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मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

ग़ज़ल का फ़कीराना स्वर -अदम गोंडवी और उनकी ग़ज़लें

लोकप्रिय शायर अदम गोंडवी
समय [22-10-1947 से 18-12-2011]
खुदी सुकरात की हो याकि हो रुदाद गाँधी की 
सदाक़त ज़िन्दगी के मोर्चे पर हार जाती है 
फटे कपड़ों से तन ढांके गुज़रता हो जहाँ कोई 
समझ लेना वो पगडण्डी अदम के गाँव जाती है 
                                                         अदम गोंडवी की कलम से 
परिचय -
अदम गोंडवी हिंदी ग़ज़ल में दुष्यन्त कुमार के बाद सबसे अधिक लोकप्रिय कवि /शायर हैं |अदम गोंडवी की वर्ग चेतना जनकवि नागार्जुन के करीब है और उनकी परम्परा कबीर की है | अदम की शायरी उर्दू ग़ज़ल की नाजुक और रेशमी वस्त्रों में लिपटी ख़ूबसूरत नायिका को रिझाने और लुभाने वाली शायरी नहीं है बल्कि तेल और धूल  - मिट्टी में सने  मुंशी प्रेमचन्द के उपन्यासों के नायक और नायिका है | सियासत ,मजहब ,व्यवस्था साम्प्रदायिकता और  भ्रष्टाचार अदम को कचोटते हैं और उनकी शायरी के विषय खुद- ब - खुद बन जाते हैं | अदम गोंडवी की कलम खुरदरी है और वह गाँव -जवार से खुरदरे विषय अपनी क्रन्तिकारी कविता या ग़ज़ल के लिए चुनते हैं |जिस तरह गाँव का  किसान  धूप ,ओले ,बरसात में रहकर अपनी कड़ी मेहनत से खेतों में हरियाली लाता है उसी तरह अदम के अन्दर बैठा एक किसान भी बहुत ईमानदारी से बेसहारा लोगों के साथ डटकर खड़ा होता है |अदम अपनी शायरी के द्वारा हमेशा गरीबों ,मजलूमों ,बेसहारा लोगों की बात करते हैं |वह न सिर्फ शायरी में बल्कि अपने रहन -सहन और पहनावे में भी अभिजात्य नहीं होते बल्कि ठेठ देहाती रंग -ढंग में रहना पसंद करते थे | अदम गोंडवी का जन्म आजाद भारत में 22 अक्तूबर  1947 को परसपुर जनपद गोंडा के गाँव आटा में हुआ था | अदम गोंडवी का असली नाम रामनाथ सिंह था |इनका जन्म स्व० मांडवी सिंह और देवकली सिंह के पुत्र के रूप में हुआ था |अदम गोंडवी का निधन 18-12 -2011 को लखनऊ में लीवर सिरोसिस की बीमारी से जूझते हुए हो गया था | यह क्रन्तिकारी शायर राजपूत परिवार में पैदा होकर भी दलितों -शोषितों को अपनी शायरी का विषय बनता रहा और जाति विरोध सहकर भी उनके खिलाफ़ होने वाले जुल्म के विरोध में दमदार आवाज़ उठाता रहा | अदम गोंडवी किताब पढ़कर जनवादी नहीं हुए थे बल्कि समस्याओं को समस्याओं के बीच में रहकर देखा था और महसूस किया था |अदम गोंडवी के साथ एक बार मुझे भी सुल्तानपुर में कविता पाठ करने का सुअवसर मिला था तब शायर चन्द्रभाल सुकुमार वहां जिला जज थे और कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे थे या मुख्य अतिथि थे ठीक से याद नहीं है | मंच का संचालन कैलाश गौतम कर रहे थे |अदम साहब ने प्रथम मुलाकात में ही मेरी ग़ज़लों की तारीफ किया |यह मेरे लिए एक सुखद क्षण था बिना -परिचय बिना पहचान के |साहित्य की सियासत से बिलकुल अलग एक निर्मल व्यक्तिव बिलकुल कबीर के सांचे में ढला हुआ |अदम गोंडवी बेदाग कपास से अपनी शायरी का ताना -बाना बुनते रहे जो कभी मैला नहीं होगा | अदम गोंडवी को दुष्यन्त कुमार पुरष्कार 1998 में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा दिया गया था |अदम गोंडवी की पहली किताब थी गर्म रोटी की महक ,बाद में अनुज प्रकाशन प्रतापगढ़ से नागेन्द्र अनुज ने धरती की सतह पर ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित किया |एक और ग़ज़ल संग्रह वाणी प्रकाशन नई दिल्ली से समय से मुठभेड़ प्रकाशित हुआ है | अदम गोंडवी की शायरी किसी परिचय की मोहताज नहीं है फिर भी आज हम उनके रचना संसार से आप सभी शुभचिंतकों और काव्य रसिकों  को परिचित करा रहे हैं 

लोकप्रिय और जनवादी शायर  अदम गोंडवी की ग़ज़लें -
एक 
काजू भुनी प्लेट में व्हिस्की गिलास में 
उतरा है रामराज बिधायक निवास में 

पक्के समाजवादी हैं तस्कर हों या डकैत 
इतना असर है खादी के उजले लिबास में 

आज़ादी का ये जश्न मनाएं वो किस तरह 
जो आ गये फुटपाथ पर घर की तलाश में 

पैसे से आप चाहे तो सरकार गिरा दें 
संसद बदल गई है यहाँ की नखास में 

जनता के पास एक ही चारा है बग़ावत 
यह बात कह रहा हूँ मैं होशोहवास में 

दो 
जितने हरामखोर थे कुर्बो -जवार में 
परधान बनके आ गए अगली कतार में 

दीवार फांदने में यूँ जिनका रिकार्ड था 
वो चौधरी बने हैं उमर के उतार में 

फौरन खजूर छाप के परवान चढ़ गई 
जो भी जमीन खाली पड़ी थी कछार में 

बंजर ज़मीन पट्टे में जो दे रहे हैं आप 
ये रोटी का टुकड़ा है मियादी बुखार में 

जब दस मिनट की पूजा में घंटों गुजार दें 
समझो कोई ग़रीब फँसा है शिकार में 

तीन 
एशियाई हुस्न की तस्वीर है मेरी ग़ज़ल 
मशरिकी फन में नई तामीर है मेरी ग़ज़ल 

सालहा जो हीर व राँझा की नज़रों में पले 
उस सुनहरे ख़्वाब की तामीर है मेरी ग़ज़ल 

इसकी अस्मत वक्त के हाथों न नंगी हो सकी 
यूँ समझिए द्रौपदी की चीर है मेरी ग़ज़ल 

दिल लिए शीशे का देखो संग से टकरा गई 
बर्गे गुल की शक्ल में शमशीर है मेरी ग़ज़ल 

गाँव के पनघट की रंगीनी बयां कैसे करें 
भुखमरी की धूप में दिलगीर है मेरी ग़ज़ल 

दूर तक फैले हुए सरयू के साहिल पे अदम 
शोख़ लहरों की लिखी तहरीर है मेरी ग़ज़ल 

चार 
भूख के अहसास को शेरो -सुखन तक ले चलो 
या अदब को मुफ़लिसों की अन्जुमन तक ले चलो 

जो ग़ज़ल माशूक के जलवों से वाकिफ़ हो गई 
उसको अब बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो 

मुझको नज्मों जब्त की तालीम देना बाद में 
पहले अपनी रहबरी को आचरन तक ले चलो 

खुद को ज़ख़्मी कर रहे हैं गैर के धोखे में लोग 
इस शहर को रोशनी के बांकपन तक ले चलो 

पांच 
ग़ज़ल को ले चलो अब गाँव के दिलकश नज़ारों में 
मुसलसल फन का दम घुटता है इन अदबी इदारों में 

न इनमें वो कशिश होगी न बू होगी न रानाई 
खिलेंगे फूल बेशक लाँन की लम्बी कतारों में 

अदीबों ठोस धरती की सतह पर लौट भी आओ 
मुलम्में के सिवा क्या है फ़लक के चाँद -तारों में 

रहे मुफ़लिस गुजरते बे यकीनी के तज़रबे से 
बदल देंगे ये इन महलों की रंगीनी मज़ारों में 

कहीं पर भुखमरी की धूप तीखी हो गई शायद 
जो है संगीन के साये की चर्चा इश्तहारों में 

छः 
घर के ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है 
बताओ कैसे लिख दूँ धूप फागुन की नशीली है 

भटकती है हमारे गाँव में गूंगी भिखारन- सी 
सुबहे फरवरी बीमार पत्नी से भी पीली है 

बग़ावत के कमल खिलते हैं दिल के सूखे दरिया में 
मैं जब भी देखता हूँ आंख बच्चों की पनीली है 

सुलगते जिस्म की गर्मी का फिर अहसास हो कैसे 
मोहब्बत की कहानी अब जली माचिस की तीली है 

सात 
वेद में जिनका हवाला हाशिए पर भी नहीं 
वे अभागे आस्था विश्वास लेकर क्या करें 

लोकरंजन हो जहाँ शम्बूक वध की आड़ में 
उस व्यवस्था का घृणित इतिहास लेकर क्या करें 

कितना प्रतिगामी रहा भोगे हुए क्षण का यथार्थ 
त्रासदी कुण्ठा घुटन संत्रास लेकर क्या करें 

गर्म रोटी की महक पागल बना देती मुझे 
पारलौकिक प्यार का मधुमास लेकर क्या करें 

आठ 
टी0 वी0 से अख़बार तक ग़र सेक्स की बौछार हो 
फिर बताओ कैसे अपनी सोच का विस्तार हो 

बह गए कितने सिकन्दर वक्त के सैलाब में 
अक्ल इस कच्चे घड़े से कैसे दरिया पार हो 

सभ्यता ने मौत से डरकर उठाए हैं क़दम 
ताज़ की कारीगरी या चीन की दीवार हो 

मेरी खुद्दारी ने अपना सर झुकाया दो जगह 
वो कोई मजलूम हो या साहिबे किरदार हो 

एक सपना है जिसे साकार करना है तुम्हें 
झोपड़ी से राजपथ का रास्ता हमवार हो 
नौ 
भूख के अहसास को शेरो सुखन तक ले चलो 
या अदब को मुफ़लिसों की अन्जुमन तक ले चलो 

जो ग़ज़ल माशूक के जलवों से वाकिफ हो गई 
उसको अब बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो 

मुझको नज्मों जब्त की तालीम देना बाद में 
पहले अपनी रहबरी को आचरन तक ले चलो 

खुद को ज़ख्मी कर रहे हैं गैर के धोखे में लोग 
इस शहर को रोशनी के बांकपन तक ले चलो 


दस  -अदम गोंडवी की हस्तलिपि में एक ग़ज़ल 
यह हस्तलिपि अनुज प्रकाशन प्रतापगढ़ के प्रकाशक भाई नागेन्द्र अनुज जी से हमें प्राप्त हुई है अतः हम अनुज जी और उनके प्रकाशन के प्रति ह्रदय से आभारी हैं -


रविवार, 2 दिसंबर 2012

लोकप्रिय हिंदी कवि -हरिवंश राय बच्चन ,मधुशाला और उनकी कुछ अन्य कविताएँ

लोकप्रिय कवि -हरिवंश राय बच्चन
समय -27-11-1907 से 18-01-2003]
मधुशाला और हरिवंश राय बच्चन एक दूसरे के पर्याय हो चुके हैं |अपने जीवन काल में बच्चन जी कवि सम्मेलनों के सर्वाधिक लोकप्रिय कवियों में से एक थे | हरिवंश राय बच्चन का जन्म 27-11-1907 को इलाहाबाद के मोहल्ला चक के एक मकान में हुआ था |आज वह मकान विद्यमान नहीं है और उस स्थान पर जीरो रोड गुजर रही है |बचपन से इंटर प्रथम वर्ष तक बच्चन जी इसी मकान में रहे | सन 1926 में उनका परिवार मोहल्ला चक से मुठ्ठीगंज चला आया [इलाहाबाद में ही ] सन 1929 में बच्चन जी ने इलाहाबाद विश्व विद्यालय से बी० ए० की परीक्षा पास की ,पाश्चात्य दर्शन ,हिंदी और अंग्रेजी उनके विषय थे |बच्चन जी के पिता पायनियर प्रेस में काम करते थे |बच्चन जी के एक छोटा भाई और दो बहनें जिनमें एक उनसे बड़ी और दूसरी छोटी थी |बी० ए० प्रथम वर्ष के दौरान ही श्यामा से उनका विवाह हो गया था | सन 1930 में बच्चन जी ने एम० ए० प्रथम वर्ष उत्तीर्ण किया और गाँधी जी का असहयोग आन्दोलन शुरू होने के कारण पढाई छोड़ दिया |जिसे दुबारा सन 1937-38 में पूरा किया | इसी वर्ष बच्चन जी ने  बनारस ट्रेनिंग कालेज में प्रवेश लिया | उन दिनों बच्चन जी लाहौर काफी आने -जाने लगे थे | 24 -01 1942 को बच्चन जी का तेजी बच्चन से विवाह हुआ | तेजी उन दिनों लाहौर में एफ़० सी० कालेज में मनोवज्ञान की अध्यापिका थीं | विवाह से कुछ दिन पूर्व ही बच्चन जी इलाहाबाद विश्व विद्यालय में जूनियर प्रवक्ता हो गये थे |इस समय तक बच्चन जी की ख्याति भारत भर में फ़ैल गयी थी | कुछ दिनों बाद प्रथम पत्नी श्यामा जी का निधन हो गया बच्चन जी गहन वेदना से पीड़ित होकर अमरकृति निशा निमन्त्रण रचते हैं |बच्चन जी का परिचय बहुत व्यापक है यहाँ सब कुछ लिखना संभव नहीं है | सन 1941 से 1952 तक इलाहाबाद विश्व विद्यालय में अंगेजी के प्रवक्ता | 1952 से लेकर 54 तक इंग्लैण्ड में यीट्स के काव्य पर शोध कार्य ,फलस्वरूप कैम्ब्रिज विश्व विद्यालय से पी० एच० डी० की उपाधि |कुछ मास तक आकाशवाणी इलाहाबाद में प्रोड्यूसर |इसके बाद 16 वर्षों तक दिल्ली ,10 वर्ष तक विदेश मंत्रालय में हिंदी विशेषज्ञ |छः वर्षों तक राज्य सभा के मनोनीत सदस्य रहे |अजिताभ बच्चन और अमिताभ बच्चन जैसे महान अभिनेता इस महान कवि के ही पुत्र हैं |प्रमुख कृतियाँ - मधुशाला ,मधुबाला ,मधुकलश ,निशा निमन्त्रण ,एकांत संगीत ,आकुल अंतर ,सतरंगिनी ,हलाहल ,बंगाल का काल ,खादी के फूल .सूत की माला ,मिलन यामिनी ,प्रणय पत्रिका ,बुद्ध और नाचघर ,त्रिभंगिमा आदि |क्या भूलूं क्या याद करूं ,नीड़ का निर्माण फिर ,बसेरे से दूर ,दसद्वार से सोपान तक [आत्मकथा खंड ]प्रवास की डायरी [डायरी ]कवियों में सौम्य संत ,नये -पुराने झरोखे ,टूटी फूटी कड़ियाँ [आलोचना निबन्ध तथा खय्याम और शेक्सपीयर के अनुवाद आदि |आज हम बच्चन जी के परिचय और उनके  कुछ काव्य सुमनों के साथ  आपके सम्मुख उपस्थित हैं |आभार सहित 
हिंदी के लोकप्रिय कवि हरिवंश राय बच्चन ,मधुशाला और कुछ अन्य चुनिन्दा कविताएँ 
एक 
निशा -निमंत्रण 
दिन जल्दी -जल्दी ढलता है 

हो जाय न पथ में रात कहीं 
मंजिल भी तो है दूर नहीं -
यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी -जल्दी चलता है 
दिन जल्दी -जल्दी ढलता है 

बच्चे प्रत्याशा में होंगे 
नीड़ों से झांक रहे होंगे -
यह ध्यान परों में चिड़ियों के भरता कितनी चंचलता है 
दिन जल्दी -जल्दी ढलता है 

मुझसे मिलने को कौन विकल 
मैं होऊं किसके हित चंचल 
यह प्रश्न शिथिल करता पद को ,भरता उर में विह्वलता है 
दिन जल्दी -जल्दी ढलता है 
दो 
साथी नया वर्ष आया है 

वर्ष पुराना ले अब जाता 
कुछ प्रसन्न -सा कुछ पछताता 
दे जी भर आशीष बहुत ही इससे तूने दुःख पाया है 
साथी नया वर्ष आया है 

उठ इसका स्वागत करने को 
स्नेह- बाहुओं में भरने को 
नए साल के लिए देख यह नयी वेदनाएं लाया है 
साथी नया वर्ष आया है 

उठ ओ पीड़ा के मतवाले 
ले ये तीक्ष्ण -तिक्त कटु प्याले 
ऐसे ही प्यालों का गुण तो तूने जीवन भर गाया है 
साथी नया वर्ष आया है 
तीन 
इस पार -उस पार 
इस पार प्रिये ,मधु है ,तुम हो ,उस पार न जाने क्या होगा 

यह चाँद उदित होकर नभ में कुछ ताप मिटाता जीवन का 
लहरा -लहरा यह शाखाएं कुछ शोक भुला देतीं मन का 
कल मुर्झानेवाली कलियाँ हंसकर कहतीं हैं मग्न रहो 
बुलबुल तरु की फुनगी पर से सन्देश सुनाती यौवन का 

तुम देकर मदिरा के प्याले मेरा मन बहला देती हो 
उस पार मुझे बहलाने का उपचार न जाने क्या होगा 
इस पार प्रिये मधु है तुम हो उस पार न जाने क्या होगा 

जग में रस की नदियाँ बहतीं ,रसना दो बूंदे पाती हैं 
जीवन की झिलमिल सी झांकी नयनों के आगे आती है 
स्वर -तालमयी वीणा  बजती ,मिलती है बस झंकार मुझे 
मेरे सुमनों की गंध कहीं यह वायु उड़ा ले जाती है 

ऐसा सुनता उस पार प्रिये ,ये साधन भी छिन जायेंगे 
तब मानव की चेतनता का आधार न जाने क्या होगा 
इस पार प्रिये मधु है तुम हो उस पार न जाने क्या होगा 
चार 
शहीद की माँ 
इसी घर में 
एक दिन 
शहीद का जनाज़ा निकला था 
तिरंगे में लिपटा 
हजारों की भीड़ में 
कांधा देने की होड़ में 
सैकड़ों के कुरते फटे थे 
पुट्टे छिले थे 
भारत माता की जय 
इन्कलाब जिंदाबाद 
अंग्रेजी सरकार मुर्दाबाद 
के नारों में शहीद का रोदन 
डूब गया था 
उसके आंसुओं की लड़ी 
फूल ,खील ,बताशों की झड़ी में 
छिप गयी थी -
जनता चिल्लाई थी 
तेरा नाम सोने के अक्षरों में लिखा जायेगा 
गली किसी गर्व से 
छिप गयी थी 

इसी घर से 
तीस बरस बाद 
शहीद की माँ का जनाज़ा निकला है 
तिरंगे में लिपटा नहीं 
[क्योंकि वहखास -खास लोंगों के लिए विहित है ]
केवल चार काधों पर 
राम -नाम सत्य है 
के पुराने नारों पर 
चर्चा है बुढ़िया बेसहारा थी 
जीवन के कष्टों से मुक्त हुई 
गली किसी राहत से छुई -छुई |
पांच -
तुखारा का प्रेम -गीत 
सीवान किनारे टीलों के 
इन फूलों में क्या है 
जो इनको देख सदा 
मैं याद तुम्हें कर लेता हूँ |

तुममें क्या है -
केशों में ,अधर ,कपोलों में -
जो इन फूलों को देख सदा 
मैं तुम्हें याद कर लेता हूँ |

मुझमें क्या है -
आहों में आंसू में ,गीतों में -
जो देख सदा इन फूलों को 
मैं याद तुम्हें कर लेता हूँ |
छः 
मधुशाला के कुछ छंद या अंश 
मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला 
प्रियतम ,अपने ही हाथों से आज पिलाऊंगा प्याला 
पहले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पायेगा 
सबसे पहले तेरा स्वागत करती तेरी मधुशाला 

मदिरा पीने की अभिलाषा ही बन जाए जब हाला 
अधरों की आतुरता में ही जब अभासित हो प्याला 
बने ध्यान ही करते -करते जब साकी साकार सखे 
रहे न हाला ,प्याला साकी तुझे मिलेगी मधुशाला 

मुसलमान औ हिन्दू हैं दो एक मगर उनका प्याला 
एक मगर उनका मदिरालय एक मगर उनकी हाला 
दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद -मंदिर में जाते 
बैर बढ़ाते मस्जिद -मंदिर ,मेल कराती मधुशाला 

कभी नहीं सुन पड़ता इसने हा 'छू दी मेरी हाला 
कभी न कोई कहता उसने जूठा कर डाला प्याला 
सभी जाति के लोग यहाँ पर साथ बैठकर पीते हैं 
सौ सुधारकों का करती है काम अकेली मधुशाला 

दो दिन ही मधु मुझे पिलाकर ऊब उठी साकीबाला 
भरकर अब खिसका देती है वह मेरे आगे प्याला 
नाज़ ,अदा अंदाजों से अब हाय पिलाना दूर हुआ 
अब तो कर देती है केवल फ़र्ज़ -अदाई मधुशाला 

मेरे अधरों पर हो अंतिम वस्तु न तुलसी -दल प्याला 
मेरी जिह्वा पर हो अंतिम वस्तु न गंगाजल हाला 
मेरे शव के पीछे चलनेवालो याद इसे रखना 
राम नाम है सत्य न कहना कहना सच्ची मधुशाला 
सात -
बच्चन जी के द्वारा प्रोफेसर राजेन्द्र कुमार को लिखा एक पत्र उनकी हस्तलिपि के रूप में [साभार प्रो० राजेन्द्र कुमार ]