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गुरुवार, 31 जनवरी 2013

हिंदी साहित्य के शिखर पुरुष - कथाकार शेखर जोशी का काव्य संसार

प्रख्यात कथाकार /कवि -शेखर जोशी 
सम्पर्क -09161916840
परिचय -
पहाड़ के दर्द को अपनी कहानियों में बखूबी उकेरने वाले शेखर जोशी जी का नाम हिंदी कथा साहित्य की दुनिया में बाअदब लिया जाता है | शेखर जोशी का जन्म गुलाम भारत में 10-09-1932 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश [अब उत्तराखंड ] के अल्मोड़ा जनपद में ओलियागांव के एक किसान परिवार में हुआ था |इनकी प्रारम्भिक शिक्षा दड़मियां स्कूल में आगे की स्कूली शिक्षा केकड़ी राजस्थान में हुई | देहरादून में इन्टर की पढाई के दौरान ही इनका चयन सुरक्षा विभाग में सिविलियन अप्रेन्टिसशिप के चार वर्षीय कोर्स के लिए हो गया और दिल्ली छावनी में प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद सन 1955 में इलाहाबाद स्थित बेस वर्कशाप में आये और 1986 में स्वैक्षिक अवकाश लेने तक यहीं कार्यरत रहे | शेखर जोशी का जन्म स्थान पहाड़ और कर्मस्थल प्रयाग [इलाहाबाद ] रहा | हिंदी साहित्य के लिहाज से इलाहाबाद तब अपने स्वर्णिम काल में था | सन 1958 में शेखर जोशी का पहला कहानी संग्रह प्रकाशित हुआ -कोसी का घटवार | इस कथा संग्रह ने शेखर जोशी को कथा जगत में स्थापित कर दिया | इसके बाद साथ के लोग ,हलवाहा ,मेरा पहाड़ ,डांगरी वाले ,नौरंगी बीमार है ,आदमी का डर सहित अनेक संकलित कहानी संग्रह प्रकाशित | स्मृति में रहे वे रिपोर्ताज संस्मरण तथा रेखाचित्रों का संग्रह | नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित शेखर जोशी ;संकलित कहानियां संग्रह आदान -प्रदान योजना के अंतर्गत 12 प्रादेशिक भाषाओँ में प्रकाश्य | दाज्यू और कोसी का घटवार जैसी कहानियों पर फिल्म निर्माण कथाकार शेखर जोशी का कवि रूप भी हमारे सामने आया है हाल ही में प्रकाशित कविता संग्रह -न रोको उन्हें शुभा | शेखर जोशी अपनी कविताओं में भी कहानियां रचते हैं |उनकी कविताओं में भी पहाड़ ,जंगल ,खेत ,मजदूर ,नदी ,और प्रकृति के दर्द रेखांकित होते हैं | अभी हाल में श्रीलाल शुक्ल स्मृति सम्मान इफ्को द्वारा [राशि 11 लाख ] शेखर जी को दिया गया है |इसके पूर्व उत्तर प्रदेश सरकार का साहित्य भूषण सम्मान ,मध्य प्रदेश सरकार का मैथिलीशरण गुप्त सम्मान ,पहल सम्मान ,आदि शेखर जोशी जी को मिल चुके हैं |शेखर जी के शतायु होने की शुभकामनाओं के साथ उनकी कुछ कविताएँ आपके साथ साझा कर रहे हैं | आभार सहित 

अपनी स्मृतिशेष धर्मपत्नी चन्द्रकला जोशी के साथ शेखर जोशी 

कथाकार शेखर जोशी की कविताएँ -
एक 
विदा की बेला 
विदा की बेला 
फिर फिर मोड़ ग्रीवा 
निहारूँ मैं तुम्हारा रूप 
मेरी भूमि ओ !
प्राण ,मेरी संगिनी ओ !

वे खूब ऊँचे पेड़ 
लाल गदगद खिलखिलाता 
वह बुरुन्शी फूल 
पार्श्व में फैले रजत के श्रृंग विस्तृत |

यह अनोखा साम्य 
श्रृंगों का बुरुंशी फूल का 
ज्यों विदा के क्षण सुहागिन 
सिसकती प्रिय वक्ष पर धर दे 
सिन्दूर -चर्चित -भाल 
औ ;विरह की कसमसाती स्मृति संजोये 
शेष रह जाए 
प्रणय का चिन्ह 
जलता, लाल |
दो 
प्रवासी का स्वप्न 
लौट कर जाऊंगा वर्षों बाद 
नदी किनारे मिलेगा वह विशाल शिलाखंड 
उफनती भादों की बेगवती धारा में उस साल 
अचानक आकर बैठ गया था हमारे गाँव में 
पूछूँगा ,अभी यहीं जमे हो गुरू !
मन रम गया है 
उन नंगधडंग बच्चों की संगत में 
जो स्कूली बस्ते पटक 
दुपहरिया में तुम्हारी पीठ पर चढ़कर 
कूदते हैं पानी में ?

अभी डटे हो तुम भी 
मुंहबाए ,आकाश ताकते देवदारु !
सूखे ठूंठ ,पत्रहीन पुरखा 
इस हरे -भरे वनस्पति परिवार के |
क्या था तुम्हारा दोष ?
भरी जवानी में तुम्हें बेध गया वह आकाशीय पिण्ड 
जब झूम -झूम कर नहा रहे थे 
सावन की फुहारों में |

बठिया के दोनों ओर 
पहाड़ी ढलान पर 
विस्मित से ताकेंगे मुझे 
चीड़ों के झबरीले शावक 
ये कौन आ गया अजनबी 
पहले तो देखा नहीं था कभी |
तीन 
धानरोपाई 
आज हमारे खेतों में रोपाई थी धान की 
घर में बड़ी सुबह से 
हलचल मची थी कामकाज की 
खेतों में 
हुड़के की थापों पर 
गीतों की बरषा बरसी ,
मुंगे -मोती की मालाओं से राजी 
कामदारिनों ने लहंगों में फेटे मारे 
आंचल से कमर कसी 
नाक शीर्ष से लेकर माथे तक 
रोली का टीका सजा लिया |

आषाढ़ी बादल से बैलों के जोड़े 
उतरे खेतों पर 
धरती की परतें खोलीं 
भीगी पूंछों से हलवाहों का अभिषेक किया |
सिंचित खेतों में 
विवरों से अन्नचोर चूहे निकले 
मेड़ों पर बैठे बच्चों ने किलकारी मारी 
दौड़ भूंक कर झबरा पस्त हुआ |

बेहन की कालीनों से उठकर 
शिशु पादप सीढ़ी -दर -सीढ़ी फैले 
विस्थापन की पीड़ा से किंचित पियराये 
माटी का रस पीकर 
कल ये फिर हरे -भरे झूमेंगे 
मंजरित बालियाँ इठलाएँगी ,नाचेंगी 
सोंधी बयार मह -मह महकेगी |

जब घिरी साँझ 
विदा की बेला आई 
बचुआ की बेटी ने अंतिम जोड़ 'सुनाए 
धरती माँ है 
देगी ,पालेगी ,पोसेगी उन्ही को 
जो उसकी सेवा में जांगर धन्य करेंगे 
ऋतुएं पलटेंगी 
घाम -ताप ,वर्षा -बूंदी ,हिम -तुषार 
अपनी गति से आयेंगे -जायेंगे 
रहना सुख से 
रहो जहाँ भी 
होगी सबसे भेंट पुनः 
जीवित यदि अगले वर्ष रही |
चार 
ग्रीष्मावसान 
सूरज की सेना के अग्निवाण शेष हुए 
ओ मैदानी राजा के आतंकित अनुचरों 
[अभय हो ! अभय हो !]
हिमगिरि के परकोटे से अब निर्भय निकल चलो 

मुड़ -मुड़ कर देखने की यह कैसी विवशता है ?
दो दिन के परिचय में 
यह तड़पन यह ममता है !
बुरांशों की अरुणमुखी बेटियां वो हंसती हैं 
उनसे विदा लो ,लौटो अब लौट चलो |
पांच 
नैनीताल के प्रति 
ताल में देखी तेरी छाया 
मैं त्रिषाकुल 
किन्तु जल को छू न पाया 

छः 
अंकित होने दो 
मैं कभी कविताएँ लिखता था शुभा !
और तुम अल्पना |
चाँद -तारे 
फूल -पत्तियां 
और शंखमुद्री लताएँ चित्रित करते 
न जाने कब 
कविताओं की डायरी में 
मैं हिसाब लिखने लगा |

कभी खत्म न होने वाला हिसाब 
अल्ल सुबह टूटी चप्पल से शुरू होकर 
देर रात में फटी मसहरी के सर्गों तक फैला 
अबूझ अंकों का महाकाव्य |

और तुम 
अस्पताल ,रोजगार दफ़्तर 
और स्कूलों की सूनी  देहरी पर 
माड़ती रही वर्तुल अल्पना 
साल दर साल |

शुभा !
अभिशप्त हैं पीढियां 
लिखने को कविताएँ 
बुनने को सपने 
और अंकित करने को सतरंगी दुनियाँ |

न रोको उन्हें लिखने दो शुभा 
दीवारों पर नारे ही सही 
अंकित होने दो उनके सपनों का इतिहास |
सात 
पहाड़ों की बर्फ़ 
फ़्रिज से निकलकर 
गिलासों में ढाल लेते हैं जिसे 
रंगीन पानी के साथ 
चुभला भी लेते हैं कभी -कभी 
खूब ठंडी -ठंडी होती है 
यही शायद आप समझते हैं बर्फ़ है |

बर्फ़ जला भी देती है 
गला देती है नाक ,कान ,अंगुलियाँ 
पहाड़ों की बर्फ़ बहुत निर्मम होती है 
बहुत सावधानी चाहिए इस बर्फ़ के साथ |

अक्सर देखा है 
बेपर्दा आँखों को अँधा कर देती है 
पहाड़ों की चमकती बर्फ़ |

सात -
यह कारखाना है 
पुर्जों का ताना -बाना है 
पुर्जे कुछ बड़े हैं 
पुर्जे कुछ छोटे हैं 
पुर्जे कुछ पतले हैं 
पुर्जे कुछ मोटे हैं 

मोटों की रगड़ से छोटे कभी जलते हैं 
अरे भाई ;दुनिया के काम यूँ ही चलते हैं 

रगड़ कुछ कम हो 
ग्रीज दो ,तेल दो 
ज़िन्दगानी ड्रामा है 
चार दिन खेल लो !

मन में नफ़रत हो पर मुंह से राम -राम कहो 
तीन कौड़ी के आदमी को माई -बाप सलाम कहो |
पुर्जों की जिन्दगी का इतना ही परिचय है 
पुर्जों की ज़िन्दगी भी अभिनय ही अभिनय है |

आठ -शेखर जोशी की हस्तलिपि में एक कविता -
[इस हस्तलिपि को उपलब्ध कराने हेतु अग्रज प्रो० सन्तोष भदौरिया जी का विशेष आभार ]



[चित्र गूगल -लेखक मंच से साभार ]

18 टिप्‍पणियां:

  1. शेखर जोशी जी से मिलवाने और उनकी कविताएँ पढ़्वाने के लिए आप का बहुर बहुत आभार..

    उत्तर देंहटाएं
  2. कभी खत्म न होने वाला हिसाब
    अल्ल सुबह टूटी चप्पल से शुरू होकर
    देर रात में फटी मसहरी के सर्गों तक फैला
    अबूझ अंकों का महाकाव्य |

    और तुम
    अस्पताल ,रोजगार दफ़्तर
    और स्कूलों की सुनी देहरी पर
    माड़ती रही वर्तुल अल्पना
    साल दर साल |

    ~यूँ ही गुज़र जाती है ज़िन्दगी .....
    इतनी सुन्दर रचनाएं साझा करने का आभार ...!
    ~सादर!!!

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  3. आदरणीय शेखर जोशी जी का विस्तृत परिचय और उनकी हस्तलिपि में कविता पढने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, इसके लिए धन्यवाद.
    सभी रचनाएँ बहुत उत्कृष्ट हैं और सहज ही मन में गहरे उतर जाती हैं. ये पंक्तियाँ जो सभी का सच है...

    न जाने कब
    कविताओं की डायरी में
    मैं हिसाब लिखने लगा |

    रगड़ कुछ कम हो
    ग्रीज दो ,तेल दो
    ज़िन्दगानी ड्रामा है
    चार दिन खेल लो !

    उत्तर देंहटाएं
  4. शेखर जी की कवितायेँ मुझे पसंद हैं उनके कविता संग्रह पर मेरी राय यहाँ पढ़ी जा सकती है ......http://lekhakmanch.com/?p=4981

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  5. पढ़ने में आनन्द आ गया, आपका बहुत आभार..

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  6. आदरणीय भाई प्रवीण पाण्डेय जी ,भाई महेशचन्द्र पुनेठा जी ,आदर्णीय अनीता जी ,आदरणीय माहेश्वरी कनेरी जी और डाo जेन्नी शबनम जी आभारी तो हमें आप सभी का होना चाहिए क्योंकि आप सबने कभी मुझे हताश नहीं होने दिया |बराबर उत्साहवर्धन करते रहे हैं |आभार सहित |

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  7. आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 02/02/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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  8. शेखर जी का विस्तृत परिचय और उनकी कविता पढ़वाने के लिए आपका बहुत बहुत-आभार...
    :-)

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  9. शेखर जी का परिचय करवाने के लिए बधाई और धन्यवाद |
    आशा

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  10. शेखर जोशी जी के परिचय के लिए आभार
    और उनकी रचनाएँ तो बहुत सुन्दर है !

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  11. बहुत सुन्दर कवितायें...
    शेखर जोशी जी से मिलवाने का बहुत शुक्रिया तुषार जी...
    आपके ब्लॉग पर आना सदा ही सार्थक रहता है..

    आभार
    अनु

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    1. आदरणीय आशा सक्सेना जी ,रीना जी ,सुमन जी और अनु जी आप सभी का बहुत -बहुत आभार |

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  12. शेखर जोशी की कविताएं पढ़वाने के लिए आभार

    अनुराग

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  13. SHEKHAR JOSHI KEE KAVITAAYEN PADHNA BAHUT
    ACHCHHA LAGAA HAI.

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  14. प्रभावशाली रचनाएं ... शेक्खर जी की सभी रचनाएं संवेदनशील हैं ..
    शुक्रिया उनके परिचय का ...

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  15. क्या खूब कहा आपने वहा वहा क्या शब्द दिए है आपकी उम्दा प्रस्तुती
    मेरी नई रचना
    प्रेमविरह
    एक स्वतंत्र स्त्री बनने मैं इतनी देर क्यूँ

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  16. शेखर जोशी जी से परिचय करवाने और उनकी रचनाओं को पढ़ने का मौका देने के लिये बहुत बहुत शुक्रिया तुषार जी.

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