई प्रतिष्ठित सम्मान पाने वाले इस कवि को प्रशासन की गलत नीतियों का विरोध करने का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है |यश मालवीय उस महालेखाकार कार्यालय में सेवारत हैं जहाँ सर्वेश्वरदयाल दयाल सक्सेना ,उमाकान्त मालवीय ,शिवकुटी लाल वर्मा ,केशव प्रसाद मिश्र ,जी० सी० श्रीवास्तव आदि कवियों ने अपनी लेखनी से साहित्य को समृद्ध किया है |सहज और मृदु व्यक्तित्व के स्वामी यश मालवीय देश के स्तरीय काव्य मंचों ,लाल किला और दूरदर्शन के कार्यक्रमों में शिरकत करते रहते हैं |बेहतरीन और स्तरीय मंच संचालन का हुनर भी इन्हें कवि पिता उमाकान्त मालवीय से मिला है |इनके लेखन की विधाएं नवगीत ,दोहे ,गज़ल ,व्यंग्य ,लेख आदि हैं |इनके गीतों में आम जन की छटपटाहट अभिव्यक्त होती है |घर, ऑफिस ,परिवार ,राजनीति ,व्यवस्था सभी इस कवि की कविता के विषय होते हैं |यश मालवीय का जन्म 18-07-1962 को उत्तर प्रदेश के कानपुर में हुआ था |शिक्षा -इलाहाबाद विश्व विद्यालय से स्नातक |कृतियाँ -कहो सदाशिव ,उड़ान से पहले ,एक चिड़िया अलगनी पर एक मन में ,बुद्ध मुस्कुराये [सभी नवगीत संग्रह |कृपया लाईन में आयें और सर्वर डाउन है व्यंग्य संग्रह |चिंगारी के बीज दोहा संकलन ,ताकधिनादिन और रेनी डे  बालगीत संग्रह है |निराला सम्मान [उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ]परम्परा ऋतुराज सम्मान से सम्मानित इस लोकप्रिय कवि के कुछ नवगीत और  कुछ दोहे आज  हम आपके साथ साझा कर रहे हैं |
कवि यश मालवीय अपनी पत्नी आरती मालवीय के साथ 
सुप्रसिद्ध नवगीत कवि यश मालवीय के गीत /नवगीत 
एक 
स्टेशन की किच -किच 
और हाय -हाय हुए 
हम मुगलसराय हुए |

बहुत बड़े जंक्शन की 
अपनी तकलीफ़ें हैं 
गाड़ी का शोर और 
सपनों की चीखें हैं 
सुबह की बनी रखी 
दुपहर की चाय हुए 
हम मुगलसराय हुए |

ताले -जंजीरें हैं 
नजरें शमशीरें हैं 
शयनयान में जागीं 
उचटी तकदीरें हैं 
धुन्ध -धुआँ कुहरे से 
धूप के बजाय हुए 
हम मुगलसराय हुए |

साँस -साँस मरते हैं 
दुर्घटना जीते हैं 
आग है व्यवस्था की 
आदमी पलीते हैं 
पटरी पर ही आकर 
कटी नीलगाय हुए 
हम मुगलसराय हुए |

लकड़ी से अकड़े हैं 
सर्दी से जकड़े हैं 
हम गीले कोयले से 
आग नहीं पकड़े हैं 
बिना रिजर्वेशन भी 
नींद के उपाय हुए 
हम मुगलसराय हुए |

हड्डी ही हड्डी है 
लहू -लहू लोरी है 
किस्से बलिदानी हैं 
समय की अघोरी है 
खिड़की की आँखों में 
ज्यों पन्ना धाय हुए 
हम मुगलसराय हुए |
दो 
लोग अजब हैं 
भाषण का सुख लेते हैं 
गूँगों के आगे भी 
माइक देते हैं 

तरह -तरह की हलचल है 
सरगर्मी है 
यहाँ हादसे भी तो 
उत्सवधर्मी हैं 
अपने ही दुश्मन हैं 
और चहेते हैं 

जितने चेहरे 
उससे ज्यादा शीशे हैं 
मर्ज बहुत मामूली 
ऊँची फीसें हैं 
उम्मीदों के 
नकली अंडे सेते हैं 

बादल हो तो 
चोटें गहरी -गहरी हैं 
सूरज हो तो 
ये जलती दोपहरी हैं 
इसकी -उसकी -अपनी 
गर्दन रेते हैं |
तीन 
तरह -तरह के जादू -टोने 
चलते हैं रजधानी में 
तुम क्या समझोगे लोगों का 
पुए पकाना पानी में 

दाँतों तले दबाना ऊँगली 
बड़े -बड़े आला चेहरे 
बुनते रहते हैं अपनी ही 
आँखों में जाला चेहरे 
रावण से सपने होते हैं 
इनकी रामकहानी में 

काट न पाते दिन ,
उम्मीदों से खुद ही कट जाते हैं 
रत्नजटित औजार देखकर 
आपस में बँट -बँट जाते हैं 
हम अपनी पहचान खो रहे 
झूठी बोली -बानी में 

भूल वर्णमाला जीवन की 
जाति -वर्ण को पोस रहे 
कोस रहे हैं उजियारों को 
खुद ही काले कोस रहे 
करवट लेते महल -अटारी 
टूटे छप्पर -छानी में |
चार 
गूँजता एकान्त 
कमरे चीखते हैं 

तुम नहीं हो 
नहीं चावल बीनता कोई 
पंछियों की 
मौन भाषा चीन्हता कोई ?
चहक तीखी हुई 
बेबस दीखते हैं 

मुंडेरों पर 
आंख सूनी और सूनापन 
अलगनी पर 
टांग दें क्या आज खाली मन ?
अकेले में आह !
जीना सीखते हैं 

निचुड़ता मन 
याद में भींगे अँगरखे सा 
गुज़रता दिन 
औपचारिक चले चरखे सा 
व्यर्थ अपने आप 
पर ही खीझते हैं 
पांच  
दबे पैरों से उजाला आ रहा है 
फिर कथाओं को खंगाला जा रहा है 

धुंध से चेहरा निकलता दिख रहा है 
कौन क्षितिजों पर सबेरा लिख रहा है 
चुप्पियाँ हैं जुबाँ बनकर फूटने को 
दिलों में गुस्सा उबाला जा रहा है 

दूर तक औ देर तक सोचें भला क्या 
देखना है बस फिज़ां में है घुला क्या 
हवा में उछले सिरों के बीच ही अब 
सच शगूफे सा उछाला जा रहा है 

नाचते हैं भय सियारों से रंगे हैं 
जिधर देखो उस तरफ़ कुहरे टँगे हैं 
जो नशे में धुत्त हैं उनकी कहें क्या 
होश वालों को संभाला जा रहा है 

स्थगित है गति समय का रथ रुका है 
कह रहा मन बहुत नाटक हो चुका है 
प्रश्न का उत्तर कठिन है इसलिए भी 
प्रश्न सौ -सौ बार टाला जा रहा है 

सेंध गहरी नींद में भी लग गयी है 
खीझती सी रात काली जग गयी है 
दृष्टि में है रोशनी की एक चलनी 
और गाढ़ा धुआँ चाला जा रहा है 
छः 
तुम छत से छाये 
जमीन से बिछे 
खड़े दीवारों से 
तुम घर के आंगन 
बादल से घिरे 
रहे बौछारों से 

तुम 'अलबम 'से दबे पांव 
जब बाहर आते हो 
कमरे -कमरे अब भी अपने 
गीत गुंजाते हो 
तुम बसंत होकर 
प्राणों में बसे 
लड़े पतझारों से 
तुम ही चित्रों से 
फ्रेमों में जड़े 
लदे हो हारों से 

तुम किताब से धरे मेज़ पर 
पिछले सालों से 
आँसू बनकर तुम्हीं ढुलकते 
दोनों गालों से 
तुम ही नयनों में 
सपनों से तिरे 
लिखे त्योहारों से 
तुम ही उड़ते हो 
बच्चों के हाथ 
बंधे गुब्बारों से 

यदा -कदा वह डॉट  तुम्हारी 
मीठी -मीठी सी 
घोर शीत में जग जाती है 
याद अँगीठी सी 
तुम्ही हवाओं में 
खिड़की से हिले 
बहे रस धारों से 
तुम ही फूले हो 
होंठों पर सजे 
खिले कचनारों से 
सात -यश मालवीय की हस्तलिपि में कुछ दोहे