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शुक्रवार, 27 जुलाई 2012

हिंदी साहित्य और फिल्म जगत के इन्द्रधनुषी कवि पद्मविभूषण गोपाल दास नीरज

लोकप्रिय हिंदी गीत कवि -गोपाल दास नीरज 
सम्पर्क -09412671777
इसीलिए तो नगर -नगर बदनाम हो गये मेरे आंसू 
मैं उनका हो गया कि जिनका कोई पहरेदार नहीं था 
                                गोपाल दास नीरज 
परिचय -
हिंदी साहित्य और फिल्म जगत को अपने सदाबहार और इन्द्रधनुषी  गीतों से समृद्ध करने वाले महान और सहज कवि का नाम है गोपाल दास नीरज | गोपाल दास नीरज ने जब हिंदी कविता मंच पर पदार्पण किया तब राह इतनी आसान नहीं थी |यह ऐसा वक्त था जब कवि सम्मेलनों में राष्ट्रकवि रामधारीसिंह दिनकर ,गोपाल सिंह नेपाली ,सोहन लाल द्विवेदी ,हरिवंशराय बच्चन जैसे कवि हिंदी साहित्य और मंच दोनों का ही गौरव बढ़ा रहे थे |लेकिन समन्दर की लहर को चट्टान कहाँ रोक पाती है |नीरज अपना रास्ता खुद बनाते गए, आगे बढ़ते गए और सुरीले गीत गाते गए |प्रेम को नित नई परिभषा देते गए |नीरज सर्वधर्म समभाव के एक महान सूफी कवि है |यह मानवता को सबसे बड़ा धर्म मानते हैं | गोपाल दास नीरज का जन्म इटावा के गांव पुरावली में 04 जनवरी 1925 को हुआ था |बचपन संकटपूर्ण था नीरज को चांदी के चम्मच और दूध -भात नहीं मिले थे |प्रारम्भिक शिक्षा एटा जनपद में हुई थी |एम० ए० हिंदी प्रथम श्रेणी में डी० ए० वी० कालेज से उत्तीर्ण हुए थे |सन 1944में दिल्ली में एक कवि सम्मेलन में नीरज ने संयोजक से आग्रह कर भाग लिया फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखे |जीविका के लिए बचपन में कठिन संघर्ष करना पड़ा |कभी टायपिस्ट ,कभी स्टेनोग्राफर तो कभी जिला सूचना अधिकारी बने बाद के दिनों में अध्यापन के पेशे से जुड़े |कुछ दिन भावुक इटावी के नाम से भी नीरज जी कविता करते रहे लेकिन फिर नीरज हो गए [गोपाल दास सक्सेना असली नाम ] फिल्म में गीत लेखन के समय भी कई नामचीन गीतकार उस समय मौजूद थे जिनसे नीरज जी को आगे निकलना था ,उस समय गोपाल सिंह नेपाली ,भारत व्यास इन्दीवर पंडित नरेंद्र शर्मा जैसे गीतकार फिल्मों में गीत लेखन कर रहे थे |लेकिन यहाँ भी नीरज सबसे अलग सबसे हट के गीत लेखन कर रहे थे |नीरज एक दार्शनिक और प्रयोगधर्मी गीतकार हैं फिल्म जगत को लगभग 130 गीतों का तोहफा देने वाले नीरज यहाँ भी बिलकुल अलग दिखते हैं लेकिन कवि का स्वाभिमान बहुत दिन तक बालीवुड को सहन नहीं कर सकता था |अतः नीरज जी ने बाद में फिल्मों में लिखना छोड़ दिया |आज उनके फ़िल्मी गीत भी हमारे लिए धरोहर के सामान हैं |गोपाल दास नीरज के लेखन की विधा मूलतः गीत ,मुक्तक गीतिका और हायकू हैं |इनके गीतों में प्रेम दर्शन प्रकृति और अध्यात्म के दर्शन सहज रूप से होते हैं लेकिन नीरज ने क्रान्तिकारी और जनवादी तेवर के गीत भी लिखे हैं |न्यूयार्क के एक कार्यक्रम में 600 सीटों से भरे हाल में लोग बाहर खड़े होकर इन्हें सुन रहे थे और इन्हें संत कवि की उपाधि मिली |कवि सम्मेलनों में इन्हें अपार लोकप्रियता मिली |इनके गीतों के साथ -साथ इनके काव्य पाठ का स्टाईल भी औरों से अलग है |सन 1943 में बंगाल में गोपाल सिंह नेपाली जी से इनका परिचय हुआ था |कक्षा नौवीं में ही सोहनलाल द्विवेदी की अध्यक्षता में कविता पाठ कर चुके थे | नीरज जी मंगलायतन यूनिवर्सिटी के कुलपति भी रहे इन्हें फिल्मफेयर ,पद्म विभूषण,पद्मश्री  और उत्तर प्रदेश के महत्वपूर्ण सम्मान यश भारती से सम्मानित किया जा चुका है |नीरज इस सदी के एक अप्रतिम गीत कवि हैं |उनके गीतों में रची -बसी केसर और जाफरान की खुशबू हमें सदियों तक अपनी सुगन्ध से आनन्दित करती रहेगी |गोपाल दास नीरज एक अच्छे ज्योतिषी भी हैं |नीरज जी के साथ तीन बार मुझे भी कविता पढ़ने का अवसर मिला यह महान कवि नए कवियों को प्रोत्साहित भी मन से करता है |पद्मश्री नीरज जी की प्रमुख कृतियाँ हैं -आसावरी ,कारवां गुजर गया ,कुछ दोहे नीरज के ,गीत -अगीत ,गीत जो गाए नहीं ,दर्द दिया है ,नीरज की पाती ,बादलों से सलाम लेता हूँ आदि | गोपाल दास नीरज के दीर्घायु होने की कामना के साथ हम आज उनके कुछ गीत और गीतिकाएँ आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं |आपके प्यार और आशीर्वाद की आकांक्षा के साथ -
[सम्प्रति नीरज जी उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान के अध्यक्ष पद को सुशोभित कर रहे हैं ]

लोकप्रिय गीत कवि- गोपाल दास नीरज के गीत और गीतिकाएँ [ग़ज़लें ]
एक 
इसीलिए तो नगर -नगर बदनाम हो गये मेरे आंसू 
मैं उनका हो गया कि जिनका कोई पहरेदार नहीं था |

जिनका दुःख लिखने की ख़ातिर 
मिली न इतिहासों को स्याही ,
क़ानूनों को नाखुश करके 
मैंने उनकी भरी गवाही 

जले उमर- भर फिर भी जिनकी 
अर्थी उठी अँधेरे में ही ,
खुशियों की नौकरी छोड़कर 
मैं उनका बन गया सिपाही 

पदलोभी आलोचक कैसे करता दर्द पुरस्कृत मेरा 
मैंने जो कुछ गाया उसमें करुणा थी श्रृंगार नहीं था |

मैंने चाहा नहीं कि कोई 
आकर मेरा दर्द बंटाये ,
बस यह ख़्वाहिश रही कि -
मेरी उमर ज़माने को लग जाये ,

चमचम चूनर -चोली पर तो 
लाखों ही थे लिखने वाले ,
मेरी मगर ढिठाई मैंने 
फटी कमीज़ों के गुन गाये ,

इसका ही यह फल है शायद कल जब मैं निकला दुनिया में 
तिल भर ठौर मुझे देने को मरघट तक तैयार नहीं था |

कोशिश भी कि किन्तु हो सका 
मुझसे यह न कभी जीवन में ,
इसका साथी बनूँ जेठ में 
उससे प्यार करूँ सावन में ,

जिसको भी अपनाया उसकी 
याद संजोई मन में ऐसे 
कोई साँझ सुहागिन दिया 
बाले ज्यों तुलसी पूजन में ,

फिर भी मेरे स्वप्न मर गये अविवाहित केवल इस कारण 
मेरे पास सिर्फ़ कुंकुम था ,,कंगन पानीदार नहीं था |

दोषी है तो बस इतनी ही 
दोषी है मेरी तरुणाई ,
अपनी उमर घटाकर मैंने 
हर आंसू की उमर बढ़ाई ,

और गुनाह किया है कुछ तो 
इतना सिर्फ़ गुनाह किया है 
लोग चले जब राजभवन को 
मुझको याद कुटी की आई 

आज भले कुछ भी कह लो तुम ,पर कल विश्व कहेगा सारा 
नीरज से पहले गीतों में सब कुछ था पर प्यार नहीं था |
दो 
स्वप्न झरे फूल से ,
मीत चुभे शूल से ,

लुट गये सिंगार सभी बाग के बबूल से 
और हम खड़े -खड़े बहार देखते रहे 
कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे |

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई 
पांव जब तलक उठें कि ज़िन्दगी फिसल गई 
पात -पात झर गये कि शाख -शाख जल गई 
चाह तो निकल सकी न पर उमर निकल गई ,

गीत अश्क बन गये 
छन्द हो दफ़न गये ,
साथ के सभी दिये 
धुआं -धुआं पहन गये 
और हम झुके -झुके ,
मोड़ पर रुके -रुके 
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे ,
कारवां गुजर गया ,गुबार देखते रहे |

क्या शबाब था कि फूल -फूल प्यार का उठा ,
क्या सुरूप था कि देख आईना सिहर उठा ,
इस तरफ ज़मीन और आसमां उधर उठा ,
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा ,

एक दिन मगर यहाँ 
ऐसी कुछ हवा चली ,
लुट गई कली -कली कि घुट गई गली -गली ,
और हम लुटे -लुटे 
वक्त से पिटे -पिटे 
सांस की शराब का खुमार देखते रहे ,
कारवां गुज़र गया ,गुबार देखते रहे |

हाथ थे मिले कि जुल्फ़ चांद की संवार दूं 
होंठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूं ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूं 
और सांस यूँ कि स्वर्ग भूमि पर उतार दूं ,
हो सका न कुछ मगर 
शाम बन गई सहर 
वह उठी लहर कि ढह गये किले बिखर -बिखर 
और हम डरे -डरे ,
नीर नयन में भरे 
ओढ़कर कफ़न पड़े मज़ार देखते रहे 
कारवां गुजर गया ,गुबार देखते रहे |

मांग भर चली कि एक जब नई -नई किरन 
ढोलके धुनुक उठीं ठुमुक उठे चरन -चरन 
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन ,चली दुल्हन 
गांव सब उमड़ पड़ा बहक उठे नयन -नयन 
पर तभी ज़हर भरी 
गाज एक वह गिरी 
पुंछ गया सिन्दूर तार -तार हुई चूनरी 
और हम अजान से 
दूर के मकान से 
पालकी लिए हुए कहार देखते रहे 
कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे |
तीन 
खुशबू सी आ रही है इधर ज़ाफ़रान की
खिड़की खुली  है फिर कोई उनके मकान की |

हारे हुए परिन्द ज़रा उड़के देख तो 
आ जाएगी ज़मीन पे 'छत आसमान की |

बुझ जाये सरेशाम ही जैसे कोई चिराग 
कुछ यूँ है शुरुआत मेरी दास्तान की |

ज्यों लूट लें कहार ही दुलहिन की पालकी 
हालत यही है आजकल हिन्दोस्तान की |

औरों के घर की धूप उसे क्यों पसन्द हो 
बेची हो जिसने रोशनी अपने मकान की |

जुल्फों के पेचो -ख़म में उसे मत तलाशिये 
ये शायरी ज़ुबां है किसी बेजुबान की |

नीरज 'से बढ़के और धनी कौन है यहाँ 
उसके हृदय में पीर है सारे जहान की |
चार 
अब के सावन में शरारत ये मेरे साथ हुई 
मेरा घर छोड़ के कुल शहर में बरसात हुई |

आप मत पूछिये क्या हम पे 'सफ़र में गुज़री ?
आज तक हमसे हमारी न मुलाकात हुई |

हर गलत मोड़ पे टोका है किसी ने मुझको 
एक आवाज़ तेरी जब से मेरे साथ हुई |

मैंने सोचा कि मेरे देश की हालत क्या है 
एक क़ातिल से तभी मेरी मुलाक़ात हुई |
पांच 
जब चले जाएंगे लौट के सावन की तरह ,
याद आएंगे प्रथम प्यार के चुम्बन की तरह |

ज़िक्र जिस दम भी छिड़ा उनकी गली में मेरा 
जाने शरमाए वो क्यों गांव की दुल्हन की तरह |

कोई कंघी न मिली जिससे सुलझ पाती वो 
जिन्दगी उलझी रही ब्रह्म के दर्शन की तरह |

दाग मुझमें है कि तुझमें यह पता तब होगा ,
मौत जब आएगी कपड़े लिए धोबन की तरह |

हर किसी शख्स की किस्मत का यही है किस्सा ,
आए राजा की तरह ,जाए वो निर्धन की तरह |

जिसमें इन्सान के दिल की न हो धड़कन की नीरज '
शयरी तो है वह अखबार की कतरन की तरह |
छः 
तमाम उम्र मैं इक अजनबी के घर में रहा 
सफ़र न करते हुए भी किसी सफ़र में रहा 

वो जिस्म ही था जो भटका किया ज़माने में 
हृदय तो मेरा हमेशा तेरी डगर में रहा 

तू ढूंढता था जिसे जा के बृज के गोकुल में 
वो श्याम तो किसी मीरा की चश्मे -तर में रहा 

वो और ही थे जिन्हें थी ख़बर सितारों की 
मेरा ये देश तो रोटी की ही ख़बर में रहा 

हज़ारों रत्न थे उस जौहरी की झोली में 
उसे कुछ भी न मिला जो अगर -मगर में रहा 
सात 
हम तेरी चाह में ऐ यार ! वहां  तक पहुंचे 
होश ये भी न जहाँ है कि कहाँ तक पहुँचे 

इतना मालूम है ख़ामोश है सारी महफ़िल 
पर न मालूम ये ख़ामोशी कहाँ तक पहुँचे 

वो न ज्ञानी ,न वो ध्यानी ,न बिरहमन न वो शेख 
वो कोई और थे जो तेरे मकां तक पहुँचे 

एक इस आस पे अब तक है मेरी बन्द जुबाँ 
कल को शायद मेरी आवाज़ वहां तक पहुँचे 

चाँद को छूके चले आए हैं विज्ञान के पंख 
देखना ये है कि इंसान कहाँ तक पहुँचे 

आठ - नीरज जी की हस्तलिपि में एक मुक्तक  
इलाहाबाद उच्च न्यायालय में विगत मार्च में काव्य पाठ करते गोपालदास नीरज साथ में मैं जयकृष्ण राय तुषार