सोमवार, 13 जनवरी 2020

लोकप्रिय कवि कैलाश गौतम की कविता -गाँव गया था गाँव से भागा

स्मृतिशेष कवि कैलाश गौतम 
कैलाश गौतम 
[08-01-1944-09-12-06]
काव्य प्रेमियों के मानस को अपनी कलम और वाणी से झकझोरने वाले जादुई कवि का नाम है 'कैलाश गौतम'। जनवादी सोच और ग्राम्य संस्कृति का संवाहक यह कवि दुर्भाग्य से अब हमारे बीच नहीं है | आकाशवाणी इलाहाबाद से सेवानिवृत्त होने के बाद तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने कैलाश गौतम को आजादी के पूर्व स्थापित हिन्दुस्तानी एकेडेमी के अध्यक्ष पद पर मनोनीत किया। एकेडेमी के अध्यक्ष पद पर रहते हुए इस महान कवि का 09 दिसम्बर 2006 को निधन हो गया। कैलाश गौतम को अपने जीवनकाल में पाठकों और श्रोताओं से जो प्रशंसा या खयाति मिली वह दशकों बाद किसी विरले कवि को नसीब होती है। कैलाश गौतम जिस गरिमा के साथ हिन्दी कवि सम्मेलनों का संचालन करते थे उसी गरिमा के साथ कागज पर अपनी कलम को धार देते थे। 08 जनवरी 1944 को बनारस के डिग्घी गांव (अब चन्दौली) में जन्मे इस कवि ने अपना कर्मक्षेत्र चुना प्रयाग को। इसलिए कैलाश गौतम के स्वभाव में काशी और प्रयाग दोनों के संस्कार रचे-बसे थे। जोड़ा ताल, सिर पर आग, तीन चौथाई आन्हर, कविता लौट पड़ी , बिना कान का आदमी , प्रमुख काव्य कृतियां हैं जो कैलाश गौतम को कालजयी बनाती हैं। जै-जै सियाराम, और 'तम्बुओं का शहर' जैसे महत्वपूर्ण उपन्यास अप्रकाशित रह गये। 'परिवार सम्मान', प्रतिष्ठित ऋतुराज सम्मान और मरणोपरान्त तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने कैलाश गौतम को 'यश भारती सम्मान' (राशि ५.०० लाख रुपये) से इस कवि को सम्मानित किया। अमौसा क मेला, कचहरी और गांव गया था गांव से भागा कैलाश गौतम की सर्वाधिक लोकप्रिय रचनाएं हैं। आज कैलाश गौतम की कविता ''गांव गया था गांव से भागा'' हम अपने अन्तर्राष्ट्रीय / राष्ट्रीय पाठकों के साथ साझा कर रहे हैं-
गाँव गया था गाँव से भागा 
गांव गया था
गांव से भागा
रामराज का हाल देखकर
पंचायत की चाल देखकर
आंगन में दीवाल देखकर
सिर पर आती डाल देखकर
नदी का पानी लाल देखकर
और आंख में बाल देखकर
गांव गया था 
गांव से भागा।

गांव गया था 
गांव से भागा
 सरकारी स्कीम देखकर
बालू में से क्रीम देखकर
देह बनाती टीम देखकर
हवा में उड़ता भीम देखकर
सौ-सौ नीम हकीम देखकर
गिरवी राम रहीम देखकर
गांव गया था 
गांव से भागा।

गांव गया था
गांव से भागा
जला हुआ खलिहान देखकर
नेता का दालान देखकर
मुस्काता शैतान देखकर
घिघियाता इंसान देखकर
कहीं नहीं ईमान देखकर
बोझ हुआ मेहमान देखकर
गांव गया था
गांव से भागा।

गांव गया था
गांव से भागा
नये धनी का रंग देखकर
रंग हुआ बदरंग देखकर
बातचीत का ढंग देखकर
कुएं-कुएं में भंग देखकर
झूठी शान उमंग देखकर
पुलिस चोर के संग देखकर
गांव गया था
गांव से भागा।

गांव गया था
गांव से भागा।
बिना टिकट बारात देखकर
टाट देखकर भात देखकर
वही ढाक के पात देखकर
पोखर में नवजात देखकर
पड़ी पेट पर लात देखकर
मैं अपनी औकात देखकर
गांव गया था
गांव से भागा।

गांव गया था
गांव से भागा
नये नये हथियार देखकर
लहू-लहू त्यौहार देखकर
झूठ की जै-जैकार देखकर
सच पर पड ती मार देखकर
भगतिन का श्रृंगार देखकर
गिरी व्यास की लार देखकर
गांव गया था
गांव से भागा।

गांव गया था 
गांव से भागा
मुठ्‌ठी में कानून देखकर
किचकिच दोनों जून देखकर
सिर पर चढ़ा जुनून देखकर
गंजे को नाखून देखकर
उजबक अफलातून देखकर
पंडित का सैलून देखकर
गांव गया था
गांव से भागा।

(साभार - 'सिर पर आग' से आशु प्रकाशन इलाहाबाद)

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