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मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

सुप्रसिद्ध कवि यश मालवीय का काव्य संसार

कवि -यश मालवीय 
सम्पर्क -09839792402
परिचय -
हिन्दी कविता के जिस लयविहीन दौर में हम जी रहे हैं ,उस दौर में भी अगर कहीं छान्द्सिकता के बाँसुरी मधुर आवाज हमारे कानों तक पहुँच रही है तो इसका बहुत बड़ा श्रेय हमारे दौर के चर्चित कवि भाई यश मालवीय को जाता है |यश मालवीय आज के दौर में सबसे अधिक लोकप्रिय नवगीतकार हैं |यश मालवीय के गीतों में समकालीन कविता के सारे तत्व मौजूद हैं |देश की सभी प्रतिस्ठित पत्र -पत्रिकाओं में इनके गीत /नवगीत प्रकाशित होते रहते हैं |मुक्त छन्द के नाम पर आज कविता को भी आम जन से दूर करने का जो षड्यंत्र आलोचकों /कवियों द्वारा किया जा रहा है उन सबके विरुद्ध यह कवि बहुत मुस्तैदी से ताल ठोककर खड़ा है |यह कवि इन दिनों संघर्ष कर रहा है |महालेखाकार कार्यालय प्रशासन ने इनको निलम्बित कर दिया है देश के कई प्रतिष्ठित सम्मान पाने वाले इस कवि को प्रशासन की गलत नीतियों का विरोध करने का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है |यश मालवीय उस महालेखाकार कार्यालय में सेवारत हैं जहाँ सर्वेश्वरदयाल दयाल सक्सेना ,उमाकान्त मालवीय ,शिवकुटी लाल वर्मा ,केशव प्रसाद मिश्र ,जी० सी० श्रीवास्तव आदि कवियों ने अपनी लेखनी से साहित्य को समृद्ध किया है |सहज और मृदु व्यक्तित्व के स्वामी यश मालवीय देश के स्तरीय काव्य मंचों ,लाल किला और दूरदर्शन के कार्यक्रमों में शिरकत करते रहते हैं |बेहतरीन और स्तरीय मंच संचालन का हुनर भी इन्हें कवि पिता उमाकान्त मालवीय से मिला है |इनके लेखन की विधाएं नवगीत ,दोहे ,गज़ल ,व्यंग्य ,लेख आदि हैं |इनके गीतों में आम जन की छटपटाहट अभिव्यक्त होती है |घर, ऑफिस ,परिवार ,राजनीति ,व्यवस्था सभी इस कवि की कविता के विषय होते हैं |यश मालवीय का जन्म 18-07-1962 को उत्तर प्रदेश के कानपुर में हुआ था |शिक्षा -इलाहाबाद विश्व विद्यालय से स्नातक |कृतियाँ -कहो सदाशिव ,उड़ान से पहले ,एक चिड़िया अलगनी पर एक मन में ,बुद्ध मुस्कुराये [सभी नवगीत संग्रह |कृपया लाईन में आयें और सर्वर डाउन है व्यंग्य संग्रह |चिंगारी के बीज दोहा संकलन ,ताकधिनादिन और रेनी डे  बालगीत संग्रह है |निराला सम्मान [उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ]परम्परा ऋतुराज सम्मान से सम्मानित इस लोकप्रिय कवि के कुछ नवगीत और  कुछ दोहे आज  हम आपके साथ साझा कर रहे हैं |
कवि यश मालवीय अपनी पत्नी आरती मालवीय के साथ 
सुप्रसिद्ध नवगीत कवि यश मालवीय के गीत /नवगीत 
एक 
स्टेशन की किच -किच 
और हाय -हाय हुए 
हम मुगलसराय हुए |

बहुत बड़े जंक्शन की 
अपनी तकलीफ़ें हैं 
गाड़ी का शोर और 
सपनों की चीखें हैं 
सुबह की बनी रखी 
दुपहर की चाय हुए 
हम मुगलसराय हुए |

ताले -जंजीरें हैं 
नजरें शमशीरें हैं 
शयनयान में जागीं 
उचटी तकदीरें हैं 
धुन्ध -धुआँ कुहरे से 
धूप के बजाय हुए 
हम मुगलसराय हुए |

साँस -साँस मरते हैं 
दुर्घटना जीते हैं 
आग है व्यवस्था की 
आदमी पलीते हैं 
पटरी पर ही आकर 
कटी नीलगाय हुए 
हम मुगलसराय हुए |

लकड़ी से अकड़े हैं 
सर्दी से जकड़े हैं 
हम गीले कोयले से 
आग नहीं पकड़े हैं 
बिना रिजर्वेशन भी 
नींद के उपाय हुए 
हम मुगलसराय हुए |

हड्डी ही हड्डी है 
लहू -लहू लोरी है 
किस्से बलिदानी हैं 
समय की अघोरी है 
खिड़की की आँखों में 
ज्यों पन्ना धाय हुए 
हम मुगलसराय हुए |
दो 
लोग अजब हैं 
भाषण का सुख लेते हैं 
गूँगों के आगे भी 
माइक देते हैं 

तरह -तरह की हलचल है 
सरगर्मी है 
यहाँ हादसे भी तो 
उत्सवधर्मी हैं 
अपने ही दुश्मन हैं 
और चहेते हैं 

जितने चेहरे 
उससे ज्यादा शीशे हैं 
मर्ज बहुत मामूली 
ऊँची फीसें हैं 
उम्मीदों के 
नकली अंडे सेते हैं 

बादल हो तो 
चोटें गहरी -गहरी हैं 
सूरज हो तो 
ये जलती दोपहरी हैं 
इसकी -उसकी -अपनी 
गर्दन रेते हैं |
तीन 
तरह -तरह के जादू -टोने 
चलते हैं रजधानी में 
तुम क्या समझोगे लोगों का 
पुए पकाना पानी में 

दाँतों तले दबाना ऊँगली 
बड़े -बड़े आला चेहरे 
बुनते रहते हैं अपनी ही 
आँखों में जाला चेहरे 
रावण से सपने होते हैं 
इनकी रामकहानी में 

काट न पाते दिन ,
उम्मीदों से खुद ही कट जाते हैं 
रत्नजटित औजार देखकर 
आपस में बँट -बँट जाते हैं 
हम अपनी पहचान खो रहे 
झूठी बोली -बानी में 

भूल वर्णमाला जीवन की 
जाति -वर्ण को पोस रहे 
कोस रहे हैं उजियारों को 
खुद ही काले कोस रहे 
करवट लेते महल -अटारी 
टूटे छप्पर -छानी में |
चार 
गूँजता एकान्त 
कमरे चीखते हैं 

तुम नहीं हो 
नहीं चावल बीनता कोई 
पंछियों की 
मौन भाषा चीन्हता कोई ?
चहक तीखी हुई 
बेबस दीखते हैं 

मुंडेरों पर 
आंख सूनी और सूनापन 
अलगनी पर 
टांग दें क्या आज खाली मन ?
अकेले में आह !
जीना सीखते हैं 

निचुड़ता मन 
याद में भींगे अँगरखे सा 
गुज़रता दिन 
औपचारिक चले चरखे सा 
व्यर्थ अपने आप 
पर ही खीझते हैं 
पांच  
दबे पैरों से उजाला आ रहा है 
फिर कथाओं को खंगाला जा रहा है 

धुंध से चेहरा निकलता दिख रहा है 
कौन क्षितिजों पर सबेरा लिख रहा है 
चुप्पियाँ हैं जुबाँ बनकर फूटने को 
दिलों में गुस्सा उबाला जा रहा है 

दूर तक औ देर तक सोचें भला क्या 
देखना है बस फिज़ां में है घुला क्या 
हवा में उछले सिरों के बीच ही अब 
सच शगूफे सा उछाला जा रहा है 

नाचते हैं भय सियारों से रंगे हैं 
जिधर देखो उस तरफ़ कुहरे टँगे हैं 
जो नशे में धुत्त हैं उनकी कहें क्या 
होश वालों को संभाला जा रहा है 

स्थगित है गति समय का रथ रुका है 
कह रहा मन बहुत नाटक हो चुका है 
प्रश्न का उत्तर कठिन है इसलिए भी 
प्रश्न सौ -सौ बार टाला जा रहा है 

सेंध गहरी नींद में भी लग गयी है 
खीझती सी रात काली जग गयी है 
दृष्टि में है रोशनी की एक चलनी 
और गाढ़ा धुआँ चाला जा रहा है 
छः 
तुम छत से छाये 
जमीन से बिछे 
खड़े दीवारों से 
तुम घर के आंगन 
बादल से घिरे 
रहे बौछारों से 

तुम 'अलबम 'से दबे पांव 
जब बाहर आते हो 
कमरे -कमरे अब भी अपने 
गीत गुंजाते हो 
तुम बसंत होकर 
प्राणों में बसे 
लड़े पतझारों से 
तुम ही चित्रों से 
फ्रेमों में जड़े 
लदे हो हारों से 

तुम किताब से धरे मेज़ पर 
पिछले सालों से 
आँसू बनकर तुम्हीं ढुलकते 
दोनों गालों से 
तुम ही नयनों में 
सपनों से तिरे 
लिखे त्योहारों से 
तुम ही उड़ते हो 
बच्चों के हाथ 
बंधे गुब्बारों से 

यदा -कदा वह डॉट  तुम्हारी 
मीठी -मीठी सी 
घोर शीत में जग जाती है 
याद अँगीठी सी 
तुम्ही हवाओं में 
खिड़की से हिले 
बहे रस धारों से 
तुम ही फूले हो 
होंठों पर सजे 
खिले कचनारों से 
सात -यश मालवीय की हस्तलिपि में कुछ दोहे 

16 टिप्‍पणियां:

  1. हम अपनी पहचान खो रहे
    झूठी बोली -बानी में .......100%agree...vaise sari rachnayen acchi hai,,,,thanks.

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  2. एक और अच्छी प्रस्तुति |
    ध्यान दिलाती पोस्ट |
    सुन्दर प्रस्तुति...बधाई
    दिनेश पारीक
    मेरी एक नई मेरा बचपन
    http://vangaydinesh.blogspot.in/
    http://dineshpareek19.blogspot.in/

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  3. बहुत बढ़िया रचनाएँ....

    यश जी से मिलवाने का शुक्रिया.

    सादर.
    अनु

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  4. यश जी को पढ़कर अति प्रसन्नता हुई..आभार.

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  5. तरह -तरह के जादू -टोने
    चलते हैं रजधानी में
    तुम क्या समझोगे लोगों का
    पुए पकाना पानी में

    यश जी की रचनाये अच्छी लगीं

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  6. रचना और रचनाकार का परिचय पढ़ना बहुत अच्छा लगा. बहुत से विद्वान लेखक हैं जिनके बारे में हम अनभिज्ञ होते हैं. आपके द्वारा उनके बारे में जानकार प्रसन्नता हुई. धन्यवाद.

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  7. यश मालवीय जी का जीवन और रचना परिचय बहुत ही सुंदर लगा.

    धन्यबाद.

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  8. सारी कविताएं इतनी अच्छी थीं कि सुबह-सुबह पढ़कर मन खुश हो गया। यश मालवीय जी वाकई कविता के क्षेत्र के सशक्त हस्ताक्षर हैं.. शुक्रिया जयकृष्ण जी..

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  9. अद्वितीय प्रतिभा के धनी एक बेहतरीन गीतकार से परिचय कराने और उनकी अद्भुत रचनाओं को पढ़वाने के लिए आभार।

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  10. 10 वषों से यश मालवीय जी को जान रहा हूँ बढ़िया लिखते हैं कमलेश कुमार जौनपुर

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  11. यश जी की रचनाएँ अच्छी लगी, खासकर हम मुगलसराय हुए और दबे पैरों से उजाला आ रहा है


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