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मंगलवार, 8 मई 2012

लोकप्रिय भारतीय शायर -निदा फ़ाज़ली

शायर -निदा फ़ाज़ली 
सम्पर्क -09869487139
निदा फ़ाज़ली आधुनिक उर्दू शायरी के बहुत ही लोकप्रिय शायर हैं |यह शायर हिन्दी के पाठकों के लिए भी उतना ही सुपरिचित है जितना उर्दू के पाठकों के लिए |निदा फ़ाज़ली एक सूफ़ी शायर हैं रहीम ,कबीर और मीरा से प्रभावित होते हैं तो मीर और ग़ालिब भी इनमें रच- बस जाते हैं |टी० एस० इलियट ,गोगोल ,चेखव से भी कुछ हासिल करते हैं |निदा फाज़ली की शायरी की जमीन विशुद्ध भारतीय है |इस शायर का पूरा नाम मुक्तिदा हसन निदा फ़ाज़ली है, जो बाद में निदा फ़ाज़ली के रूप में प्रसिद्द हुआ |निदा फ़ाज़ली का जन्म दिल्ली में 12 सितम्बर 1938 को हुआ था |इनकी स्कूली शिक्षा ग्वालियर में हुई थी |निदा फ़ाज़ली के पिता एक शायर थे ,जो भारत विभाजन के समय पाकिस्तान चले गए |लेकिन भारतीयता का पोषक यह शायर देश छोड़कर पाकिस्तान नहीं गया और आज भी इस देश को अपनी रचनात्मक प्रतिभा से समृद्ध कर रहा है |निदा फ़ाज़ली गज़लों के साथ दोहे भी बखूबी कहते हैं ,नज्मों में भी इन्हें महारत हासिल है |साठ के दशक के अपने समकालीन शायरों कैफ़ी आज़मी ,सरदार अली जाफ़री और साहिर लुधियानवी पर एक समीक्षात्मक किताब मुलाकातें भी निदा फ़ाज़ली ने लिखी है |सन 1946 में जीविका की तलाश में निदा फ़ाज़ली मुम्बई का रुख करते हैं ,मुम्बई में प्रारम्भिक दिनों में धर्मयुग और ब्लिट्ज में आलेख भी लिखते हैं |मुम्बई में रहते हुए मुशायरों में भी बेहद लोकप्रियता हासिल करते हैं |रज़िया सुल्तान के निर्माण के समय शायर जानिसार अख्तर के निधन के बाद फिल्म निर्माता कमाल अमरोही ने इन्हें गीत लिखने के लिए अवसर दिया ये गीत काफी लोकप्रिय भी हुए |इसके बाद आज तक इनके फ़िल्मी गीत लेखन का सफ़र जारी है |निदा फ़ाज़ली को 1998 में साहित्य के लिए साहित्य एकेडमी सम्मान दिया गया |इसके आलावा कई पुरस्कारों और सम्मानों[ जिनमें फ़िल्मी पुरस्कार भी शामिल हैं ]सम्मानित यह शायर आज देश की सरहदों के बाहर भी लोकप्रियता के शिखर पर है |निदा फ़ाज़ली की शायरी की भाषा आम आदमी को भी समझ में आ जाती है ,यह कवि /शायर सहज भाषा में गूढ़ से गूढ़ बात कहने में माहिर है |निदा फ़ाज़ली की कुछ प्रमुख कृतियाँ -लफ्जों के फूल ,मोर नाच ,आँख और ख़्वाब के दरमियाँ ,सफ़र में धूप तो होगी ,खोया हुआ सा कुछ आदि |आज हम  निदा फ़ाज़ली की कुछ रचनाओं से आपका परिचय करा रहे हैं हालाँकि इनसे आप भी अपरिचित नहीं हैं |
निदा फ़ाज़ली की कलम से -
ग़ज़लें 
एक 
सफ़र में धूप तो होगी ,जो चल सको तो चलो 
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो 

यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता 
मुझे गिरा के अगर तुम सम्हल सको तो चलो 

हर इक सफ़र को है महफूज़ रास्तों की तलाश 
हिफ़ाज़तों की रिवायत बदल सको तो चलो 

यही है ज़िन्दगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें 
इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो 

किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं 
तुम अपने आप को खुद ही बदल सको तो चलो 
दो 
कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता 
कहीं जमीं तो कहीं आस्मां नहीं मिलता 

बुझा सका है भला कौन वक्त के शोले 
ये ऐसी आग है जिसमें धुआँ नहीं मिलता 

तमाम शहर में ऐसा नहीं खुलूस न हो 
जहाँ उम्मीद हो इसकी वहाँ नहीं मिलता 

कहाँ चराग़ जलाएँ कहाँ गुलाब रखें 
छतें तो मिलती हैं लेकिन मकाँ नहीं मिलता 

ये क्या अज़ाब है सब अपने आप में गुम हैं 
जुबाँ मिली है मगर हमजुबाँ नहीं मिलता 

चराग़ जलते ही बिनाई बुझने लगती है 
खुद अपने घर में ही घर का निशाँ नहीं मिलता 
तीन 
अपना ग़म ले के कहीं और न जाया जाए 
घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाए 

बाग़ में जाने के आदाब हुआ करते हैं 
किसी तितली को न फूलों से उड़ाया जाए 

खुदकशी करने की हिम्मत नहीं होती सबमें 
और कुछ दिन अभी औरों को सताया जाए 

घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें 
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए 
चार 
अब खुशी है न कोई दर्द रुलाने वाला 
हमने अपना लिया हर रंग ज़माने वाला 

एक बेचेहरा -सी उम्मीद है चेहरा -चेहरा 
जिस तरफ़ देखिए आने को है आने वाला 

उसको रुख्शत तो किया था मुझे मालूम न था 
सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला 

दूर के चाँद को ढूंढो न किसी आंचल में 
ये उजाला नहीं आंगन में समाने वाला 

इक मुसाफिर के सफ़र जैसी है सबकी दुनिया 
कोई जल्दी में कोई देर में जाने वाला 
पांच 
कुछ भी बचा न कहने को हर बात हो गई 
आओ कहीं शराब पिएँ रात हो गई 

सूरज को चोंच में लिए मुर्गा खड़ा रहा 
खिड़की के पर्दे खींच दिए रात हो गई 

वह आदमी अब कितना भला ,कितना पुरखुलूस 
उससे भी आज लीजे मुलाकात हो गई 

रस्ते में वह मिला था मैं बचकर गुज़र गया 
उसकी फटी कमीज़ मेरे साथ हो गई 

नक्शा उठा के कोई नया शहर ढूँढ़िए 
इस शहर में अब सबसे मुलाकात हो गई 
छः 
अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं 
रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं 

पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है 
अपने ही घर में, किसी दूसरे घर के हम हैं 

वक्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों से 
किसको मालूम ,कहाँ के हैं किधर के हम हैं 

जिस्म से रूह तलक अपने कई आलम हैं 
कभी धरती के कभी चाँद नगर के हम हैं 

चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब 
सोचते रहते हैं ,किस राहगुज़र के हम हैं 

गिनतियों में ही गिने जाते हैं हर दौर में हम 
हर क़लमकार की बेनाम ख़बर के हम हैं 

निदा फ़ाज़ली के कुछ दोहे 
सबकी पूजा एक सी ,अलग -अलग हर रीत 
मस्जिद जाए मौलवी ,कोयल गाए गीत 

पूजा -घर में मूरती ,मीरा के संग श्याम 
जितनी जिसकी चाकरी ,उतने उसके दाम 

सीता -रावण ,राम का ,करें बिभाजन लोग 
एक ही तन में देखिए ,तीनों का संजोग 

माटी से माटी मिले ,खो के सभी निशान 
किसमें कितना कौन है ,कैसे हो पहचान 

सात समुन्दर पार से कोई करे व्यापार 
पहले भेजे सरहदें ,फिर भेजे हथियार 

चाकू काटे बांस को ,बंसी खोले भेद 
उतने ही सुर जानिए ,जितने उसमें छेद 

बच्चा बोला देखकर ,मस्जिद आलीशान 
अल्ला तेरे एक को ,इतना बड़ा मकान 

जादू टोना रोज़ का ,बच्चों का व्यवहार 
छोटी सी एक गेंद में भर दें सब संसार 

मैं रोया परदेश में ,भींगा माँ का प्यार 
दुःख ने दुःख से बात की ,बिन चिट्ठी बिन तार 

सातो दिन भगवान के क्या मंगल क्या पीर 
जिस दिन सोये देर तक भूखा रहे फ़कीर 

सीधा -सादा डाकिया जादू करे महान 
एक ही थैले में भरे ,आँसू और मुस्कान 
निदा फ़ाज़ली की हस्तलिपि में दो ग़ज़लें  [हस्तलिपि उपलब्ध कराने हेतु गुफ़्तगू की सम्पादक नाज़िया गाज़ी जी का विशेष आभार -