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सोमवार, 20 अक्तूबर 2014

सुप्रसिद्ध गीत कवि -गुलाब सिंह और उनके नवगीत

कवि -गुलाब सिंह 
परिचय -

गुलाब सिंह हिंदी के प्रमुख नवगीतकार हैं ,इनके गीतों में पूरा का पूरा गाँव बसता है बसती है ग्राम्य संस्कृति ,लोकचेतना |यह प्रमुख रूप से आंचलिक गीतकार हैं |गाँव का पूरा परिवेश ,कला -संस्कृति ,लोक उत्सव और वहां की दिनचर्या सब कुछ इनके गीतों में हमें पढ़ने को मिलता है |नरम तेवर रखते हुए भी व्यवस्था पर अचूक प्रहार करते हैं गुलाब सिंह |पेशे से अध्यापक रहे गुलाब सिंह राजकीय इंटर कालेज के प्रधानाचार्य के पद से सेवानिवृत्त हो गए हैं |गुलाब सिंह अपने गीतों की तरह सहज और सरल व्यक्तित्व के धनी हैं |शहर की आपाधापी से दूर इलाहाबाद के एक गाँव बिगह्नी में सादगी पूर्ण जीवन व्यतीत कर रहे हैं | धूल भरे पांव ,बांस -वन और बांसुरी ,जड़ों से जुड़े हुए इनके प्रमुख नवगीत संग्रह हैं |डॉ शम्भुनाथ सिंह के द्वारा सम्पादित नवगीत दशक में शामिल नवगीतकार हैं |गुलाब सिंह का जन्म 05-01-1940 को ग्राम बिगहनी इलाहाबाद में हुआ था |इनके गीत देश के प्रतिष्ठित पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं |हम आज इनके कुछ नवगीत आपके साथ साझा कर रहे हैं |सादर 

गुलाब सिंह और उनके नवगीत -

एक 
फूल पर बैठा हुआ भंवरा 
शाख पर गाती हुई चिड़िया 
घास पर बैठी हुई तितली 
और तितली देखती गुड़िया 
हमें कितने दिन हुए देखे |

घाट पर नीचे झुके दो पेड़ 
धार पर ठहरी हुई दो आंख 
सतह से उठता हुआ बादल 
और रह -रह फड़कती दो पांख 
हमें कितने दिन हुए देखे |

बांह सी फैली हुई राहें 
गोद -सा वह धूल का संसार 
धूल पर उभरे हुए दो पांव 
और उन पर बिछा हरसिंगार 
हमें कितने दिन हुए देखे |

घुप अँधेरे में दिये  की लौ 
दिये जल पर भी जलाते लोग 
रोशनी के साथ में बहती नदी 
और उसमें नाव का संयोग 
हमें कितने दिन हुए देखे |

दो 
बदल गयीं ऋतुएं 
या धरती बदली है |

जहाँ फूल थे वहां 
फूल के किस्से हैं 
हम सब क्यारी -
फुलवारी के हिस्से हैं 
सावन तो है लेकिन 
तीज न कजली है |

आसमान धुंधला या 
हमीं उनींदे हैं 
बाकी है रोशनी 
आँख क्यों मूंदे हैं ?
सचमुच डूब रहा दिन 
या फिर बदली है |

हंगामा है कि 
ओठों पर खिली हंसी 
लेकिन हिचकी है 
दांतों के बीच फंसी 
भींगी आंख अभी भी 
कहते मछली है |

तीन 
गीला घाट कांपती टहनी 
चिड़ियों की घबराहट 
संजो रहा है सूना तट 
जाने वाले की आहट |

धंस कर धार नहाकर कोई 
चला गया पदचिन्ह छोड़ता 
अविरल बहती नदी समय की 
गहरे जल की ओर मोड़ता 
थमने लगी सतह पर उभरे 
वृत्तों की थर्राहट |

पगडण्डी के दायें -बायें 
बिखरे हैं पतझर के पत्ते 
नयी कोपलों वाला झुरमुट 
झुक -झुककर कर रहा नमस्ते 
भींगे बासी फूल देखते 
कलियों की गरमाहट |

गहरी नदी थहाती सांसे 
तटबंधों सी पुष्ट भुजायें 
आग अँधेरा बंजर -अंकुर 
पांव और पथ प्यास घटायें 
तब तक जब तक है गिरगिर कर 
उठने की अकुलाहट |

चार 
सुबह की खिड़की खुली 
अख़बार जैसे 
गिर गया है दिन |

बढ़ गई फिर 
शहर के नाख़ून -सी 
टेढ़ी नदी 
सीढ़ियाँ विज्ञापनों की 
चढ़ गई 
प्यासी सदी 

डूबने के डर सरीखे 
झांकते घर 
छत -मुंडेरों बिन |

सुर्ख़ियों से 
सड़क या पगडंडियों पर 
उग रहे कांटे 
सीत के सैलाब बहते 
भीड़ के 
बेनाम सन्नाटे 

ख़बर है 
जल उतरने के बाद 
दूने हो गए दुर्दिन |

पांच 
फूट रहे नीमों में कल्ले 
फिर सींकें मोड़कर 
रिया, सिया 
रच -रच बनवायेंगी छल्ले |

घुंघरू बिन पायल 
पाजेब पड़ी पांवों में 
दो पल के सुख पहने 
जनम के अभावों ने 

खुशियों से गूंज उठे 
गाँव -घर -मुहल्ले |

बातों ही बातों में 
महल बना एक किता ,
साथ -साथ उठ बैठे 
हँसते माता -पिता 

देहरी पर बहू जैसे 
बैठी तिनतल्ले ||

अब की फिर गम खायें 
नथ -झुलनी -झुमके 
बौड़र के तिनके 
तन छुएँ घूम घूम के 

गरदीली आँखों में 
सपनों के बुल्ले |

छः -गुलाब सिंह की हस्तलिपि -