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बुधवार, 21 दिसंबर 2011

प्रयोगों और प्रतीकों के कवि-सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय

कवि -अज्ञेय 
समय [07-03-1911से 04-04-1987]
हिन्दी के महान यायावर कवि ,कहानीकार और अप्रतिम उपन्यासकार सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय का सम्पूर्ण परिचय ब्लॉग पर दे पाना असम्भव नहीं तो कठिन  अवश्य है |अज्ञेय प्रयोगों और प्रतीकों के कवि हैं और भाषा को गढ़ते और रचते भी हैं |विश्व भ्रमण और यायावरी का प्रभाव ,बौद्ध दर्शन का प्रभाव भी उनकी कविताओं में झलकता है |उनकी कविताओं में यथार्थ और आदर्श दोनों मिलते हैं |अज्ञेय हिन्दी के लोकल नहीं बल्कि ग्लोबल कवि हैं |वह जितने कवि हैं उतने ही कथाकार उपन्यासकार |प्रोफेसर बिद्या निवास मिश्र ने अज्ञेय पर सम्पादित पुस्तक में लिखा है --हिन्दी कविता में अज्ञेय का नाम इस प्रकार दुर्निवार बन गया है कि जो लोग इस नाम को निकालना भी चाहते हैं वे भी इस नाम को भूल नहीं पाते |1936-37के आसपास हिन्दी की एक मान्य पत्रिका में यह आदेश दिया गया था कि अज्ञेय की कहानी बिना देखे छापो ,पर कविता अच्छी भी लगे तो नहीं "|अज्ञेय का जन्म 7 मार्च 1911को गोरखपुर के समीप कसया ,कुशीनगर [देवरिया ]और निधन  4अप्रैल  1987 को हुआ |अज्ञेय छात्र जीवन से ही विद्रोही स्वभाव के थे और उसी समय क्रांतिकारियों के सम्पर्क में आ गए थे |नयी कविता के कवियों में अज्ञेय पहले कवि हैं जिन्होंने भाषा के संकुचित केंचुल फाड़कर उसमें नया व्यापक और सारगर्भित अर्थ लाने का अभियान छेड़ा उनकी भाषा ने नवीन अर्थों की अभिव्यक्ति के लिए नया वातावरण सृजित किया |अज्ञेय ने तारसप्तक और नया प्रतीक का सम्पादन कर एक महत्वपूर्ण कार्य किया |अज्ञेय ने फरवरी 1965में उस समय के प्रतिष्ठित साप्ताहिक दिनमान का सम्पादन करना खराब स्वास्थ्य के बावजूद स्वीकार किया |1969 में कैलिफोर्निया विश्व विद्यालय ,बर्कले के द्वारा रीजेंट प्रोफेसर के पद पर सम्मान पूर्वक आमन्त्रित किये गए |अज्ञेय ने विश्व के कई प्रमुख देशों यथा हालैंड ,जर्मनी फ़्रांस इंग्लैंड स्विट्जरलैंड इटली ,ग्रीस ,मैक्सिको ,युगोस्लाविया ,स्वीडन वितनाम ,जापान आस्ट्रेलिया आदि की यात्रायें की |अज्ञेय कवि /लेखक ,पत्रकार सम्पादक ,सेनानी सब कुछ थे |उनका व्यक्तित्व समुद्र की तरह विशाल था |शेखर एक जीवनी उनका एक महत्वपूर्ण उपन्यास है |अज्ञेय का रचना संसार इतना व्यापक है कि यहाँ उनके नाम दे पाना कठिन काम  है काव्य संकलन -भग्नदूत ,चिन्ता ,इत्यलम ,प्रिजन डेज एंड अदर पोयम्स [अंग्रेजी में ]हरी घास पर क्षण भर ,बावरा अहेरी ,इन्द्रधनुष रौंदे हुए ,अरी ओ करुना प्रभामय ,आंगन के पार द्वार ,कितनी नावों में कितनी बार ,क्योंकि मैं उसे जानता हूँ ,सागर मुद्रा ,पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ ,महावृक्ष के नीचे ,नदी की बांक पर छाया ,सदानीरा आदि उपन्यास शेखर एक जीवनी प्रथम और द्वितीय  भाग ,नदी के द्वीप ,अपने -अपने अजनबी |कहानियाँ -विपथगा ,परम्परा ,कोठरी की बात ,शरणार्थी ,जयदोल ,अमरवल्लरी ,ये तेरे प्रतिरूप ,कड़ियाँ आदि यात्रावृत अरे यायावर रहेगा याद ,एक बूंद सहसा उछली |ललित निबन्ध सबरंग ,सबरंग और कुछ राग ,कहाँ है द्वारका और छाया का जंगल आदि आज अज्ञेय के काव्य समुद्र से कुछ मोती हम आप तक पहुँचा रहे हैं |नव वर्ष की अग्रिम शुभकामनाओं के साथ -
प्रयोगों और प्रतीकों के कवि- अज्ञेय 
नन्दा देवी 

नन्दा देवी 
बीस -तीस -पचास वर्षों में 
तुम्हारी वन-राजियों की लुगदी बनाकर 
हम उस पर 
अखबार छाप चुके होंगे '
तुम्हारे सन्नाटे को चींथ रहे होंगे 
हमारे धुँधुआते शक्तिमान ट्रक ,
तुम्हारे झरने -सोते सूख चुके होंगे 
और तुम्हारी नदियाँ 
ला सकेंगी केवल शस्य -भक्षी बाढ़ें 
या आंतों को उमेठने वाली बीमारियाँ 
तुम्हारा आकाश हो चुका होगा 
हमारे अतिस्वन विमानों का गुंझर 

नन्दा 
जल्दी ही 
बीस -तीस -पचास वर्षों में 
हम तुम्हारे नीचे एक मरु बिछा चुके होंगे 
और तुम्हारे उस नदी -धौत सीढ़ी वाले मन्दिर में 
जला करेगा 
एक मरू -द्वीप !
खुल गयी नाव 
खुल गयी नाव 
घिर आयी संझा ,सूरज 
डूबा सागर- तीरे |

धुंधले पड़ते से जल -पंछी 
भर धीरज से 
मूक लगे मँडराने ,

सूना तारा उगा 
चमक कर
 साथी लगा बुलाने |

तब फिर सिहरी हवा 
लहरियाँ कॉपीं 
तब फिर मूर्छित 
व्यथा विदा की 
जागी धीरे -धीरे |
हिरोशिमा 
एक दिन सहसा 
सूरज निकला 
अरे क्षितिज पर नहीं 
नगर के चौक :
धूप बरसी 
पर अन्तरिक्ष से नहीं 
फटी मिट्टी से 
छायाएँ मानव-जन से 
दिशाहीन 
सब ओर पडीं -वह सूरज 
नहीं उगा था पूरब में ,वह 
बरसा सहसा 
बीचों -बीच नगर के :
काल -सूर्य के रथ के 
पहियों के ज्यों अरे टूटकर 
बिखर गये हों 
दासों दिशा में |

कुछ क्षण का वह उदय -अस्त 
केवल एक प्रज्ज्वलित क्षण की 
दृश्य सोख लेने वाली दोपहरी 
फिर ?
छायाएँ मानव-जन की 
नहीं मिटीं लम्बी हो -हो कर :
मानव ही सब भाप हो गये |
झुलसे हुए पत्थरों पर 
उजड़ी सड़कों की गच पर |
मानव का रचा हुआ सूरज 
मानव को भाप बनाकर सोख गया |
पत्थर पर लिखी हुई यह 
जली हुई छाया 
मानव की साखी है |
मरुथल में चट्टान 
चट्टान से टकरा कर 
हवा 
उसी के पैरों में लिख जाती है 
लहरीले सौ -सौ रूप 

और तुम्हारे रूप की चट्टान से 
लहराता टकरा कर मैं ?
अपने ही जीवन की बालू पर 
अपनी सांसों से लिखा रह जाऊंगा |
मैं ने देखा ,एक बूंद 
मैं ने देखा 
एक बूंद सहसा 
उछली सागर के झाग से :
रंग गयी क्षण -भर 
ढलते सूरज की आग से |

मुझको दीख गया ;
सूने विराट के सम्मुख 
हर अलोक -छुआ अपनापन 
है उन्मोचन 
नश्वरता के दाग से |
आज मैं ने 
आज मैं ने पर्वत को नयी आँखों से देखा |
आज मैं ने नदी को नयी आँखों से देखा |
आज मैं ने पेड़ को नयी आँखों से देखा |

आज मैं ने पर्वत ,पेड़ ,नदी ,निर्झर ,चिड़िया को 
नयी आँखों से देखते हुए 
देखा कि मैं ने उन्हें तुम्हारी आँखों से देखा है |

यों मैं ने देखा 
कि मैं कुछ नहीं  हूँ |
[हाँ ,मैं ने यह भी देखा 
कि तुम भी कुछ नहीं हो |]
मैं ने देखा कि हर होने के साथ 
एक न -होना बंधा है 

और उस का स्वीकार ही बार -बार 
हमें हमारे होने की ओर लौटा जाता है 
उस होने को एक प्रभा -मंडल से मढ़ता हुआ |

आज मैं ने अपने प्यार को 
जो कुछ है और जो नहीं है उस सब के बीच 
प्यार के एक विशिष्ट आसन पर प्रतिष्ठित देखा |
[तुम्हारी आँखों से देखा ]
आज मैं ने तुम्हारा 
एक आमूल नये प्यार से अभिषेक किया 
जिस में मेरा ,तुम्हारा और स्वयं प्यार का 
न होना भी है वैसा ही अशेष प्रभा -मंडित 
आज मैं ने 
तुम्हें 
प्यार किया ,प्यार किया ,प्यार किया .....
सांप 
सांप !तुम सभ्य तो हुए नहीं -
नगर में बसना भी तुम्हें नहीं आया |
एक बात पूछूं [उत्तर दोगे ?]
तब कैसे सीखा डसना -विष कहाँ पाया ?
बाँहों में लो 
ऑंखें मिली रहें 
मुझे बाँहों में लो 
यह जो घिर आया है 
घना मौन 
छूटे नहीं 
कांप कर जुड़ गया है 
तना तार /टूटे नहीं 
यह जो लहक उठा 
घाम ,पिया 
इस से मुझे छाहों में लो !
ऑंखें यों अपलक मिली रहें 
पर मुझे बाँहों में लो !
अज्ञेय की हस्तलिपि -यह हस्तलिपि /आटोग्राफ [श्रीरंजन शुक्ल  श्रीलाल शुक्ल जी के भतीजे हैं और इस समय इलाहाबाद संग्रहालय में अधिकारी हैं ]हमें आदरणीय श्री रंजन शुक्ल जी के द्वारा प्राप्त हुई है हम उनके आभारी हैं |

मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

कुछ चुनिन्दा ग़ज़लें--कवि प्रदीप कांत

कवि -प्रदीप कांत 
e-mail-kant1008@rediffmail.com
mob.no.09407423354
परिचय -
क्षिप्रा की सहायक धाराओं और मालवा की गोंद में बसा लघु मुम्बई कहा जाने वाला इंदौर शहर सांस्कृतिक विविधताओं का शहर है |कलाकार ,संगीतकार ,कवि ,नाटककार ,चित्रकार सभी इसकी गोंद में पले -बढ़े हैं |सन सत्रह सौ पन्द्रह के आसपास यह शहर ओंकारेश्वर और उज्जैन के बीच एक खुशनुमा पड़ाव हुआ करता था |यह शहर सुर साम्राज्ञी लता जी के नाम से भी जाना और पहचाना जाता है |इस शहर की पहचान जाने -माने कथाकार/चित्रकार प्रभु जोशी ,चित्रकार एन० एस० बेंद्रे ,पेंटर एम० एफ़० हुसैन ,ईश्वरी रावल संगीतकार उस्ताद अमीर खां और कवि चन्द्रकांत देवताले के नाम से भी अपनी पहचान कायम किए हुए है |इसी शहर में हिन्दी के एक बेहतरीन गज़ल के कवि प्रदीप कांत भी अपने जनवादी तेवर और कलेवर से जाने और पहचाने जाते हैं |तत्सम ब्लाग के माध्यम से अंतर्जाल पर सक्रिय इस कवि का जन्म 22 मार्च 1968 को रावतभाटा ,राजस्थान में हुआ था |अजमेर विश्व विद्यालय से गणित में स्नातकोत्तर उपाधि हासिल कर प्रदीप कांत ने देवी अहिल्या विश्व विद्यालय इंदौर से भौतिकी में भी स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल की प्रदीप कांत भारत सरकार के द्वारा स्थापित राजा रामन्ना प्रगति प्रौद्योगिकी केन्द्र इंदौर में वैज्ञानिक हैं |प्रदीप कांत की रूचि संगीत कला ,नाटक सभी क्षेत्रों में है |इनके लेखन की मूल विधा गज़ल ही है |इनकी ग़ज़लें देश की प्रतिष्ठित पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं |दूरदर्शन और आकाशवाणी से कविताओं का प्रसारण होता रहता है |प्रदीप कांत इंदौर में जनवादी लेखक संघ के सक्रिय सदस्य भी हैं |आज हम इस कवि की कुछ ग़ज़लें आप तक पहुँचा रहे हैं -
प्रदीप कांत की ग़ज़लें -
एक 
कहाँ हमारा हाल नया है
कहने को ही साल नया है

कहता है हर बेचने वाला
दाम पुराना माल नया है

बड़े हुए हैं छेद नाव में
माझी कहता पाल नया है

इन्तज़ार है रोटी का बस
आज हमारा थाल नया है

लोग बेसुरे समझाते हैं
नवयुग का सुर-ताल नया है

नहीं सहेगा मार दुबारा
गाँधी जी का गाल नया है
दो 
चाँद उगेगा अम्बर में फिर
ज्वार पढ़ेगा सागर में फिर

लफ़्ज गढ़ूँ तब ज़रा देखना
दर्द जगेगा पत्थर में फिर

फिक्र अगर हो रोटी की तो
ख़्वाब चुभेगा बिस्तर में फिर

अगर ज़रूरी है तो पूछो
प्रश्न उठेगा उत्तर में फिर
तीन 
कौन गया है रखकर इतने
आँखें दो हैं मंज़र इतने

जगह नहीं है अर्जुन को भी
चढ़े सारथी रथ पर इतने

तितली के हिस्से में थे जो
फूल चढ़े हैं बुत पर इतने

ज़मीं तलाशे नींद हमारी
और आपको बिस्तर इतने

नाइन्साफ़ी की भी हद है
शीशा इक है पत्थर इतने

खाली है अपना भी पेट
और कबूतर छत पर इतने

बोल आपके काफी मुझ पर
क्यों ताने हैं ख़ंज़र इतने
चार 
पत्तों की ख़ता न पूछ
हवा का पता न पूछ

मुकम्मल हो पाएगी
बच्चों की रज़ा न पूछ

आँसू ज़मीन के पोंछ
आसमाँ की सज़ा न पूछ

बेनकाब कर देगा सब
हमारा बयाँ न पूछ
पांच 
 इतना क्यों बेकल है भाई
हर मुश्किल का हल है भाई

सूखा नहीं अभी भी सारा
कुछ आँखों में जल है भाई

आँख भले ही टिकी गगन पर
पैरों नीचे थल है भाई

यहाँ ठोस ही जी पाऐगा
जीवन भले तरल है भाई

कहाँ सूद की बात करें अब
डूबा हुआ असल है भाई

वही जटिल होता है सबसे
कहना जिसे सरल है भाई

आप भले ही ना माने पर
हमने कही ग़ज़ल है भाई
छः 
खुशी भले पैताने रखना
दुख लेकिन सिरहाने रखना

कब आ पहुँचे भूखी चिड़िया
छत पर कुछ तो दाने रखना

अर्थ कई हैं एक शब्द के
खुद में खुद के माने रखना

यूँ ही नहीं बहलते बच्चे
सच में कुछ अफ़साने रखना

घाघ हुऐ हैं आदमखोर
ऊँची और मचाने रखना

जब तुम चाहो सच हो जाएँ
कुछ तो ख़्वाब सयाने रखना
सात 
 धूप खड़ी है बाहर देख
गीत गगन के गाकर देख

अगर परखना है सच को
खुद से आँख मिला कर देख

जिस पत्थर से खाई ठोकर
पूजा उसकी भी कर देख

खुद पर ही आएँगे छींटे
दामन ज़रा बचा करदेख

रावण हैहै नहीं विभिषण
अब तू तीर चला कर देख

नींद सुलाती है इस पर भी
धरती का ये बिस्तर देख
आठ -प्रदीप कांत की हस्तलिपि में एक गज़ल