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मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

कुछ चुनिन्दा ग़ज़लें--कवि प्रदीप कांत

कवि -प्रदीप कांत 
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परिचय -
क्षिप्रा की सहायक धाराओं और मालवा की गोंद में बसा लघु मुम्बई कहा जाने वाला इंदौर शहर सांस्कृतिक विविधताओं का शहर है |कलाकार ,संगीतकार ,कवि ,नाटककार ,चित्रकार सभी इसकी गोंद में पले -बढ़े हैं |सन सत्रह सौ पन्द्रह के आसपास यह शहर ओंकारेश्वर और उज्जैन के बीच एक खुशनुमा पड़ाव हुआ करता था |यह शहर सुर साम्राज्ञी लता जी के नाम से भी जाना और पहचाना जाता है |इस शहर की पहचान जाने -माने कथाकार/चित्रकार प्रभु जोशी ,चित्रकार एन० एस० बेंद्रे ,पेंटर एम० एफ़० हुसैन ,ईश्वरी रावल संगीतकार उस्ताद अमीर खां और कवि चन्द्रकांत देवताले के नाम से भी अपनी पहचान कायम किए हुए है |इसी शहर में हिन्दी के एक बेहतरीन गज़ल के कवि प्रदीप कांत भी अपने जनवादी तेवर और कलेवर से जाने और पहचाने जाते हैं |तत्सम ब्लाग के माध्यम से अंतर्जाल पर सक्रिय इस कवि का जन्म 22 मार्च 1968 को रावतभाटा ,राजस्थान में हुआ था |अजमेर विश्व विद्यालय से गणित में स्नातकोत्तर उपाधि हासिल कर प्रदीप कांत ने देवी अहिल्या विश्व विद्यालय इंदौर से भौतिकी में भी स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल की प्रदीप कांत भारत सरकार के द्वारा स्थापित राजा रामन्ना प्रगति प्रौद्योगिकी केन्द्र इंदौर में वैज्ञानिक हैं |प्रदीप कांत की रूचि संगीत कला ,नाटक सभी क्षेत्रों में है |इनके लेखन की मूल विधा गज़ल ही है |इनकी ग़ज़लें देश की प्रतिष्ठित पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं |दूरदर्शन और आकाशवाणी से कविताओं का प्रसारण होता रहता है |प्रदीप कांत इंदौर में जनवादी लेखक संघ के सक्रिय सदस्य भी हैं |आज हम इस कवि की कुछ ग़ज़लें आप तक पहुँचा रहे हैं -
प्रदीप कांत की ग़ज़लें -
एक 
कहाँ हमारा हाल नया है
कहने को ही साल नया है

कहता है हर बेचने वाला
दाम पुराना माल नया है

बड़े हुए हैं छेद नाव में
माझी कहता पाल नया है

इन्तज़ार है रोटी का बस
आज हमारा थाल नया है

लोग बेसुरे समझाते हैं
नवयुग का सुर-ताल नया है

नहीं सहेगा मार दुबारा
गाँधी जी का गाल नया है
दो 
चाँद उगेगा अम्बर में फिर
ज्वार पढ़ेगा सागर में फिर

लफ़्ज गढ़ूँ तब ज़रा देखना
दर्द जगेगा पत्थर में फिर

फिक्र अगर हो रोटी की तो
ख़्वाब चुभेगा बिस्तर में फिर

अगर ज़रूरी है तो पूछो
प्रश्न उठेगा उत्तर में फिर
तीन 
कौन गया है रखकर इतने
आँखें दो हैं मंज़र इतने

जगह नहीं है अर्जुन को भी
चढ़े सारथी रथ पर इतने

तितली के हिस्से में थे जो
फूल चढ़े हैं बुत पर इतने

ज़मीं तलाशे नींद हमारी
और आपको बिस्तर इतने

नाइन्साफ़ी की भी हद है
शीशा इक है पत्थर इतने

खाली है अपना भी पेट
और कबूतर छत पर इतने

बोल आपके काफी मुझ पर
क्यों ताने हैं ख़ंज़र इतने
चार 
पत्तों की ख़ता न पूछ
हवा का पता न पूछ

मुकम्मल हो पाएगी
बच्चों की रज़ा न पूछ

आँसू ज़मीन के पोंछ
आसमाँ की सज़ा न पूछ

बेनकाब कर देगा सब
हमारा बयाँ न पूछ
पांच 
 इतना क्यों बेकल है भाई
हर मुश्किल का हल है भाई

सूखा नहीं अभी भी सारा
कुछ आँखों में जल है भाई

आँख भले ही टिकी गगन पर
पैरों नीचे थल है भाई

यहाँ ठोस ही जी पाऐगा
जीवन भले तरल है भाई

कहाँ सूद की बात करें अब
डूबा हुआ असल है भाई

वही जटिल होता है सबसे
कहना जिसे सरल है भाई

आप भले ही ना माने पर
हमने कही ग़ज़ल है भाई
छः 
खुशी भले पैताने रखना
दुख लेकिन सिरहाने रखना

कब आ पहुँचे भूखी चिड़िया
छत पर कुछ तो दाने रखना

अर्थ कई हैं एक शब्द के
खुद में खुद के माने रखना

यूँ ही नहीं बहलते बच्चे
सच में कुछ अफ़साने रखना

घाघ हुऐ हैं आदमखोर
ऊँची और मचाने रखना

जब तुम चाहो सच हो जाएँ
कुछ तो ख़्वाब सयाने रखना
सात 
 धूप खड़ी है बाहर देख
गीत गगन के गाकर देख

अगर परखना है सच को
खुद से आँख मिला कर देख

जिस पत्थर से खाई ठोकर
पूजा उसकी भी कर देख

खुद पर ही आएँगे छींटे
दामन ज़रा बचा करदेख

रावण हैहै नहीं विभिषण
अब तू तीर चला कर देख

नींद सुलाती है इस पर भी
धरती का ये बिस्तर देख
आठ -प्रदीप कांत की हस्तलिपि में एक गज़ल 

24 टिप्‍पणियां:

  1. बड़ी सुन्दर गजलें, पढ़कर आनन्द आ गया। आभार आपका।

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  2. छोटी बहर में अच्छी ग़ज़लें.प्रदीप जी को बधाई.

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  3. उम्दा गज़लें पढवाई है तुषार जी

    प्रदीप कान्त जी की ग़ज़लें पढ़ कर ऐसा लगा किसी उस्ताद शायर को पढ़ रहा हूँ

    प्रदीप जी दिली दाद कबूल फरमाएं

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  4. वाह.. बहुत ही उम्दा गज़लें पढवाईं आपने .सभी शेर इतने सुन्दर हैं कि समझ में नहीं आ रहा किसे कोटे करूँ ..पर फिर भी

    नहीं सहेगा मार दुबारा
    गाँधी जी का गाल नया है
    ये तो बस ..कमाल लगा .

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  5. आपकी प्रवि्ष्टी की चर्चा कल बुधवार के चर्चा मंच पर भी की जा रही है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल उद्देश्य से दी जा रही है!
    शुभकामनाओं सहित!

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  6. बहुत ही बढ़िया ग़ज़ल हैं...
    प्रदीप कान्त जी की ग़ज़लें पढवाने का बहुत बहुत शुक्रिया...

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  7. तितली के हिस्से में थे जो
    फूल चढ़े हैं बुत पर इतने
    vaah!!

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  8. प्रदीप हमेशा ही कमाल करता है। इन गजलों की खूब पढ़ता-सुनता रहा हूँ। बधाई। - प्रदीप मिश्र

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  9. सभी ग़ज़लें बहुत ही उम्दा लगीं | एक-एक शे'र में जान है |
    -ओम वर्मा

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  10. प्रदीप ग़जले अच्छी ही लिखता है बधाई

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  11. bAHUT ACCHI GAJAL HAI. BAS AISE HI LIKHTE RAHO.

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  12. बहुत -बहुत बधाई .प्रदीप कान्त जी. सुन्दर गजलें हैं .

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  13. आपका पोस्ट पर आना बहुत ही अच्छा लगा मेरे नए पोस्ट "खुशवंत सिंह" पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

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  14. कहता है हर बेचने वाला
    दाम पुराना माल नया है

    बड़े हुए हैं छेद नाव में
    माझी कहता पाल नया है....waah

    bahut hi sundar gajal...welcome to my blog

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  15. जबरदस्त ... एक से बढ़ कर एक ... निःशब्द कर गयीं सब ...

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  16. सभी एक से बड़ कर एक सुन्दर गजलें हैं .....

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  17. sari gazle ek se badh kar ek
    इन्तज़ार है रोटी का बस
    आज हमारा थाल नया है
    bahut sunder sher
    dhnyavad
    rachana

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  18. कवि प्रदीप कान्त जी परिचय कराने के लिए शुक्रिया.
    वैज्ञानिक और कवि ..क्या बात है.
    उनकी गजल भी कमाल की है.

    मेरे ब्लॉग पर आईयेगा,जय कृष्ण जी.
    आपके सुवचन मेरा मनोबल बढ़ाते हैं.

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  19. उम्दा ग़ज़ल! बहुत बढ़िया लगा पढ़कर!
    मेरे नये पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/
    http://seawave-babli.blogspot.com/

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  20. काव्य के चितेरे प्रदीप कांट जी को पढवाया .एक से बढ़के आज के मिजाज़ की एक ग़ज़ल .जीवन का हर रंग समेटे हुए .शुक्रिया .नववर्ष मंगल मय होवे .

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  21. waah bahut khoob...behtareen gazalen.
    ज़मीं तलाशे नींद हमारी
    और आपको बिस्तर इतने

    बोल आपके काफी मुझ पर
    क्यों ताने हैं ख़ंज़र इतने..kya baat hai.

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