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बुधवार, 30 मार्च 2011

पांच गज़लें -कवि -विज्ञान व्रत

कवि -विज्ञान व्रत
जन्म- 17/08/1943
सम्पर्क . e-mail-vigyanvrat@yahoo.com

मेरठ की जमीन जहां क्रांति के लिए विख्यात है वहीं कला और कविता से भी इसके गहरे सरोकार रहे हैं |वैसे तो दुनियां के इस  रंगमंच पर प्रत्येक व्यक्ति अपना रोल बखूबी  निभाता है ,लेकिन कुछ अभिनेता ऐसे होते हैं जो एक साथ कई रोल निभा ले जाते हैं |ऐसे ही एक नामचीन हिन्दी कवि और कलाकार का नाम है विज्ञान व्रत |विज्ञान व्रत  कवि बड़े हैं या  कलाकार यह तय कर पाना कम से कम मेरे लिए असम्भव नहीं तो मुश्किल अवश्य है |विज्ञान व्रत में कला और कविता दोनों के संस्कार बचपन से ही मिले हैं  |देश -विदेश की  विख्यात कला दीर्घाओं में इनकी पेंटिंग्स की प्रदर्शनियां लग चुकी हैं ,तो देश की  प्रतिष्ठित पत्र -पत्रिकाओं में इनकी गज़लें प्रकाशित होती रहतीं हैं |इस कवि का जन्म 17जुलाई 1943 को मेरठ के टेरा गांव में हुआ था |दुष्यन्त के बाद हिन्दी गज़ल में जो  महत्वपूर्ण नाम उभर कर आये उनमे विज्ञान व्रत का नाम बड़े  आदर से लिया जाता है |छोटी बहर में लिखने वाले विज्ञान व्रत एक अनूठे रचनाकार /गजलकार हैं | विज्ञान व्रत मूलतः गज़ल विधा के कवि /शायर हैं लेकिन गीत और दोहा विधा भी इनकी कलम के लिए अछूते नहीं रहे हैं | विज्ञान व्रत मंच पर जब कविता पाठ करते हैं तो वहाँ भी अपने हुनर की  मिशाल  पेश करते हैं और श्रोताओं का दिल जीत लेते हैं | जगजीत सिंह जैसे नामचीन गायक ने विज्ञान व्रत की  गज़लों को अपना रेशमी स्वर दिया है |दिल्ली में कला को समर्पित एक स्टूडियो भी है | 1966 में आगरा विश्व विद्यालय से फाईन आर्ट्स में स्नातकोत्तर उपाधि हासिल करने वाले विज्ञान व्रत तमाम पुरस्कारों और सम्मानों से सम्मानित किये जा चुके हैं | विज्ञान व्रत का पूरा परिचय यहाँ दे पाना सम्भव नहीं है | कृतियाँ -बाहर धूप खड़ी है ,चुप कि आवाज ,जैसे कोई लूटेगा ,तब तक हूँ ,महत्वपूर्ण गज़ल संग्रह हैं खिड़की भर आकाश इनके दोहों का संकलन है | हम विज्ञान व्रत जी की  पांच गज़लें और कुछ पेंटिग्स आप के साथ साझा कर रहे हैं |
एक 

मुझको जब ऊँचाई दे 
मुझको जमीं दिखाई दे 

एक सदा ऐसी भी हो 
मुझको साफ सुनाई दे 

दूर रहूँ मैं खुद से भी 
मुझको वो तनहाई दे 

एक खुदी भी मुझमें हो 
मुझको अगर खुदाई दे 

दो 
खुद से आंख मिलाता है 
फिर बेहद शरमाता है 

कितना कुछ उलझाता है 
जब खुद को सुलझाता है 

खुद को लिखते लिखते वो 
कितनी बार मिटाता है 

वो अपनी मुस्कानों में 
कोई दर्द छुपाता है 

तीन 
सुन लो जो सय्याद करेगा 
वो मुझको आजाद करेगा 

आँखों ने ही कह डाला है 
तू जो कुछ इरशाद करेगा 

एक जमाना भूला मुझको 
एक जमाना याद करेगा 

काम अभी कुछ ऐसे भी हैं 
जो तू अपने बाद करेगा 

तुझको बिलकुल भूल गया हूँ 
जा तू भी क्या याद करेगा 

चार 
सारा ध्यान खजाने पर है 
उसका तीर निशाने पर है 

अब इस घर के बंटवारे में 
झगड़ा बस तहखाने पर है 

होरी सोच रहा हा उसका 
नाम यहाँ किस दाने पर है 

सबकी नजरों में हूँ जब से 
मेरी आँख जमाने पर है 

कांप रहा है आज शिकारी 
ऐसा कौन निशाने पर है 
पांच -विज्ञान व्रत कि हस्तलिपि में एक गज़ल 






विज्ञान व्रत की पेंटिग्स और स्केच 

विज्ञान व्रत की पेंटिग 
विज्ञान व्रत का स्केच 
सुनहरी कलम से

1-विज्ञान व्रत हिन्दी के उन गज़लकारों में से हैं, जो छान्दसिक अनुशासन और भाषा सौष्ठव से च्युत गज़ल को गज़ल मानने से इनकार करते हैं |गज़ल के प्रति उनका यह रवैया गज़ल लेखन के उनके के उनके प्रारम्भिक दौर से रहा है और इसलिए वे शुरू से ही एक उल्लेखनीय गजलकार के रूप में पहचाने जाते रहे हैं |छोटी बहरों में गज़ल कहना अपेक्षाकृत दुष्कर है ,लेकिन विज्ञान व्रत को छोटी बहरें ही रास आती हैं |सीधी -सादी आम फहम शब्दावली में अपनी बात कहने के बावजूद वे अपने अशआर सपाटबयानी के इल्जाम से बचा ले जाते हैं |यही उनकी खास पहचान है | विज्ञान व्रत हमारे समय के एक ऐसे गज़लकार हैं जिन्होंने छोटी बहर में बड़ा से कथ्य कह देने कि पुरजोर कोशिश की है |इस कोशिश में वह कामयाब  भी रहे हैं |छोटी बहर में बड़ी बात कहना वैसे ही है जैसे एक छोटे से फ्रेम में कथ्य का एक विस्तृत आसमान मढ़ दें |बहर के लघु कलेवर में सोच का व्यापक फलक देना गज़लकार की अपनी निजी सामर्थ्य है |शायद इसीलिए विज्ञान व्रत की गिनती उस्ताद शायरों में की जाती है |
एहतराम इस्लाम सुप्रसिद्ध कवि /शायर अध्यक्ष प्रगतिशील लेखक संघ इलाहाबाद 

2-विज्ञान व्रत कि गज़लें समूचे हिन्दी गज़ल साहित्य में अपने ढंग कि अनूठी हैं |यह अनूठापन या विलक्षणता इस बात में है कि उनकी हर गज़ल कहीं न कहीं दूसरी गज़ल से जुड़ाव रखती है |उनकी अधिकांश गज़लें एक ही बहर में कही गई हैं ,और यह बहर बहुत छोटी है |हिन्दी गज़ल के बारे में कविता के आलोचकों का यह एक बड़ा आरोप रहा है कि गज़ल में बातें विस्तार से या मनचाहे ढंग से नहीं कही जा सकती हैं इसके बंधन ऐसा करने की इजाजत नहीं देते हैं |विज्ञान व्रत की गज़लें ऐसे आलोचकों के लिए करारा जबाब हैं |समूची हिन्दी कविता में रामदरस मिश्र के अतिरिक्त घर की उपस्थिति विज्ञान व्रत की गज़लों में सर्वाधिक है | प्रोफेसर वशिष्ठ अनूप काशी हिंदू विश्व विद्यालय 

3 विज्ञान व्रत हिन्दी के गज़लकारों से अलग छोटी बहरों के बड़े गज़लकार हैं | विज्ञान व्रत की अपने आसपास के परिवेश पर व्यापक नजर होती | घर को लेकर विज्ञान व्रत ने अद्भुत शेर कहे हैं |ये घर इस मायने में अनेकार्थी हैं जिसमें अपने समय में विखरती जा रही घर की सम्वेदनाओं से लेकर वसुधैव कुटुम्बकम के निरंतर छीजते जाते हुए एहसास का स्पंदन दिखाई देता है | डॉ० विनय मिश्र [अलवर राजस्थान ]

4-विज्ञान व्रत हमारे समय के एक महत्वपूर्ण गज़लकार हैं |एक विलक्षण संयोग यह भी है कि विज्ञान व्रत कला के भी अद्भुत चितेरे हैं |इसीलिए उनकी गज़ल कभी पेंटिग हो जाती है तो कभी उनकी पेंटिग गज़ल का रूप धारण कर लेती है | उनकी छोटी बहर की ग़ज़लों में बड़ा कथ्य समाया होता है |सोच का व्यापक फलक लिए उनकी बहर का शिल्प आज के समय को पूरी तरह से अभिव्यक्त कर देता है |इसलिए विज्ञान व्रत की ग़ज़लें हमारे समाज का आइना होकर हमारे सामने आती हैं ,जिसमें हम युग सत्य का बिम्ब देख सकते हैं | यश मालवीय 
विज्ञान व्रत की पेंटिग 

रविवार, 27 मार्च 2011

एक गज़ल और तीन नवगीत: कवि-अमरनाथ श्रीवास्तव


कवि -अमरनाथ श्रीवास्तव 
समय [21-06-1937 से 15-11-2009]

जिस जनपद की मिट्टी में मशहूर कथाकार /उपन्यासकार राही मासूम रज़ा का उपन्यास आधा गांव देश भर में ख्याति बटोरता है , उसी मिट्टी में जन्म लेते हैं हिन्दी के सुप्रसिद्ध नवगीतकार अमरनाथ श्रीवास्तव | अमरनाथ श्रीवास्तव का जन्म गाज़ीपुर जनपद में 21 जून 1937 में ग्राम बौरवा में हुआ था | हिन्दी के इस अप्रतिम गीतकार का15 नवम्बर 2009 को निधन हो गया | अमरनाथ श्रीवास्तव जी का जन्म हुआ तो गाज़ीपुर में किन्तु उनकी कर्मस्थली बना प्रयाग | जीविका के लिए जी० इ० सी० कम्पनी में काम किया बाद में स्वैक्षिक सेवानिवृत्ति लेकर कुछ दिनों तक माया प्रेस से जुड़े रहे | एक बार गाज़ीपुर से इलाहाबाद आने के बाद अमरनाथ जी यहीं रच -बस गये | अमरनाथ श्रीवास्तव ने नवगीत को ही अपनी लेखनी का विषय बनाया | अमरनाथ श्रीवास्तव विसंगतियों के गीतकार हैं | डॉ० शम्भुनाथ सिंह द्वारा सम्पादित नवगीत दशक और नवगीत अर्धशती में बड़े आदर के साथ अमरनाथ जी के गीतों को भी सम्मिलित किया गया है | देश भर की  प्रतिष्ठित पत्र -पत्रिकाओं में इस कवि की रचनाएँ प्रकाशित होती रही हैं | उत्तर-प्रदेश के प्रतिष्ठित निराला सम्मान से दो बार और साहित्य भूषण से एक बार अमरनाथ श्रीवास्तव को सम्मानित किया जा चुका है  | कृतियाँ- गेरू की लिपियाँ [१९९०], दोपहर में गुलमोहर [१९९५ ], आदमी को देखकर [गज़ल संग्रह -२००२] मैं न कहूँ तो आदि हैं |

गज़ल
एक-
इस तरह मौसम बदलता है बताओ क्या करें 
शाम को सूरज निकलता है बताओ क्या करें 
यह शहर वो है कि जिसमें आदमी को देखकर 
आइना चेहरे बदलता है बताओ क्या करें 
आदतें मेरी किसी के होंठ कि मुस्कान थीं 
अब इन्हीं से जी दहलता है बताओ क्या करें 
दिल जिसे हर बात में हँसने कि आदत थी कभी 
अब वो मुश्किल से बहलता है बताओ क्या करें 
इस तरह पथरा गयीं आँखें कि इनको देखकर 
एक पत्थर भी पिघलता है है बताओ क्या करें 
ले रहा है एक नन्हा दिया मेरा इम्तहान 
हवा के रुख पर सफलता है बताओ क्या करें 
दोस्त मुझको देखकर विगलित हुए तो सह्य था 
दुश्मनों का दिल बदलता है बताओ क्या करें 

नवगीत

दो-
कहता है पका हुआ फल 
देह नहीं है मेरी सीमा 
मुझसे है आगामी कल |

चुभो रहे हैं जैसे पिन 
वृन्त पर टिके मेरे दिन 
जाने कब कौन सी हवा 
ले जाए मेरे पल छिन 
स्वागत में  आया मेरे 
समय लिए त्यौरी पर बल |

हठयोगी तरु का मैं व्रत 
पूर्णकाम है यह तन श्लथ 
साथ -साथ चलते हैं अब 
ऋतुओं के जितने तीरथ 
रस अब तो पंचामृत है 
भाव हो गये तुलसी दल |

अंतहीन खुशबू का छोर 
मंजरियों पर उगती भोर 
धुंधली आँखों देखा है 
रंग चढ़ी रेशे कि डोर 
फिर होगी धरती सुफला 
सांचे में धूप रही ढल |

तीन-
सम्बन्धों के ठंढे घर में 
वैसे तो सबकुछ है लेकिन 
इतने नीचे तापमान पर 
रक्तचाप बेहद खलता है |

दिनचर्या कोरी दिनचर्या 
घटनायें कोरी घटनायें 
पढ़ा हुआ अखबार उठाकर 
हम कब तक बेबस दुहरायें 
नाम मात्र को सुबह हुई है 
कहने भर को दिन ढलता है |

सहित ताप अनुकूलित घर में 
मौसम के प्रतिमान ढूंढते 
आधी उमर गुजर जाती है 
प्याले में तूफान ढूंढते 
गर्म खून वाला तेवर भी 
अब तो सिर्फ हाथ मलता है |

सजे हुए दस्तरख्वानों पर 
मरी भूख के ताने -बाने 
ठहरे हुए समय सी टेबुल 
टिकी हुई बासी मुस्कानें 
शिष्टाचार डरे नौकर सा 
अक्सर दबे पांव चलता है |

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चार
अमरनाथ श्रीवास्तव कि हस्तलिपि में एक गीत 
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विशेष -
नवगीत नई कविता की प्रतिक्रिया नहीं है |नवगीत और नई कविता में विधागत भेद तो है ही शिल्पगत और कथ्यगत भी है |गद्यात्मकता दुरुहता आधुनिकता के नाम पर समसामयिक बल्कि क्षणिकता ,छंदहीनता या छान्दिक अज्ञान के कारण छंद मुक्ति ,अंधानुकरण ,आरोपित नवीनता ,जाली और और घिसे हुए बिम्ब प्रतीक नकली अनुभूति और अप्रचलित भाषा जो नई कविता में है ,नवगीत में नहीं है |बल्कि है लय ,एक बदली हुई काव्योचित लय ,सहजता जातीय संस्कृति ,भावोदभूति और ताजगी पूर्ण बिम्बप्रतीक ,टटकी भाषा |अंततः नितांत सद्यः प्रस्तुत दृश्य और वास्तविक जीवन की गहन अनुभूति ,युग सम्पृक्ति और आज की विषमता और जटिलता से चटकते हुए व्यक्ति के लिए एक सांत्वनाप्रद सहलाता हुआ आत्मिक स्पर्श |नवगीत की दृष्टि में जीवन की सम्पूर्णता है | कवि - अमरनाथ श्रीवास्तव 
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आपकी कलम से -
1. अमरनाथ जी ने नवगीत और अतुकांत कविता के भेद को मिटाते हुए एक नई शैली निर्मित की | इसी कारण उनकी रचनाएँ अपनी अलग पहचान बनाती हैं | उन्होंने प्रवृत्तियों को घटनाओं के स्थान पर महत्व देते हुए नवगीत का एक दर्शन निर्मित किया | इसी कारण अपनी पीढ़ी के अत्यंत महत्वपूर्ण नवगीतकारों में अमरनाथ जी का स्थान सदैव स्मरणीय रहेगा | - गुलाब सिंह [वरिष्ठ हिन्दी नवगीत कवि]

2. अमरनाथ जी परम्परा और आधुनिक बोध  का अद्भुत समन्वय हैं | उनकी पूरी गीत यात्रा जीवन के अहं संघर्षों से प्रेरणा पाती रही है | गहरी संवेदना और अनुभूति उनके कृतित्व और व्यक्तित्व दोनों में समान रूप से दिखाई देती है | उनका सम्पूर्ण काव्य मानवता और करुना से ओतप्रोत है |- वरिष्ठ गीत कवि विनोद श्रीवास्तव 

3. अमरनाथ श्रीवास्तव हिन्दी नवगीत का  बहुत चुप -चुप मगर बेहद बोलता चेहरा रहे हैं | उस चेहरे पर उल्लास और उदासी का धूप छाहीं बादल जीवन पर्यन्त रहा , कभी-कभी कोई इन्द्रधनुष भी झिलमिला जाता रहा | इन्हीं रंग रूपों  के बीच से जिंदगी और रचना के बिंदुओं की तलाश की | इस तलाश में  दी सम्वेदना  और वैचारिकता के सच से रचनाकार का साक्षात्कार हुआ | यही सच ही कालान्तर में अमरनाथ जी के नवगीतों में नवगति की तरह खिल उठा है |- यश मालवीय 


4.अमरनाथ श्रीवास्तव गीत चेतना के महत्ववपूर्ण कवि थे |उनकी गीत यात्रा घर -आंगन पास -पड़ोस से होती हुई अपने समय और समाज तक जाती है |हालाँकि अमरनाथ जी को जो पहचान मिलनी चाहिए थी वह शायद नहीं मिल पाई |उनकी यह पंक्तियाँ शायद यूँ ही नहीं हैं --
चिंता के गहरे सागर में 
काली रात उतर आती है 
थके वाद्य यंत्रों पर मन की 
सारी व्यथा पसर जाती है 
मुझको मुख्य पात्र होना था 
लेकिन यह तब पता चला है 
जब चरित्र अभिनय में अपनी 
सारी उमर गुजर जाती है |  सत्यनारायण [वरिष्ठ हिन्दी नवगीत कवि पटना ]
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मंगलवार, 15 मार्च 2011

चार नवगीत: कवि नईम

नईम
[समय -01-04-1935 से  09-04-2009]
सम्पर्क- डॉ० समीरा  नईम [स्व० नईम साहब की बेटी ]
दूरभाष -09425047836
7/6 राधागंज, देवास [म० प्र०]

जिस मालवा की धरती और आकाश  में कुमार गंधर्व की लोक धुनों की स्वर लहरियां आज भी गुंजायमान है, उसी मालवा के क्षितिज पर हिन्दी के अप्रतिम कवि नईम के गीतों की इन्द्रधनुषी आभा देखते ही बनती है | नईम के गीतों / कविताओं में भी मालवा रचा-बसा है | मालवा की सांस्कृतिक और साहित्यिक विरासत बहुत ही समृद्ध है उसी विरासत को बड़े सलीके से संजोया है इस महान कवि ने | अगर आधुनिक समय में आपको गीतों/ कविताओं में कबीर को तलाशना हो तो निः संदेह आपको ढूँढना होगा देवास को और पढ़ना होगा नईम के रचना संसार को | नईम अब हमारे बीच नहीं हैं 09 अप्रैल 2009 को उनका चोला पंच तत्व में विलीन हो गया | नईम का जन्म 01  अप्रैल 1935 को ग्राम- फतेहपुर [हटा] दमोह, म० प्र० में हुआ था | सागर विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा [हिन्दी में ऍम० ए०] ग्रहण करने के बाद अध्यापन के पेशे से जुड गये और सन 1995 में राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राचार्य के पद से सेवानिवृत्त हो गये | इस कवि की वाणी में कबीर की ठसक है कभी यह कवि कहता है-"ईद बकरीद एक बहाना है / जान तो  लोगों मेरी  जाना है", तो कभी "काशी साधे नहीं सध रही / चलो कबीरा |" नईम साहब 1959 में  कविता की दुनियां में प्रवेश कर गये थे और आखिरी साँस तक हिन्दी साहित्य खासकर गीत विधा को समृद्ध करते रहे | नईम के गीत गायिकी के लिए नहीं बल्कि गहरे भावार्थ के लिए जाने जाते हैं | यह कवि भाषा के प्रति बहुत ही सजग है | कंटेंट की ताजगी अपनी निजी शैली, जनवादी तेवर, समकालीन सोच नईम को एक प्रतिनिधि गीतकार के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं | इस कवि ने कविता को हंटर की तरह व्यवस्था की पीठ पर इस्तेमाल किया है | नईम कभी झुके नहीं डरे नहीं न ही लेखन में कभी हल्के हुए ,मंच पर भी उन्ही गीतों के साथ खड़े हुए जिन्हें कागज पर धार दिये | देश की सभी उत्कृष्ट पत्र -पत्रिकाओं ने इस कवि के गीतों को प्रकाशित किया | आकाशवाणी और दूरदर्शन पर भी काव्य पाठ में हिस्सा लेते रहे | नईम सिर्फ उत्कृष्ट कवि ही नहीं थे वरन एक उत्कृष्ट काष्ठ शिल्पी भी थे ,वाग्देवी उन पर मेहरवान थीं | 1997 में मुंबई की जहांगीर आर्ट गैलरी में ग्रुप शो में नईम की कलाकृतियों का प्रदर्शन भी हुआ था | तकनीक के दौर में जब लोग चिठ्ठियों की संवेदना से दूर हो गये तब भी नईम साहब पत्रों का उत्तर बड़ी सहजता से देते थे उनके पत्रों का संग्रह प्रकाशनाधीन है | म० प्र० का दुष्यन्त सम्मान उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा भूषण सम्मान और मुंबई के  परिवार सम्मान से सम्मानित इस कवि की कृतियाँ ..उजाड़ में परिंदे [हाल ही में भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित] पथराई आँखें ,बातों ही बातों में ,पहला दिन मेरे आषाढ़ का ,लिख सकूं तो महत्वपूर्ण गीत संकलन हैं 'गलत पते पर समय 'प्रकाशनाधीन है | नईम साहब की लाडली बेटी डॉ० समीरा नईम ने हमें बहुत ही सहज ढंग से महत्वपूर्ण सामग्री उपलब्ध कराई | हम उनके प्रति आभार प्रकट करते हैं | नईम के चार गीत जिसमे एक उनकी हस्तलिपि में है तथा उनके काष्ठ शिल्प की छायाकृति हम आप तक अंतर्जाल के माध्यम से पहुंचा रहे हैं: -

एक

चिट्ठी पत्री 
खतो खिताबत के मौसम 
फिर कब आयेंगे?
रब्बा जाने 
सही इबादत के मौसम 
फिर कब आयेंगे?

चेहरे झुलस गये कौमों के लू लपटों में 
गंध चिरायंध की आती छपती रपटों में 
युद्ध क्षेत्र से क्या कम है यह मुल्क हमारा 
इससे बदतर 
किसी कयामत के मौसम 
फिर कब आयेंगे?

हवालात-सी रातें दिन कारागारों से 
रक्षक घिरे हुए चोरों से बटमारों से 
बंद पड़ी इजलास 
जमानत के मौसम 
फिर कब आयेंगे ?

ब्याह सगाई विछोह मिलन के अवसर चूके 
फसलें चरे जा रहे पशु हम मात्र बिजूके 
लगा अंगूठा कटवा बैठे नाम खेत से 
जीने से भी बड़ी 
शहादत के मौसम 
फिर कब आयेंगे?

दो 

काशी साधे नहीं सध रही 
चलो कबीरा !
मगहर साधें |

सौदा-सुलुफ कर लिया हो तो 
उठकर अपनी 
गठरी बांधें,
इस बस्ती के बाशिंदे हम 
लेकिन सबके सब अनिवासी,
फिर चाहे राजे-रानी हों -
या हो कोई दासी,
के दिन की लकड़ी की हांड़ी?
क्योंकर इसमें खिचड़ी राधें |

राजे बेईमान वजीरा बेपेंदी के लोटे 
छाये हुए चलन में सिक्के 
बड़े ठाट से खोटे 
ठगी पिंडारी के मारे सब 
सौदागर हो गये हताहत 
चलो कबीरा !
काशी साधे नहीं सध रही 
तब मगहर ही साधें |

तीन 

मैं कहाँ जोड़ूँ,
घटाऊँ कहाँ,
कुछ तरमीम कर दूँ ?
कहाँ मुमकिन है 
की चैतू घसीटे को 
नईम कर दूँ ?

क्यों करूं ऐसा भला क्या लाजमी है 
साधते हैं शब्द केवल वाग्मी हैं 
आम कटहल 
गूलरों को भला कैसे नीम कर दूँ ?

बस की सबकी है यहाँ पर एक फितरत 
एक की भी हो  पूरी कोई हसरत 
कुछ नहीं को भी 
कहाँ से-
कथा की मैं "थीम "कर दूँ ?
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आपकी कलम से:

1. नईम की कविता में न केवल बुंदेलखंड और मालवा की मिट्टी की गंध मिलती है, बल्कि जन-जीवन में संघर्ष से जुड़े चेहरे भी उभरकर सामने आते हैं. उनमें जहां एक ओर कबीर की अक्खड़ता है, वहीं दूसरी ओर समकालीन हिन्दी कविता का तेवर और गीत को कविता से जोड़ने का गहरा उपक्रम मौजूद है. नईम भाषा के साथ खेलते भी हैं और उसे रचते भी हैं. उन्होंने हिन्दी नवगीत की पहचान को पूरी ताकत के साथ स्थापित किया है. - माहेश्वर तिवारी


2. गीत एक आदिम विधा है | सन्दर्भों के बदलने के स्वरूप हमारी जिंदगी में जो नए सम्बन्ध पनपे उसका परिणाम नवगीत है | आज की गद्यात्मक जिंदगी में नईम गद्यात्मक नवगीत लिखने वाले एक मात्र नवगीतकार थे |इसलिए उनके नवगीत गाने को नहीं बल्कि सुनने और गुनने का मन करता है | - जहीर कुरेशी


3. नईम ने नवगीत को रुमानियत की दुनियां से बाहर निकालकर उसे एंटी रोमांटिक बनाने का काम किया और अपने ढंग से छंद की सामर्थ्य को बढाया | आंचलिक और देशज शब्दों का इस तरह इस्तेमाल किया जैसे मिट्टी ही उनका गोत्र हो | मालवा में घर बसाते हुए उन्होंने एक घराना बसा लिया | - प्रभु जोशी [ कथाकार ,चित्रकार एवं पूर्व कार्यक्रम अधिशाषी दूरदर्शन केन्द्र इंदौर ]


4. नईम हिन्दी नवगीत के कबीर हैं | वैसी ही सधुक्कड़ी भाषा, वही भाव भंगिमा, वही ठेठ तेवर का ठाठ, वही कलम की लुकाठी, वही व्यवस्था को भर मुंह गाली बक लेने का रचनात्मक एवं नैतिक साहस इस कवि को ताजिंदगी नवता से जोड़ते रहे | - यश मालवीय


5. चलो चलें उस पार कबीरा / लेकर अपना झांझ मजीरा [नईम ] हिन्दी नवगीत की विकास यात्रा के अग्रणी कवि और बेहद आत्मीय नईम के भीतर सहजता-गम्भीरता हाथ थामे रहती थी | जिस समय में सब नई कविता की ओर भाग रहे थे, नईम ने उपेक्षित होती जा रही विधा गीत का हाथ थामकर उसे एक नई ऊंचाई प्रदान की | नईम के गीत लोकोन्मुखी हैं, जिनकी भाषा में बुन्देली और मालवा के शब्द बिना किसी रोक टोक के चले आते थे | सामाजिक सरोकारों से जुड़े नईम के नवगीत पाठकों के भीतर बड़ी सहजता से उतरते हैं | - प्रदीप कान्त


6. नईम जी का बहुआयामी व्यक्तित्व उनके गीतों की तरह ही आदर्शमय एवं प्रभावशाली रहा. अपने गीतों के माध्यम से वे सदैव आपसी भाईचारा एवं सामाजिक एकता को बनाये रखने की सार्थक अपील करते दिखते हैं. गीत-नवगीत के लिए जो ठाठ फकीरी भावना उनके पास थी, वह कम ही देखने को मिलती है. इस दृष्टि से उन्हें हिन्दी कविता का 'नया कबीर' कहा जा सकता है. - अवनीश सिंह चौहान

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चार 

नीचे नईम का  एक हस्तलिखित गीत और उन्हीं के द्वारा निर्मित काष्ठ कलाकृति:


                                                                                   
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रविवार, 6 मार्च 2011

तीन गीत: कवयित्री- पूर्णिमा वर्मन


 पूर्णिमा वर्मन 
e.mail-purnima.varman@gmail.com

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस [ मार्चपर विशेष प्रस्तुति

किसी शायर ने कहा है- "जुबां पे नाम जो आये जुबान खुशबू दे  / मैं उसको सोचूं तो सारा मकान खुशबू  दे|" आज मैं एक ऐसी अप्रवासी कवयित्री के बारे में बताने जा रहा हूँ जो किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं, बल्कि उस पर लिखकर मेरी कलम का रंग चटख हो जायेगा | इस कवयित्री के कार्यों और विचारों की खुशबू बहुत दूर तक महक रही है | इस कवयित्री से न सिर्फ महिलाओं को सीख लेनी चाहिए, बल्कि पुरुषों को भी प्रेरणा लेनी चाहिए | कवयित्री का नाम पूर्णिमा से शुरू होता है जिसका मकसद ही उजाला बाँटना होता है | भारत को अपनी ऐसी बेटियों पर गर्व होना चाहिए | जी हाँ अब मैं बताने जा रहा हूँ आदरणीया पूर्णिमा वर्मन जी के बारे में | हिमालय की सुरम्य घाटियों में इस कवयित्री का जन्म २७ जून १९५५ को पीलीभीत उत्तर प्रदेश में हुआ था | पहाड़  की खूबसूरत वादियों में जन्मी इस कवयित्री का लगाव प्रकृति और कला के प्रति बचपन से ही हो गया था, जो आज तक जारी है | संस्कृत साहित्य में स्नातकोत्तर किया | पत्रकारिता और बेब डिजाइनिंग में डिप्लोमा भी हासिल किया |प्रारम्भिक दिनों में मिर्जापुर और इलाहाबाद से भी नाता रहा, साहित्य के प्रति रुझान और कविता का संस्कार यहीं से मिला | पूर्णिमा वर्मन का व्यक्तित्व बहुआयामी है; खाली समय में जलरंगों, रंगमंच, संगीत और स्वाध्याय से इनका लगाव रहता है |पिछले २० -२५ वर्षों से लेखन, संपादन, स्वतंत्र पत्रकारिता, अध्यापन, कला, ग्राफिक डिजाइनिंग और अंतर्जाल के अनेक रास्तों से गुजरते हुए अब सयुंक्त अरब अमीरात के शारजाह शहर में इन्टरनेट पत्रिकाओं अनभूति और अभिव्यक्ति का सम्पादन कर रही हैं | पूर्णिमा वर्मन की दो प्रमुख काव्य कृतियाँ हैं -पूर्वा और वक्त के साथ | हम इस कवयित्री के तीन गीत आप तक पहुंचा रहे हैं -
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चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार 
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१. हवा में घुल रहा विश्वास


हवा में घुल रहा विश्वास
कोई साथ में है

धूप के दोने
दुपहरी भेजती है
छाँह सुख की
रोटियाँ सी सेंकती है
उड़ रही डालें
महक को छोड़ती उच्छवास
कोई साथ में है

बादलों की ओढ़नी
मन ओढ़ता है
एक घुँघरू
चूड़ियों में बोलता है
नाद अनहद का छिपाए
मोक्ष का विन्यास
कोई साथ में है |



२. दिन कितने आवारा थे

दिन कितने आवारा थे
गली गली और
बस्ती बस्ती
अपने मन
इकतारा थे

माटी की
खुशबू में पलते
एक खुशी से
हर दुख छलते
बाड़ी, चौक,

गली, अमराई
हर पत्थर 

गुरुद्वारा थे
हम सूरज
भिनसारा थे


किसने बड़े
ख़्वाब देखे थे
किसने ताज
महल रेखे थे
माँ की गोद, 
पिता का साया
घर-घाटी चौबारा थे
हम घर का
उजियारा थे |



3. ...सारे मोल गये


शहरों की मारामारी में
सारे मोल गये

सत्य अहिंसा ,दया ,धर्म
अवसरवादों ने लूटे
सरकारी दावे और वादे
सारे निकले झूठे
भीड़ बहुत थी  
अवसर थे कम
जगह बनाती  

रहीं कोहनियाँ
घुटने बोल गये

सडकें, गाड़ी, महल, अटारी
सभी झूठ में फाँसे
तिकड़म लील गये 

सब खुशियाँ
भीतर रहे उदासे
बेगाने दिल की क्या जानें
अपनों से भी मन की पीड़ा
टालमटोल गये |


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आपकी कलम से: 

1. हिंदी ब्लॉग लेखन में पूर्णिमा वर्मन का नाम किसी परिचय का मुखापेक्षी नहीं है| उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर छंद की कविता और विशेषकर गीत-नवगीत का मान बढ़ाया है| - यश मालवीय 


2. प्रतिकूलताओं को चुनौती मानने वाली पूर्णिमा वर्मन जी ने अपनी सशक्त लेखनी और ई-पत्रकारिता के माध्यम से हिन्दी साहित्य जगत को बहुत कुछ दिया है| उनका योगदान स्तुत्य है| - अवनीश सिंह चौहान 
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शनिवार, 5 मार्च 2011

कुछ दोहे: कवि डॉ० राधेश्याम शुक्ल

डॉ० राधेश्याम शुक्ल

डॉ० राधेश्याम शुक्ल हिन्दी साहित्य के अप्रतिम कवि हैं| गीत/ नवगीत/ ग़ज़ल/ दोहे/ लघुकथा और समीक्षा से हिन्दी साहित्य को समृद्ध कर रहे इस कवि का जन्म २६ अक्टूबर १९४२ को ग्राम सेमरा जिला संत रविदास नगर [भदोही] उत्तर प्रदेश में हुआ था| जाट पी० जी० कॉलेज [हिसार] के हिन्दी विभाग से २००२ में सेवानिवृत्त होने के उपरांत आप कुरुक्षेत्र विश्व विद्यालय [आदमपुर ] में अतिथि प्रोफेसर एवं शोध निदेशक के रूप में कार्यरत हैं | डॉ० शुक्ल के बारे में हिन्दी गीतों के शिखर कवि माहेश्वर तिवारी जी कहते हैं - "श्री राधेश्याम शुक्ल एक प्रतिबद्ध कवि हैं , किसी दर्शन अथवा सोच से अपने को मुक्त रखते हुए मानवीय सरोकारों के प्रतिबद्ध कवि हैं |" पंखुरी -पंखुरी झरता गुलाब , त्रिविधा , एक बादल मन , दरपन वक्त के , जरा सी प्यास रहने दे - डॉ० राधेश्याम शुक्ल की महत्वपूर्ण काव्य कृतियाँ हैं | देश राग , कैसे बुने चदरिया साधो शीघ्र प्रकाश्य कृतियाँ हैं | कविवर, तरुण, व्यक्ति ,वस्तु और कला महत्वपूर्ण शोध ग्रन्थ हैं | तमाम प्रतिष्ठित पुरस्कारों - सम्मानों से सम्मानित इस कवि की कविताएं देश की प्रतिष्ठित पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं हैं | हम यहाँ डॉ० राधेश्याम शुक्ल जी के कुछ दोहे आप तक इस ब्लॉग के माध्यम से पहुंचा रहे है:-

कुछ दोहे :

अम्मां शब्दों से परे, संज्ञा एक अनाम |
उसके आंचल में बंधे, चारो पावन धाम ||

भाभी पीली रोशनी, करती घर उजियार |
सोन चिरैया थी कभी, उड़ी न पंख पसार ||

भैया खत परदेश का, फीकी स्याही लेख
थोड़े में कहता बहुत, असमय हुआ सरेख ||

बेटी मैना दूर की, चहके करे निहाल |
वक्त हुआ लो उड़ चली, तज पीहर की डाल ||

बेटा है माँ बाप की, इच्छा का आकाश |
वक्त पड़े भूगोल है, वक्त पड़े इतिहास ||

किसी जुआघर की सुबह, या मरघट की शाम |
महानगर की जिंदगी, तुझको दूँ क्या नाम ||

इस बस्ती में है भरी, निरी जंगली आग |
मेरी हिरना प्यास तू, यहाँ न पानी मांग ||

काली आंधी का शहर, उजले-उजले लोग |
वक्त फरेबी कर रहा, छल के नए प्रयोग ||

बस्ती-बस्ती रेत है, चेहरा-चेहरा प्यास |
है पानी के नाम पर, पानी का इतिहास ||

बाट देखते दिन ढला, जंगल हुआ उदास |
रही भटकती शहर में, मृगछौनों की प्यास ||

घर-घर चिताएं तपें, गलें पसीज-पसीज |
मेहँदी के क्या मायने, क्या सावन क्या तीज ||

दोहे दरपन वक्त के, मौजूदा तकरीर |
किसी यक्ष की त्रासदी, नागमती की पीर ||

पानी रोया फूटकर लगी चतुर्दिक आग |
मछ्ली तू सोयी पड़ी, जाग पड़े तो जाग ||

लोग संगमरमर हुए, हृदय हुआ इस्पात |
बर्फ हुई संवेदना, खत्म हुई सब बात ||

तेरे प्यासे शहर की, क्या चिकनी तहजीब |
फिसला मुंह के बल गिरा, गंवई गांव गरीब ||

सहते-सहते सह गये, लोग समय की मार |
पथराये परिवेश में, किससे करें गुहार ||

धूप कड़ी छाया घनी, दोनों अब निर्मूल |
मौसम से कुछ हो गयी, कहीं खास ही भूल ||

नहीं हुई परदेश की, पूरी कभी मियाद |
अब घर चल कहती रही, मुझे वतन की याद ||

अखबारी सुबहें करें, जारी नए बयान |
फिर शिकार के वास्ते, बंधने लगे मचान ||

दरके-दरके आइने, धुआं-धुआं तस्वीर |
बुझी बुझी आँखे पढ़ें, रेत-रेत तकदीर ||

पत्नी आंगन की नदी, विरवा है घर बार |
सींच-सींच कर सूखती, ढोती रेत अपार' |


चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार