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रविवार, 15 मई 2016

शीलेन्द्र कुमार सिंह चौहान और उनके नवगीत

कवि /नवगीतकार -शीलेन्द्र कुमार सिंह चौहान  

परिचय -
अवध  [उ०प्र० ]या यूँ कहें लखनऊ  की मिटटी ने कई नामचीन हिंदी /उर्दू के कवियों को अपनी कोख में जन्म देकर हिंदी साहित्य और हिंदी का मान -सम्मान बढाया है |उनमें से एक महत्वपूर्ण नाम हिंदी गीत /नवगीत में शीलेन्द्र कुमार सिंह चौहान का है |प्रशासनिक सेवा में लम्बे समय तक रहने के बावजूद इस कवि ने हिंदी नवगीत को बहुत कुछ दिया है |अपने प्रशासनिक अनुभवों को भी कविता का सहज विषय बनाया |आम जन का संघर्ष विविधता के साथ इनके गीतों में समाहित है |इस कवि का जन्म 15  जुलाई  1955 को दादूपुर बंथरा लखनऊ में हुआ था | प्रमुख कृतियाँ -तपती रेत प्यासे शंख ,टूटते तिलस्म [गीत संग्रह ]सम्पादन -आराधना के स्वर ,डलमऊ दर्शन [सह सम्पादन ]पता -ग्राम -दादूपुर पोस्ट -बंथरा जिला -लखनऊ उ०प्र० |भाई शीलेन्द्र कुमार सिंह चौहान के कुछ गीत आपके साथ साझा कर रहा हूँ |सादर 

शीलेन्द्र कुमार सिंह और उनके नवगीत 
एक 
साहब आने वाले हैं 

बैठो, अभी 
अभी बस साहब आने वाले हैं 

तब तक लिखवा लो 
तुम अपनी मनमाफ़िक अर्जी 
लिखवाना कुछ सच का किस्सा 
कुछ किस्सा फर्जी 
आश्वासन की लम्बी घूंट 
पिलाने वाले हैं 

मेरी चिंता 
मत करना ,बस चाय -पान काफी 
चाहोगे तो करवा दूंगा सौ 
दो सौ माफ़ी 
और दांत खाने के 
और दिखाने वाले हैं 

एक बार में 
काम न हो तो कोई बात नहीं 
आना लौट यहीं ,मत जाना 
चलकर और कहीं 
जैसे नमक दाल में 
वैसा खाने वाले हैं 

दो 
दिन अलबेले हैं 

नावों में सूराख नदी के 
दिन अलबेले हैं 
खड़े रामजी सरयू तट पर 
खड़े अकेले हैं 

पार उतरने की जिद मन में 
ठाठें मार रही 
मौसम को जाने क्या सूझी 
उल्टी हवा बही 
मंजिल को पाने में दिखते 
बड़े झमेले हैं 

छोटी हो या बड़ी भंवर हो 
सबके मुंह फैले 
चंचल चाल ,बदन कोमल 
पर अंतरतम मैले 
मांस नोचते घूम रहे 
मगरों के हेले हैं 

वे क्यों डरें विश्व में जिनका 
बाज चुका डंका 
पल में उतरे सिन्धु ,जीत ली 
रावण की लंका 
सौ सौ बार 
समय के पहले से ही झेले हैं 

तीन 
बस इतनी ही हई कमाई 

चमड़ी बेचीं ,दमड़ी बेचीं 
बस इतनी ही हई कमाई 
पेट -पीठ मिल एक हुए पर 
चेहरे पर मुस्कान न आई 

नौ मन तेल न ज़ुरा कभी भी 
राधा नाचे तो क्या नाचे 
पंडित भी दक्षिणा लिए बिन 
कुटिया की तकदीर न बांचे 
उजले -उजले मन हैं जिनके 
उनको ही डंस गई जुन्हाई 

टूटी खाट ,कठौती फूटी 
जब जिसने चाही तब लूटी 
पास बची बस एक दवा है 
राम नाम की सुमिरन बूटी 
कहने को सौ बरस जिए पर 
रोने में ही उमर गंवाई 

नाम बड़े पर दर्शन छोटे 
रेस लगाते लंगड़े घोड़े 
दुखी पीठ का दर्द न जाने 
मरी खाल के बहरे कोड़े 
जिनके पांव न फटी बिवाई 
वो क्या जानें पीर पराई 

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (17-05-2016) को "अबके बरस बरसात न बरसी" (चर्चा अंक-2345) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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