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बुधवार, 8 जून 2016

हिंदी के चर्चित गज़लकार सत्य प्रकाश शर्मा और उनकी ग़ज़लें

कवि /गज़लकार सत्य प्रकाश शर्मा 


परिचय -

दुष्यंत के बाद कई बड़े गज़लकार हुए जिनकी शायरी से हिंदी ग़ज़ल समृद्ध हुई | सत्य प्रकाश शर्मा उन्हीं चुनिन्दा नामों में से एक हैं | कहन की विविधता इनकी गजलों की विशेषता है |बहुत ही साफगोई के साथ और सलीके से कही गयी इनकी ग़ज़लें देश और उसकी सीमाओं की परिधि के बाहर सुनी और सराही जाती हैं | पूज्य संत मोरारी बापू इनके शेर अपने प्रवचन में अक्सर सुनाया करते हैं |सत्य प्रकाश शर्मा का जन्म 05 जुलाई 1956 में कानपुर में हुआ था |भारतीय स्टेट बैंक की व्यस्ततम सेवा में रहते हुए[अब सेवानिवृत्त ] इतनी उम्दा ग़ज़लें कहना अद्भुत है |देश की लब्ध प्रतिष्ठ पत्र -पत्रिकाओं ,साझा संकलनों में इनकी ग़ज़लें समय -समय पर प्रकाशित होती रहती हैं | रौशनी महकती है इनका गज़ल संकलन है जो पाखी प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित है | हम अपने ब्लॉग पर शर्मा जी की कुछ ग़ज़लें आपके साथ साझा कर रहे हैं -सादर 

कवि /गजलकार सत्य प्रकाश शर्मा और उनकी ग़ज़लें 
एक 
आपको हो न एतराज़ कोई 
हमसे छुपता नहीं है राज़ कोई 

कैसे रिश्तों से फायदा पंहुचे 
हमको इसका नहीं रियाज़ कोई 

दिल में क्या है ये साफ़ दिखता है 
हो अगर दिल ,न हो दराज़ कोई 

भीड़ तो है दिमाग वालों की 
मिल ही जायेगा दिलनवाज़ कोई 

चाँद -तारों को नोच ले बढ़ कर 
अब यहाँ है कहाँ मजाज़ कोई 

दिल की दौलत न साथ ले के चलो 
लूट लेगा इसे रिवाज़ कोई 

दो 
तस्वीर का रुख़ एक नहीं दूसरा भी है 
खैरात जो देता है वही लूटता भी है 

ईमान को अब ले के किधर जाइयेगा आप 
बेकार है ये चीज़ कोई पूछता भी है 

बाज़ार चले आये खुलूस और मुहब्बत 
अब घर में बचा क्या है कोई सोचता भी है 

तरकश में तेरे तीर हैं पर इतना  बता दे 
क्या इनमें कोई तीर है जो फूल- सा भी है 

इस दिल ने भी फ़ितरत किसी बच्चे -सा है पाई 
पहले जिसे खो दे उसे फिर ढूंढ़ता भी है 
तीन 
कोई रौनक हंसी में है ही नहीं 
साफ़ पानी नदी में है ही नहीं 

आप से झूठ बोल सकती हो 
ये सिफ़त शायरी में है ही नहीं 

जिसका दम भर रहा है अरसे से 
वो तेरी ज़िन्दगी में है ही नहीं 

करके एहसान भूलते थे लोग 
अब ये ज़ज्बा किसी में है ही नहीं 

खीँच लाये सुकून की राधा 
अब वो धुन बांसुरी में है ही नहीं 

यार ! अब ढूंढने किधर जाएँ 
ज़िन्दगी ,ज़िन्दगी में है ही नहीं 

उनसे मिलने की चाह रखते हैं 
और कुछ अपने जी में है ही नहीं 

चार 
हम जो थोड़ा- सा डगमगाने लगे 
लोग समझे कि अब ठिकाने लगे 

बाप का कर्ज़ है वहीँ का वहीं 
जबकि बेटे भी सब कमाने लगे 

हाथ उतने ही हो गये ख़ाली 
मुल्क में जितने कारखाने लगे 

यूँ लगा पेट पर पड़ी चोटें 
आप जब मेज़ थपथपाने लगे 

इन अंधेरों का क्या करें ,ये तो 
रौशनी की तरफ़ से आने लगे 

देखकर आंसुओं की हमदर्दी 
मेरे एहसास मुस्कराने लगे 

ज़िक्र मैं कर रहा था दुनिया का 
आप नाहक नज़र चुराने लगे 
पांच 
न रौशनी, न इशारा ,न राहबर कोई 
किस एतबार पे करता रहे सफ़र कोई 

जो ख़ुद को ढूंढने उतरे तो ख़ुद ही गायब थे 
मज़े की बात हमें भी न थी ख़बर कोई 

जब उसके सामने पहुंचे तो इतने नादिम थे 
छुपा न ऐब न ज़ाहिर हुआ हुनर कोई 

शबे -फ़िराक़ के नश्तर भी साथ आएंगे 
ख़याल रख के इसे लाए अपने घर कोई 

मिले भी याद नहीं ज़ख्म भी हरे कम हैं 
मिलेगा क्या उसे ,आया अगर इधर कोई 


सत्य  प्रकाश शर्मा का ग़ज़ल संग्रह-रौशनी महकती है