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मंगलवार, 29 अप्रैल 2025

एक देशगान -वीरों सरहद पार करो

तिरंगा

 
विष्णु अवतार भगवान परशुराम

परशुराम के 

जन्मदिवस पर 
वीरों सरहद पार करो.
भारत माता 
की जय बोलो 
दुश्मन का संहार करो.

काहूटा को 
राख बना दो 
मारो हर उन्मादी को,
रावण की 
लंका को फूंको 
मारो हर जेहादी को,
कभी नहीं 
जो हुआ आज तक 
 वह तांडव इस बार करो.

खप्पर और त्रिशूल 
उठा लो 
महाकाल को याद करो,
रावलपिंडी 
और कराची 
को बिलकुल बर्बाद करो,
पांचजन्य फूंको 
मानवता का 
फिर से उद्धार करो.

दुनिया काँपे 
अबकी जो भी
युद्ध लड़ो निर्णायक हो,
भारत का
हर सैनिक लक्ष्मण
महावीर रघुनायक हो,
अग्नि, त्रिशूल
पिनाक दागकर
अब अपनी हुंकार भरो.
चित्र साभार गूगल


मंगलवार, 22 अप्रैल 2025

एक देशगान -बाज़ उड़ाओ

 

भारत माता

देशगान -


एक भिखारी मुल्क 
चुनौती 
देता हिंदुस्तान को.
दुनिया के 
नक्शे से गायब
कर दो पाकिस्तान को,

बाज़ उड़ाओ 
श्वेत कबूतर 
कब तक यहाँ उड़ाओगे,
कब तक सत्य-
अहिंसा वाला 
झूठा गीत सुनाओगे,
अब  ब्रम्हास्त्र 
चलाकर मारो
सदियों के शैतान को.

बार -बार आतंकी 
घेरो मारो 
यही कहानी है,
फिर धरती 
कुरुक्षेत्र बना दो 
इसमें क्या हैरानी है,
सूर्य निगल 
जाये जो पल में 
याद करो हनुमान को.

आँख दिखाते 
बांग्लादेशी 
कैसी नीति हमारी है,
घात लगाए 
दुश्मन बैठे 
घर में भी गद्दारी है,
कब्जे में लो 
सिंध कराची 
और बलूचिस्तान को.

जयहिंद

तिरंगा





सोमवार, 21 अप्रैल 2025

श्री आमोद माहेश्वरी जी लोक भारती में आज

 


लोकभारती प्रयागराज के दफ़्तर में राजकमल, लोकभारती, एवं राधाकृष्ण के मुख्य कार्यकारी श्री आमोद माहेश्वरी जी साथ में श्री रमेश ग्रोवर जी, भाई श्री सूर्यनारायण जी एवं श्री विवेक निराला जी.


एक देशगान -जागो फिर वैशाली

 

एक देश गान -जागो फिर वैशाली 

चित्र साभार गूगल
चित्र साभार गूगल


एक देशगान-जागो फिर वैशाली

तक्षशिला,

नालंदा जागो 

जागो फिर वैशाली.

जागो फिर 

चौसठ योगिनियों 

महाकाल की काली.


फिर कोदंड 

उठाकर निकलो 

हे रघुकुल के नायक,

पंचवटी के 

ऋषियों का 

फिर जीवन हो सुखदायक,

धर्म, मोक्ष से 

रिक्त न हो 

अब अक्षय वट की डाली.


वक़्त आ गया 

चक्र उठा लो 

वंशी, मुरली छोड़ो,

हे पीतांबर धारी 

कटि फिर 

दुर्योधन की तोड़ो,

विदुर बुझाओ

लक्षागृह की 

ज्वाला लपटों वाली.


चन्द्रगुप्त

चाणक्य,शिवाजी

राणा अपने नायक,

गांधारी के

दरबारों में

पूजनीय खलनायक,

भारत माता

की गाथा हो

युग-युग गौरवशाली.

जयकृष्ण राय तुषार 

चित्र साभार गूगल


रविवार, 13 अप्रैल 2025

एक देशगान -रामकृष्ण बंकिम सुभाष का चंदन वन मुरझाया है

 

चित्र साभार गूगल

चित्र साभार गूगल

क्रांति गीत -अब सोये बंगाल को


मिलजुलकर 

आवाज़ लगाओ 

अब सोये बंगाल को.

गंगासागर के 

सीने पर 

रक्खा किसने ब्याल को.


रामकृष्ण, बंकिम 

सुभाष का 

चंदन वन मुरझाया है,

संविधान के 

हर पन्ने का 

अनुच्छेद अकुलाया है,

शर्मिंदा कर 

रही आसुरी 

नीति यहाँ पाताल को.


अब रविन्द्र संगीत 

की धरती 

पत्थर लेकर चलती है,

महिलाएं 

असुरक्षित 

बस्ती असहायों की जलती है,

माँ काली के 

साथ बुलाओ 

महाकाल विकराल को.


संत विवेकानंद की 

गौरव गाथा 

कैसे भूल गए,

आज़ादी के

लिए यहाँ 

फाँसी पर कितने झूल गए,

जहाँ -जहाँ 

विषधर लिपटे हैं 

काटो उस हर डाल को.



गुरुवार, 3 अप्रैल 2025

एक दिन लोकभारती प्रेस में विद्वानों के साथ

 विगत सप्ताह साहित्य और प्रकाशन जगत की दो महान विभूतियों से लोकभारती /राजकमल प्रकाशन में आत्मीय मुलाक़ात हुई. इलाहाबाद विश्व विद्यालय के हिन्दी विभाग के पूर्व प्रोफ़ेसर /आलोचक एवं कवि आदरणीय श्री राजेंद्र कुमार जी एवं लोकभारती के संस्थापक अब संरक्षक आदरणीय श्री रमेश ग्रोवर जी. रमेश जी अस्वस्थ होकर गुड़गांव चले गए थे पुनः उनकी वापसी से लोग अभिभूत हैं. रमेश जी के साथ दूसरी फोटो प्रोफ़ेसर संतोष भदौरिया जी हिन्दी विभाग इलाहाबाद विश्व विद्यालय की है.आप दोनों शतायु हों.

लोकभारती के संस्थापक आदरणीय श्री रमेश ग्रोवर,
 प्रोफ़ेसर संतोष भदौरिया जी हिन्दी विभाग
इलाहाबाद केंद्रीय विश्व विद्यालय

आदरणीय श्री रमेश ग्रोवर संस्थापक लोकभारती
एवं कवि, लेखक, प्रोफ़ेसर राजेंद्र कुमार जी


बुधवार, 26 मार्च 2025

एक ताज़ा गीत -चैत्र रामनवमी भी आनेवाली है

 

चित्र साभार गूगल

चित्र साभार गूगल

चित्र साभार गूगल


एक ताज़ा गीत -

सुबह 

परी सी बन्द

खिड़कियाँ खोल रही.

फूल गली 

फिर राधे -

राधे बोल रही.


गोकुल,

वृन्दावन 

मन में बरसाना है,

यमुना के 

जल में भी 

तालमखाना है,

मन के 

निधिवन 

एक मयूरी बोल रही.


फागुन 

बीत गया 

आमों का मौसम है,

महाकुम्भ की 

याद 

सजाये संगम है,

लहरों पर 

नौका 

आहिस्ता डोल रही.


चैत्र 

रामनवमी 

भी आने वाली है,

सरयू 

मंगल गीत 

सुनानेवाली है,

अवधपुरी 

की मिट्टी

जय -जय बोल रही.


काशी के 

घाटों पर 

उत्सव चलते हैं,

इसमें 

दीप अखण्ड 

हमेशा जलते हैं,

ठुमरी

गंगा तट

मीठे रस घोल रही.

कवि 

जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साभार गूगल

चित्र साभार गूगल


शुक्रवार, 14 मार्च 2025

कुछ दोहे होली

 

चित्र साभार गूगल

फूलों से श्रृंगार कर मौसम हुआ अनंग 

होली के हुड़दंग में काशी पीये भंग 

गली गली फगुआ सुने जोगीरा के बोल 
इंद्रधनुष से हो गए सबके सुर्ख कपोल 

साधू, संत, गृहस्थ सब मना रहे त्यौहार 
होली सिखलाती हमें सब रंगो से प्यार 

तन मन रंगना भूलकर बैठे पथिक उदास 
भक्ति सरोवर खिल रहा बरसाने के पास 

ब्रज पढ़ता है सूर को काशी तुलसीदास 
बस प्रयाग में ही मिलीं यमुना, गंगा पास 

रिश्ते और समाज के मरहम हैं त्यौहार 
लोकरंग के साथ में देते हैं उपहार 

सबकी अपनी बाँसुरी सबके अपने राग 
अपनी सारंगी लिए वैरागी मन जाग 

टेसू, इत्र, ग़ुलाल से खुश गोपी, गोपाल 
अपनी धुन में बज रहे उद्धव के करताल 

केरल, पटना, चेन्नई, दिल्ली और भोपाल 
कुछ उदास कुछ रंग गए राजनीति के गाल 

धूल भरी पगडंडियों पर रंगों का खेल 
उम्र जाति बंधन नहीं सबका सबसे मेल 

बचे रहें ये रंग सब, बचा रहे संसार 
हिंसा होली में जले, बचे शांति और प्यार

जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साभार गूगल


गुरुवार, 13 मार्च 2025

एक पुराना होली गीत

 

चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार 
एक - होली में आना जी आना 

होली में 
आना जी  आना 
चाहे जो रंग लिए आना |
भींगेगी देह 
मगर याद रहे 
मन को भी रंग से सजाना |


वर्षों से 
बर्फ जमी प्रीति को 
मद्धम सी आंच पर उबालना ,
जाने क्या
चुभता है आँखों में 
आना तो फूंककर निकालना ,
मैं नाचूँगी 
राधा बनकर 
तू कान्हा बांसुरी बजाना |


आग लगी 
जंगल में या 
पलाश दहके हैं ,
मेरे भी 
आंगन में 
कुछ गुलाब महके हैं ,
कब तक 
हम रखेंगे बांधकर 
खुशबू का है कहाँ ठिकाना |


लाल हरे 
पीले रंगों भींगी
चूनर को धूप में सुखायेंगे ,
तुम मन के 
पंख खोल उड़ना 
हम मन के पंख को छुपायेंगे ,
मन की हर 
बंधी गाँठ खोलना 
उस दिन तो दरपन हो जाना |


हारेंगे हम ही 
तुम जीतना 
टॉस मगर जोर से उछालना ,
ओ मांझी 
धार बहुत तेज है 
मुझे और नाव को सम्हालना ,
नाव से 
उतरना जब घाट पर 
हाथ मेरी ओर भी बढ़ाना


दो -
आम  कुतरते हुए सुए से 


आम कुतरते हुए सुए से 
मैना कहे मुंडेर की |
अबकी होली में ले आना 
भुजिया बीकानेर की |


गोकुल ,वृन्दावन की हो 
या होली हो बरसाने की ,
परदेशी की वही पुरानी 
आदत है तरसाने की ,
उसकी आंखों को भाती है 
कठपुतली आमेर की |


इस होली में हरे पेड़ की 
शाख न कोई टूटे ,
मिलें गले से गले ,पकड़कर 
हाथ न कोई छूटे ,
हर घर -आंगन महके खुशबू 
गुड़हल और कनेर की |


चौपालों पर ढोल मजीरे 
सुर गूंजे करताल के ,
रूमालों से छूट न पायें 
रंग गुलाबी गाल के ,
फगुआ गाएं या फिर बांचेंगे 
कविता शमशेर की |
चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार
[मेरा दूसरा गीत अमर उजाला के २० मार्च २०११ के साप्ताहिक परिशिष्ट जिंदगी लाइव में प्रकाशित हो चुका है |इस गीत को प्रकाशित करने के लिए जाने माने कवि /उपन्यासकार एवं सम्पादक साहित्य अरुण आदित्य जी  का विशेष आभार]
[दूसरा  गीत   नरेंद्र व्यास जी के आग्रह पर  लिखना पड़ा, इसलिए यह गीत उन्हीं को समर्पित  कर रहा हूँ ]

सोमवार, 24 फ़रवरी 2025

माँ गंगा, यमुना और सरस्वती का भव्य मंदिर बने प्रयागराज में

 

चित्र साभार गूगल 

प्रयागराज में गंगा, यमुना और सरस्वती का भव्य मन्दिर बने 


मैं देश के यशस्वी प्रधानमंत्री जी और माननीय मुख्यमंत्री जी से परमपूज्य चारो शंकराचार्य और संत समाज के साथ देश के उद्योगपति बन्धुओं से निवेदन करता हूँ कि महाकुम्भ 2025 की मनोहर स्मृति में संगम, अरेल या लेटे हनुमान जी के निकट विश्व में श्रेष्ठतम माँ गंगा, यमुना और सरस्वती का मन्दिर बने.आस्था के साथ पर्यटन भी धन्य होगा.  यह महाकुम्भ सनातन आस्था का दिव्य, अलौकिक और विराट स्वरूप है. सकल विश्व के लिए शांति और अध्यात्म का अतुलनीय शंखनाद है.धनकुबेरों और आमजन की आस्था का महासंगम देखने को मिला इस महान कुम्भ में. हर हर गंगे. जय प्रयागराज


चित्र साभार गूगल