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शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

हिंदी गीत /नवगीत के निराला - कवि -माहेश्वर तिवारी

वरिष्ठ नवगीत कवि -माहेश्वर तिवारी 
सम्पर्क -09456689998
खत्म नहीं होगा 
वसंत का आना यह 
हर बार |

खत्म नहीं होगा 
पलाश के फूलों वाला रंग ,
पतझारों को रौंद 
विहंसने- गाने का यह ढंग ,

खत्म नहीं होगा 
मनुष्य से 
फूलों का व्यवहार ---
             माहेश्वर तिवारी 
परिचय -
हिंदी नवगीत में पांच जोड़ बाँसुरी के प्रकाशन के पूर्व से ही जिस गीत कवि के गीतों की बाँसुरी हिंदी साहित्य और मंच को अपनी लयात्मकता और गीतात्मकता से मन्त्र मुग्ध कर रही थी ,जिस कवि ने हिंदी गीत को नवगीत का कलेवर धारण करते हुए देखा हो  या उसमें खुद उसकी भी भूमिका रही हो और आज भी जो गीत कवि अपने समय को अपने मानक नवगीतों से रेखांकित कर रहा हो | जिसके डमरू से छन्द अनायास कविता का रम्य रूप धारण कर लेते हों उस महान नवगीतकार का नाम माहेश्वर तिवारी ही हो सकता है | माहेश्वर तिवारी का जन्म एक जमींदार परिवार में[22-07-1939] गांव मलौली जिला बस्ती उत्तर प्रदेश में हुआ था | इनके पिता का नाम स्व० श्याम बिहारी तिवारी माँ का नाम स्व० चन्द्रावती तिवारी था |माहेश्वर जी की धर्मपत्नी श्रीमती विशाखा तिवारी संगीत की शिक्षिका हैं शौक वश कवितायें भी लिख लेती हैं | माहेश्वर तिवारी की शिक्षा एम० ए० हिंदी [गोरखपुर विश्व विद्यालय] है | माहेश्वर तिवारी सदानीरा नदी के बहते हुए जल की तरह जीवन के मध्यान्ह तक बहते रहे यह बहाव कभी गोरखपुर कभी बनारस कभी विदिशा कभी होशंगाबाद ले जाता रहा आखिर में उन्हें पीतलों का  शहर मुरादाबाद रास आया और वह यहीं स्थाई रूप से रच - बस गए |माहेश्वर जी मूलतः यायावर कवि हैं प्रकृति और जीवन के विविध रंग इनके नवगीतों में समाहित हैं |एक विशिष्ट बात तिवारी जी के साथ यह रही कि लगतार हिंदी कविता मंचों पर काव्य पाठ करने के बावजूद इन्होनें नवगीत को नवगीत ही रहने दिया |उन्हें फूहड़ और मंचीय नहीं होने दिया | मंचों पर भी ये पन्त ,महादेवी ,बच्चन ,नेपाली ,भवानी प्रसाद मिश्र ,सर्वेश्वरदयाल सक्सेना के काव्य पाठ के साक्षी रहे |पांच जोड़ बाँसुरी [संपादन चन्द्रदेव सिंह और महेन्द्र शंकर अधीर ने किया था ] के पहले कलकत्ता से एक सप्तक और प्रकाशित हुआ था जिसमें माहेश्वर तिवारी एक प्रमुख नवगीतकार थे |इसके अतिरिक्त गीतायन ,यात्रा में साथ -साथ नवगीत दशक दो और नवगीत अर्द्धशती में माहेश्वर तिवारी के नवगीत संकलित हैं |इनका प्रथम स्वतंत्र नवगीत संकलन हरसिंगार कोई तो हो [1981] में प्रकाशित हुआ इसके बाद के संकलन हैं नदी का अकेलापन ,फूल आये हैं कनेरों में ,और सच की कोई शर्त नहीं |माहेश्वर तिवारी के नवगीत समय -समय पर देश की प्रतिष्ठित पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं |उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की साहित्यिक पत्रिका साहित्य भारती का अतिथि सम्पादन भी इन्होंने किया है |उत्तर प्रदेश के प्रतिष्ठित साहित्य भूषण सम्मान ,परिवार सम्मान के अतिरिक्त कई सम्मानों से सम्मानित इस कवि की आवाज को आकाशवाणी दिल्ली के केन्द्रीय संग्रहालय में 'रचनात्मकता और आत्मकथात्मक 'विषय पर साक्षात्कार को धरोहर के रूप में संग्रहीत किया गया है या सुरक्षित रखा गया है |यह साक्षात्कार 14-08-2012  को लिया गया | हम माहेश्वर तिवारी जी  के शतायु होने की कामना करते हुए उनके कुछ गीत /नवगीत आप तक पहुँचा रहे हैं |
माहेश्वर तिवारी के गीत /नवगीत 
एक 
राजा चुप है 
रानी चुप है 
ठिठकी हुई कहानी चुप है |

कालिदास 
अब भी 
उज्जयिनी में 
रहते हैं !
देख रहे हैं 
सब कुछ 
लेकिन कुछ भी 
कभी नहीं कहते हैं 

मेघदूत आते हैं 
अब भी ,
शब्द मौन हैं ,
बानी चुप है |

उज्जयिनी में 
सब है केवल 
न्याय नहीं है ,
पर जीने का 
कोई और उपाय 
नहीं है ,

भीतर चीखें हैं 
क्रन्दन है 
पर आँखों का 
पानी चुप है |

दो 
वैशाली के लोग 
नहीं अब 
वैशाली में हैं |
और -और हैं 

वे जो ,अब भी 
वहीँ कहीं रहते हैं 
कतराते खुद से 
धारा में 
अलग -अलग 
बहते हैं 
अपने ही भग्नावशेष से 
बदहाली में हैं |

इतिहासों के 
कूड़ाघर में 
पड़ी आम्रपाली .
बुद्धं शरणम को 
अगोरती 
स्मृतियाँ काली ,

मंत्रि परिषदें ,गणाध्यक्ष 
बस खुशहाली में हैं |

तीन 
पढ़ने -लिखने का 
काशी में 
नहीं रिवाज रहा |

उजड़ चुकीं 
संगीत सभाएँ 
ठहरे हैं संवाद 
लोग बाग 
मिलते आपस में 
कई दिनों के 
बाद 

गंगा सूख रही 
लहरों का टूटा साज रहा |

श्रेष्ठिजनों ,भूखों में 
बस्ती का है 
बंटा समाज 
सड़कों -गलियों में 
शव रखकर 
भाग रहे सब 
आज |

पहले जैसा अब 
काशी का नहीं समाज रहा |

चार 
तक्षशिला से 
लौट रहे हैं 
नालन्दा के लोग |

समझ चुके हैं 
नगर -नगर है 
केवल वही समाज ,
भद्रजनों का 
चेहरा पहने 
वही तख़्त या ताज ,
बहुत कर चुके 
बीते कल से 
अब तक नए प्रयोग |

लौट रहे 
लोगों में भी 
अब नहीं रहा संवाद ,
बस इतना -सा 
परिवर्तन 
लोगों को केवल याद |
जहाँ कहीं भी 
गए घटा है 
वहीँ -वहीँ संयोग |

पांच 
खुद से खुद की 
बतियाहट हम 
लगता भूल गए |

डूब गए हैं 
हम सब इतने 
दृश्य -कथाओं में ,
स्वर कोई भी 
बना नहीं है शेष,
हवाओं में ,
भीतर के मन की 
आहट हम 
लगता भूल गए |

रिश्तों वाली 
पारदर्शिता लगे 
कबन्धों -सी ,
शामें लगती हैं 
थकान से टूटे 
कन्धों -सी ,
संवादों की 
गरमाहट हम 
लगता भूल गए |

छः 
हरियल शाखों में 
अब भी कुछ सपने जाग रहे हैं |

कुछ चिड़ियों के 
कुछ फूलों के 
कुछ -कुछ आदम -
कद भूलों के 
आँखों -आँखों में 
अब भी कुछ सपने जाग रहे हैं |

ताना कुछ आगामी 
कल के 
कुछ ऊंचाई और 
अतल के 
सुलगी राखों में 
अब भी कुछ सपने जाग रहे हैं |

मलयानिल के कुछ 
आंधी के ,
कुछ सोने के 
कुछ चांदी के 
बन्द सलाखों में 
अब भी कुछ सपने जाग रहे हैं |

सात 
याद तुम्हारी जैसे कोई 
कंचन -कलश भरे |
जैसे कोई किरन अकेली 
पर्वत पार करे |

लौट रही गायों के 
संग -संग 
याद तुम्हारी आती ,
और धूल के 
संग -संग 
मेरे माथे को छू जाती ,
दर्पण में अपनी ही छाया- सी 
रह -रह उभरे 
जैसे कोई हंस अकेला 
आंगन में उतरे |

जब इकला कपोत का 
जोड़ा 
कंगनी पर आ जाये ,
दूर चिनारों के 
वन से 
कोई वंशी स्वर आये ,
सो जाता सूखी टहनी पर 
अपने अधर धरे 
लगता जैसे रीते घट से 
कोई प्यास हरे |
आठ -माहेश्वर तिवारी की हस्तलिपि में एक नवगीत

11 टिप्‍पणियां:

  1. माहेश्वर तिवारी जी को जानना तथा उन्हें पढ़ना बहुत अच्छा लगा..आभार..

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  2. बहुत खूब....तिवारी जी की रचना पढ़ कर बहुत अच्छा लगा

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  3. अहा पढ़कर आनन्द आ गया, परिचय का आभार..

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  4. आप इस शृंखला में लेखको और कवियों का परिचय करवाते है वह एक अत्यंत सराहनीय कार्य है और इसके लिये आपको जितनी बधाई दी जय कम है.

    आज की कड़ी पढकर भी मज़ा आ गया. धन्यबाद.

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  5. वाह!
    आपकी इस ख़ूबसूरत प्रविष्टि को कल दिनांक 24-09-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-1012 पर लिंक किया जा रहा है। सादर सूचनार्थ

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  6. आदरणीय मिश्र जी आपका बहुत -बहुत आभार |

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  7. एक महान नवगीतकार से परिचय प्राप्त हुआ।
    और कई बेहतरीन नवगीत पढ़ने का आनंद भी लूटा।

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  8. सार्थक बोध परक भावाभि -व्यक्ति .

    लिंक 21-
    तेरी परछाईं भी -डॉ. निशा महाराणा

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  9. उजड़ चुकीं
    संगीत सभाएँ
    ठहरे हैं संवाद
    लोग बाग
    मिलते आपस में
    कई दिनों के
    बाद

    नवगीत के इतने सशक्त हस्ताक्षर से मिलवाया .आभार .

    इतने शहरी हो गए लोगों के(काशी ) ज़ज्बात ,

    सबके मुंह पे सिटकनी क्या करते संवाद .

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  10. इस पोस्ट को पसंद करने के लिए हम आप सभी के आभारी हैं |

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