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शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

हिंदी के सुपरिचित नवगीतकार -श्रीकृष्ण तिवारी

लोकप्रिय नवगीतकार श्रीकृष्ण तिवारी
समय -08-08-1939 से 29-04-2013
परिचय -
हिंदी नवगीत परम्परा को समृद्ध करने में तिवारी त्रय की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है |उमाशंकर तिवारी गाजीपुर श्रीकृष्ण तिवारी वाराणसी और हिंदी के नवगीत के लोकप्रिय और वरिष्ठ कवि माहेश्वर तिवारी [मुरादाबाद ]|उमाशंकर तिवारी और श्रीकृष्ण तिवारी की स्मृतियाँ और उनकी कृतियाँ ही अब हमारे बीच शेष हैं |श्रीकृष्ण तिवारी कवि सम्मेलनों के भी लोकप्रिय कवि रहे और उनका मंच संचालन बेजोड़ रहा |बनारस उनका था वह बनारस के थे |मैं कई कार्यक्रमों में छात्र जीवन में और बाद में भी उनके संचालन में कविता पढ़ चुका हूँ |विगत 14-09-2012 को हिंदी संस्थान लखनऊ में एक मुलाकात में मैंने उनकी हस्तलिपि ले लिया था तब मुझे क्या पता था की मेरी तिवारी जी से यह आखिरी मुलाकात होगी |तिवारी जी के गीतों में एक बनारस बोलता है ,वह सामाजिक और राजनैतिक विषंगतियों पर तीखा प्रहार करते हैं |मंच पर लगातार जाने के बावजूद तिवारी जी ने कभी गीतों को अपनी सामर्थ्य से फूहड़ या लचर नहीं होने दिया |नवगीत दशक दो में डॉ शम्भुनाथ सिंह ने उनके गीतों को सादर स्थान दिया है | तिवारी जी का जन्म 08-08-1939 को वाराणसी में हुआ था उनका निधन वाराणसी में 29-04-2013 को लगभग चौहत्तर वर्ष की उम्र में हुआ |हाल ही में उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार ने हिंदी गौरव सम्मान प्रदान किया था | साहित्य भूषण और पूर्वांचल भूषण सहित कई सम्मान श्रीकृष्ण तिवारी को मिल चुके हैं | सन्नाटे में झील उनका प्रमुख नवगीत संग्रह है |आज हम श्रीकृष्ण तिवारी के गीतों को आपके साथ साझा कर रहे हैं |सादर 

लोकप्रिय हिंदी नवगीतकार श्रीकृष्ण तिवारी के नवगीत 
एक 
क्या हुए वे रेत पर उभरे 
नदी के पांव 
जिन्हें लेकर लहर आई थी 
हमारे गाँव 

आइना वह कहाँ जिसमें 
हम संवारे रूप 
रोशनी के लिए झेलें 
अब कहाँ तक धूप 
क्या हुई वह 
मोरपंखी बादलों की छाँव 

फूल पर नाखून के क्यों 
उभर आये दाग 
बस्तियों में एक जंगल 
बो गया क्यों आग 
वक्त लेकर जिन्हें आया था 
हमारे गाँव 

दो 
भीलों ने बाँट लिए वन 
राजा को खबर तक नहीं 

पाप ने लिया नया जनम 
दूध की नदी हुई जहर 
गाँव, नगर धूप की तरह 
फैल गई यह नई ख़बर 
रानी हो गई बदचलन 
राजा को खबर तक नहीं 

कच्चा मन राजकुंवर का 
बेलगाम इस कदर हुआ 
आवारे छोरे के संग 
रोज खेलने लगा जुआ 
हार गया दांव पर बहन 
राजा को खबर तक नहीं 

उलटे मुंह  हवा हो गई 
मरा हुआ सांप जी गया 
सूख गए ताल -पोखरे 
बादल को सूर्य पी गया 
पानी बिन मर गए हिरन 
राजा को खबर तक नहीं 

एक रात काल देवता 
परजा को स्वप्न दे गए 
राजमहल खंडहर हुआ 
छत्र -मुकुट चोर ले गए 
सिंहासन का हुआ हरण 
राजा को खबर तक नहीं 

तीन 
मीठी लगने लगी नीम की पत्ती -पत्ती 
लगता है यह दौर सांप का डसा हुआ है 

मुर्दा टीलों से लेकर 
जिन्दा बस्ती तक 
ज़ख्मी अहसासों की 
एक नदी बहती है 
हारे और थके पांवों ,टूटे चेहरों की 
ख़ामोशी से अनजानी पीड़ा झरती है 
एक कमल का जाने कैसा 
आकर्षण है 
हर सूरज कीचड़ में 
सिर तक धंसा हुआ है 

अंधियारे में 
पिछले दरवाजे से घुसकर 
कोई हवा घरों के दर्पण तोड़ रही है 
कमरे -कमरे बाहर का नंगापन बोकर 
आंगन -आंगन को 
जंगल से जोड़ रही है 
ठण्डी आग हरे पेड़ों में सुलग रही है 
पंजों में आकाश 
धुंए के कसा हुआ है 

चार 
कुछ के रुख दक्षिण 
कुछ वाम 
सूरज के घोड़े हो गए 
बेलगाम 

थोड़ी- सी  तेज हुई हवा 
और हिल गई सड़क 
लुढ़क गया शहर एक ओर 
ख़ामोशी उतर गई केंचुल -सी 
माथे के उपर बहने लगा 
तेज धार पानी सा शोर 
अफ़वाहों के हाथों 
चेक की तरह भूनने लग गई 
आवारा सुबह और शाम 

पत्थर को चीरती हुई सभी 
आवाज़ें कहीं गईं मर 
गरमाहट सिर्फ राख की 
जिन्दा है इस मौसम भर 
ताश -महल फिर बनने लग गया 
चुस्त लगे होने फिर 
हुकुम के गुलाम |

पांच -
वक्त की आवाज़ पर 
फिर फेंकने दो एक पत्थर और 
शायद 
बन्द शीशे के घरों में लोग 
बाहर निकल आएं |

देखता हूँ --
रोपकर पीछे अँधेरा ,
बहुत आगे बढ़ गया है सूर्य का रथ 
उसे मुड़ना चाहिए अब |
छोड़कर आकाश 
टूटे गुम्बदों में रह रहे हैं जो कबूतर 
उन्हें उड़ना चाहिए अब |
सनसनाती हवा की ऊँगली पकड़कर 
घूमने दो आईने को फिर शहर में 
कौन जाने आज के ये सभी चेहरे 
कल सुबह तक बदल जाएँ |

जानता हूँ -
आंधियां जिस राह से होकर गयी हैं ,
उस तरफ़ साबूत कोई मील का 
पत्थर नहीं है |
और यह भी जानता हूँ ---
हाथ फिर से जो हवा में तन रहे हैं |
उन्हें कन्धों से अलग करना 
किसी  भी प्रश्न का उत्तर नहीं है |
इसलिए अब 
धुंआ बनकर छा रही खामोशियों से 
फूटने दो आग के स्वर 
बहुत मुमकिन है 
धमनियों में जमे कतरे खून के 
फिर पिघल जाएँ |

छः - 
बांस वनों से गूंज सीटियों की आयी ,
सन्नाटे की झील पांव तक थर्रायी |

अनदेखे हाथों ने लाकर चिपकाये 
दीवारों पर टूटे पंख तितलियों के ,
लहर भिगोकर कपड़े पोंछ गयी सारे 
दरवाजे पर उभरे चिन्ह उँगलियों के ,
खिड़की पर बैठे -बैठे मन भर आया 
द्वार बन्द कमरे में तबियत घबरायी |

शीशे के जारों में बन्द मछलियों ने 
सूनी आकृतियों में रंग भरे गहरे ,
शब्दों को हिलने -डुलने न कहीं देते 
नये -पुराने अर्थों के दुहरे पहरे ,
एक प्रश्न जो सारे बंधन खोल गया 
उत्तर की सीमा उसको न बांध पायी |

कमरे के कोने में पत्र पड़े कल के 
हवा उड़ा ले गयी साथ गलियारों में ,
सारा का सारा घर -आंगन भींग गया 
गली सड़क को धोती हुई फुहारों में ,
टकराकर बंट गयी हजारों कोणों में 
आदमकद दर्पण में मेरी परछाईं |
सात - श्रीकृष्ण तिवारी की हस्तलिपि में एक गीत 

एक मंच पर बाएं कमलेश द्विवेदी मैं और श्रीकृष्ण तिवारी उनके बगल में जाहिल
सुल्तानपुरी और कैलाश गौतम हँसते हुए 

7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत 2 आभार ....भावों से घनीभूत नवगीत पढवाने के लिए |

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शनिवार (19-01-2014) को "सत्य कहना-सत्य मानना" (चर्चा मंच-1496) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. आदरणीय शास्त्री जी और वन्दना जी आप दोनों का शुक्रिया |

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  4. एक एक कविता उतार कर गहराई में ले गयी।

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  5. सुंदर व्यक्तित्व परिचय...सुंदर रचनायें...धन्यवाद...

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  6. आनंदित कर गयी कवितायें!

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  7. सुंदर व्यक्तित्व परिचय

    Recent Post शब्दों की मुस्कराहट पर ….अब आंगन में फुदकती गौरैया नजर नहीं आती

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