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शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

महाप्राण निराला की कविताएँ

महाप्राण निराला [युवावस्था में ]
समय -[21-02-1896-15-10-1961]
कल वसन्त पंचमी का दिन है और यह पवित्र दिन माँ सरस्वती के वरद पुत्र महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला का भी जन्मदिन है |वसन्त आने के बाद जिस तरह कुहासा धरती से गायब हो जाता है या छँट जाता है ,प्रकृति अपने अनुपम सौन्दर्य और विविध रंगी पुष्प गुच्छों से लदकर अवर्णनीय हो जाती है ,ठीक वही काम निराला ने हिन्दी साहित्य को समृद्ध करने में किया |महाप्राण निराला को उनके जीवन काल में वह मान सम्मान नहीं मिला जो आज उनके लिए सुरक्षित है |नवगति नव लय ताल छन्द नव की बात करने वाले महाप्राण निराला छन्द को तोड़ते भी हैं और छन्द और लय को समृद्ध भी करते हैं |अपने समय के कवियों से बहुत आगे हैं निराला |छायावाद की छाया से बाहर निकलकर  उसी समय निराला प्रगतिशील मूल्यों को भी स्थापित करते हैं| छायावाद के चार महत्वपूर्ण स्तम्भों प्रसाद ,पन्त ,महादेवी और निराला में निराला बिलकुल अलग है ,अप्रतिम हैं |निराला हिन्दी साहित्याकाश में सूर्य के सामान देदीप्यमान हैं |उनका परिचय देना यहाँ मात्र एक औपचारिकता ही है |महाप्राण निराला का जन्म 21 फरवरी 1896 को मिदनापुर पश्चिम बंगाल में हुआ था पिता का नाम पंडित रामाश्रय त्रिपाठी था |निराला का पैत्रिक गाँव गढ़ाकोला  उन्नाव उत्तर प्रदेश है |बाद में निराला जी का स्थायी आश्रय बना इलाहाबाद का दारागंज जो अब भी उनके प्रपौत्र निवास करते हैं |महाप्राण निराला बांग्ला ,हिन्दी ,संस्कृत और अंग्रेजी भाषाओँ का ज्ञान रखते थे |महाप्राण निराला का निधन 15 अक्टूबर  1961को इलाहाबाद में हुआ था |निराला जी स्वामी रामकृष्ण परमहंस ,स्वामी विवेकानन्द और गुरुदेव रविन्द्र नाथ टैगोर से प्रभावित थे |कविता ,निबन्ध कहानी और अनुवाद से हिन्दी साहित्य को समृद्ध किये |निराला जी की सभी कृतियों का नाम यहाँ देना पाना सम्भव नहीं है |उनकी कुछ प्रमुख कृतियाँ -ध्वनि ,सरोज स्मृति ,परिमल ,अनामिका ,आराधना ,तुलसीदास ,जागो फिर एक बार ,अणिमा ,अप्सरा ,निरुपमा ,नये पत्ते ,कुकुरमुत्ता ,दीवानों की हस्ती ,सुकुल की वीवी ,सखी ,लिली ,चतुरी चमार ,कुल्ली भाट ,बिलेस्सुर बकरिहा ,अनुवाद -रामकृष्ण वचनामृत ,आनन्द मठ ,विषवृक्ष ,कपालकुंडल ,दुर्गेशनंदिनी भारत में विवेकानन्द आदि | हम वसन्त पंचमी निराला के जन्मदिन पर उनकी कुछ कविताएँ आप सभी पाठकों और ब्लॉगर मित्रों तक अंतर्जाल के माध्यम से पहुँचा रहे हैं -
वसन्त पंचमी-
महाप्राण  निराला के जन्मदिन पर विशेष प्रस्तुति 
एक 
सखि ,वसन्त आया |
भरा हर्ष वन के मन ,
नवोत्कर्ष छाया |

किसलय -वसना नव -वय -लतिका 
मिली मधुर प्रिय -उर -तरु -पतिका ,
मधुप -वृन्द बन्दी-
पिक -स्वर नभ सरसाया |

लता -मुकुल -हार -गन्ध -भार भर ,
बही पवन बन्द मन्द मन्दतर ,
जागी नयनों में वन -
यौवन की माया |

आवृत्त सरसी -उर सरसिज उठे ,
केशर के केश कली के छूटे ,
स्वर्ण -शस्य -अंचल 
पृथ्वी का लहराया |
दो 
हिन्दी के सुमनों के प्रति पत्र 
मैं जीर्ण -साज बहु छिद्र आज ,
तुम सुदल सुरंग सुवास सुमन 
मैं हूँ केवल पदतल -आसन ,
तुम सहज विराजे महाराज |

ईर्ष्या कुछ नहीं मुझे ,यद्यपि 
मैं ही वसन्त का अग्रदूत ,
ब्राह्मण -समाज में ज्यों अछूत 
मैं रहा आज यदि पार्श्वच्छिवि |

तुम मध्य भाग के ,महाभाग !
तरु के उर के गौरव प्रशस्त 
मैं पढ़ा जा चुका पत्र ,न्यस्त 
तुम अलि के नव रस -रंगराग |

देखो ,पर क्या पाते तुम फल "
देगा जो भिन्न स्वाद रस भर ,
कर पार तुम्हारा भी अन्तर 
निकलेगा जो तरु का सम्बल |

फल सर्वश्रेष्ठ नायाब चीज 
या तुम बांध कर रंगा धागा :
फल के भी उर का ,कटु त्यागा ,
मेरा आलोचक एक बीज |
तीन 
वर दे ,वीणावादिनी वर दे !
प्रिय स्वतन्त्र -रव अमृत -मन्त्र नव 
भारत में भर दे !

काट अन्ध -उर के बन्धन -स्तर 
बहा जननि ज्योतिर्मय निर्झर :
कलुष -भेद -तम हर प्रकाश भर 
जगमग जग कर दे !

नव गति ,नव लय ,ताल -छन्द नव ,
नवल कंठ नव जलद -मन्द्ररव :
नव नभ के नव विहग -वृन्द को 
नव पर ,नव स्वर दे !
चार 
किनारा वह हमसे किये जा रहे हैं |
दिखाने को दर्शन दिये जा रहे हैं |

जुड़े थे सुहागिन के मोती के दाने ,
वही सूत तोड़े लिये जा रहे हैं |

छिपी चोट की बात पूछी तो बोले 
निराशा के डोरे सिये जा रहे हैं |

ज़माने की रफ़्तार में कैसे तूफां ,
मरे जा रहे हैं ,जिये जा रहे हैं |

खुला भेद ,विजयी कहाये हुए जो ,
लहू दूसरे का पिये जा रहे हैं |
पांच 
जल्द -जल्द पैर बढ़ाओ ,आओ ,आओ !
आज अमीरों की हवेली 
किसानों की होगी पाठशाला ,
धोबी ,पासी ,चमार ,तेली 
खोलेंगे अंधरे का ताला ,
एक पाठ पढेंगे ,टाट बिछाओ |

यहाँ जहाँ सेठ जी बैठे थे 
बनिये की आँख दिखाते हुए ,
उनके ऐंठाये ऐंठे थे 
धोखे पर धोखा खाते हुए ,
बैंक किसानों का खुलवाओ |

सारी संपत्ति देश की हो ,
सारी आपत्ति देश की बने ,
जनता जातीय वेश की हो ,
वाद से विवाद यह ठने ,
कांटा काँटे से कढ़ाओ |
छः 
वह तोड़ती पत्थर 
देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर 
वह तोड़ती पत्थर |

कोई न छायादार 
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार ,
श्याम तन ,भर बंधा यौवन ,
नत नयन ,प्रिय -कर्म -रत मन ,
गुरु हथौड़ा हाथ ,
करती बार -बार प्रहार -
सामने तरु मल्लिका अट्टालिका ,प्राकार |

चढ़ रही थी धूप :
गर्मियों के दिन 
दिवा का तमतमाता रूप :
उठी झुलसाती हुई लू ,
रुई ज्यों जलती हुई भू ,
गर्द चिनगी छा गयीं 
प्रायः हुई दुपहर ;-
वह तोड़ती पत्थर |

देखते देखा मुझे तो एक बार 
उस भवन की ओर देखा ,छिन्नतार :
देखकर कोई नहीं ,
देखा मुझे उस दृष्टि से 
जो मार खा रोयी  नहीं ,
सजा सहज सितार ,
सुनी मैंने वह नहीं जो थी सुनी झंकार 
एक क्षण के बाद वह कांपी सुघर ,
ढुलक माथे से गिरे सीकर ,
लीन होते कर्म में फिर ज्यों कहा -
मैं तोड़ती पत्थर !
सात -महाप्राण निराला की हस्तलिपि में एक कविता -यह हस्तलिपि निराला जी के प्रपौत्र कवि विवेक निराला जी से हमें प्राप्त हुई है |विवेक निराला जी का आभार
महाप्राण निराला से जुड़ी वस्तुएँ और वस्त्र उनकी पचासवीं पुण्यतिथि 15-10-2011को  एक कार्यक्रम में इलाहाबाद संग्रहालय को भेंट किया गया |सबसे बाएँ प्रोफेसर दूधनाथ सिंह मध्य में इलाहाबाद संग्रहालय के निदेशक राजेश पुरोहित उनके पुरोहित जी के बगल में रामकृष्ण त्रिपाठी निराला जी के प्रपौत्र और कवि मंगलेश डबराल 

17 टिप्‍पणियां:

  1. निराला ने जाने कितनों को कवि बना डाला, वह तोड़ती पत्थर पढ़ पहली कविता लिखी थी हमने भी..

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  2. निराला को पढ़ पढकर ही बड़े हुए हैं.उनकी हस्तलिपि में कविता देख बहुत सुखद लगा.आभार.

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  3. इस विशेष प्रस्तुति के लिए हार्दिक आभार!

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  4. निराला से जुड़कर यह पोस्ट भी निराला हौ गया है।

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  5. इस विशेष प्रस्तुति के लिये कुछ भी कहना मुनासिब नही, बस अनुपम !

    अर्श

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  6. वसंतोत्सव पर सुन्दर प्रस्तुति.

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  7. बसंत पर्व पर बेहतरीन प्रस्‍तुति।

    निराला जी को नमन।

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  8. निराला जी की रचना के लिए आपका आभार .
    वसंत पंचमी की हार्दिक शुभ कामनाएँ ....

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  9. nirala ji ki itni sari rachnaye ek sath padhne ko mili aap bdhai ke paatr hai ....bahut -2 shukriya

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  10. http://gauvanshrakshamanch.blogspot.com/

    गौ रक्षा करने की जाग्रति हेतु एक ब्लॉग का निर्माण किया है ,आप सादर आमंत्रित है सदस्य बनने और अपने विचार /सुझाव/ लेख /कविता रखने के लिए ,अवश्य पधारियेगा.......

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  11. वसंत पंचमी के दिन इस महान कवि को स्मरण करने के लिए साधुवाद! उनकी अमर रचना 'वर दे वीणावादिनी वर दे' कौन भूल सकता है।

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  12. निराला जी एक महान कवि थे,..उनको मेरा नमन,....
    निराला जी की प्रस्तुति अच्छी लगी.,
    welcome to new post --काव्यान्जलि--हमको भी तडपाओगे....

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  13. निराला जी की कवितायेँ पढ़कर बहुत अच्छा लगा! उनको मेरा शत शत नमन!

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  14. nice collection of Nirala ji....

    http://ayodhyaprasad.blogspot.com

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  15. लोचन विलोचते,अंधकार में
    दुःख हो या सुख जीवन प्रहार में

    निराला जी कि कविता आप के सोजन्य से प्राप्त हुई,,,,धन्यवाद

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