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शनिवार, 18 जून 2011

पांच गीत और एक गज़ल -कवि कैलाश गौतम

कवि -कैलाश गौतम 
[समय -08-01-1944से 09-12-2006]
काव्य प्रेमियों के मानस को अपनी कलम और वाणी से झकझोरने वाले जादुई कवि का नाम है 'कैलाश गौतम'। जनवादी सोच और ग्राम्य संस्कृति का संवाहक यह कवि दुर्भाग्य से अब हमारे बीच नहीं है। आकाशवाणी इलाहाबाद से सेवानिवृत्त होने के बाद तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने कैलाश गौतम को आजादी के पूर्व स्थापित हिन्दुस्तानी एकेडेमी के अध्यक्ष पद पर मनोनीत किया। एकेडेमी के अध्यक्ष पद पर रहते हुए इस महान कवि का 9 दिसम्बर 2006 को निधन हो गया। कैलाश गौतम को अपने जीवनकाल में पाठकों और श्रोताओं से जो प्रशंसा या खयाति मिली वह दशकों बाद किसी विरले कवि को नसीब होती है। कैलाश गौतम जिस गरिमा के साथ हिन्दी कवि सम्मेलनों का संचालन करते थे उसी गरिमा के साथ कागज पर अपनी कलम को धार देते थे। 8 जनवरी 1944 को बनारस के डिग्घी गांव (अब चन्दौली) में जन्मे इस कवि ने अपना कर्मक्षेत्र चुना प्रयाग को। इसलिए कैलाश गौतम के स्वभाव में काशी और प्रयाग दोनों के संस्कार रचे-बसे थे। जोड़ा ताल, सिर पर आग, तीन चौथाई आन्हर, कविता लौट पड़ी  बिना कान का आदमी  आदि प्रमुख काव्य कृतियां हैं जो कैलाश गौतम को कालजयी बनाती हैं। जै-जै सियाराम, और 'तम्बुओं का शहर' जैसे महत्वपूर्ण उपन्यास अप्रकाशित रह गये। 'परिवार सम्मान', प्रतिष्ठित ऋतुराज सम्मान और मरणोपरान्त तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने कैलाश गौतम को 'यश भारती सम्मान' (राशि पांच लाख रुपये) से  सम्मानित किया था |अमौसा क मेला, कचहरी और गांव गया था गांव से भागा कैलाश गौतम की सर्वाधिक लोकप्रिय रचनाएं हैं। आज कैलाश गौतम के कुछ लोकप्रिय गीत हम आप सब तक पहुंचा रहे हैं -
एक 
बादल 
टूटे ताल पर |
आटा सनी हथेली जैसे 
भाभी पोंछ गई 
शोख ननद के गाल पर |

कजलीवन लौटी पुरवाई 
गाता विन्ध्याचल 
गंगा में जौ बोता खुलकर 
इन्द्रधनुष आंचल 
मीठा -मीठा चुंबन हँसकर 
मौसम पार गया 
नई फसल के भाल पर |

बंद गली की कसम न टूटी 
गाड़ी छूट गई 
लहरों में ही आर -पार की 
माला टूट गई 
तन जैसे पिंजरे का पंछी 
मन का हाल वही 
जैसे ढूध उबाल पर |
दो 
कल से 
डोरे डाल रहा है 
फागुन बीच सिवान में 
रहना मुश्किल हो जायेगा 
प्यारे बंद मकान में |

भीतर से 
खिड़कियाँ खुलेंगी 
बौर आम के महकेंगे 
आंच पलाशों पर आयेगी 
सुलगेंगे कुछ दहकेंगे 
घर का महुआ रंग लाएगा 
चूना जैसे पान में |

फिर अधखुली पसलियों की 
गुदगुदी धूप में बोलेगी 
पकी फसल सी लदी ठिठोली 
गली -गली फिर डोलेगी 
कोहबर की जब बातें होंगी 
ऊँगली दोनों कान में |

रात गये 
पुरवा के झोंके 
सौ आरोप लगायेंगे 
सारस जोड़े 
ताल किनारे 
लेकर नाम बुलाएंगे 
मन -मन भर के 
पाँव पडेंगे 
घर आंगन दालान में |
तीन 
यह कैसी अनहोनी मालिक 
यह कैसा संयोग |
कैसी -कैसी कुर्सी पर हैं 
कैसे -कैसे लोग |

जिनको आगे होना था 
वो पीछे छूट गये 
जितने पानीदार थे शीशे 
तड़ से टूट गये 
प्रेमचन्द से मुक्तिबोध से 
कहो निराला से 
कलम बेचने वाले  अब हैं 
करते छप्पन भोग |

हँस -हँस कालिख बोने वाले 
चांदी काट रहे 
हल की मूठ पकड़ने वाले 
जूठन चाट रहे 
जाने वाले जाते -जाते 
सब कुछ झाड़ गये 
भुतहे घर में छोड़ गये हैं 
सौ -सौ छुतहे रोग |

धोने वाले हाथ धो रहे 
बहती गंगा में 
अपने मन का सौदा करते 
कर्फ्यू दंगा में 
मिनटों में मैदान बनाते हैं 
आबादी को 
लाठी ,आँसू गैस पुलिस का 
करते जहाँ प्रयोग |
चार 
संतों के चरण पड़े 
रेत में कछार खो गये |

पौ फटते ही ग्रहण लगा 
और उग्रह होते शाम हो गयी 
जब से मरा भगीरथ गंगा 
घड़ियालों के नाम हो गयी 
आंगन में अजगर लेटे हैं 
पथ के दावेदार खो गये |

हल्दी रंगे सगुन के चावल 
राख हो गये हवन कुंड में 
उजले धुले शहर गीतों के 
झुलस रहे हैं धुआँ धुन्ध में 
नये पराशर हुए अवतरित 
कुहरे में भिनसार खो गये |

आश्वासन कोरे थे कितने 
कितने वादे झूठे थे 
ऐश महल में वही हैं कल जो 
कोपभवन में रूठे थे 
आज उन्हीं के गले ढोल है 
कल जिनके त्यौहार खो गये |
पांच 
काली -काली घटा देखकर 
जी ललचाता है |
लौट चलो घर पंछी 
जोड़ा ताल बुलाता है |

सोंधी -सोंधी 
गंध खेत की 
हवा बाँटती है 
सीधी सादी राह 
बीच से 
नदी काटती है 
गहराता है रंग और 
मौसम लहराता है |

कैसे -कैसे 
दृश्य नाचने लगे 
दिशाओं में 
मेरी प्यास 
हमेशा चातक रही 
घटाओं में 
बींध रहा है गीत प्यार का 
कैसा नाता है 
सन्नाटे में 
आंगन की बिरवाई 
टीस रही 
मीठी -मीठी छुवन 
और 
अमराई टीस रही 
पागल को जैसे कोई 
पागल समझाता है |
छः कैलाश गौतम की हस्तलिपि में एक गज़ल 


सुनहरी कलम से - 


कैलाश गौतम की रचनाओं का रंग बिलकुल अनोखा है |अवध के गाँव -कस्बों का अल्हड़पन ,बिलकुल जाने -पहचाने साधारण घास -पात ,पोखर -पाखी ,खेतों की मेड़ों पर खिले हुए फूल ,नदी से नहाकर निकली गोरे बदन पर गीली साड़ी  लपेटे सकुचाई -सी ग्राम वधू ,चौपाल की साँझ ,घर लौटती गायों का रम्भाना ,इन सबका अनायास गीतों में जैसे अपने आप ढलते जाना कुछ अजीब ग्राम्य -टोना सा है |
 डॉ० धर्मवीर भारती [जोड़ा ताल की भूमिका से ]

कैलाश गौतम कोई दुधमुहें कवि नहीं हैं कि उनका परिचय देना जरूरी हो |लेकिन जो कवि फन और फैशन से बाहर खड़ा हो उससे लोग परिचित होना भी जरुरी नहीं समझते |क्योंकि अक्सर लोगों का ध्यान तो सौंदर्यशास्त्र की बनी बनायी श्रेणियाँ खींचती हैं |कैलाश गौतम उस खांचे में नहीं अटते |वह खांचा उनके काम का नहीं है या वे उस खांचे के काम के नहीं |इसका सीधा मतलब है कि यह कवि अपनी कविताओं के लिये एक अलग और और विशिष्ट सौंदर्यशास्त्र की मांग करता है |
वरिष्ठ कथाकार प्रोफेसर दूधनाथ सिंह [सिर पर आग की भूमिका से ]
कैलाश गौतम सहज भाव और भाषा के साथ साडी परम्परा को शब्दों में ,चित्रों में ,बिम्बों में परोस देते हैं ,वह कितना उदात्त है ,क्या नहीं है इन गीतों में ?सारा भारतीय लोकजीवन कंधे पर गीली धोती उठाये चना -चबेना चबाते हुए अपनी विश्वास की धरती पर चलते दिखता है |हमारी भारतीय संस्कृति का मूल हमारा लोकजीवन ही है |कैलाश गौतम जैसे वास्तविक कवि अपनी संस्कृति से एक क्षण भी पृथक नहीं होते |
 नरेश मेहता [कविता लौट पड़ी की भूमिका से ]
कैलाश के इन दोहों में जड़ प्रकृति नहीं सर्जित प्रकृति है ,जो मानवीय अनुभव के बिभावन का परिणाम है ,इसलिए इन दोहों में विभावन मात्र भाषा से नहीं उस स्मृति से भी होता है ,जिसके संचरण से रस दसा प्राप्त होती है |ये दोहे जिस आदिमता की निर्मिति करते हैं ,वहीं से कल्पना ,मेधा ,मति प्रज्ञा आदि सबका विकास हुआ है अतः वह नाभिक ही संवेदन और संकेतन का केन्द्र है |
प्रोफेसर सत्यप्रकाश मिश्र [दोहा संग्रह बिना कान का आदमी की भूमिका से ]