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शनिवार, 24 सितंबर 2011

राधेश्याम बंधु की गीत -यात्रा

कवि -राधेश्याम बंधु 
संपर्क -09868444666
दूरसंचार विभाग में सेवा के दौरान  टेलीफोन से लोगों के दिलों को जोड़ने का काम करते हुए अपने शब्दों और उम्दा लेखनी के माध्यम से भी लोगों के दिलों को दशकों से जोड़ते चले आ रहे सुपरिचित गीतकार का नाम है राधेश्याम बंधु |राधेश्याम बंधु के गीतों में मानवीय पीड़ा के स्वर मुखरित होते रहते हैं |घर -परिवार ,रिश्ते  -नाते ,समाज और राजनीति सबसे सरोकार है इनके गीतों का | राधेश्याम बंधु का जन्म उत्तर प्रदेश के पडरौना जनपद [देवरिया को तोड़कर बना नया जनपद ]में श्री महादेव जायसवाल के घर 10 जुलाई 1940 को हुआ था |1960के दशक से सक्रिय लेखन शुरू |इस कवि के गीत देश की प्रतिष्ठित पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं |इनके लेखन के विषय हैं -नवगीत ,कविता ,कहानी ,उपन्यास ,पटकथा ,समीक्षा ,निबन्ध |राधेश्याम बंधु की कथा /पटकथा पर आधारित तीन टेलीफिल्में -रिश्ते [1996],संकल्प [1998],कश्मीर एक सबक [2001]और कश्मीर की बेटी [2003]दूरदर्शन के नेशनल चैनल से प्रसारित हो चुके हैं |तमाम पुरस्कारों ,सम्मानों से सम्मानित इस कवि के गीत डॉ० शम्भुनाथ सिंह द्वारा सम्पादित नवगीत अर्धशती और कई साझा संकलनों में प्रकाशित हैं |कृतियाँ -बरसो रे घन [गीत -नवगीत 1962] जनपथ [सम्पादित  1967]नवगीत [समग्र चेतना ,विशेषांक सम्पादित 1980]कानपुर की काव्य -यात्रा [सम्पादित [1982]समकालीन कविता [सम्पादित -1989] प्यास के हिरन [मौलिक नवगीत 1989]समकालीन कहानियाँ [सम्पादित 1994]एक और तथागत [खंडकाव्य 1996] शीतघर [मौलिक कहानियाँ -2000] नवगीत और उसका युगबोध [सम्पादित -2004] एक गुमसुम धूप [मौलिक नवगीत- 2008] इसके अतिरिक्त समग्र चेतना[पत्रिका ] का 1980से अनवरत संपादन |सहायक महाप्रबंधक दूरसंचार के पद से सन 2000 में सेवानिवृत्ति के बाद राधेश्याम बंधु अब देश की राजधानी नई दिल्ली में रहते हुए साहित्य सेवा जारी रखे हुए हैं |हम अंतर्जाल के माध्यम से इस कवि के कुछ गीत आप तक पहुंचा रहे हैं -
एक 
ज्योति- पथ 
यह कौन दंशित कर गया है |

पालतू तोते 
मुखर संवाद 
शब्दकोशों से 
मिटे प्रतिवाद |

उफ़ ! समय को 
आज यह क्या हो गया है |

बाज़ दहशत -सी 
लगाता गश्त 
हर कबूतर 
मौन को अभिशप्त 

सूर्य -रथ यह कौन 
खंडित कर गया है |[नवगीत अर्धशती से ]
दो 
यातना यह 
और हम कब तक सहें ?

चतुर्दिक व्याप्त 
गीदड़ -भेड़िए 
मांस के भुक्खड़ 
ठसाठस भर चुके नुक्कड़ 
बंद दरवाजे 
हमारी खिड़कियाँ 
कब तक रहें ?

तोड़ते दम
सूर्य -पथ पर 
रोज ही एहसास 
गुमसुम मौन है आकाश 
उफ़ !सहमती 
इस हवा के साथ 
हम कब तक बहें ?

बंधु मेरे ! यातना यह 
और हम कब तक सहें ?[नवगीत अर्धशती से ]
तीन 
पिछवाड़े बेला संग 
बतियाती चांदनी |
रिश्तों की उलझन को 
सुलझाती चांदनी |

चाहो तो बाँहों को 
हथकड़ी बना लेना 
मौन के कपोलों पर 
संधि -पत्र लिख देना |

एकाकी जीना क्या 
समझती चांदनी |

यादों के जूड़े में 
मौलश्री टांक दो 
मिलनों के गजरे में 
सपनो को बांध लो 

महुआ तन छेड़-छाड़ 
इठलाती चांदनी 

यादों की निशिगंधा 
रात -रात जागती 
मिलनों की एक रात 
पूनम से मांगती 
गंधों की पाती नित 
लिखवाती चांदनी |
चार 
अभी परिंदों में 
धड़कन है ,पेड़ हरे हैं जिन्दा धरती |
मत उदास हो 
छाले लिखकर ,ओ राही नदिया कब थकती ?

चाँद भले ही बहुत दूर हो 
राहों को चांदनी सजाती 
हर गतिमान चरण की खातिर 
बदली खुद छाया बन जाती 
चाहे थके पर्वतारोही 
दिन की धूप नहीं है रूकती |

फिर -फिर घर का पीपल कहता 
बढ़ो हवा की लेकर हिम्मत 
बरगद का आशीष सिखाता 
खोना नहीं धैर्य की दौलत 
पथ में रात भले घिर आये 
तन की यात्रा चलती रहती ?

कितने ही पंछी बेघर हैं 
गांवों के बच्चे बेहाल 
तम से लड़ने कौन चलेगा 
रोज दिए का यही सवाल ?
पग -पग है आंधी की साजिश 
पर मशाल की जंग न थमती |
पांच -राधेश्याम बंधु की हस्तलिपि में एक गीत 

शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

कवि केदारनाथ अग्रवाल की प्रतिनिधि कविताएँ

कवि -केदारनाथ अग्रवाल 
समय [01-04-1911से 22-06-2000]
केदारनाथ अग्रवाल का काव्य संसार विविधताओं से भरा है |इनकी काव्य -यात्रा 1930-31शुरू होती है |प्रारम्भ के छः -सात वर्षों तक की उनकी कविताएँ केवल भाववादी रुझान की हैं ,लेकिन बाद में वह जीवन की विसंगतियों ,राजनीति और वक्त से मुठभेंड़ करते दिखाई देते हैं |1937 से आगे का समय उनकी कविताओं में बदलाव का समय है |केदारनाथ अग्रवाल का जन्म 1अप्रैल 1911में बाँदा,उत्तर प्रदेश  [गाँव -कमासिन ]में हुआ था |स्नातक की शिक्षा इलाहबाद विश्वविद्यालय और एल०एल०बी० की शिक्षा डी० ए० वी० कालेज कानपुर से हुई थी |निधन 22 जून 2000 को हुआ |अब तक अनुवाद सहित कुल 29 कृतियाँ प्रकाशित हैं -युग की गंगा ,नींद के बादल ,लोक और अलोक ,फूल नहीं रंग बोलते हैं ,आग का आईना ,गुलमेहंदी ,आधुनिक कवि ,पंख और पतवार ,हे मेरी तुम ,मार प्यार की थापें ,बम्बई का रक्त स्नान ,कहें केदार खरी -खरी ,जमुन जल तुम ,अपूर्वा ,बोले बोल अबोल ,जो शिलाएँ तोड़ते हैं ,आत्म -गंध ,अनहारी हरियाली खुली आँखें खुले डैने ,पुष्प दीप ,बसन्त में प्रसन्न हुई पृथ्वी ,कुहकी कोयल खड़े पेड़ की देह अनुवाद -देश -देश की कविताएँ ,समय -समय पर ,विचार बोध विवेक- विवेचन उपन्यास -पतिया  यात्रा -वृतान्त बस्ती खिले गुलाबों की [रूस की यात्रा का वृतान्त ],पत्र -साहित्य ,मित्र -संवाद पुरस्कार सोवियत लैंड नेहरु पुरस्कार उत्तर -प्रदेश हिंदी संस्थान का विशिष्ट पुरस्कार अपूर्वा पर 1986 का साहित्य अकादमी सम्मान मध्य प्रदेश साहित्य परिषद भोपाल का तुलसी सम्मान और मैथिलीशरण गुप्त सम्मान से सम्मानित इस कवि के रचना संसार से आज हम आपको परिचित कराने की एक कोशिश कर रहे हैं -
एक 
आज नदी बिलकुल उदास थी ,
सोयी थी अपने पानी में ,
उसके दर्पण पर 
बादल का वस्त्र पड़ा था |

मैंने उसको नहीं जगाया ,
दबे पाँव घर वापस आया | 10-03-58
दो 
हम न रहेंगे -
तब भी तो यह खेत रहेंगे ,
इन खेतों पर घन घहराते 
शेष रहेंगे 
,
जीवन देते ,
प्यास बुझाते 
माटी को मद-मस्त बनाते ,
श्याम बदरिया के 
लहराते केश रहेंगे !

हम न रहेंगे -
तब भी तो रति- रंग रहेंगे ,
मधु के दानी 
मोद मनाते ,
भूतल को रससिक्त बनाते ,
लाल चुनरिया में 
लहराते अंग रहेंगे |10-03-58
तीन 
मार हथौड़ा ,
कर कर चोट 
लाल हुए काले लोहे को 
जैसा चाहे वैसा मोड़ |

मार हथौड़ा 
कर कर चोट 
थोड़े नहीं -अनेकों गढ़ ले 
फौलादी नरसिंह करोड़ |

मार हथौड़ा 
कर कर चोट 
लोहू और पसीने से ही 
बंधन की दीवारें तोड़ |

मार हथौड़ा 
कर कर चोट 
दुनिया की जाती ताकत हो 
जल्दी छवि से नाता जोड़ !
चार 
माँझी !न बजाओ वंशी 
माँझी !न बजाओ वंशी मेरा मन डोलता 
मेरा मन डोलता है जैसे जल डोलता 
जल का जहाज जैसे पल -पल डोलता 
माँझी !न बजाओ वंशी मेरा प्रन टूटता 
मेरा प्रन टूटता है जैसे त्रिन टूटता 
त्रिन का निवास जैसे बन बन टूटता 
माँझी !न बजाओ वंशी मेरा तन झूमता 
मेरा तन झूमता है तेरा तन झूमता 
मेरा तन तेरा तन एक बन झूमता -1946
पांच 
मेरी कविताएँ गायेगी जनता सस्वर 
नहीं सहारा रहा 
धरम का और करम का 

एक सहारा है 
बस मुझको नेक करम का ,
जरा -मरण से हार न सकते 
मेरे अक्षर 
मेरी कविताएँ गायेगी 
जनता सस्वर |28-05-85
छः 
न आग है 
न पानी ,
देश की राजनीति 
बिना आग -पानी के 
खिचड़ी पकाती है 
जनता हवा खाती है |
सात -केदारनाथ अग्रवाल की हस्तलिपि में एक कविता [यह कविता हस्तलिपि में हमें प्रोफेसर संतोष भदौरिया जी ने दिया है जो कि अंतर्राष्ट्रीय महात्मा गाँधी हिंदी विश्व विद्यालय वर्धा में हिंदी के प्रोफेसर हैं |हम उनके आभारी हैं -
सुनहरी कलम से 
केदारनाथ अग्रवाल हिंदी की प्रगतिशील काव्यधारा के ख्यातनाम कवि है |केदार जी के यहाँ समाज की विद्रूपताओं के अनेक बिम्ब मिलते हैं उनके जन्म शताब्दी वर्ष में उनकी कविताओं का पुनः पाठ और पुनर्मूल्यांकन जरूरी है |देश के छोटे से कस्बे [बुन्देलखण्ड के ]में रहकर उन्होंने व्यापक सरोकारों की कविता लिखी |केदार बुन्देलखण्ड की जमीन और जनता से आजीवन मुखातिब रहे और वहाँ की तकलीफों को अपनी कविताओं का विषय बनाया |
प्रोफेसर संतोष भदौरिया प्रोफेसर अंतर्राष्ट्रीय महात्मा गाँधी हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा 
केदारनाथ अग्रवाल तल्खियों को जीवन में ढाल देने वाले कुछ विरल कवियों में से एक हैं |वे लोहे जैसे बिम्ब को उठाते हैं और उसे बुन्देलखण्ड क्षेत्र की महिलाओं के जीवन संघर्ष से जोड़कर उसे लोहा जैसे गलते ,ढलते और फिर गोली जैसे चलते देखते हैं |यह कवि की ही दृष्टि है जो लोहे को करोड़ों फौलादी नरसिंह में बदलकर इस दुनिया को भय ,अत्याचार और अन्याय से मुक्त कर एक बेहतरीन समाज की रचना हेतु प्रतिबद्ध दिखायी पड़ती है |केदार जी की कविताओं में देशज और ग्राम्य गंधा प्रकृति का सहज साक्षात्कार किया जा सकता है |जिसके बिना लोक ,जन और भारतीयता की परिभाषा अपूर्ण है |
संतोष चतुर्वेदी संपादक अनहद एवं जाने माने युवा  कवि 

मंगलवार, 6 सितंबर 2011

छः नवगीत -कवि मयंक श्रीवास्तव

कवि -मयंक श्रीवास्तव 
संपर्क -09977121221
सुहाग का  प्रतीक खनखनाती विविध रंगी  चूड़ियों का शहर फिरोज़ाबाद और झीलों -तालों का शहर भोपाल जिसकी मिट्टी में सांस्कृतिक विविधता और साहित्य के विविध रंग रचे -बसे हैं |इसी शहर की आबोहवा में हिन्दी नवगीत के वरिष्ठ कवि मयंक श्रीवास्तव बहुत दिनों से कुछ गुनगुनाते चले आ रहे हैं |मयंक श्रीवास्तव ने  प्रेसमेन वीकली के माध्यम से हिन्दी नवगीत को काफी समृद्ध किया |सीधे -सादे व्यक्तित्व वाले इस कवि का जन्म 11-04-1942 को उत्तर प्रदेश के फिरोज़ाबाद के  ऊंदनी गांव में हुआ था |मयंक जी का वास्तविक नाम सुरेशचंद्र श्रीवास्तव है |माध्यमिक शिक्षा सेवा मंडल मध्य प्रदेश में लम्बे समय तक सहायक सचिव के महत्वपूर्ण पद पर रहे किन्तु बाद में स्वैक्षिक सेवानिवृत्ति ले लिए |मयंक जी के गीत डॉ० शम्भुनाथ सिंह जी द्वारा सम्पादित नवगीत अर्धशती में भी प्रकाशित हैं |कृतियाँ   -सूरज दीप धरे ,सहमा हुआ घर ,इस शहर में आजकल और उँगलियाँ उठतीं रहें सभी नवगीत संग्रह हैं ,अभी हाल में पहले पहल प्रकाशन भोपाल से एक गीतिका /गज़ल संग्रह रामवती  प्रकाशित हुआ है |मयंक जी बिना किसी खेमे /गुट के ही अपने सृजन के पथ पर अग्रसर हैं |हम आज अंतर्जाल के माध्यम से मयंक श्रीवास्तव के छः  गीत आप तक पहुंचा रहे हैं 
एक 

आग लगती जा रही है 
अन्न -पानी में |
और जलसे हो रहे हैं 
राजधानी में |


रैलियाँ पाबंदियों को 
जन्म देती हैं ,
यातनाएं आदमी को 
बांध लेती हैं ,
हो रहे रोड़े बड़े 
पैदा रवानी में |


खेत में लाशें पड़ी हैं 
बन्द है थाना ,
भव्य भवनों ने नहीं 
यह दर्द पहचाना ,
क्यों बुढ़ापा याद आता 
है जवानी में |


लोग जो भी इस 
ज़माने में बड़े होंगे ,
हाँ हुजूरी की नुमाइश 
में खड़े होंगे ,
सुख दिखाया जा रहा 
केवल कहानी में |
दो 
आह भरती है नदी 
टेर उठती है नदी 
और मौसम है कि उसके 
दर्द को सुनता नहीं |

रेत बालू से अदावत 
मान बैठे हैं किनारे 
जिंदगी कब तक बितायें 
शंख -सीपी के सहारे 
दर्द को सहती नदी 
चीखकर कहती नदी 
क्या समुन्दर में नया 
तूफान अब उठता नहीं ?

मन मरुस्थल में दफ़न है 
देह पर जंगल उगे हैं 
तन बदन पर किश्तियों के 
खून के धब्बे लगे हैं 
आज क्यों चुप है सदी 
प्रश्न करती है नदी 
क्या नदी का दुःख 
सदी की आंख में चुभता नहीं ?

घाट के पत्थर उठाकर 
फेंक आयी हैं हवाएं 
गोंद में निर्जीव लेटी 
पेड़ -पौधों की लताएं 
वक्त से पिटती नदी 
प्राण खुद तजती नदी 
क्योकि आंचल से समूचा 
जिस्म अब ढंकता नहीं ?

तीन 
मेरे गांव घिरे ये बादल 
जाने कहां -कहां बरसेंगे 

अल्हड़पन लेकर पछुआ का 
घिर आयीं निर्दयी घटाएं 
दूर -दूर तक फ़ैल गयीं हैं 
घाटी की सुरमई जटाएं 
ऐसे मदमाते मौसम में 
जाने कौन -कौन तरसेंगे 

मछुआरिन की मस्ती लेकर 
मेघों की चल पड़ी कतारें 
कहीं बरसने की तैयारी 
कहीं -कहीं गिर पड़ी फुहारें 
कितने का तो दर्द हरेंगे 
कितनों को पीड़ा परसेंगे 

मेरे गांव अभागिन संध्या 
रोज -रोज रह जाती प्यासी 
जिसके लिए जलाए दीपक 
उसका ही उपहार उदासी 
जाने किसका हृदय दुखेगा 
जाने कौन -कौन हरषेगें 
चार 
पता नहीं है ,लोगों को 
क्यों अचरज होता है 
जब भी कोई गीत प्यार का 
मैं गा देता हूँ |


प्यार कूल है प्यार शूल है 
प्यार फूल भी है 
प्यार दर्द है प्यार दवा है 
प्यार भूल भी है 
मेरे लिए प्यार की इतनी 
भागीदारी है 
इसको लेकर अपनी रीती 
नैया खेता हूँ |


प्यार एक सीढ़ी है 
इस पर चढ़ना ही होता 
प्यार एक पुस्तक है 
इसको पढ़ना ही होता 
धरती का कण -कण जब मुझसे 
रूठा लगता है 
गा कर गीत प्यार के ही 
मन समझा लेता हूँ |


प्यार दया है प्यार धर्म है 
प्यार फ़र्ज भी है 
प्यार एक जीवन की लय है 
प्यार मर्ज़ भी है 
जब भी किया प्यार पर मैंने 
न्योछावर खुद को 
मुझे लगा है सब हारे 
मैं एक विजेता हूँ  |
पांच 
एक अरसे बाद 
फिर सहमा हुआ घर है |
आदमी गूंगा न बन जाये 
यही डर है |

याद फिर भूली हुई 
आयी कहानी है ,
एक आदमखोर 
मौसम पर जवानी है ,
हाथ जिसका आदमी के 
खून से तर है |

सोच पर प्रतिबंध का 
पहरा कड़ा होगा ,
अब बड़े नाख़ून वाला 
ही बड़ा होगा ,
वक्त ने फिर से किया 
व्यवहार बर्बर है |

पूजना होगा 
सभाओं में लुटेरों को 
मानना होगा हमें 
सूरज अंधेरों को ,
प्राणहंता आ गया 
तूफान सर पर है |

कोंपलें तालीम लेकर 
जब बड़ी होंगीं ,
पीढ़ियां की पीढ़ियां 
ठंडी पड़ी होंगी ,
वर्णमाला का दुखी 
हर एक अक्षर है |

छः  -मयंक श्रीवास्तव की हस्तलिपि में एक गीत 


सुनहरी कलम से 
मयंक श्रीवास्तव अपनी लम्बी गीत यात्रा के स्वयं साथी रहे हैं |महाप्राण निराला ने  नवगति ,नव लय ,ताल ,छंद नव की जो बात की है ,इस बात की रोशनी में उनका नवगति ही मयंक जी के गीतों की पृष्ठभूमि बना है |गीत में नवता का आग्रह उन्हें अधुनातन संवेदनाओं का संवाहक सिद्ध करता है |उन्होंने प्रेसमेन के माध्यम से हिन्दी नवगीत की जो अलख जगायी है उस गूंज -अनुगूँज में बहुत सारे नवगीत के कवि अपने समय और समाज का चेहरा स्पष्ट रूप से देख सके | यश मालवीय सुप्रसिद्ध गीत कवि 

प्रेसमेन के साहित्यिक संपादक के रूप में मयंक जी का योगदान सतत स्मरणीय रहेगा |लगभग पूरे भारत के समर्थ छान्दस कवियों को प्रेसमेन के मंच पर लाकर उन्होंने गीत ,गज़ल , और दोहा विधा को प्रतिष्ठित किया |भारतीय गांवों का समग्र परिवेश उभर कर आया है मयंक के गीतों में ,अनेक आयामों से गुजरते हुए उनके गीत हमें धरती से जोड़ते हैं |उनमें संस्कारों की मिठास है ,माटी की गंध है ,सूखती नदी और टूटते मचानों की करुना है |श्री मयंक श्रीवास्तव गीत विधा के समर्पित कवि हैं |
यतीन्द्रनाथ राही प्रसिद्ध हिन्दी गीत कवि