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गुरुवार, 27 सितंबर 2012

जनसंघर्ष ,विद्रोह और विविधता के कवि -जनकवि नागार्जुन

जनकवि -नागार्जुन 
समय -[30-06-2011से 05-11-1998]

वे लोहा पीट रहे हैं 
तुम मन को पीट रहे हो 
वे पत्तर जोड़ रहे हैं 
तुम सपने जोड़ रहे हो 
उनकी घुटन ठहाकों में घुलती है 
और तुम्हारी 
उनींदी घडियों में चुरती है -----
                                                         नागार्जुन 
परिचय 
नागार्जुन हिंदी कविता में एक विलक्षण कवि हैं |वह जिस खाँचे में फिट बैठते उसका निर्माण या सृजन स्वंय उन्होंने ही किया है |जिस तरह छायावाद के कवियों में प्रसाद ,निराला ,पन्त और महादेवी को महत्वपूर्ण माना जाता है उसी तरह प्रयोगवादी कवियों में शमशेर ,त्रिलोचन ,केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन को माना जाता है |नागार्जुन किसान ,मजदूरों ,छात्रों के आंदोलनों के साथ -साथ बहुत बड़े राजनीतिक कवि भी माने जाते हैं |जनकवि नागार्जुन रूप और विविधताओं के कवि हैं | जनसंघर्षों के कवि हैं |इनकी कवितायें बिना किसी लाग -लपेट के सीधे व्यवस्था की पीठ पर हंटर बरसाती हैं |विद्द्वता के साथ -साथ इनकी कविताओं में सादगी और सरलता भी है | नागार्जुन का जन्म 30-06-1911 को दरभंगा जिले [बिहार ] के सतलखा के पास तरौनी ग्राम में हुआ था | इस महान कवि का निधन 05-11-1998 को हुआ | बचपन में इनका नाम वैद्यनाथ मिश्र था ,किन्तु बाद में बौद्ध धर्म की ओर रुझान होने के कारण इन्होनें अपना नाम नागार्जुन रख लिया |नागार्जुन बचपन में मैथिली में यात्री नाम से कविताएँ लिखा करते थे |नागार्जुन का बचपन बहुत ही संघर्षपूर्ण था |इन्होने काफी यात्रायें की इन्हीं यात्राओं के दौरान श्रीलंका पहुंचे वहां इन्होनें बौद्धों को संस्कृत पढ़ाया और उनसे पालि भाषा सीखी |सन 1941 में भारत लौट आये |नागार्जुन की प्राथमिक शिक्षा संस्कृत पाठशाला में हुई ,आगे की पढ़ाई जारी नहीं रह पाई |नागार्जुन को हिंदी ,संस्कृत ,पालि ,बांग्ला भाषाओं का अच्छा ज्ञान था | नागार्जुन का लेखन गद्य और पद्य दोनों में हुआ | कृतियाँ -उपन्यास -रतिनाथ की चाची ,बलचनमा ,नई पौध ,बाबा बटेसरनाथ ,दुःखमोचन और वरुण के बेटे |काव्य -युगधारा ,सतरंगे पंखोंवाली ,प्यासी पथराई आँखें ,खून और शोले ,हजार-हजार बाँहों वाली ,तुमने कहा था ,भस्मासुर इनके द्वारा रचित खण्ड काव्य है | तमाम पुरस्कारों और सम्मानों से सम्मानित नागार्जुन को साहित्य अकादमी सम्मान ,भारत -भारती सम्मान ,मध्य प्रदेश सरकार का कबीर सम्मान और बिहार सरकार का राजेन्द्र प्रसाद सम्मान प्रमुख रूप से मिला था |साहित्य अकादमी फेलोशिप भी इनको दी गयी थी | आज हम इस जनवादी कवि की कुछ कवितायें सुनहरी कलम के माध्यम से आप तक पहुंचा रहे हैं |

कवि -नागार्जुन की एक विशिष्ट फोटो |यह फोटो हमें  स्वामी      -   
 सहजानन्द  सरस्वती संग्रहालय अ० म० गाँधी हिंदी विश्व विद्यालय 
 से प्राप्त हुआ है अतः हम हिंदी विश्व विद्यालय के प्रति आभारी हैं 
जनकवि नागार्जुन की कविताएँ 
एक 
अकाल और उसके बाद 
कई दिनों तक चूल्हा रोया 
चक्की रही उदास 
कई दिनों तक 
कानी कुतिया सोई उनके पास 
कई दिनों तक लगी 
भीत पर छिपकलियों की गश्त 
कई दिनों तक 
चूहों की भी हालत रही शिकस्त 

दाने आए घर के अंदर 
कई दिनों के बाद 
धुआं उठा आंगन से उपर 
कई दिनों के बाद 
चमक उठी घर -भर की 
ऑंखें कई दिनों के बाद 
कौए ने खुजलाई पांखें 
कई दिनों के बाद 

दो 
कालिदास 
कालिदास सच -सच बतलाना !
इंदुमती के मृत्यु शोक से 
अज रोया या तुम रोए थे ?
कालिदास ,सच -सच बतलाना !

शिवजी की तीसरी आँख से 
निकली हुई महाज्वाला में 
घृत मिश्रित सूखी समिधा -सम 
कामदेव जब भस्म हो गया 
रति का क्रन्दन सुन आंसू से 
तुमने ही तो दृग धोए थे ?
कालिदास ,सच -सच बतलाना 
रति रोई या तुम रोए थे ?

वर्षा ऋतु की स्निग्ध भूमिका 
प्रथम दिवस आषाढ़ मास का 
देख गगन में श्याम घन -घटा 
विधुर यक्ष का मन जब उचटा 
खड़े -खड़े तब हाथ जोड़कर 
चित्रकूट के सुभग शिखर पर 
उस बेचारे ने भेजा था 
जिनके ही द्वारा संदेशा 
उन पुष्करावर्त मेघों का 
साथी बनकर उड़नेवाले 
कालिदास ,सच -सच बतलाना 
परपीड़ा से पूर् -पूर हो 
थक -थककर  औ' चूर -चूर हो 
अमल -धवल गिरि के शिखरों पर 
प्रियवर ,तुम कब तक सोये थे ?
रोया यक्ष कि तुम रोए थे ?
कालिदास ,सच -सच बतलाना !

तीन 
जनकवि 
मैं भी तो पहले देखा करता था सपने 
साथी अब तो रंग -ढंग ही बदल गए हैं 
समझ गया हूँ 
जीवन में इस धरा- धाम का क्या महत्व है 
कैसे कहलाता कोई धरती का बेटा 
आसमान में सतरंगी बादल पर चढ़कर 
कैसे जनकवि धान रोपता 
समझ गया हूँ 
कैसे जनकवि जमींदार के उन अमलों को मार भागता 
हरे बांस की हरी -हरी वह लाठी लेकर !

चार 
बहुत दिनों के बाद 
बहुत दिनों के बाद 
अब की मैंने जी -भर देखी 
पकी सुनहली फसलों की मुसकान 
बहुत दिनों के बाद 

बहुत दिनों के बाद 
अब की मैं जी -भर सुन पाया 
धान कूटती किशोरियों की कोकिल कंठी तान 
बहुत दिनों के बाद 

बहुत दिनों के बाद 
अब  की मैंने जी- भर सूंघे 
मौलसिरी के ढेर -ढेर से ताजे टटके फूल 
बहुत दिनों के बाद 

बहुत दिनों के बाद 
अब की मैं जी- भर छू पाया 
अपनी गंवई पगडंडी की चंदनवर्णी धूल 
बहुत दिनों के बाद 

बहुत दिनों के बाद 
अब की मैंने जी भर तालमखाना खाया 
गन्ने चूसे जी -भर 
बहुत दिनों के बाद 

बहुत दिनों के बाद 
अब की मैंने जी भर-भोगे 
गंध -रूप -रस -शब्द -स्पर्श सब साथ -साथ इस भू पर 
बहुत दिनों के बाद |

पांच 
बादल को घिरते देखा है 
अमल धवलगिरि के शिखरों पर 
बादल को घिरते देखा है |
छोटे -छोटे मोती जैसे 
उसके शीतल तुहिन कणों को ,
मानसरोवर के उन स्वर्णिम 
कमलों पर गिरते देखा है 
बादल को घिरते देखा है |

तुंग्ग हिमालय के कंधों पर 
छोटी -बड़ी कई झीलें हैं ,
उनके श्यामल -नील सलिल में 
समतल देशों से आ -आकर 
पावस की उमस से आकुल 
तिक्त -मधुर बिस -तंतु खोजते 
हंसों को तिरते देखा है 
बादल को घिरते देखा है |

ऋतु बसंत का सुप्रभात था 
मंद -मंद था अनिल बह रहा 
बालारुण की मृदु किरणें थीं 
अगल -बगल स्वर्णाभ शिखर से 
एक दूसरे से विरहित हो 
अलग -अलग रहकर ही जिनको 
सारी रात बितानी होती ,
निशाकाल के चिर -अभिशापित 
बेबस उन चकवा -चकई का 
बंद हुआ क्रंदन ,फिर उनमें 
उस महान सरवर के तीरे 
शैवालों की हरी दरी पर 
प्रणय -कलह छिड़ते देखा है 
बादल को घिरते देखा है |

दुर्गम बर्फानी घाटी में
शत -सहस्त्र फुट ऊंचाई पर 
अलख नाभि से उठनेवाले 
निज के ही उन्मादक परिमल -
के पीछे धावित हो -होकर 
तरल तरुण कस्तूरी मृग को 
अपने पर चिढ़ते देखा है 
बादल को घिरते देखा है |

कहाँ गया धनपति कुबेर वह 
कहाँ गई उसकी वह अलका 
नहीं ठिकाना कालिदास के 
व्योम प्रवाही गंगाजल का ,
ढूंढा बहुत परन्तु लगा क्या 
मेघदूत का पता कहीं पर ,
कौन बताए वह छायामय 
बरस पड़ा होगा न यहीं पर ,
जाने दो ,वह कवि कल्पित था ,
मैंने तो भीषण जाड़ों में 
नभ -चुम्बी कैलाश शीर्ष पर 
महामेघ को झंझानिल से 
गरज -गरज भिड़ते देखा है ,
बादल को घिरते देखा है |

शत -शत निर्झर -निर्झरणी -कल 
मुखरित देवदारु कानन में ,
शोणित -धवल भोजपत्र से 
छाई हुई कुटी के भीतर ,
रंग -बिरंगे और सुगंधित 
फूलों से कुंतल को साजे ,
इन्द्रनील की माला डाले 
शंख -सरीखे सुघड़ गलों में ,
कानों में कुवलय लटकाए ,
शतदल लाल कमल वेणी से ,
रजत -रचित मणि -खचित कलामय 
पानपात्र द्राक्षासव -पूरित 
रखे सामने अपने -अपने 
लोहित चंदन की त्रिपदी पर 
नरम निदाग बाल -कस्तूरी -
मृगछालों पर पल्थी मारे 
मदिरारुण आंखोंवाले उन 
उन्मद किन्नर -किन्नरियों की 
मृदुल मनोरम अँगुलियों को 
वंशी पर फिरते देखा है 
अमल धवलगिरि के शिखरों पर 
बादल को घिरते देखा है |

छः 
नागार्जुन की मैथिली भाषा में एक कविता 
भोरे -भोर 
भोरे -भोर
आएल छी बूलि 
दुबिआही लाँन में 
भोरे -भोर 
आएल छी धांगी 
पथार मोतीक भोरे -भोर 
क 'आएल छी अनुभव 
पुलकित होइत छइ रोम -रोम 
स्पर्शक प्रतापें कोना -कोना 
भोरे -भोर 
पैरक दुहू तरबाक ग'ह द'ने 
आएल छी पीवि 
माघी आकाशक हेमाल ओस 
भोरे -भोर 
आएल छी बूलि 
दुबिआही लाँन में

सात  
जनकवि नागार्जुन की हस्तलिपि -यह हस्तलिपि हमें स्वामी सहजानन्द सरस्वती संग्रहालय म० गाँधी अ० हिंदी विश्व विद्यालय से प्राप्त हुई है |इसे उपलब्ध कराने के लिए हम प्रो० संतोष भदौरिया जी के विशेष आभारी हैं -


जनकवि नागार्जुन की हस्तलिपि 


सुनहरी कलम से -
जनकवि नागार्जुन भारतीय समाज की वर्गीय संरचना की बारीकियों और जटिलताओं को जितनी स्पष्टता से पहचानते हैं उतनी ही सहजता ,निर्भीकता और पक्षधरता के साथ व्यक्त भी करते हैं |ऐसे प्रसंगों में भी वे दुविधा और असमंजस की भाषा नहीं बोलते |वे मध्यवर्ग के दंभ और तुनुकमिजाजी को खूब समझते हैं ,इसलिए मजदूरों से दूरी बनाये रखने की उनकी आदत पर व्यंग्य करते हुए मजा लेते हैं |.......नागार्जुन जैसे समाज की कविता लिखते हुए साधारण आदमी का विशेष ध्यान रखते हैं वैसे ही प्रकृति की कविता लिखते हुए प्रकृति के उन साधारण रूपों ,वस्तुओं ,स्थितियों और जीवों पर कविता लिखते हैं जिनपर दूसरा कोई प्रकृति प्रेमी कवि न लिखता है न लिखने के बारे में सोचता है |.....नामवर सिंह ठीक कहते हैं कि नागार्जुन की गिनती न तो प्रयोगशील कवियों के संदर्भ में होती है ,न नई कविता के प्रसंग में ;फिर भी कविता में रूप संबंधी जितने प्रयोग अकेले नागार्जुन ने किए हैं ,उतने शायद ही किसी ने किए हों |कविता की उठान तो कोई नागार्जुन से सीखे और नाटकीयता में तो वे लाजवाब ही हैं |जैसी सिद्धि छंदों में ,वैसा ही अधिकार बेछ्न्द या मुक्त छंद की कविता पर |उनके बात करने के हजार ढंग हैं |नागार्जुन ने महाकाव्य को छोड़कर कविता के सभी रूपों का प्रयोग किया है उन्होंने कविता के रूप में एक ऐसा भी प्रयोग किया है जो अपूर्व तो है ही ,अनूठा भी है |वह प्रयोग उनकी मंत्र कविता में है |वह उत्तर आधुनिक कविता का एक नायाब नमूना है |
मैनेजर पांडेय [नागार्जुन चयनित कविताएं पुस्तक की भूमिका से ]

शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

हिंदी गीत /नवगीत के निराला - कवि -माहेश्वर तिवारी

वरिष्ठ नवगीत कवि -माहेश्वर तिवारी 
सम्पर्क -09456689998
खत्म नहीं होगा 
वसंत का आना यह 
हर बार |

खत्म नहीं होगा 
पलाश के फूलों वाला रंग ,
पतझारों को रौंद 
विहंसने- गाने का यह ढंग ,

खत्म नहीं होगा 
मनुष्य से 
फूलों का व्यवहार ---
             माहेश्वर तिवारी 
परिचय -
हिंदी नवगीत में पांच जोड़ बाँसुरी के प्रकाशन के पूर्व से ही जिस गीत कवि के गीतों की बाँसुरी हिंदी साहित्य और मंच को अपनी लयात्मकता और गीतात्मकता से मन्त्र मुग्ध कर रही थी ,जिस कवि ने हिंदी गीत को नवगीत का कलेवर धारण करते हुए देखा हो  या उसमें खुद उसकी भी भूमिका रही हो और आज भी जो गीत कवि अपने समय को अपने मानक नवगीतों से रेखांकित कर रहा हो | जिसके डमरू से छन्द अनायास कविता का रम्य रूप धारण कर लेते हों उस महान नवगीतकार का नाम माहेश्वर तिवारी ही हो सकता है | माहेश्वर तिवारी का जन्म एक जमींदार परिवार में[22-07-1939] गांव मलौली जिला बस्ती उत्तर प्रदेश में हुआ था | इनके पिता का नाम स्व० श्याम बिहारी तिवारी माँ का नाम स्व० चन्द्रावती तिवारी था |माहेश्वर जी की धर्मपत्नी श्रीमती विशाखा तिवारी संगीत की शिक्षिका हैं शौक वश कवितायें भी लिख लेती हैं | माहेश्वर तिवारी की शिक्षा एम० ए० हिंदी [गोरखपुर विश्व विद्यालय] है | माहेश्वर तिवारी सदानीरा नदी के बहते हुए जल की तरह जीवन के मध्यान्ह तक बहते रहे यह बहाव कभी गोरखपुर कभी बनारस कभी विदिशा कभी होशंगाबाद ले जाता रहा आखिर में उन्हें पीतलों का  शहर मुरादाबाद रास आया और वह यहीं स्थाई रूप से रच - बस गए |माहेश्वर जी मूलतः यायावर कवि हैं प्रकृति और जीवन के विविध रंग इनके नवगीतों में समाहित हैं |एक विशिष्ट बात तिवारी जी के साथ यह रही कि लगतार हिंदी कविता मंचों पर काव्य पाठ करने के बावजूद इन्होनें नवगीत को नवगीत ही रहने दिया |उन्हें फूहड़ और मंचीय नहीं होने दिया | मंचों पर भी ये पन्त ,महादेवी ,बच्चन ,नेपाली ,भवानी प्रसाद मिश्र ,सर्वेश्वरदयाल सक्सेना के काव्य पाठ के साक्षी रहे |पांच जोड़ बाँसुरी [संपादन चन्द्रदेव सिंह और महेन्द्र शंकर अधीर ने किया था ] के पहले कलकत्ता से एक सप्तक और प्रकाशित हुआ था जिसमें माहेश्वर तिवारी एक प्रमुख नवगीतकार थे |इसके अतिरिक्त गीतायन ,यात्रा में साथ -साथ नवगीत दशक दो और नवगीत अर्द्धशती में माहेश्वर तिवारी के नवगीत संकलित हैं |इनका प्रथम स्वतंत्र नवगीत संकलन हरसिंगार कोई तो हो [1981] में प्रकाशित हुआ इसके बाद के संकलन हैं नदी का अकेलापन ,फूल आये हैं कनेरों में ,और सच की कोई शर्त नहीं |माहेश्वर तिवारी के नवगीत समय -समय पर देश की प्रतिष्ठित पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं |उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की साहित्यिक पत्रिका साहित्य भारती का अतिथि सम्पादन भी इन्होंने किया है |उत्तर प्रदेश के प्रतिष्ठित साहित्य भूषण सम्मान ,परिवार सम्मान के अतिरिक्त कई सम्मानों से सम्मानित इस कवि की आवाज को आकाशवाणी दिल्ली के केन्द्रीय संग्रहालय में 'रचनात्मकता और आत्मकथात्मक 'विषय पर साक्षात्कार को धरोहर के रूप में संग्रहीत किया गया है या सुरक्षित रखा गया है |यह साक्षात्कार 14-08-2012  को लिया गया | हम माहेश्वर तिवारी जी  के शतायु होने की कामना करते हुए उनके कुछ गीत /नवगीत आप तक पहुँचा रहे हैं |
माहेश्वर तिवारी के गीत /नवगीत 
एक 
राजा चुप है 
रानी चुप है 
ठिठकी हुई कहानी चुप है |

कालिदास 
अब भी 
उज्जयिनी में 
रहते हैं !
देख रहे हैं 
सब कुछ 
लेकिन कुछ भी 
कभी नहीं कहते हैं 

मेघदूत आते हैं 
अब भी ,
शब्द मौन हैं ,
बानी चुप है |

उज्जयिनी में 
सब है केवल 
न्याय नहीं है ,
पर जीने का 
कोई और उपाय 
नहीं है ,

भीतर चीखें हैं 
क्रन्दन है 
पर आँखों का 
पानी चुप है |

दो 
वैशाली के लोग 
नहीं अब 
वैशाली में हैं |
और -और हैं 

वे जो ,अब भी 
वहीँ कहीं रहते हैं 
कतराते खुद से 
धारा में 
अलग -अलग 
बहते हैं 
अपने ही भग्नावशेष से 
बदहाली में हैं |

इतिहासों के 
कूड़ाघर में 
पड़ी आम्रपाली .
बुद्धं शरणम को 
अगोरती 
स्मृतियाँ काली ,

मंत्रि परिषदें ,गणाध्यक्ष 
बस खुशहाली में हैं |

तीन 
पढ़ने -लिखने का 
काशी में 
नहीं रिवाज रहा |

उजड़ चुकीं 
संगीत सभाएँ 
ठहरे हैं संवाद 
लोग बाग 
मिलते आपस में 
कई दिनों के 
बाद 

गंगा सूख रही 
लहरों का टूटा साज रहा |

श्रेष्ठिजनों ,भूखों में 
बस्ती का है 
बंटा समाज 
सड़कों -गलियों में 
शव रखकर 
भाग रहे सब 
आज |

पहले जैसा अब 
काशी का नहीं समाज रहा |

चार 
तक्षशिला से 
लौट रहे हैं 
नालन्दा के लोग |

समझ चुके हैं 
नगर -नगर है 
केवल वही समाज ,
भद्रजनों का 
चेहरा पहने 
वही तख़्त या ताज ,
बहुत कर चुके 
बीते कल से 
अब तक नए प्रयोग |

लौट रहे 
लोगों में भी 
अब नहीं रहा संवाद ,
बस इतना -सा 
परिवर्तन 
लोगों को केवल याद |
जहाँ कहीं भी 
गए घटा है 
वहीँ -वहीँ संयोग |

पांच 
खुद से खुद की 
बतियाहट हम 
लगता भूल गए |

डूब गए हैं 
हम सब इतने 
दृश्य -कथाओं में ,
स्वर कोई भी 
बना नहीं है शेष,
हवाओं में ,
भीतर के मन की 
आहट हम 
लगता भूल गए |

रिश्तों वाली 
पारदर्शिता लगे 
कबन्धों -सी ,
शामें लगती हैं 
थकान से टूटे 
कन्धों -सी ,
संवादों की 
गरमाहट हम 
लगता भूल गए |

छः 
हरियल शाखों में 
अब भी कुछ सपने जाग रहे हैं |

कुछ चिड़ियों के 
कुछ फूलों के 
कुछ -कुछ आदम -
कद भूलों के 
आँखों -आँखों में 
अब भी कुछ सपने जाग रहे हैं |

ताना कुछ आगामी 
कल के 
कुछ ऊंचाई और 
अतल के 
सुलगी राखों में 
अब भी कुछ सपने जाग रहे हैं |

मलयानिल के कुछ 
आंधी के ,
कुछ सोने के 
कुछ चांदी के 
बन्द सलाखों में 
अब भी कुछ सपने जाग रहे हैं |

सात 
याद तुम्हारी जैसे कोई 
कंचन -कलश भरे |
जैसे कोई किरन अकेली 
पर्वत पार करे |

लौट रही गायों के 
संग -संग 
याद तुम्हारी आती ,
और धूल के 
संग -संग 
मेरे माथे को छू जाती ,
दर्पण में अपनी ही छाया- सी 
रह -रह उभरे 
जैसे कोई हंस अकेला 
आंगन में उतरे |

जब इकला कपोत का 
जोड़ा 
कंगनी पर आ जाये ,
दूर चिनारों के 
वन से 
कोई वंशी स्वर आये ,
सो जाता सूखी टहनी पर 
अपने अधर धरे 
लगता जैसे रीते घट से 
कोई प्यास हरे |
आठ -माहेश्वर तिवारी की हस्तलिपि में एक नवगीत

सोमवार, 10 सितंबर 2012

पवन कुमार की कुछ चुनिन्दा ग़ज़लें

कवि /शायर -पवन कुमार [ I.A.S]
सम्पर्क -09412290079 e-mail-singhsdm@gmail.com
साहित्य में कुछ ऐसे प्रशासनिक अधिकारी होते हैं जिन्हें लोग सिर्फ़ और सिर्फ़ उनके ओहदे के नाते कवि या कहानीकार मान लेते हैं |लेकिन कुछ ऐसे भी प्रशासनिक ऑफिसर होते हैं जो अपने ओहदे के नाते नहीं बल्कि अपने लेखन से अपनी अलग पहचान बना लेते हैं |उनके भीतर का शायर उनके ओहदे पर भारी पड़ जाता है |पवन कुमार गज़ल की दुनिया में एक ऐसा ही सहज  नाम है, जिसने अपने पद और शायरी के बीच एक विभाजन रेखा खींच दिया है |कहन की सादगी भाषा के प्रति सजगता  और कथ्य शिल्प में नयापन इनकी गज़लों की विशेषता है | पवन कुमार की ग़ज़लें आम आदमी से सीधा संवाद करती हैं ,बिना किसी आवरण के बिना किसी लाग -लपेट के | कविता लिखना एक आदमी होने की कोशिश करना है और इस कोशिश में पवन जी शत -प्रतिशत कामयाब हुए हैं |प्रशासन के अनुभवों को भी यह शायर सरकारी सेवा में रहते हुए गज़ल का विषय बनाने में नहीं चूकता है |पवन कुमार पेशे से भारतीय प्रशासनिक सेवा से जुड़े हैं और वर्तमान में जिलाधिकारी चन्दौली [वाराणसी को विभाजित करके बनाया गया जिला ]के पद पर तैनात हैं |पवन कुमार का जन्म 08-08-1975 को उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जनपद में हुआ था | पवन कुमार विज्ञान और कानून में सेंट जोन्स आगरा से स्नातक हैं |इनके पिता का नाम श्री डी० पी० सिंह माता का नाम श्रीमती शीला देवी और धर्मपत्नी का नाम श्रीमती अंजू सिंह है |अभी हाल में नई दिल्ली से इनका गज़ल संग्रह वाबस्ता [ग़ज़लें /नज़्में ]प्रकाशित हुआ है |प्रोफ़ेसर वसीम बरेलवी से इनकी काफ़ी निकटता है |यह निकटता व्यक्तिगत और शायराना दोनों ही स्तर पर है |अंतर्जाल पर भी नज़रिया नाम के ब्लॉग के माध्यम से पवन कुमार सक्रिय हैं |आप तक हम उनकी कुछ ग़ज़लें अन्तर्जाल के माध्यम से पंहुचा रहे हैं |

पवन कुमार और उनका काव्य संसार -कुछ ग़ज़लें 
एक 
जहां हमेशा समंदर ने मेहरबानी की 
उसी ज़मीन पे किल्लत है आज पानी की 

उदास रात की चौखट पे मुंतज़िर आँखें 
हमारे नाम मुहब्बत ने ये निशानी की 

तुम्हारे शहर में किस तरह जिंदगी गुज़रे 
यहाँ कमी है तबस्सुम की ,शादमानी की 

ये भूल जाऊं तुम्हें सोच भी नहीं सकता 
तुम्हारे साथ जुड़ी है कड़ी कहानी की 

उसे बताये बिना उम्र भर रहे उसके 
किसी ने ऐसे मुहब्बत की पासबानी की 

दो 
ज़रा सी चोट को महसूस करके टूट जाते हैं 
सलामत आईने रहते हैं चेहरे टूट जाते हैं 

पनपते हैं यहाँ रिश्ते हिजाबों एहतियातों में 
बहुत बेबाक होते हैं तो रिश्ते टूट जाते हैं 

दिखाते हैं नहीं जो मुद्दतों तिश्नालबी अपनी 
सुबू के सामने आकर वो प्यासे टूट जाते हैं 

किसी कमजोर की मज़बूत से चाहत यही देगी 
कि मौजें सिर्फ़ छूती हैं ,किनारे टूट जाते हैं 

यही इक आखिरी सच है जो हर रिश्ते पे चस्पा है 
जरूरत के समय अक्सर भरोसे टूट जाते हैं 

गुज़ारिश अब बुज़ुर्गों से यही करना मुनासिब है 
ज़ियादा हो जो उम्मीदें तो बच्चे टूट जाते हैं 

तीन 
कभी तो है कभी गोया नहीं है 
मगर ये सच है तू खोया नहीं है 

इन्हीं से अब सुकूं पाने की ज़िद में 
किसी भी दाग को धोया नहीं है 

तेरे हर नक्श को दिल से जिया है 
तुझे ऐ ज़िन्दगी ढोया नहीं है 

उगेगा खौफ़ ही आँखों में अब तो 
सिवा-ए -मौत कुछ बोया नहीं है 

मुझे भी ख़्वाब होना था उसी का 
मेरी किस्मत कि वो सोया नहीं है 

न जाने उसको कितने गम मिले हैं 
हुई मुद्दत कि वो रोया नहीं है 

चार 
मेरी तन्हाई क्यों अपनी नहीं है 
ये गुत्थी आज तक सुलझी नहीं है 

बहुत हल्के से तुम दीवार छूना 
नमी इसकी अभी उतरी नहीं है 

मुआफ़ी बख्स दी इस तंज़ के साथ 
'तुम्हारी भूल ये पहली नहीं है '

ये दिल है इसको बन्द आँखों से समझो 
कोई तहरीर या अर्ज़ी नहीं है 

बक़ारो -इज़्ज़तो -शोहरत की मंज़िल 
मुझे पाना है पर जल्दी नहीं है 

बहुत चाहा तेरे लहजे में बोलूँ 
मगर आवाज़ में नरमी नहीं है 

पांच 
मैं हूँ मुश्किल में, याद करते ही 
दोस्त बदले हैं दिन बदलते ही 

हर कदम पर थी किस कदर -फिसलन 
गिर गया मैं ज़रा सम्हलते ही 

फिर नया ज़ख्म दे गया ज़ालिम
 कुछ पुराने से घाव सिलते ही 

कोरों -कोरों में कांच चुभते हैं 
ख़्वाब टूटे हैं आँख खुलते ही 

है अजब सल्तनत भी सूरज की 
रात बिखरी है दिन संवरते ही 

पानियों का जुलुस देखा था 
सख्त चट्टान के दरकते ही 

वस्ल में वक़्त ऐसे कटता है 
शब गुज़र जाए पल झपकते ही 

छः 
चुनी है राह जो काँटों भरी है 
डरें क्यों हम तुम्हारी रहबरी है 

हर इक शय में तुझी को सोचता हूँ 
तेरे जलवों की सब जादूगरी है 

खुला रहता है दरवाज़ा सभी पर 
तुम्हारा दिल है या बारहदरी है 

दिखावा किस लिए फिर दोस्ती का 
अगर दिल में फक़त नफ़रत भरी है 

वही मसरूफ़ दिन बेकैफ़ लम्हे 
इसी का नाम शायद नौकरी है 

सुना है फिर नया सूरज उगेगा 
यही इक रात बस काँटों भरी है 

वो कहता है छुड़ाकर हाथ मुझसे 
तुम्हारी ज़ीस्त में क्यूँ अबतारी है 

भटकना भी नहीं बस में हमारे 
जिधर देखो तुम्हारी रहबरी है 

सात -पवन कुमार की हस्तलिपि में कुछ अशआर 


कवि /शायर पवन कुमार का खूबसूरत और चर्चित गज़ल संग्रह 
विशेष -[पवन कुमार के ग़ज़ल संग्रह वाबस्ता पर उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का जयशंकर प्रसाद सम्मान 10-03-2013 को दिया गया ]
सुनहरी कलम से -
पवन कुमार की ग़ज़लें पढ़कर यह कहा जा सकता है कि उन्होंने अपने अहसास को सलीके से अल्फ़ाज देने की कोशिश की है |उनका शेरीजौक समाई है |मकबूल शाइरों से मुतास्सिर हुए |मैं नहीं जानता कि पवन कुमार भीड़ से कितनी बात करते हैं |करते भी हैं कि नहीं ?लेकिन वे ;वाबस्ता ;के वसीले से फर्द से फ़र्दंन -फ़र्दंन बात करना चाहते हैं |मैं उनके इस इरादे का इस्तकबाल करता हूँ |
शीन काफ़ निज़ाम [पुस्तक के फ्लैप से ]
पवन कुमार एक खुशमिजाज़ इंसान ,जिम्मेदार सरकारी अफ़सर और मोहतात लाबोलहजे के शायर हैं |उनकी मनसबी मसरूफ़ियत ने अगर उन्हें आइन्दा भी गज़ल के साथ खुल खेलने का भरपूर मौका दिया तो वह यक़ीनन गज़ल की पेशानी पर अपना नाम लिखकर इसकी मुमलिकत को वसीअ से वसीअ तर करेंगे -
अकील नोमानी -[पुस्तक की भूमिका से ]