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सोमवार, 21 नवंबर 2011

हिन्दी के अप्रतिम नवगीत कवि -डॉ० प्रेम शंकर

कवि -डॉ० प्रेम शंकर 
e-mail-pshanker98@gmail.com
mob.no.09410061985
डॉ० प्रेम शंकर [कवि /लेखक ]
कार्यकारी पूर्णकालीन अध्यक्ष उ० प्र० हिन्दी संस्थान -लखनऊ 
परिचय -
वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के कार्यकारी पूर्ण कालीन अध्यक्ष के पद को सुशोभित कर रहे डॉ० प्रेम शंकर हिन्दी नवगीत विधा के अप्रतिम कवि हैं |डॉ० प्रेम शंकर न केवल कवि हैं बल्कि हिन्दी के उद्भट विद्वान और महत्वपूर्ण लेखक हैं |नवगीत लेखन में जब यह कवि प्रेम को अभिव्यक्त करता है तो नितांत ताजे बिम्बों प्रतीकों से कविता का एक अप्रतिम रूप हमारे सामने आता है |शहरी भाव बोध से लेकर ग्रामीण अंचल की खूबसूरती इनकी कविताओं की विशेषता है |डॉ० प्रेम शंकर कविता के भाव ,शिल्प ,समकालीन सोच के साथ नए -प्रतीकों और प्रयोगों के साथ एक सधे हुए कुम्हार की तरह कविता के घड़े को सुघर बनाते हैं |डॉ० प्रेम शंकर की कविता बेडरूम से निकलकर उनकी कल्पना की सहचरी नहीं बनती बल्कि उनके जीवन के व्यापक अनुभव और दृष्टिकोण से छनकर ताजा खिली धूप बनकर हरियाली के उपर फ़ैल जाती है |यह धूप कभी जाड़े की गुनगुनी होती है तो कभी वैशाख की दोपहरी जैसी कड़क होती है |हिन्दी के इस महान कवि विचारक का जन्म अपनी विश्वसनीयता के लिए प्रसिद्ध तालों के शहर, मशहूर शायर शहरयार और गोपाल दास नीरज के शहर अलीगढ़ में 01-11-1943 को हुआ था | शिक्षा -डॉ० प्रेम शंकर ने प्रथम श्रेणी में हिन्दी में स्नातकोत्तर उपाधि हासिल कर प्रयोगवाद और व्यक्तिवाद पर एम० फ़िल० और आधुनिक हिन्दी कविता में व्यक्तिवाद पर पी० एच० डी० की उपाधि हासिल किया |इन्हें धर्मरत्न की उपाधि सन 1955में प्रदान की गयी |पुस्तकें और प्रकाशन -हिन्दी और उसकी उपभाषाएं ,नयी गन्ध [नवगीत संग्रह ],दलितों का चीखता आभाव [कविता संकलन ]अपनी शताब्दी से उपेक्षित [कविता संकलन ]कविता रोटी की भूख तक [कविता संकलन ]इसके अतिरिक्त भी कई शोध पत्र और पुस्तकें इनके द्वारा सम्पादित की गयीं हैं |कई महत्वपूर्ण पदों को सुशोभित कर चुके डॉ० प्रेम शंकर लाल बहादुर राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी मसूरी में प्रोफेसर एवं समन्वयक [हिन्दी एवं प्रादेशिक भाषाएं ]भी रह चुके हैं |डॉ० प्रेमशंकर का विस्तृत परिचय उनके ब्लॉग पर देखा जा सकता है   http://drpremshanker.blogspot.com/|स्वभाव से विनम्र और मृदुभाषी डॉ० प्रेम शंकर जी का परिचय आज हम अंतर्जाल के माध्यम से आप सब सहृदय मित्रों और पाठकों तक पहुंचा रहे हैं -
डॉ० प्रेम शंकर के नवगीत
एक  
तुम्हें 
छूकर 
लौट आया दिन |
अनमना -सा 
हो गया -
ये इन्द्रधनुषी मन |

कुछ दरारें 
बन गईं 
जो जुड़ नहीं पायीं 
कुछ नयी दीवार हैं 
जो हट नहीं पायीं 
अब दूर तक 
अंधी गुफाओं में ,
ढूंढता ,
झख मारता है मन |

फैशन 
अधुनातन नहीं ,
बाज़ार सी आँखें 
अब नहीं 
मुझको बुलातीं 
गुलमोहर शाखें 
हम सफाई 
ना भी दें 
तो क्या -
टूटता 
मन मारता है प्रन  |
दो 
कल मैं 
आऊँगा |
कांपते संशय की 
शाख तोड़ लाऊंगा |

तुम मिलना 
उसी तरह 
अधर खोल 
गुलमोहर डाल- से 
आँखों के 
वर्जित प्रश्न 
उधर जायेंगे |
कल मैं 
आऊँगा 
झूमते गुलमोहर फूल 
तोड़ लाऊंगा |

तुम आना 
उसी तरह 
शशि मुख 
केशामुक्लाई -सी 
बतियाना 
उसी तरह -
अलक हिला ,
जीवन के 
चर्चित रंग 
उभर आयेंगे -
कल 
मैं आऊंगा |
अनलिखे 
हृदय पर 
नाम छाप जाऊंगा |
तीन 
आ गया है 
चैत ,
सोने -सी पकी फसलें |
दो घड़ी 
हम आम तरु की 
छांह में हंस लें |

पोखरे का 
जल गंदीला 
मछलियाँ प्यासी 
ये 
किसानी आंख 
मानो ,
अनधुली बासी 
कह रही ज्यों 
हम कहाँ ,
किस ठौर जा बस लें |
लादकर 
गट्ठर समय का 
एक युग बीता 
आदमी ने 
मौत को 
अब तक नहीं जीता 
इसलिए हम 
हाथ में हंसिया 
जरा कस लें |
दूर तक 
हर खेत में 
बालें लहरती -सीं 
कर्म के हर 
छंद पर हम 
अर्थ का रस लें |
चार 
शायद 
हम तुम दो छाया हैं 
अंधी भादों रात की |
तन ने पीड़ा सही अनेकों 
करका -घन संघात की |

पता नहीं कितनी दूरी है ,
या हम पास खड़े 
एक दूसरे को छूने को ,
कितनी बार मुड़े 
पर 
बदरायी छाया पल छिन 
खो जाती है गात की |

कभी -कभी हम इस धुंधले में 
साथ -साथ चलते 
नयी प्रेत -सी छायाओं से ,
पग -पग पर छलते 
अक्सर 
पीर उभर आती है 
जाने क्यों बेबात की |

घने अँधेरे में जलते  दो 
जैसे मधुर दिये 
तिल -तिल जलकर किरण फेंकते ,
गूंगी जलन जिये 
दूर -दूर तक खो जाती है ,
लौ मन की 
सौगात की |
पांच 
मन में पसर गईं हैं यादें |
लोहे के हर कला भवन में 
पारस -पत्थर की बुनियादें |

हरी दूब पर -
वीर वहूटी 
जड़े हुए दर्पण में -
खूंटी 
बिखरे चित्रों की 
परिभाषा 
डूब रहे हैं 
लिए हताशा 
पंख लिए हैं -
उड़ने वाले 
जाल तोड़ना हमें सिखा दें |

घर -आंगन ,
आकाश नयन में 
थके पांव थे ,
बीच सहन में 
तुतलाते हकलाते सपने 
हुए प्रज्ज्वलित 
छल से अपने 
धूप बनो ,तारों से चमको 
इन शोलों को 
सभी हवा दें |
छः -डॉ० प्रेमशंकर की हस्तलिपि में एक गीत 

बुधवार, 16 नवंबर 2011

हिन्दी के लोकप्रिय नवगीतकार शतदल

कवि -शतदल 
सम्पर्क -e-mail-rshatdal@gmail.com
राम प्रकाश शुक्ल शतदल का काव्य संसार 

हिन्दी गीत /नवगीत विधा के सौम्य और सरस कवि शतदल नवगीत के बहुत ही  लोकप्रिय कवि हैं | शतदल जी का पूरा नाम राम प्रकाश शुक्ल है जो सरकारी कामकाज तक ही सीमित है |हिन्दी के इस लोकप्रिय कवि का जन्म 25 अक्टूबर  1944 को कानपुर में हुआ था |सबसे पहली कविता कानपुर से प्रकाशित साप्ताहिक पत्रिका सहयोगी में प्रकाशित हुई थी |सन 1963 में मेरठ के नौचन्दी में प्रथम बार काव्य पाठ में शामिल हुए |लन्दन से प्रकाशित बी० बी० सी० हिंदी पत्रिका में गीत प्रकाशित [यह पत्रिका अब बन्द हो चुकी है ] शतदल जी देश के विभिन्न आकाशवाणी केन्द्रों से कविता पाठ कर चुके हैं |दो बार नेपाल यात्रा भी कर चुके हैं |लेखन की मूल विधा गीत /नवगीत /गज़ल है |लेकिन संस्मरण ,यात्रा वृतान्त फीचर आदि में भी सक्रिय लेखन है |गीत कविता की प्रतिष्ठा और स्थापना के लिए सन 1977 में श्रृंगार संध्या की स्थापना और उसका संचालन लगभग बारह वर्षों तक |सम्पादन -चलौ मोती उगाऊ [लोकगीतों का संकलन ]श्रृंगार संध्या वार्षिक पत्रिका ,उमाकान्त मालवीय स्मृतियों के गवाक्ष [मालवीय जी पर साहित्यकारों के लेखों का संकलन ]कविकुल के गज़लगो कवि [गज़ल संकलन ,स्मृति वार्षिक पत्रिका ,कवि त्रयी [तीन कवियों की कविताओं का संकलन |साझा संकलन -श्रेष्ठ हिन्दी गीत संचयन -सम्पादक कन्हैयालाल नन्दन ,बंजर धरती पर इन्द्रधनुष -सम्पादक नन्दन ग़ज़लें रंगारंग सम्पादक डॉ० शेरजंग गर्ग ,धार पर हम ,कानपुर के कवि संपादक डॉ० प्रतीक मिश्र ,संयोग साहित्य [उत्तर प्रदेश काव्य विशेषांक -संपादक मुरलीधर पाण्डेय ,दूसरी पीढ़ी के प्रेम गीत संपादक कृष्ण गोपाल गौतम |कृतियाँ --पवन गया नीली घाटी में [गीत संग्रह 1967] तीन कृतियाँ प्रकाशनाधीन |शतदल जी अन्तर्जाल पर भी अपने ब्लॉग के माध्यम से सक्रिय हैं |भारतीय डाक विभाग से शतदल जी अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं |हम अपने पाठकों /मित्रों को अन्तर्जाल के माध्यम से शतदल जी के काव्य संसार से आज परिचित करा रहे हैं -
एक 
फूल रोशनी के 
खिलते हैं 
घने अँधेरे में |

आँखों में जल घिरे 
कि इनमें सूनापन डोले 
अधर तुम्हारे आगे 
मीठी बानी ही बोले 
हिम से ढके 
स्नेह शिखरों ने 
ताप सहा लेकिन 
नदियों से लहराते अपने 
केश नहीं खोले |

तुम्ही बता पाओगे 
मुझको तुम्हीं बताओगे 
चिन्ह तुम्हारे 
क्यों मिलते हैं 
घने अँधेरे में ?
दो 
भीड़ों के मरुथल में हमसे 
सपने हरे -भरे मिलते हैं |

सपनों के हम सौदागर हैं 
गागर में सिमटे सागर हैं ,
जीवन को महकाने वाले 
हम सरगम के कोमल स्वर हैं ,

मन महके तो अँधियारों में 
फूल रोशनी के खिलते हैं |

सपने जिस दिन पास न होंगे 
हम अपना आभास न होंगे ,
सपने जिनके साथ नहीं वो 
जीवन भर आकाश न होंगे ,

दुःख के फटे पुराने कपड़े 
सपने ही आखिर सिलते हैं |
तीन 
दिन ठहरते नहीं हैं 
किसी मोड़ पर |
क्या करें आँसुओं से 
इन्हें जोड़कर |

तुम मिले तो हुए दिन उमंगों भरे 
चाँदनी से धुले लाख रंगों भरे ,
जी रहे थे हमें भी अनूठे प्रहर 
अनगिनत गुनगुनाते प्रसंगों भरे ,

प्राण से प्राण ही 
सुन रहे थे मगर 
उठ गए तुम 
अधूरी कथा छोड़कर |

दिन फिसलते हुए जा रहे हैं जहाँ 
आदमी की जरूरत नहीं है वहाँ 
एक पल हम भले शीश पर बांध लें 
पर समय को कभी बांध पाए कहाँ ?

सोच कर देख लो 
क्या मिलेगा तुम्हें 
प्यार के गुनगुने 
आचरण छोड़ कर |
चार 
कौड़ी -कौड़ी माया जोड़ी 
बादर देख गगरिया छोड़ी |

गागर की चादर तानी थी 
चादर जो पानी -पानी थी ,
चादर ने ही समझाया फिर 
बेमतलब है भागा -दौड़ी |

अधरों -अधरों खेल तमाशे 
पानी आगे पीछे प्यासे ,
साँसों की जंजीर हवा सी 
आखिर इक दिन सबने तोड़ी |

झूठे -सच्चे सपन दिखाए 
कठपुतली सा नाच नचाए ,
उम्र मिली थी कितनी थोड़ी 
वह भी रही न साथ निगोड़ी |

जितनी भी जिनगानी पाई 
हँसते -रोते ,खेल बिताई ,
उसका नाच -नाच दुनिया में 
जिसने तुझसे डोरी जोड़ी |
पांच -गज़ल 
जिस सिम्त नज़र जाए ,वो मुझको नज़र आए 
हसरत है कि अब यूँ ही ,ये उम्र गुजर जाए |

आसार हैं बारिश के ,तूफां का अंदेशा है 
मौसम का तकाजा है अब कोई न घर जाए |

तामीरो -तरक्की का ये दौर तो है लेकिन 
ये सोच के डरता हूँ एहसास न मर जाए |

हो जिसका जो हक ले -ले गुलशन में बहारों से 
ये मौसम ए गुल यारों कल जाने किधर जाए |
छः -गज़ल 
वो जो थोड़ी मुश्किलों से हो के आजिज मर गए 
उनसे क्या उम्मीद थी और देखिए क्या कर गए |


उस इमारत को भला पुख्ता इमारत क्या कहें 
नींव में जिनकी लगाए मोम के पत्थर गए |


उम्र भर अन्धी गुफ़ाओं में रहे दरअस्ल हम 
इसलिए कल धूप में साये से अपने डर गए |


फूल खिलते हैं बड़ी उम्मीद से देखो इन्हें 
उम्र थोड़ी ,मुस्करा कर डालियों से झर गए |


बंट रहा है तेल मिट्टी का किसी ने जब कहा 
छोड़कर बच्चे मदरसा अपने -अपने घर गए |


हम किसी को क्या समझ पाते कि करते एहतराम 
हम तो अपने वक्त से पहले ही यारों मर गए |
सात -शतदल की हस्तलिपि में एक गीत 


गुरुवार, 10 नवंबर 2011

गोपीकृष्ण गोपेश का काव्य संसार -गंगा से वोल्गा तक

प्रोफ़ेसर गोपीकृष्ण गोपेश 
समय -11-11-1925से 04-09-1974
जन्मदिन 11 नवम्बर पर विशेष प्रस्तुति 
परिचय -
इलाहाबाद के साहित्यिक उपवन को आज जो सुवासित संसार मिला है इनमें उन फूलों का विशेष योगदान है जो हवा के झोकों के साथ यहाँ आये और यहीं के हो गए |हिन्दी के लगभग सारे बड़े कवि /लेखक इलाहाबाद के नाते जाने -पहचाने जाते हैं ,लेकिन इनमें शायद ही किसी का जन्म इलाहाबाद की मिट्टी में हुआ हो |इसकी मिट्टी जन्मदात्री से अधिक पालनहार है |आज मैं जिस महान कवि /अनुवादक से आपको परिचित कराने जा रहा हूँ वह भी इलाहाबाद के नाते जाना और पहचाना जाता है लेकिन इस कवि का जन्म भी कहीं और ही हुआ  था |गंगा से वोल्गा तक का सफर तय करने वाले कवि /अनुवादक प्रोफेसर गोपी कृष्ण गोपेश जी का जन्म 11नवम्बर 1925[पुस्तक में जन्म 1923लिखा है जो गलत है ] को फरीदपुर [पीताम्बरपुर ]बरेली उत्तर प्रदेश में हुआ था और निधन 4सितम्बर  1974 को |इलाहाबाद विश्व विद्यालय से हिन्दी में स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल कर गोपेश जी शोध में दाखिला लिए लेकिन वह अपूर्ण ही रह गया |स्नातक से ही युवा कवि के रूप में पहचान मिल गयी थी |जाने माने हिन्दी के कवि हरिवंशराय बच्चन जी का गुरु के रूप में गोपेश जी को सानिध्य मिला और इलाहाबाद के सभी बड़े साहित्यकारों का आशीर्वाद गोपेश जी को उस समय मिला |भारती और डॉ० जगदीश गुप्त गोपेश जी के परम मित्रों में थे |जीवन के प्रारम्भिक दिनों में गोपेश जी आकाशवाणी इलाहाबाद से जुड़े फिर यहीं से आकाशवाणी कलकत्ता चले गए |कलकत्ता से मास्को चले गए वहाँ भी रेडियो मास्को में डेपुटेशन पर वापस लौटकर आकाशवाणी दिल्ली में कुछ दिन रहे |बाद में इलाहाबाद और दिल्ली विश्व विद्यालयों में रुसी भाषा का अध्यापन किये |मास्को में रहते हुए गोपेश जी मास्को विश्वविद्यालय में हिन्दी भी पढाते थे और वहाँ के प्रतिस्ठित पीपुल्स पब्लिशिंग हॉउस से भी जुड गए थे |पीपुल्स पब्लिशिंग हॉउस में रहते हुए गोपेश जी ने अनुवाद के क्षेत्र में अविस्मरणीय कार्य किया |प्रकाशित कृतियाँ ---किरन- काव्य संग्रह ,धूप की लहरें कविता संग्रह ,सोने की पत्तियाँ काव्य संग्रह [गीत और कवितायेँ ] तुम्हारे लिए- कविता संग्रह ,विदेशों के महाकाव्य अनुवाद ,पूँजीपति जार्ज गिसिंग की कहानियों का हिन्दी अनुवाद ,अर्वाचीन और प्राचीन नाटक ,कार्य और कारण [अपट्रेंस उपित्स के उपन्यास का अनुवाद इंसान का नसीबा शोलोखोव के उपन्यास का अनुवाद ,सोवियत संघ का संक्षिप्त इतिहास ,दास्तान चलती है अनातोली कुज्नेत्सोव के उपन्यास का अनुवाद ,हिन्दी कविता बदलती दिशाएं समीक्षा ,रातें रुपहली दिन सी दोस्तेपेव्सकी के उपन्यास का अनुवाद ,धीरे बहो दोन रे शोलोखोव के उपन्यास का अनुवाद ,वे बेचारे ला मिजरेबुल्स का अनुवाद अपूर्ण और अप्रकाशित |आज हम अंतर्जाल के माध्यम से प्रोफेसर गोपीकृष्ण गोपेश के रचना कर्म से आपको परिचित करा रहे हैं |गोपेश जी पर सामग्री उपलब्ध कराने के लिए  सुपरिचित कथाकार एवं इलाहाबाद विश्व विद्यालय के प्राणी विज्ञान विभाग में प्रोफेसर अनीता गोपेश [जो गोपेश जी की बड़ी लाडली बेटी हैं]के हम विशेष आभारी हैं - 
प्रोफ़ेसर गोपी कृष्ण गोपेश मास्को प्रवास के दौरान अपने सहकर्मी महिला दोस्तों के साथ 
कविताएँ -
एक 
पीले हाथ करती हैं सोने की पत्तियाँ 
पेड़ों से झरती हैं सोने की पत्तियाँ 

सुनते हैं बहुरि -बहुरि यह वसन्त आता है 
ज्यादा बीमार नहीं होने की पत्तियाँ 

बुलबुल के बोलों और कोयल की छेड़ों पर 
हर गिज़ हर बार नहीं रोने की पत्तियाँ 

साँसों ने झेला है ,गंधों का मेला है 
जादू के फूल और टोने की पत्तियाँ 

बात नहीं मानी है ,अबकी जिद ठानी है 
मन के साथ तन को नहीं ढोने की पत्तियाँ 

चाहो तो शबनम के आँसू पी डालो तुम 
हीरे कहाँ इतने पिरोने की पत्तियाँ 

नस -नस अलसानी है ,चेहरे पर पानी है 
मुँह का गुलाल नहीं धोने की पत्तियाँ 

चैत का महीना है रिस -रिस कर जीना है 
अपनी मुस्कान नहीं खोने की पत्तियाँ 
दो 
मैंने कभी 
इन्द्रधनुष देखा तो 
उसके सातो रंग झटके से चुरा लिए 
और उन्हें रेखाओं में छिपा दिया !

परन्तु 
तुम्हें मेरी यह हरकत सदा ही खली -
और तुमने 
कभी यह रंग पोंछ डाला ,
तो कभी वह ,
तो कभी वह |

आज स्थिति यह है 
कि इस प्रकार 
सात में पाँच रंग घुल चुके हैं ,
केवल दो शेष हैं |
मेरा प्रस्ताव है कि इनमें से भी एक को 
तुम रंग वाले डिब्बे में भर दो ,
और गली -मुहल्ले के बच्चों को दे दो 
कि अगली होली में 
वे इसे कंडाल भर पानी में घोल लें ,
और ,आने -जाने वाले 
हर परिचित - अपरिचित पर डाल दें |

बचा एक -
उसे तुम 
पालतू बना डालो .....
कुछ ऐसा करो 
कि उसे पिंजड़े की तीलियों से प्यार हो जाए |
वही उसके आकाश का सम्पूर्ण विस्तार हो जाए |

इसके बाद 
समान है तुम्हारे लिए -
सावन मास रोये या भादों मास गाये |
तुम तो महज वह करो 
जो तुम्हें रास आये |
तीन 
तुम्हें याद है ,
हुए बहुत दिन ,इसी पेड़ के नीचे ,
किसी शक्ति ने -
किसी शक्ति से प्राण हमारे खींचे .....
तब से यह बादल ,यह पानी 
भरी -भरी बरसात ,
मुझको लगती है ,जैसे हो किसी प्यार की रात 
घायल सपने खड़े हुए हों 
भरी आँख के पास |
आज कि पहिला पानी बरसा 
मन हो गया उदास |

तुम्हें याद है ,
हुए बहुत दिन इसी पेड़ के नीचे ,
हमने -तुमने 
सुधियों के कितने ही विरवे सींचे -
तब से उमड़े -घुमड़े बादल 
रूम झूम घनघोर 
अक्सर बहा -बहा ले जाते हैं पलकों की कोर 
और मुझे लगता है ,मेरे प्राण 
कि पिघली प्यास |
आज कि पहिला पानी बरसा 
मन हो गया उदास 
तुम्हें याद है 
हुए बहुत दिन तुम रोई मैं रोया 
और आँसुओं पर 
सर धर सोने का बादल सोया -
आज कि कल की बात लग गई 
जाने कैसे दिखने 
और अचानक बैठ गया हूँ 
मैं यह कविता लिखने 
डर है कहीं न उग आए 
मेरी साँसों पर घास |
आज कि पहिला पानी बरसा 
जन हो गया उदास 
मन हो गया उदास |
चार 
सूरज नहीं चाहिए हमको 
अब उधार की ज्वाला -
शक्ति हमारी देखो ,
हमने नया चाँद गढ़ डाला |

तुम्हें बहुत अभिमान कि तुमने 
तम का काजल छांटा 
इतने -इतने नक्षत्रों को 
सदा उजाला बाँटा |

हमने भी कुछ किया मगर 
हमको अभिमान नहीं है 
मानव मानव है ,मानव 
कोई भगवान नहीं है |

हम धरती पर बसनेवाले 
हमको धरती प्यारी -
चाँद गढ़ गया ,सूर्य देवता 
शीघ्र तुम्हारी बारी |

मानव ने धीरे -धीरे सब कुछ 
गढ़ने की ठानी -
क्या धरती ,क्या आसमान ,
क्या आगी औ क्या पानी |

देखो सपनों की सच्चाई 
तासीरें ,तदबीरें ,
देशकाल की सीमाओं की 
टूट गिरीं जंजीरें |

एक हिमालय -काकेशस है 
एक वोल्गा गंगा 
मानव मन में उभर रहा है 
इन्द्रधनुष सतरंगा |

भेद -विषमता और कलह की 
केंचुल छूट रही -
नई जिंदगी 
करवट लेती है ,
पौ फूट रही |
पांच 
मुझसे मेरा नाम न पूछो 

तुमको अनगिन चिन्तायें हैं ,तुम दुनिया के विचित्र मानव 
सह न सकेंगे दुर्बल जर्जर ,मेरी अंतर्ध्वनियों का स्वर 
अपना उजड़ा सा घर देखो 
मेरा उजड़ा ग्राम न पूछो 
मुझसे मेरा नाम न पूछो |

तुमको अपनी सौ साधे हैं ,तुमको अपने सौ धन्धे हैं 
मेरी साधे शव हैं जिनको दूभर मिलने दो कन्धे हैं 
मत पूछो मैं क्यों आया हूँ 
काम बढ़ेगा काम न पूछो 
मुझसे मेरा नाम न पूछो |

छः -प्रोफेसर गोपीकृष्ण गोपेश की हस्तलिपि में एक गीत अंश 

मास्को का लाल चौक -सबसे बाएं रुसी इन्टरप्रेटर
इसके बाद स्नेहलता गोपेश गोपेश जी की पत्नी ,गोपेश जी ,
डॉ० महेंद्र और आखिर में प्रभात गोपेश जी के पुत्र 

शनिवार, 5 नवंबर 2011

डॉ० विनोद निगम के गीत -नवगीत

कवि -डॉ० विनोद निगम 
सम्पर्क -09425642597
डॉ० विनोद निगम हिन्दी नवगीत विधा के प्रमुख हस्ताक्षर हैं |ये अपने आसपास विखरी हुई अनुभूतियों को ग्रहण कर उसे छन्द में ढाल कर गीत -नवगीत का सृजन करते हैं |यह सृजन बिना किसी हो हल्ला या शोरगुल के हो जाता है |बहुत ही शान्त और सहज लेखनी के धनी विनोद निगम स्वभाव से भी सहज और निर्मल हैं |विनोद निगम अधिक नहीं लिखते हैं लेकिन जो कुछ लिखते हैं वह सार्थक सृजन है |इनके नवगीत नवगीत दशक ,नवगीत अर्द्धशती ,कन्हैयालाल नन्दन द्वारा सम्पादित श्रेष्ठ हिन्दी गीत संचयन और स्वान्तः सुखाय जैसे समवेत संकलनों में संकलित हैं | जारी हैं यात्रायें लेकिन इनका नवगीत संकलन और अगली सदी हमारी होगी [कोरस गीतों का संकलन है ] डॉ० विनोद निगम का जन्म मशहूर शायर खुमार बाराबंकी के गृह जनपद बाराबंकी उत्तर प्रदेश में 10 अगस्त 1944 को हुआ |शिक्षा एम० ए० ,एम० काम० है |लोकप्रिय हिन्दी नवगीतकार उमाकांत मालवीय के व्यक्तित्व और कृतित्व पर 1994 में विनोद निगम ने पी० एच० डी०  की उपाधि हासिल किया |विनोद निगम के गीत देश की प्रतिष्ठित पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं | दूरदर्शन और आकशवाणी से इनकी कविताओं का प्रसारण होता रहता है |काव्य मंचों पर भी अपने गीतों से जन से जुड़ने का कार्य अब भी जारी है |जीवन के प्रारम्भिक कुछ वर्ष नवभारत टाईम्स मुम्बई में पत्रकारिता करने के बाद अध्यापन के पेशे से जुड़े विनोद निगम गवर्नमेंट्स गर्ल्स पी० जी० कालेज होशंगाबाद से वर्ष 2006 में विनोद निगम सेवानिवृत्त हो गए और हमेशा के लिए होशंगाबाद के ही हो गए |हम आज अंतर्जाल के माध्यम से विनोद निगम के रचना संसार से आपको परिचित करा रहे हैं -
डॉ० विनोद निगम के गीत -नवगीत 
एक 
इन चलते फिरते लोगों में भीड़ -भाड़ में 
याद तुम्हारी आ जाती है यह क्या कम है |

कितनी हैं उलझनें यहाँ रोटी -पानी की 
नहीं नशीले छंद ,जिंदगी ,रख सकते हैं 
मौसम की रंगीनी पेट नहीं भर सकती 
और नहीं ये सपने तन को ढक सकते हैं 

इतनी उड़ती गर्द ,धूल में अन्धकार में 
छवि न तुम्हारी मिट पाती है यह क्या कम है |

कोई उत्सव नहीं व्यर्थ की चहल -पहल है 
दौड़ रहे हैं लोग नहीं फिर भी थकते हैं 
छिड़ा हुआ संघर्ष यहाँ आगे जाने का 
गिर जाने की छूट न लेकिन रुक सकते हैं 

इतने शोर -शराबे में इस कोलाहल में 
हर ध्वनि तुमको गा जाती है यह क्या कम है |

आवागमन नहीं है लेकिन प्रगति नहीं है 
पहुँच रहे हैं लोग सभी बस एक विन्दु पर 
इतनी कुंठाओं में इतने बिखरेपन में 
हवा तुम्हें दुहरा जाती है यह क्या कम है |
दो 
और नहीं ,भीड़ भरा यह सूनापन 
आओ घर लौट चलें ओ मन !

आमों में डोलने लगी होगी गन्ध 
अरहर के आसपास ही होगें छन्द 
टेसू के दरवाजे होगा यौवन 
आओ घर लौट चलें ओ मन !

सरसों के पास ही खड़ी होगी 
मेड़ों पर अलसाती हुई बातचीत 
बंसवट में घूमने लगे होंगे गीत 
महुओं ने घेर लिया होगा आंगन 

खेतों में तैरने लगे होंगे दृश्य 
गेहूँ के घर ही होगा अभी भविष्य 
अंगड़ाता होगा खलिहान में सृजन 
आओ घर लौट चलें ओ मन !
तीन
सर पर तपती टीन ,पांव हैं दहके पत्थर में |
रोटी मुझे खींच लाई है ,इस जलते घर में |

एक खुशनुमा आंगन से ,मैं आया था चलकर 
सांसों में थे फूल ,हवा ,खुशबू के हस्ताक्षर 
दृग में भी भाषा चन्दन की ,वंशी कानों में 
एक नदी बहती थी मुझमें .एक मुझे छूकर 

घुटन ,पसीना ,हाँफ रहे क्षण ,धुआँ खिड़कियों भर 
अब तो यही कहानी है ,इस झुलसे छप्पर में |

वर्तमान ने मुझे दिया है यह सूखा मंजर 
वे सब आये हैं भविष्य से आतंकित होकर 
सूखे होंठ ,झूलते कन्धे बोझ किताबों के 
एक सदी जकड़े पाँवों को ,एक सदी सर पर 

साथी हम चौराहे तक ,फिर सफर अकेला है 
शहरों के हिंसक जंगल में ,सूखे सागर में |
चार 
घाटियों में ऋतु सुखाने लगी है 
मेघ धोये वस्त्र अनगिन रंग के 
आ गए दिन धूप के सत्संग के |

पर्वतों पर छंद फिर बिखरा दिये हैं 
लौटकर जाती घटाओं ने |
पेड़ फिर पढ़ने लगे हैं धूप के अखबार 
फुरसत से दिशाओं में |
निकल फूलों के रसीले बार से 
लड़खड़ाती है हवा 
पांव दो पड़ते नहीं हैं ढंग के |

बंध न पाई ,निर्झरों की बाँह ,उफनाई नदी 
तटों से मुँह जोड़ बतियाने लगी है |
निकल जंगल की भुजाओं से ,एक आदिम गन्ध 
आंगन की तरफ आने लगी है |

आँख में आकाश की चुभने लगी है 
दृश्य शीतल ,नेह -देह प्रसंग के |
पांच 
सड़कों से जुड़ना भर ,नियमों से टूटना ,
केवल उपलब्धि यही ,यह ही करते बना |

सुबह घुली बासी खबरों में 
धूप चढ़ी बिगड़े क्रम रोते ,
काली पड़ गयीं सभी शामें 
खालीपन कन्धों पर ढोते 

व्यर्थों से जुड़ना 
संदर्भों से छूटना ,
लेखे चर्चाओं के ,यह ही करते बना |

पग -पग पर समझौते -
चाहे -अनचाहे 
पी गए भविष्य ,भीड़ पीते चौराहे ,
वर्तमान ने भोगा हमको कुछ ऐसे 
होते हम हवन ,दूसरे गए सराहे |

आमों को बोना ,
लेकिन बबूल काटना ,
यह ही करते रहे ,यह ही करते बना |
छः 
अब घर के सारे दरवाजे खोल दो ,
किरणों को अन्दर तक आने को बोल दो |

पानी के मौसम में बन्द पड़े कमरे हैं 
भारी मजबूरी में लोग यहाँ ठहरे हैं ,
पर्दों पर छीटों के दाग अभी गहरे हैं 
भीतर की  सीलन में धूप जरा घोल दो |

मन कब से भारी है रिसते गीलेपन से 
कितने क्षण बंधा रहूँ भींगे घर -आंगन से ,
ठहरी सी रही हवा ,लिपटी -लिपटी तन से 
पी लें ख़ामोशी ,पल ऐसे अनमोल दो |

पिघले दीवारों पर जमा हुआ सूनापन 
धूल के ,उदासी के ,मेज़ों पर बिखरे कन ,
फैले उजियारे का आकर्षण ,सम्मोहन 
रोशनी समेटो सारे बन्धन खोल दो |
सात  -विनोद निगम की हस्तलिपि में एक गीत