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गुरुवार, 27 सितंबर 2012

जनसंघर्ष ,विद्रोह और विविधता के कवि -जनकवि नागार्जुन

जनकवि -नागार्जुन 
समय -[30-06-2011से 05-11-1998]

वे लोहा पीट रहे हैं 
तुम मन को पीट रहे हो 
वे पत्तर जोड़ रहे हैं 
तुम सपने जोड़ रहे हो 
उनकी घुटन ठहाकों में घुलती है 
और तुम्हारी 
उनींदी घडियों में चुरती है -----
                                                         नागार्जुन 
परिचय 
नागार्जुन हिंदी कविता में एक विलक्षण कवि हैं |वह जिस खाँचे में फिट बैठते उसका निर्माण या सृजन स्वंय उन्होंने ही किया है |जिस तरह छायावाद के कवियों में प्रसाद ,निराला ,पन्त और महादेवी को महत्वपूर्ण माना जाता है उसी तरह प्रयोगवादी कवियों में शमशेर ,त्रिलोचन ,केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन को माना जाता है |नागार्जुन किसान ,मजदूरों ,छात्रों के आंदोलनों के साथ -साथ बहुत बड़े राजनीतिक कवि भी माने जाते हैं |जनकवि नागार्जुन रूप और विविधताओं के कवि हैं | जनसंघर्षों के कवि हैं |इनकी कवितायें बिना किसी लाग -लपेट के सीधे व्यवस्था की पीठ पर हंटर बरसाती हैं |विद्द्वता के साथ -साथ इनकी कविताओं में सादगी और सरलता भी है | नागार्जुन का जन्म 30-06-1911 को दरभंगा जिले [बिहार ] के सतलखा के पास तरौनी ग्राम में हुआ था | इस महान कवि का निधन 05-11-1998 को हुआ | बचपन में इनका नाम वैद्यनाथ मिश्र था ,किन्तु बाद में बौद्ध धर्म की ओर रुझान होने के कारण इन्होनें अपना नाम नागार्जुन रख लिया |नागार्जुन बचपन में मैथिली में यात्री नाम से कविताएँ लिखा करते थे |नागार्जुन का बचपन बहुत ही संघर्षपूर्ण था |इन्होने काफी यात्रायें की इन्हीं यात्राओं के दौरान श्रीलंका पहुंचे वहां इन्होनें बौद्धों को संस्कृत पढ़ाया और उनसे पालि भाषा सीखी |सन 1941 में भारत लौट आये |नागार्जुन की प्राथमिक शिक्षा संस्कृत पाठशाला में हुई ,आगे की पढ़ाई जारी नहीं रह पाई |नागार्जुन को हिंदी ,संस्कृत ,पालि ,बांग्ला भाषाओं का अच्छा ज्ञान था | नागार्जुन का लेखन गद्य और पद्य दोनों में हुआ | कृतियाँ -उपन्यास -रतिनाथ की चाची ,बलचनमा ,नई पौध ,बाबा बटेसरनाथ ,दुःखमोचन और वरुण के बेटे |काव्य -युगधारा ,सतरंगे पंखोंवाली ,प्यासी पथराई आँखें ,खून और शोले ,हजार-हजार बाँहों वाली ,तुमने कहा था ,भस्मासुर इनके द्वारा रचित खण्ड काव्य है | तमाम पुरस्कारों और सम्मानों से सम्मानित नागार्जुन को साहित्य अकादमी सम्मान ,भारत -भारती सम्मान ,मध्य प्रदेश सरकार का कबीर सम्मान और बिहार सरकार का राजेन्द्र प्रसाद सम्मान प्रमुख रूप से मिला था |साहित्य अकादमी फेलोशिप भी इनको दी गयी थी | आज हम इस जनवादी कवि की कुछ कवितायें सुनहरी कलम के माध्यम से आप तक पहुंचा रहे हैं |

कवि -नागार्जुन की एक विशिष्ट फोटो |यह फोटो हमें  स्वामी      -   
 सहजानन्द  सरस्वती संग्रहालय अ० म० गाँधी हिंदी विश्व विद्यालय 
 से प्राप्त हुआ है अतः हम हिंदी विश्व विद्यालय के प्रति आभारी हैं 
जनकवि नागार्जुन की कविताएँ 
एक 
अकाल और उसके बाद 
कई दिनों तक चूल्हा रोया 
चक्की रही उदास 
कई दिनों तक 
कानी कुतिया सोई उनके पास 
कई दिनों तक लगी 
भीत पर छिपकलियों की गश्त 
कई दिनों तक 
चूहों की भी हालत रही शिकस्त 

दाने आए घर के अंदर 
कई दिनों के बाद 
धुआं उठा आंगन से उपर 
कई दिनों के बाद 
चमक उठी घर -भर की 
ऑंखें कई दिनों के बाद 
कौए ने खुजलाई पांखें 
कई दिनों के बाद 

दो 
कालिदास 
कालिदास सच -सच बतलाना !
इंदुमती के मृत्यु शोक से 
अज रोया या तुम रोए थे ?
कालिदास ,सच -सच बतलाना !

शिवजी की तीसरी आँख से 
निकली हुई महाज्वाला में 
घृत मिश्रित सूखी समिधा -सम 
कामदेव जब भस्म हो गया 
रति का क्रन्दन सुन आंसू से 
तुमने ही तो दृग धोए थे ?
कालिदास ,सच -सच बतलाना 
रति रोई या तुम रोए थे ?

वर्षा ऋतु की स्निग्ध भूमिका 
प्रथम दिवस आषाढ़ मास का 
देख गगन में श्याम घन -घटा 
विधुर यक्ष का मन जब उचटा 
खड़े -खड़े तब हाथ जोड़कर 
चित्रकूट के सुभग शिखर पर 
उस बेचारे ने भेजा था 
जिनके ही द्वारा संदेशा 
उन पुष्करावर्त मेघों का 
साथी बनकर उड़नेवाले 
कालिदास ,सच -सच बतलाना 
परपीड़ा से पूर् -पूर हो 
थक -थककर  औ' चूर -चूर हो 
अमल -धवल गिरि के शिखरों पर 
प्रियवर ,तुम कब तक सोये थे ?
रोया यक्ष कि तुम रोए थे ?
कालिदास ,सच -सच बतलाना !

तीन 
जनकवि 
मैं भी तो पहले देखा करता था सपने 
साथी अब तो रंग -ढंग ही बदल गए हैं 
समझ गया हूँ 
जीवन में इस धरा- धाम का क्या महत्व है 
कैसे कहलाता कोई धरती का बेटा 
आसमान में सतरंगी बादल पर चढ़कर 
कैसे जनकवि धान रोपता 
समझ गया हूँ 
कैसे जनकवि जमींदार के उन अमलों को मार भागता 
हरे बांस की हरी -हरी वह लाठी लेकर !

चार 
बहुत दिनों के बाद 
बहुत दिनों के बाद 
अब की मैंने जी -भर देखी 
पकी सुनहली फसलों की मुसकान 
बहुत दिनों के बाद 

बहुत दिनों के बाद 
अब की मैं जी -भर सुन पाया 
धान कूटती किशोरियों की कोकिल कंठी तान 
बहुत दिनों के बाद 

बहुत दिनों के बाद 
अब  की मैंने जी- भर सूंघे 
मौलसिरी के ढेर -ढेर से ताजे टटके फूल 
बहुत दिनों के बाद 

बहुत दिनों के बाद 
अब की मैं जी- भर छू पाया 
अपनी गंवई पगडंडी की चंदनवर्णी धूल 
बहुत दिनों के बाद 

बहुत दिनों के बाद 
अब की मैंने जी भर तालमखाना खाया 
गन्ने चूसे जी -भर 
बहुत दिनों के बाद 

बहुत दिनों के बाद 
अब की मैंने जी भर-भोगे 
गंध -रूप -रस -शब्द -स्पर्श सब साथ -साथ इस भू पर 
बहुत दिनों के बाद |

पांच 
बादल को घिरते देखा है 
अमल धवलगिरि के शिखरों पर 
बादल को घिरते देखा है |
छोटे -छोटे मोती जैसे 
उसके शीतल तुहिन कणों को ,
मानसरोवर के उन स्वर्णिम 
कमलों पर गिरते देखा है 
बादल को घिरते देखा है |

तुंग्ग हिमालय के कंधों पर 
छोटी -बड़ी कई झीलें हैं ,
उनके श्यामल -नील सलिल में 
समतल देशों से आ -आकर 
पावस की उमस से आकुल 
तिक्त -मधुर बिस -तंतु खोजते 
हंसों को तिरते देखा है 
बादल को घिरते देखा है |

ऋतु बसंत का सुप्रभात था 
मंद -मंद था अनिल बह रहा 
बालारुण की मृदु किरणें थीं 
अगल -बगल स्वर्णाभ शिखर से 
एक दूसरे से विरहित हो 
अलग -अलग रहकर ही जिनको 
सारी रात बितानी होती ,
निशाकाल के चिर -अभिशापित 
बेबस उन चकवा -चकई का 
बंद हुआ क्रंदन ,फिर उनमें 
उस महान सरवर के तीरे 
शैवालों की हरी दरी पर 
प्रणय -कलह छिड़ते देखा है 
बादल को घिरते देखा है |

दुर्गम बर्फानी घाटी में
शत -सहस्त्र फुट ऊंचाई पर 
अलख नाभि से उठनेवाले 
निज के ही उन्मादक परिमल -
के पीछे धावित हो -होकर 
तरल तरुण कस्तूरी मृग को 
अपने पर चिढ़ते देखा है 
बादल को घिरते देखा है |

कहाँ गया धनपति कुबेर वह 
कहाँ गई उसकी वह अलका 
नहीं ठिकाना कालिदास के 
व्योम प्रवाही गंगाजल का ,
ढूंढा बहुत परन्तु लगा क्या 
मेघदूत का पता कहीं पर ,
कौन बताए वह छायामय 
बरस पड़ा होगा न यहीं पर ,
जाने दो ,वह कवि कल्पित था ,
मैंने तो भीषण जाड़ों में 
नभ -चुम्बी कैलाश शीर्ष पर 
महामेघ को झंझानिल से 
गरज -गरज भिड़ते देखा है ,
बादल को घिरते देखा है |

शत -शत निर्झर -निर्झरणी -कल 
मुखरित देवदारु कानन में ,
शोणित -धवल भोजपत्र से 
छाई हुई कुटी के भीतर ,
रंग -बिरंगे और सुगंधित 
फूलों से कुंतल को साजे ,
इन्द्रनील की माला डाले 
शंख -सरीखे सुघड़ गलों में ,
कानों में कुवलय लटकाए ,
शतदल लाल कमल वेणी से ,
रजत -रचित मणि -खचित कलामय 
पानपात्र द्राक्षासव -पूरित 
रखे सामने अपने -अपने 
लोहित चंदन की त्रिपदी पर 
नरम निदाग बाल -कस्तूरी -
मृगछालों पर पल्थी मारे 
मदिरारुण आंखोंवाले उन 
उन्मद किन्नर -किन्नरियों की 
मृदुल मनोरम अँगुलियों को 
वंशी पर फिरते देखा है 
अमल धवलगिरि के शिखरों पर 
बादल को घिरते देखा है |

छः 
नागार्जुन की मैथिली भाषा में एक कविता 
भोरे -भोर 
भोरे -भोर
आएल छी बूलि 
दुबिआही लाँन में 
भोरे -भोर 
आएल छी धांगी 
पथार मोतीक भोरे -भोर 
क 'आएल छी अनुभव 
पुलकित होइत छइ रोम -रोम 
स्पर्शक प्रतापें कोना -कोना 
भोरे -भोर 
पैरक दुहू तरबाक ग'ह द'ने 
आएल छी पीवि 
माघी आकाशक हेमाल ओस 
भोरे -भोर 
आएल छी बूलि 
दुबिआही लाँन में

सात  
जनकवि नागार्जुन की हस्तलिपि -यह हस्तलिपि हमें स्वामी सहजानन्द सरस्वती संग्रहालय म० गाँधी अ० हिंदी विश्व विद्यालय से प्राप्त हुई है |इसे उपलब्ध कराने के लिए हम प्रो० संतोष भदौरिया जी के विशेष आभारी हैं -


जनकवि नागार्जुन की हस्तलिपि 


सुनहरी कलम से -
जनकवि नागार्जुन भारतीय समाज की वर्गीय संरचना की बारीकियों और जटिलताओं को जितनी स्पष्टता से पहचानते हैं उतनी ही सहजता ,निर्भीकता और पक्षधरता के साथ व्यक्त भी करते हैं |ऐसे प्रसंगों में भी वे दुविधा और असमंजस की भाषा नहीं बोलते |वे मध्यवर्ग के दंभ और तुनुकमिजाजी को खूब समझते हैं ,इसलिए मजदूरों से दूरी बनाये रखने की उनकी आदत पर व्यंग्य करते हुए मजा लेते हैं |.......नागार्जुन जैसे समाज की कविता लिखते हुए साधारण आदमी का विशेष ध्यान रखते हैं वैसे ही प्रकृति की कविता लिखते हुए प्रकृति के उन साधारण रूपों ,वस्तुओं ,स्थितियों और जीवों पर कविता लिखते हैं जिनपर दूसरा कोई प्रकृति प्रेमी कवि न लिखता है न लिखने के बारे में सोचता है |.....नामवर सिंह ठीक कहते हैं कि नागार्जुन की गिनती न तो प्रयोगशील कवियों के संदर्भ में होती है ,न नई कविता के प्रसंग में ;फिर भी कविता में रूप संबंधी जितने प्रयोग अकेले नागार्जुन ने किए हैं ,उतने शायद ही किसी ने किए हों |कविता की उठान तो कोई नागार्जुन से सीखे और नाटकीयता में तो वे लाजवाब ही हैं |जैसी सिद्धि छंदों में ,वैसा ही अधिकार बेछ्न्द या मुक्त छंद की कविता पर |उनके बात करने के हजार ढंग हैं |नागार्जुन ने महाकाव्य को छोड़कर कविता के सभी रूपों का प्रयोग किया है उन्होंने कविता के रूप में एक ऐसा भी प्रयोग किया है जो अपूर्व तो है ही ,अनूठा भी है |वह प्रयोग उनकी मंत्र कविता में है |वह उत्तर आधुनिक कविता का एक नायाब नमूना है |
मैनेजर पांडेय [नागार्जुन चयनित कविताएं पुस्तक की भूमिका से ]

28 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 29/09/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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  2. आपके ब्लॉग पर वरिष्ठ कवियों, लेखकों की हस्तलिपि के चित्र एक बेहद सुखद अहसास कराते हैं.
    बहुत आभार.

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  3. जनकवि नागार्जुन की कविताएँ पढ़वाने के लिए आभार....

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  4. आदरणीया यशोदा जी ,शिखा जी आपका उत्साहवर्धन हेतु आभार |

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  5. आपका बहुत बहुत आभार ... आपके प्रयास को साधुवाद !


    कुछ बहरे आज भी राज कर रहे है - ब्लॉग बुलेटिन ब्लॉग जगत मे क्या चल रहा है उस को ब्लॉग जगत की पोस्टों के माध्यम से ही आप तक हम पहुँचते है ... आज आपकी यह पोस्ट भी इस प्रयास मे हमारा साथ दे रही है ... आपको सादर आभार !

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  6. आदरणीय भाई शिवम मिश्र जी और महेश्वरी कनेरी जी आप दोनों का आभार |

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  7. ब्‍लॉगों के बियाबान में अलग एकदम
    प्रिय रचनाकारों का अनोखा अलबम

    लिपि की बानगी संग रचना-प्रस्‍तुति
    संकल्‍पना-प्रस्‍तुति स्‍मरणीय हरदम

    तृप्तिकर सदा इस ब्‍लॉग पर आगमन
    सचमुच विशिष्‍ट यह 'सुनहरी कलम'

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  8. आभार बाबा के परिचय और उत्कृष्ट रचनाओं को हम तक पहुँचाने का

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  9. नागार्जुन को पढ़ना भाव प्रवाह उत्पन्न कर देता है।

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  10. नागार्जुन ज़मीन से जुड़े कवि रहे हैं ... उनकी हर कविता अपने आस पास की बुनी लगती है ... बादल को घिरते देखा है कभी पूरी नहीं पढ़ी थी ... यहाँ पढ़वाने के लिए आभार

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  11. तुषार जी कुछ ऐसा इतेफाक़ रहा की हम बहुत से श्रेष्ठ कवियों की रचनाओं को नहीं पढ़ पाए हैं....ये हमारा बहुत बड़ा दुर्भाग्य हैं...जानते हैं..लेकिन आज आपकी पोस्ट पर आकर जो अमृत पान किया है ...अन्दर से तृप्ति हो रही है ...आपका शत शत आभार..नार्गार्जुन जी की इतनी सुन्दर रचनायें हमें पढ़ाने के लिए ....

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  12. कवी नागार्जुन के परिचय एवं कविताये पढ़वाने के लिए आभार...
    :-)

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  13. नागार्जुन जी की यह सभी कविताएं संगृहणीय हैं।

    सादर

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  14. सार्थक हुआ आज का दिन और इस ब्लॉग पर आना दोनों श्री तुषार जी के प्रति कृतज्ञ हूँ !

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  15. कई दिनों तक चूल्हा रोया
    चक्की रही उदास
    कई दिनों तक
    कानी कुतिया सोई उनके पास.

    दर्द झर रहा हो ज्यों, क्या कहूँ शब्द नहीं है.

    तुषार जी आपकी यह श्रंखला अदभुत है. इसको सतत चलायें, यही अनुरोध है. बहुत कुछ सीखने समझने और जानने को मिलता है. आभार.

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  16. आप सभी का स्नेह बना रहा तो यह ब्लॉग भी चलता रहेगा |आप सभी का दिल से आभार |

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  17. बहुत ही लाजवाब संकलन है छवि का और हस्तलिपी का भी।
    सारी कविताएं नागार्जुन की रचना संसार का प्रितिनिधित्व करती हैं।

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  18. अग्रज मनोज जी आपका बहुत -बहुत आभार |

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  19. बेहतरीन...हस्तलेखन ने अभिभूत कर दिया!! आभार मित्र!!

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  20. अमल धवलगिरि के शिखरों पर
    बादल को घिरते देखा है |

    बहुत आभार ...इस संग्रहणीय पोस्ट के लिए ॥मैंने तो बुक मार्क कर लिया है ....कई बार पढ़ूँगी....बहुत आभार तुषार जी ...

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  21. बहुत सुंदर,
    बढिया लगा या यूं कहें कि आज का दिन सार्थक हो गया



    कभी समय मिले तो मेरे नए ब्लाग TV स्टेशन.. को देखिएगा.

    http://tvstationlive.blogspot.in/

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  22. बहुत बहुत शुक्रिया,इन कविताओं को यहाँ संकलित करने का.

    उनकी कई कविताएँ तो कंठस्थ हैं, अच्छा लगा,इन कविताओं को पढना.

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  23. अमल धवलगिरि के शिखरों पर
    बादल को घिरते देखा है |
    यह रचना मैंने ओशो की किताब में बहुत बार पढ़ा है
    लेकिन कवि का परिचय मुझे नहीं था जो आपने दिया है
    आभार तुषार जी,

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  24. तुम मन को पीट रहे हो
    वे पत्तर जोड़ रहे हैं
    तुम सपने जोड़ रहे हो .....bahut sari rachnaon ko padhwane ke liye tushar jeee aapko bahut-bahut dhanyavad ...

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  25. BABA KI SABHI KAVITAYEN PADHI HAIN.. LEKIN EK BAAR PHIR PADH KAR MAN UDWELIT HO GAYA... YAH SAMAY KUCH AKAL KE SAMAY SA HAI.. EMERGENCY KE SAMAY SA HAI LEKIN AAJ KE KAVIYON ME WAH CHETNA KAHAN...

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  26. वास्तव मे नागार्जुन ने जितने प्रयोग कविता मे किए है उतने किसी और ने नहीं किए । नागार्जुन की सादगी भी प्रभावशाली बन पडती हैं ।

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