अहा ज़िन्दगी में वसंत पर गीत
सूरज कल भोर में जगाना नींद नहीं टूटे तो देह गुदगुदाना | सूरज कल खिड़की से भोर में जगाना |
फूलों में रंग भरे खुशबू हो देह धरे , मौसम के होठों से रोज सगुन गीत झरे ,
फिर आना झील -ताल बांसुरी बजाना |
हल्दी की गाँठ बंधे रंग हों जवानी के , इन सूखे खेतों में मेघ घिरें पानी के ,
धरती की कोख हरी दूब को उगाना |
लुका -छिपी खेलेंगे जीतेंगे -हारेंगे मुंदरी के शीशे में हम तुम्हें निहारेंगे ,
मन की दीवारों पर अल्पना सजाना |
कवि/गीतकार-जयकृष्ण राय तुषार
 | | चित्र -गूगल से साभार |
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