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रविवार, 28 अगस्त 2011

लोकप्रिय कवि दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लें

लोकप्रिय कवि -दुष्यन्त कुमार 
समय [01-09-1933से 30-12-1975]
एक सितम्बर दुष्यन्त कुमार के  जन्म दिन पर विशेष प्रस्तुति 
                                                                                
हिन्दी साहित्याकाश में दुष्यन्त सूर्य की तरह देदीप्यमान हैं |समकालीन हिन्दी कविता विशेषकर हिन्दी गज़ल के क्षेत्र में जो लोकप्रियता दुष्यन्त कुमार को मिली वो दशकों बाद विरले किसी कवि को नसीब होती है |दुष्यन्त एक कालजयी कवि हैं और ऐसे कवि समय काल में परिवर्तन हो जाने के बाद भी प्रासंगिक रहते हैं |दुष्यन्त का लेखन का स्वर सड़क से संसद तक गूँजता है |इस कवि ने आपात काल में बेख़ौफ़ कहा था मत कहो आकाश में कुहरा घना है /यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है |इस कवि ने कविता ,गीत ,गज़ल ,काव्य नाटक ,कथा आदि सभी विधाओं में लेखन किया लेकिन गज़लों की अपार लोकप्रियता ने अन्य विधाओं को नेपथ्य में डाल दिया |दुष्यन्त कुमार का जन्म बिजनौर जनपद [यू० पी० ]के ग्राम राजपुर नवादा में 01सितम्बर  1933 को और निधन भोपाल में 30दिसम्बर 1975 को हुआ था |इलाहबाद विश्व विद्यालय से शिक्षा प्राप्त करने के उपरांत कुछ दिन आकाशवाणी भोपाल में असिस्टेंट प्रोड्यूसर रहे बाद में प्रोड्यूसर पद पर ज्वाइन करना था लेकिन तभी हिन्दी साहित्याकाश का यह सूर्य अस्त हो गया |इलाहबाद में कमलेश्वर ,मार्कण्डेय और दुष्यन्त की दोस्ती बहुत लोकप्रिय थी वास्तविक जीवन में दुष्यन्त बहुत ,सहज और मनमौजी व्यक्ति थे |कथाकार कमलेश्वर बाद में दुष्यन्त के समधी भी हुए |दुष्यन्त का पूरा नाम दुष्यन्त कुमार त्यागी था |प्रारम्भ में दुष्यन्त कुमार परदेशी के नाम से लेखन करते थे |कृतियाँ -सूर्य का स्वागत ,आवाज़ों के घेरे ,जलते हुए वन का वसंत [ सभी कविता संग्रह ] साये में धूप [गज़ल संग्रह ]एक कंठ विषपायी [काव्य नाटक ]आदि दुष्यन्त की प्रमुख कृतियाँ हैं |आज हम अपने देश -परदेश में बैठे अपने सहृदय पाठकों और दुष्यन्त प्रेमियों के साथ दुष्यन्त कुमार की कुछ ग़ज़लें हस्तलिपि और कुछ दुर्लभ चित्र साझा कर रहे हैं |हम दुष्यन्त कुमार के सुपुत्र श्री अलोक त्यागी और श्री राजुरकर राज उद्घोषक आकाशवाणी भोपाल और निदेशक -दुष्यन्त कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय ,भोपाल के विशेष आभारी हैं जिन्होंने हमें दुष्यन्त कुमार से सम्बंधित दुर्लभ फोटोग्राफ और हस्तलिपि उपलब्ध कराया |संपर्क -राजुरकर राज -09425007710संपर्क आलोक त्यागी -09755020066

चित्र में बायें  राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर दायें दुष्यन्त कुमार 
एक 
हो गई है पीर पर्वत -सी पिघलनी चाहिए ,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए |


आज यह दीवार ,परदों की तरह हिलने लगी ,
शर्त लेकिन थी कि ये  बुनियाद हिलनी चाहिए |


हर सड़क पर ,हर गली में ,हर नगर ,हर गाँव में ,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए |


सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं 
मेरी कोशिश है कि ये  सूरत बदलनी चाहिए |


मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही 
हो कहीं भी आग ,लेकिन आग जलनी चाहिए |
दो 
मैं जिसे ओढ़ता -बिछाता हूँ ,
वो गज़ल आपको सुनाता हूँ |


एक जंगल है तेरी आँखों में 
मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ |

तू किसी रेल सी गुजरती है ,
मैं किसी पुल -सा थरथराता हूँ |

हर तरफ़ एतराज़ होता है ,
मैं अगर रोशनी में आता हूँ |

एक बाजू उखड़ गया जब से ,
और ज़्यादा वज़न उठाता हूँ |

मैं तुझे भूलने की कोशिश में ,
आज कितने करीब पाता हूँ |

कौन ये फासला निभाएगा ,
मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूँ |
तीन 
तुम्हारे पाँवों के नीचे कोई ज़मीन नहीं ,
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यकीन नहीं |

मैं बेपनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहूँ 
मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं |

तेरी जुबान है झूठी जम्हूरियत की तरह 
तू एक ज़लील सी गाली से बेहतरीन नहीं |

तुम्हीं से प्यार जताएँ तुम्हीं को खा जायें ,
अदीब यों तो सियासी है पर कमीन नहीं |

तुझे क़सम है खुदी को बहुत हलाक न कर ,
तू इस मशीन का पुर्ज़ा है ,तू मशीन नहीं |

बहुत मशहूर हैं आयें जरुर आप यहाँ 
ये मुल्क देखने के लायक़ तो है ,हसीन नहीं |

ज़रा सा तौर -तरीकों में हेर -फेर करो ,
तुम्हारे हाथ में कालर हो आस्तीन नहीं |
चार 
कहाँ तो तय था चिरागाँ हरेक घर के लिए ,
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए |

यहाँ दरख्तों के साये में धूप लगती है ,
चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए |

खुदा नहीं ,न सही ,आदमी का ख़्वाब सही ,
कोई हसीन नज़ारा तो हो नज़र के लिए |

वे मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता ,
मैं बेकरार हूँ आवाज़ में असर के लिए |

तेरा निज़ाम है सिल दे जुबान शायर को 
ये एहतियात ज़रुरी है इस बहर के लिए |

जिएँ तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले ,
मरें तो गैर की गलियों में गुलमोहर के लिए |
पांच 
ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा 
मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा  हुआ होगा |

यहाँ तक आते -आते सूख जाती हैं कई नदियाँ ,
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा |

ग़ज़ब ये है कि अपनी मौत कि आहट नहीं सुनते,
वो सब -के -सब परीशाँ हैं वहाँ पर क्या हुआ होगा |

तुम्हारे शहर में ये शोर सुन -सुनकर तो लगता है ,
कि इंसानों के जंगल में कोई हाँका हुआ होगा |

कई फ़ाके बिताकर मर गया ,जो उसके बारे में ,
वो सब कहते हैं अब ऐसा नहीं ,ऐसा हुआ होगा |

यहाँ तो सिर्फ़ गूँगे और बहरे लोग बसते हैं ,
खुदा जाने यहाँ पर किस तरह जलसा हुआ होगा |

चलो अब यादगारों की अँधेरी कोठरी खोलें ,
कम -अज़ -कम एक वो चेहरा तो पहचाना हुआ होगा |
छः 
ये जो शहतीर है पलकों पे उठा लो यारों ,
अब कोई ऐसा तरीका भी निकालो यारों |

दर्दे दिल वक्त का पैगाम  भी पहुँचाएगा , 
इस कबूतर को जरा प्यार से पालो यारों |

लोग हाथों में लिए बैठे है अपने पिंजरे ,
आज सय्याद को महफ़िल में बुला लो यारों |

आज सीवन को उधेड़ो तो जरा देखेंगे ,
आज संदूक से वो खत तो निकालो यारों |

रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया ,
इस बहकती हुई दुनिया को संभालो यारो |

कैसे आकाश में सुराख नहीं हो सकता ,
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो |

लोग कहते थे कि ये बात नहीं कहने की ,
हमने कह दी है तो कहने की सजा लो यारो |
सात 
बाढ़ की संभावनाएँ सामने हैं ,
और नदियों के किनारे घर बने हैं |

चीड़ -वन में आंधियों की बात मत कर,
इन दरख्तों के बहुत नाजुक तने हैं |

इस तरह टूटे हुए चेहरे नहीं है ,
जिस तरह टूटे हुए ये आईने हैं |

आपके कालीन देखेंगे किसी दिन ,
इस समय तो पाँव कीचड़ में सने हैं |

जिस तरह चाहो बजाओ इस सभा में 
हम नहीं हैं आदमी ,हम झुनझने हैं |

अब तड़पती सी गज़ल कोई सुनाए ,
हमसफ़र ऊँघे हुए हैं ,अनमने हैं | 
आठ -दुष्यन्त कुमार की हस्तलिपि में एक गीत 

दुष्यन्त की हस्तलिपि में एक चर्चित गज़ल 

दुष्यन्त कुमार के माता -पिता एवं परिवार के अन्य सदस्य 
आत्मकथ्य -
कि उर्दू और हिंदी अपने -अपने सिंहासन से उतरकर जब आम आदमी के पास आती हैं तो उनमें फर्क कर पाना बड़ा मुश्किल होता है |मेरी नीयत और कोशिश यह रही है कि इन दोनों भाषाओँ को ज़्यादा  से ज़्यादा करीब ला सकूँ |इसलिए ये ग़ज़लें उस भाषा में कही गई हैं ,जिसे मैं बोलता हूँ |.......और कमलेश्वर !वह इस अफ़साने में न होता तो ये सिलसिला शायद यहाँ तक न आ पाता |मैं तो -
हाथों में अंगारों को लिये  सोच रहा था ,
कोई मुझे अंगारों की तासीर बताए | दुष्यन्त कुमार  [साये में धूप की भूमिका से ]
सुनहरी कलम से 
दुष्यन्त कुमार को इलाहबाद बहुत ही प्रिय था |इलाहबाद छोड़ने के बाद भी अक्सर यहाँ आते थे अपने दोस्तों से मिलने |दुष्यन्त एक खुशमिजाज और मनमौजी व्यक्ति थे| कमलेश्वर और मार्कण्डेय दुष्यन्त के घनिष्ठ मित्र थे इन तीनों में दुष्यन्त की आर्थिक स्थिति सबसे अच्छी थी |तीनों का बैठना -उठाना मेरे यहाँ [लोकभारती ]और काफ़ी हॉउस में होता था |एक बार मैं भोपाल गया और एक कंठ विषपायी प्रकाशित करने की इच्छा प्रकट की तो दुष्यन्त ने मुझे सहज भाव से अनुमति दे दिया |एक कंठ विषपायी से आचार्य नन्द दुलारे वाजपेयी बहुत प्रभावित हुए और कई आलेख लिखे और इस काव्य नाटक कोउन्होंने  भारती के अंधायुग से अच्छा बताया |
दिनेश ग्रोवर प्रकाशक लोकभारती इलाहबाद 
दुष्यन्त अपने जीवनकाल में ही एक किंवदंती बन गए थे |आज जब हम उन्हें याद करते हैं ,तो लगता है हम अपने जीवन सूत्रों को ही जन्दा शक्ल में अपने आस -पास महसूस करते हैं |उनकी लोकप्रियता का अनुमान केवल इतनी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले चुनावों में आमने -सामने दो विरोधी पार्टियां एक ही तख्ती लगाये चल रही थी ;सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं /मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए |हम फख्र से कह सकते हैं कि हिंदी ने मीर ,ग़ालिब भले न पैदा किये हों मगर दुष्यन्त कुमार को पैदा किया है और यही हमारी हिंदी कि जातीय अस्मिता की एक बहुत बड़ी विजय है |
लोकप्रिय कवि यश मालवीय 
दुष्यन्त की कविता जिन्दगी का बयान है |जिन्दगी के सुख- दुःख में उनकी कविता अनायास याद आ जाती है |विडम्बनायें उनकी कविता में इस तरह व्यक्त होती हैं कि आम आदमी को वे अपनी आवाज लगने लगती हैं |समय को समझने और उससे लड़ने की ताकत देती ये कवितायें हमारे समाज में हर संघर्ष में सर्वाधिक उद्धरणीय कविताएँ हैं |सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं //मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए |यह मात्र एक शेर नहीं जिन्दगी का एक दर्शन है फलसफा है चूँकि दुष्यन्त की कविताएँ जनता के जुबान पर चढ़ी हुई हैं इसलिए मिडिया के लोग भी विशेष मौकों पर अपनी बात जन तक पहुँचाने के लिए ,उनके दिलों में उतार देने के लिए दुष्यन्त की शायरी का इस्तेमाल करते हैं |दुष्यन्त की ग़ज़लें कठिन समय को समझने के लिए शास्त्र और उनसे जूझने के लिए शस्त्र की तरह हैं |
 अरुण आदित्य जाने -माने  कवि /उपन्यासकार सम्पादक साहित्य अमर उजाला नोयडा[ अरुण आदित्य दुष्यन्त पुरस्कार से सम्मानित कवि हैं ]
[इस पोस्ट में प्रकाशित चित्र और पांडुलिपियाँ हमें दुष्यन्त कुमार पाण्डुलिपि संग्रहालय भोपाल के निदेशक राजुरकर राज से प्राप्त हुई हैं |दुष्यन्त कुमार के पुत्र श्री अलोक त्यागी और श्री राजुरकर राज के हम विशेष आभारी हैं |भोपाल संग्रहालय की अनुमति के बिना इनका उपयोग वर्जित है ]

सोमवार, 22 अगस्त 2011

छः नवगीत -कवि नचिकेता

कवि -नचिकेता
संपर्क -09835260441
 हिंदी नवगीत विधा को जिन कवियों ने अपने तेवर और कलेवर से समृद्ध किया है उनमें नचिकेता का नाम बड़े आदर से लिया जाता है |नचिकेता जनवादी तेवर के प्रमुख गीतकार हैं |मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक होने के नाते ये अपने गीतों को समय के साँचे में ढालने में सिद्धहस्त हैं |नचिकेता का जन्म सावन पूर्णिमा के दिन [सन 1945]केउर, जहानाबाद बिहार में हुआ था |नचिकेता के द्वारा अंतराल ,बीज ,अलाव ,परस्पर [पत्रिकाएँ ]हरित वसुंधरा का गीत अंक ,शिनाख्त [जनवादी गीतों का समीक्षात्मक अध्ययन ]पंख -पंख आसमान [शान्ति सुमन के एक सौ एक प्रतिनिधि गीत ]गीत- वसुधा [वर्ष 1960के बाद के प्रतिनिधि गीत शीघ्र प्रकाश्य ]नचिकेता की प्रमुख कृतियाँ -आदमकद खबरें ,सुलगते पसीने ,पसीने के रिश्ते ,लिक्खेंगे इतिहास ,बाइस्कोप का गीत ,सोये पलाश दहकेंगे,नचिकेता के भजन ,रंग मैले नहीं होंगे ,कोई क्षमा नहीं ,मकर चांदनी का उजास ,तासा बज रहा है ,पर्दा अभी उठेगा ,रंग न खोने दें ,जेठ में मधुमास ,रेत में खोई नदी [सभी गीत संग्रह ]आइना दरका हुआ [गज़ल संग्रह ]गीत रचना की नयी जमीन [आलोचना ]|आज हम अंतर्जाल के माध्यम से नचिकेता के छः गीत आप तक पहुँचा रहे हैं -
एक 
नमन उसे सौ बार 
साथियों नमन उसे सौ बार 

जिसने पहली बार धरा था 
हल पर अपना हाथ 
हँसिये और हथौड़े का था 
जिसका पहला साथ 
जिसने पहली बार 
गढ़ा था उत्पादन औजार 

खान -खदानों में था -
जिसने पहले किया प्रवेश 
इस्पातों से जिसने पाया 
जीवन का सन्देश 
श्रम को ही जिसने माना 
उत्पादन का आधार 

शोषण -उत्पीड़न का 
जिसने पहले किया विरोध 
वर्गविहीन समाज रचाने का 
पहला परिशोध 
जिसने पहली बार उठाया 
हाथों में हथियार 
साथियों ,नमन उसे सौ बार 
दो 
प्यार नहीं रुक सकता भाई 
कभी किसी के रोके 

प्यार सुबह की नयी किरण है 
मुक्त हंसी बच्चों की 
चिड़ियों की है चहक 
महक वनफूलों के गुच्छों की 
प्यार धूप में ही खिलता है 
अपना आपा खोके 

प्यार कमाई है मिहनत की 
रोटी गरम -गरम है 
होंठों की मुस्कान 
खनक चूड़ी की नरम -नरम है 
प्यार हमेशा दर्द बांटता 
दीन और दुखियों के 

प्यार पसीना है ,घट्टा है 
पांवों का छाला है 
प्यार बुढ़ापे की लाठी है  
यौवन की हाला है 
प्यार छलकता है बचपन की 
आँखों में खुश होके 

जीवन का संघर्ष प्यार है 
लोकगीत की भाषा 
आजादी के लिए प्यार है 
मुक्ति युद्ध का तासा 
एका का बल प्यार 
प्यार है गर्म हवा के झोंके 
तीन 
जब कभी भी मैं 
तुम्हारा नाम लिक्खूंगा  
स्वप्न -जल से धुला 
सालिग्राम लिक्खूंगा 

जब कभी मेरा -
तुम्हारा तन छुआ होगा 
सात रंगों के धनुष -सा 
मन हुआ होगा 
उस छुवन का 
रसभरा पैगाम लिक्खूंगा 

जब महकती 
फूलकर कचनार काया थी 
जल -तरंगों -सी बजी 
हर बार काया थी 
उस गुलाबी गंध का 
अंजाम लिक्खूंगा 

गुलमुहर की डाढ़ जैसा 
गदगदाना तुम 
शगुन पंछी -सा
हमेशा चहचहाना तुम 
मैं महावर रचा दिन 
अविराम लिक्खूंगा 
चार 
हम भटकते रोज अन्हुआये 
सुरंगों में 

ठंड से ठिठुरी 
सुबह की कनपटी धीपी 
इस कुहासे में कंहरते 
शंख औ सीपी 
झर रहा तम का बुरादा 
कई रंगों में 

वन पखेरू घोसलों में 
हैं नहीं सोये 
जो गये थे गीत के जल से 
सदा धोये 
है न ऊष्मा स्वरलहरियों की 
उमंगों में 

हांककर जो ले गये 
दिन के उजालों को 
पी गये दो घूंट में ही 
नदी -तालों को 
वे नहीं शामिल हुए 
दिन के प्रसंगों में 
पांच 
संभव हो 
तो रखें बचाकर कविता की 
लय ,स्वर ,सरगम 
हर दुर्दिन के 
मुँह पर छापें 
हल्दी सनी हथेली हम 

संभव हो तो 
रखें बचाकर खेतों में 
हरियाली हम 
बचपन के होंठों से 
गायब होती जाती 
लाली हम 
लिक्खें पतझर में झरते 
पत्तों पर 
कोयल का पंचम 

संभव हो 
तो रखें बचाकर साँझा 
चूल्हा ,आंगन हम 
गिरवीं होने 
कभी नहीं दें सावन -
भादों ,अगहन हम 
नहीं मिलावट से 
हो जायें जहरीले 
सारे मल्हम 

संभव हो 
तो रखें बचाकर 
हक ,इज्जत ,आज़ादी हम 
मरुआये होंठों पर 
खिलने दें 
मुस्काने सादी हम 
तह करके रख दें 
बक्से में नहीं 
मुक्तिवाले परचम 
छः नचिकेता की हस्तलिपि में एक गीत 

सुनहरी कलम से 
नचिकेता के गीतों में ऐसे जन की तस्वीर उभरती है जिनकी अंतड़ियाँ भूख से ऐंठ रही हैं खून खौल रहा है ,त्योरी चढ़ी हुई है ,ऑंखें लाल हैं और वह कसी हुई मुठ्ठी ताने सत्ता को ललकार रहा है |
डॉ० मैनेजर पाण्डेय 
नचिकेता हमारे समय के एक बड़े गीतकार हैं ,एक जनगीतकार हैं और इनके गीत हमें उद्वेलित करते हैं 
डॉ० शिवशंकर मिश्र 
नचिकेता के गीतों की एक बड़ी ताकत है इनमें प्रयुक्त व्यंग्यात्मक शैली |इन व्यंग्य गीतों को पढ़कर कबीर ,भारतेन्दु और नागार्जुन की व्यंग्य कविताओं की यादें ताजा हो जाती हैं |नचिकेता ने बहुत जटिल और गंभीर राजनितिक बातों को भी बड़े आसान शब्दों में व्यक्त किया है |मतलब है कि नचिकेता और रमेश रंजक हमारे समय के प्रतिरोध के सबसे बड़े गीतकार हैं -प्रोफेसर वशिष्ठ अनूप 

सोमवार, 15 अगस्त 2011

छःकविताएं -कवयित्री वाजदा खान

कवयित्री -वाजदा खान 
mob.no.09868744499
e-mail-vazda.artist@gmail.com
वाजदा खान समकालीन हिंदी कविता की एक महत्वपूर्ण कवयित्री हैं | वाजदा खान का जन्म 15 जून 1969को ग्राम -बढ़नी ,सिद्धार्थनगर [उ० प्र० ]में हुआ था |यह  कवयित्री एक कुशल और लब्धप्रतिष्ठ चित्रकार /पेंटर भी है |वाजदा खान जिस तरह स्त्री मनोभावों को अपनी पेंटिंग्स में चित्रित करती हैं उसी तरह अपनी कविताओं में भी बड़े सलीके से उन्हें अभिव्यक्त करती हैं |नया ज्ञानोदय ,हंस ,वागर्थ ,बहुवचन ,साक्षात्कार ,साहित्य अमृत ,आजकल ,पाखी और देश की अन्य प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में इनकी कविताएँ प्रकाशित होती रहती हैं |वाजदा खान की कुछ कविताओं का कन्नड़ में अनुवाद भी हुआ है |देश के कई सम्मानित काव्य मंचों पर इनका काव्य पाठ भी हो चुका है |वाजदा खान की पेंटिंग्स की एकल और सामूहिक प्रदर्शनियां देश की विख्यात कलादीर्घाओं में आयोजित  हो चुकी हैं |देश की कई कार्यशालाओं में भाग ले चुकी वाजदा खान को भारत के संस्कृति मंत्रालय द्वारा वर्ष 2004-2005 में फेलोशिप भी दी प्रदान की गयी है | जिस तरह घुलती है काया भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित वाजदा खान का कविता संग्रह है जिसे हेमंत स्मृति सम्मान 2010 से सम्मानित किया जा चुका है |वाजदा खान ललित कला अकादमी नई दिल्ली [लाजपत नगर के पास ]बतौर स्वतंत्र कलाकार कार्यरत हैं |हम वाजदा खान की कुछ कविताएँ अंतर्जाल के माध्यम से पहुंचा रहे हैं |
एक 
वाजदा खान की हस्तलिपि में एक कविता 
दो 
मैं अनंत ,तुम आकाश 
हम अनंत आकाश हो गए 
धरती से दूर कहीं ,जहाँ सपने पलते हैं ,
कोई मेरी आँखों में तमाम 
पारदर्शी महीन रेखाओं का 
बहुवर्णीय संजाल बीनता रहा 
मेरे इर्द -गिर्द मंडराता रहा 
क्या जरूरत थी सपने की तरह तुम्हें मेरी 
देह /रक्त /मज्जा में पलने की 
कितना अमूर्तन था तुम्हारे चेहरे की 
रेखाओं में ,
पहचान न सकी ,अपने भीतर की स्थूलता के 
कारण ,अमूर्तन में ढलने की 
लम्बी साधना की दरकार है 
शायद तब तुम कोई आकार 
ले पाओ सपने |
तीन 
चिड़िया तुम अपने पंख 
उधार दे दो 
मुझे चाँद से मिलने जाना है 
हवा न जाने कहाँ उसे 
बुहार कर ले गई 
चिड़िया !मुझ पर विश्वास करो 
तुम्हारे पंख लौटा दूंगी 
बस एक मुलाकात करना चाहती हूँ ,
उसके लिए मुझे जाना ही होगा 
तुम मेरे लिए इतना तो कर सकती हो ना !
मैं तुम्हें प्यार जो करती हूँ इतना 
थोड़ा प्यार चाँद के पंखों में 
भरना चाहती हूँ ताकि 
आसमान की बंदिश के आलावा 
कोई मनचाही उड़ान भर सके |
चार 
मैं अध्यात्म के समंदर में 
गोता लगाता हूँ तो कुछ अमूर्त प्रेम 
के मोती निकालकर लाता हूँ 
बहुत सारे मोती मेरे पास 
इकट्ठा हैं |
सोचता हूँ पिरो लूँ उन्हें 
उम्मीद के किसी धागे में 
कभी तो डाल पाउँगा तुम्हारे गले में 
उसका प्रभाव -
बहुत सारे सितारे उगा देगा तुम्हारे भीतर ,
जीवन के माथे पर धर देगा दीप 
जिसकी रोशनी होगी 
तुम्हारे चारो ओर 
प्रभावित होंगीं सदियों की सदियाँ |
पांच 
तुम्हें तिनका -तिनका बीनकर 
घोंसला बनाने का पूरा इरादा था 
बया का 
क्या हुआ ?जो तुम धूलिकण से 
बिखरे थे यहाँ -वहां 
थोड़ा सा विश्वास ओढ़ लेते आँखों पर 
गांधारी वाली पट्टी खोलकर 
थोड़ा सा कर्ण से कृष्ण बन जाते 
देख पाते विराट संसार की माया 
जो राह भूले पथिक सा भटका देती है 
तुम्हें ,किस मार्ग पर उठाकर पांव धरने हैं 
यह समझ पाते 
मैंने कहा भी था ,लाओ मैं खोल दूँ 
तुम्हारी गांधारी पट्टी 
तुम बिफर गए थे फटते ज्वालामुखी सा 
कितना गर्द -गुबार उठा था 
छा गया था अँधेरा हृदय पर 
जम गई थी धुंए की परत दर परत 
लिपट गई देह से 
न जाने कितनी बेचैन हवाएं 
सिर्फ एक क्षण को 
हटा लेते पट्टी आँखों से 
देख पाते कौरवों की क्षुद्र सेना 
दस दिशाओं तक 
फैले साम्राज्य की रानी का अपमान 
छः 
परे ढकेलना क्या होता है ?
कोई तुमसे सीखे 
कई पिरामिडों पर पांव रखते हुए 
अपना पिरामिड सुरक्षित तुम तक लाई थी 
ढहा दिया तुमने उसे 
ताश के पत्तों की तरह 
चलो दूर देश कहीं 
याद करोगे कभी 
तो पाओगे 
तमाम दुश्वारियों की छवियाँ कैद थीं 
तुम्हारी आँखों में ,जिनकी जड़ें 
बहुत गहरी थीं |
वाजदा खान की कुछ पेंटिंग्स 
[सभी पेंटिंग्स कवयित्री /चित्रकार वाजदा खान की हैं ]