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बुधवार, 20 फ़रवरी 2013

हिंदी और मैथिली के सुपरिचित कवि डॉ0 बुद्धिनाथ मिश्र और उनके गीत /नवगीत

सुपरिचित नवगीत कवि -डॉ 0 बुद्धिनाथ मिश्र
सम्पर्क -09412992244


परिचय -
हिंदी गीत /नवगीत विधा के सुपरिचित और लोकप्रिय गीतकार डॉ0 बुद्धिनाथ मिश्र हिंदी के संस्थापक नवगीतकारों में से एक हैं | बुद्धिनाथ मिश्र ने इस विधा को सरहद की सीमाओं के पार भी लोकप्रिय बनाया है |देश -विदेश के कई विश्व हिंदी सम्मेलनों में शिरकत कर बुद्धिनाथ मिश्र ने हिंदी नवगीत का मान बढाया है | गीत निः संदेह वाचिक होने के कारण अधिक लोकप्रिय होता है ,और यदि इसे बुद्धिनाथ मिश्र जैसा कोकिल कंठ वाला नवगीत स्वर मिल जाये तो इसकी लोकप्रियता को कौन रोक सकता है | देश -विदेश की प्रमुख पत्रिकाओं और पत्रों में इस कवि के गीत /आलेख प्रकाशित होते रहे हैं |डॉ 0 बुद्धिनाथ मिश्र स्वयं पेशे से पत्रकार रहे हैं |आज हिंदी दैनिक में वर्षों तक सम्पादक साहित्य रह चुके हैं | बुद्धिनाथ मिश्र मैथिली के भी महत्वपूर्ण कवि  हैं | डॉ 0 बुद्धिनाथ मिश्र का जन्म 01-05-1949 को मिथिलांचल के समस्तीपुर [बिहार ] के देवधा गाँव में हुआ था | इनके पिता का नाम पंडित भोला मिश्र माता का नाम गुलाब देवी है | इनकी प्रारम्भिक शिक्षा वाराणसी में प्राचीन संस्कृत परिपाटी में सम्पन्न हुई |बाद में एम० ए० हिंदी और अंग्रेजी में उच्च शिक्षा हासिल कर इन्होनें यथार्थवाद और हिंदी नवगीत पर पी० एच० डी 0 की उपाधि हासिल किया | देश के आकाशवाणी और दूरदर्शन केन्द्रों से इनकी कविताओं का प्रसारण होता रहा है |विश्व के कई प्रतिष्ठित शहरों की साहित्यिक यात्रा कर चुके बुद्धिनाथ जी दुष्यन्त कुमार अलंकरण ,निराला सम्मान और पुश्किन जैसे प्रतिष्ठित सम्मान हासिल कर चुके हैं | विभिन्न सार्वजानिक उपक्रमों में कार्य कर चुके बुद्धिनाथ मिश्र तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग के मुख्य प्रबन्धक राजभाषा के पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं | तमाम साझा संकलनों में गीत /नवगीत प्रकाशित |विश्व हिंदी दर्पण ,शिखर बोलते हैं ,और स्वयंप्रभ का सम्पादन | काव्य संग्रह -जाल फेंक रे मछेरे ,जाड़े में पहाड़ ,नोहर के नाहर और शिखरिणी गीत संग्रह प्रकाशित | आज इस सुपरिचित कवि और उसकी कविताओं से हम अंतर्जाल के पाठकों को परिचित करा रहे हैं |


डॉ0 बुद्धिनाथ मिश्र के गीत /नवगीत 
एक 
नीम तले 

फिर दोपहर लगी अलसाने 
नीम तले |
कौए लगे पंख खुजलाने 
नीम तले |

सिर पर पसरी छाँह 
लगी हटने 
ताल -नदी के होंठ 
लगे फटने 
हवा लगी अफ़वाह उड़ाने 
नीम तले |

टहनी -टहनी सूख 
हुई कांटा 
खेतों में फैला फिर 
सन्नाटा 
अंग -अंग फिर लगे पिराने 
नीम तले |

चैता आंके रेख 
महावर की 
खलिहानों को 
याद आए घर की 
आँचर लगे नयन उलझाने 
नीम तले |
दो 
बागमती 
अबकी फिर बागमती 
घर -आँगन धो गयी |
बेजुबान झोपड़ियाँ 
बौराये नाले 
बरगद के तलवों में 
और पड़े छाले |
अंखुआये कुठलों में 
मडुआ के दाने 
कमला को भेंट हुए 
ताल के मखाने 
बालो पंडित जी की मड़ई 
डुबो गयी |

छप्पर पर रेंग चुके 
कछुओं के बेटे 
बीच धार बही खाट 
सुजनी समेटे |
पांक में सनी गैया 
ऊंघती ओसारे 
चूल्हे में बैठ 
नाग केंचुली उतारे |
दुखनी की आँखों की कोर 
फिर भिगो गयी |
तीन 
छालों भरा सफ़र 
कोई एक गिलहरी 
पत्ती -पत्ती गयी कुतर 
जीवन हुआ 
अजनबीपन का 
छालों भरा सफ़र |

यह कबंध -सा युग 
बन बैठा 
भूलों का पर्याय 
घर अपना हो गया आज 
परचों की एक सराय |
जलता जंगल 
नये आइने भटके इधर -उधर |

रोके नहीं रुके 
पानी का यह मौसमी बहाव 
जलावतन का दर्द झेलता 
आँगन का मेहराब 
सिरहाने के धरे फूल की 
किसको रही खबर ?

मणि हारे तक्षक- सी 
बस्ती की है नींद हराम 
अर्थहीन पैबंद जोड़ते 
बीते सुबहो-शाम 
कितना कठिन यहाँ 
जी पाना 
गिनके चार पहर |
चार 
तुम बदले 
तुम बदले ,संबोधन बदले 
लेकिन मन की बात वही है |
जाने क्यों मौसम के पीछे 
दिन बदले पर रात वही है |

यह कैसा अभिशाप -चाँद तक 
सागर तक मनुहार न पहुँचे 
नदी तीर एकाकी चकवे का 
क्रन्दन उस पार न पहुँचे 
तन की तृषा झुलसकर सोयी 
मन में झंझावात वही है |

तुम्हें नहीं मालूम कि कैसे 
भर जाता नस -नस में पारा 
उड़ते हुए मेघ की छाया -सा 
पलभर का मिलन तुम्हारा 
तृप्ति नहीं मरुथल को यद्यपि 
प्यास वही ,बरसात वही है |

जितना पुण्य किया था ,पाया 
साथ तुम्हारा उतने दिन का 
तुम बिछड़े थे जहाँ वहीं से 
पंथ मुड़ गया चंदन वन का 
सब कुछ बदले पर अपने संग 
यादों की बारात वही है |
पांच -
शीशे की किरचें 
सड़कों पर शीशे की किरचें हैं 
औ 'नंगे पांव हमें चलना है |
सरकस के बाघ की तरह हमको 
लपटों के बीच से निकलना |

इतने बादल, नदियाँ ,सागर हैं 
फिर भी हम हैं रीते के रीते 
चुमते हुए छुरी कसाई की 
मेमने सरीखे ये दिन बीते 
फिर लहूलुहान उम्र पूछेगी 
जीवन क्या नींद में टहलना है ?

सूर्य लगे अब डूबा ,तब डूबा 
औ 'जमीन लगती है धंसती -सी 
भोर :हिंस्र पशुओं की लाल ऑंखें 
साँझ :बेगुनाह जली बस्ती सी 
मेघों से टकराते महलों की 
छाहों में और अभी जलना है |

मन के सारे रिश्ते पल भर में 
बासी क्यों होते अख़बारों- से ?
पूजा के हाथ यहाँ छू जाते 
क्यों बिजली के नंगे तारों से ?
जीने के लिए हमें इस उलटी 
सांसों के दौर को बदलना है |
छः 
जमुन -जल मेघ 
लौट आए हैं जमुन -जल मेघ 
सिन्धु की अंतर्कथा लेकर |

यों फले हैं टूटकर जामुन 
झुक गयी आकाश की डाली 
झांकती है ओट से रह -रह 
बिजलियाँ तिरछी नजरवाली 
ये उठे कंधे ,झुके कुंतल 
क्या करें काली घटा लेकर |

रतजगा लौटा कजरियों का 
फिर बसी दुनिया मचानों की 
चहचहाये हैं हरे पाखी 
दीन  आँखों में किसानों की 
खंडहरों में यक्ष के साए 
ढूंढते किसको दिया लेकर ?

दूर तक फैली जुही की गंध 
दिप उठी सतरंगिनी मन में 
चंद भँवरे ही उदासे गीत 
गा रहे झुलसे कमल -वन में 
कौन आया द्वार तक मेरे 
दर्भजल सींची ऋचा लेकर ?
सात 
आकाशदीप 
जलता रहता सारी रात एक आस में 
मेरे आंगन का आकाशदीप |

पीले अक्षत का दिन सो गया 
और धुंआ हो गया सिवान 
मौलसिरी की नन्ही डाल ने 
लहरों पर किया दीपदान 
चुगता रहता अंगार चाँदनी -उजास में 
मेरे आंगन का आकाशदीप |

मौन हई मंदिर की घंटियाँ 
ऊँघ रहे पूजा के बोल 
मंत्र -बंधी यादों के ताल में 
शेफाली शहद रही घोल 
गढ़ता रहता तमाम रूप आसपास में 
मेरे आंगन का आकाशदीप |

तिथियों के साथ मिटी उम्र की 
भीत पर टंकी उजली रेख 
हँस -हँस कर नम आंखे बांचतीं 
मटमैले पत्र -शिलालेख 
बरता रहता सलीब एक -एक साँस में 
मेरे आंगन का आकाशदीप |

रोशनी अँधेरे का महाजाल 
बुनती है यह श्यामा रैन 
पिंजरे का सुआ पंख फड़फड़ा 
उड़ने को अब है बेचैन 
कसता रहता सारी रात नागफांस में 
मेरे आंगन का आकाशदीप |
आठ -डॉ0 बुद्धिनाथ मिश्र की हस्तलिपि में एक नवगीत -

15 टिप्‍पणियां:

  1. वाह क्या बात! आपके इस प्रयास की जितनी सराहना कीजाय तुषार जी कम है

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  2. डॉ0 मोनिका शर्मा जी भाई चंद्रभूषण मिश्र गाफ़िल जी आप दोनों स्वजनों एवं शुभचिंतकों का बहुत -बहुत आभार |

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  3. आनन्द आ गया पढ़ने में..
    यादों की बारात वही है..

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  4. बहुत सुन्दर बहुत खूब अद्भुत रचना

    मेरी नई रचना

    खुशबू


    प्रेमविरह


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  5. प्रिय भाई तुषार जी, आपने जिस विधि से मेरे गीतों को परिचय के साथ अपने ब्लॉग में प्रस्तुत किया है, वह सचमुच पीठ ठोकने लायक काम है। मैं हृदय से आपका आभारी हूँ। देर आये दुरुस्त आये।
    - बुद्धिनाथ मिश्र

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  6. बहुत ही सुन्दर औ अदभुत रचना.

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  7. भाव पूर्ण ...
    नवगीतों की बहार कर दी आपने आज ... आदरणीय बुद्धिनाथ जी परिचय ओर गीत से मिलना बहुत ही अच्छा लगा ...

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  8. आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 23/02/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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  9. मिश्र जी के गीतों में गाँव के विम्ब , प़तीक , उपमान और शब्दावली पद पद पर मिलती है ।
    उन के गीतों में एक सहजता है ,ताज़गी है और उन्मत्त मन की मादक़ता है । तुषार जी को बधाई
    कि मिश्र जी के गीत पढ़वाये ।

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  10. बहुत बहुत शुक्रिया बेहतरीन रचनाएं शेयर करने के लिए

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  11. उत्कृष्ट रचनाओं को पढ़वाने के लिए आभार...

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  12. ~सड़कों पर शीशे की किरचें हैं
    औ 'नंगे पांव हमें चलना है |
    सरकस के बाघ की तरह हमको
    लपटों के बीच से निकलना |

    इतने बादल, नदियाँ ,सागर हैं
    फिर भी हम हैं रीते के रीते
    चूमते हुए छुरी कसाई की
    मेमने सरीखे ये दिन बीते
    फिर लहूलुहान उम्र पूछेगी
    जीवन क्या नींद में टहलना है ?~

    बहुत सुंदर !
    कल्पनाशीलता भी क्या कमाल की चीज़ है....
    इतने बढ़िया परिचय का हार्दिक आभार...तुषार जी !:-)
    ~सादर!!!

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  13. बहुत ही बेहतरीन रचनाएँ है..
    परिचय हेतु आभार ...

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  14. बहुत ही बेहतरीन रचनाएँ है..

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