सोमवार, 13 जनवरी 2020

कुछ सामयिक दोहे -स्मृतिशेष कवि कैलाश गौतम


स्मृतिशेष कवि -कैलाश गौतम 

कुछ सामयिक दोहे -कवि कैलाश गौतम 

चाँद शरद का मुंह लगा ,भगा चिकोटी काट |
घण्टों सहलाती रही ,नदी महेवा घाट |

नदी किनारे इस तरह ,खुली पीठ से धूप |
जैसे नाइन गोद में ,लिए सगुन का सूप |

तितली जैसे उड़ रही ,घसियारिन रंगीन |
गेहूं कहता दो -नली ,जौ कहता संगीन |

सुअना पंखी गीत के ,खुले हल्दिया बन्द |
जैसे कत्थक नृत्य में ,ताल -ताल में छंद |

काटे से कटती नहीं ,जाड़े की ये रात  |
शाल ,रजाई ,कोयले ,वही ढाक के पात |

शाम हुई फिर जम गये ,सुर्ती ,चिलम ,अलाव |
खेत ,कचहरी ,नौकरी ,गौना ,ब्याह ,चुनाव |

बिन आंगन का घर मिला ,बसे पिया भी दूर |
आग लगे इस पूस में ,खलता है सिंदूर |

धूप भरी ऑंखें मिली,गलियारे की ओट |
जैसे गोरी गाँव की ,मन में लिए कचोट |

शोख सयानी घाटियाँ ,छैल छबीले ताल |
खजुराहो है आइना ,ताजमहल रूमाल |

देख रहा सब -कुछ मगर ,पूछ रहा है कौन |
अभी ठहाका था जहाँ ,वहीं खड़ा है मौन |

ओस नहायी चांदनी ,रंग नहाये फूल |
आते -जाते हो गयी ,वही दुबारा भूल |

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (14-01-2020) को   "सरसेंगे फिर खेत"   (चर्चा अंक - 3580)   पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    -- लोहिड़ी तथा उत्तरायणी की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

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