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सोमवार, 21 नवंबर 2011

हिन्दी के अप्रतिम नवगीत कवि -डॉ० प्रेम शंकर

कवि -डॉ० प्रेम शंकर 
e-mail-pshanker98@gmail.com
mob.no.09410061985
डॉ० प्रेम शंकर [कवि /लेखक ]
कार्यकारी पूर्णकालीन अध्यक्ष उ० प्र० हिन्दी संस्थान -लखनऊ 
परिचय -
वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के कार्यकारी पूर्ण कालीन अध्यक्ष के पद को सुशोभित कर रहे डॉ० प्रेम शंकर हिन्दी नवगीत विधा के अप्रतिम कवि हैं |डॉ० प्रेम शंकर न केवल कवि हैं बल्कि हिन्दी के उद्भट विद्वान और महत्वपूर्ण लेखक हैं |नवगीत लेखन में जब यह कवि प्रेम को अभिव्यक्त करता है तो नितांत ताजे बिम्बों प्रतीकों से कविता का एक अप्रतिम रूप हमारे सामने आता है |शहरी भाव बोध से लेकर ग्रामीण अंचल की खूबसूरती इनकी कविताओं की विशेषता है |डॉ० प्रेम शंकर कविता के भाव ,शिल्प ,समकालीन सोच के साथ नए -प्रतीकों और प्रयोगों के साथ एक सधे हुए कुम्हार की तरह कविता के घड़े को सुघर बनाते हैं |डॉ० प्रेम शंकर की कविता बेडरूम से निकलकर उनकी कल्पना की सहचरी नहीं बनती बल्कि उनके जीवन के व्यापक अनुभव और दृष्टिकोण से छनकर ताजा खिली धूप बनकर हरियाली के उपर फ़ैल जाती है |यह धूप कभी जाड़े की गुनगुनी होती है तो कभी वैशाख की दोपहरी जैसी कड़क होती है |हिन्दी के इस महान कवि विचारक का जन्म अपनी विश्वसनीयता के लिए प्रसिद्ध तालों के शहर, मशहूर शायर शहरयार और गोपाल दास नीरज के शहर अलीगढ़ में 01-11-1943 को हुआ था | शिक्षा -डॉ० प्रेम शंकर ने प्रथम श्रेणी में हिन्दी में स्नातकोत्तर उपाधि हासिल कर प्रयोगवाद और व्यक्तिवाद पर एम० फ़िल० और आधुनिक हिन्दी कविता में व्यक्तिवाद पर पी० एच० डी० की उपाधि हासिल किया |इन्हें धर्मरत्न की उपाधि सन 1955में प्रदान की गयी |पुस्तकें और प्रकाशन -हिन्दी और उसकी उपभाषाएं ,नयी गन्ध [नवगीत संग्रह ],दलितों का चीखता आभाव [कविता संकलन ]अपनी शताब्दी से उपेक्षित [कविता संकलन ]कविता रोटी की भूख तक [कविता संकलन ]इसके अतिरिक्त भी कई शोध पत्र और पुस्तकें इनके द्वारा सम्पादित की गयीं हैं |कई महत्वपूर्ण पदों को सुशोभित कर चुके डॉ० प्रेम शंकर लाल बहादुर राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी मसूरी में प्रोफेसर एवं समन्वयक [हिन्दी एवं प्रादेशिक भाषाएं ]भी रह चुके हैं |डॉ० प्रेमशंकर का विस्तृत परिचय उनके ब्लॉग पर देखा जा सकता है   http://drpremshanker.blogspot.com/|स्वभाव से विनम्र और मृदुभाषी डॉ० प्रेम शंकर जी का परिचय आज हम अंतर्जाल के माध्यम से आप सब सहृदय मित्रों और पाठकों तक पहुंचा रहे हैं -
डॉ० प्रेम शंकर के नवगीत
एक  
तुम्हें 
छूकर 
लौट आया दिन |
अनमना -सा 
हो गया -
ये इन्द्रधनुषी मन |

कुछ दरारें 
बन गईं 
जो जुड़ नहीं पायीं 
कुछ नयी दीवार हैं 
जो हट नहीं पायीं 
अब दूर तक 
अंधी गुफाओं में ,
ढूंढता ,
झख मारता है मन |

फैशन 
अधुनातन नहीं ,
बाज़ार सी आँखें 
अब नहीं 
मुझको बुलातीं 
गुलमोहर शाखें 
हम सफाई 
ना भी दें 
तो क्या -
टूटता 
मन मारता है प्रन  |
दो 
कल मैं 
आऊँगा |
कांपते संशय की 
शाख तोड़ लाऊंगा |

तुम मिलना 
उसी तरह 
अधर खोल 
गुलमोहर डाल- से 
आँखों के 
वर्जित प्रश्न 
उधर जायेंगे |
कल मैं 
आऊँगा 
झूमते गुलमोहर फूल 
तोड़ लाऊंगा |

तुम आना 
उसी तरह 
शशि मुख 
केशामुक्लाई -सी 
बतियाना 
उसी तरह -
अलक हिला ,
जीवन के 
चर्चित रंग 
उभर आयेंगे -
कल 
मैं आऊंगा |
अनलिखे 
हृदय पर 
नाम छाप जाऊंगा |
तीन 
आ गया है 
चैत ,
सोने -सी पकी फसलें |
दो घड़ी 
हम आम तरु की 
छांह में हंस लें |

पोखरे का 
जल गंदीला 
मछलियाँ प्यासी 
ये 
किसानी आंख 
मानो ,
अनधुली बासी 
कह रही ज्यों 
हम कहाँ ,
किस ठौर जा बस लें |
लादकर 
गट्ठर समय का 
एक युग बीता 
आदमी ने 
मौत को 
अब तक नहीं जीता 
इसलिए हम 
हाथ में हंसिया 
जरा कस लें |
दूर तक 
हर खेत में 
बालें लहरती -सीं 
कर्म के हर 
छंद पर हम 
अर्थ का रस लें |
चार 
शायद 
हम तुम दो छाया हैं 
अंधी भादों रात की |
तन ने पीड़ा सही अनेकों 
करका -घन संघात की |

पता नहीं कितनी दूरी है ,
या हम पास खड़े 
एक दूसरे को छूने को ,
कितनी बार मुड़े 
पर 
बदरायी छाया पल छिन 
खो जाती है गात की |

कभी -कभी हम इस धुंधले में 
साथ -साथ चलते 
नयी प्रेत -सी छायाओं से ,
पग -पग पर छलते 
अक्सर 
पीर उभर आती है 
जाने क्यों बेबात की |

घने अँधेरे में जलते  दो 
जैसे मधुर दिये 
तिल -तिल जलकर किरण फेंकते ,
गूंगी जलन जिये 
दूर -दूर तक खो जाती है ,
लौ मन की 
सौगात की |
पांच 
मन में पसर गईं हैं यादें |
लोहे के हर कला भवन में 
पारस -पत्थर की बुनियादें |

हरी दूब पर -
वीर वहूटी 
जड़े हुए दर्पण में -
खूंटी 
बिखरे चित्रों की 
परिभाषा 
डूब रहे हैं 
लिए हताशा 
पंख लिए हैं -
उड़ने वाले 
जाल तोड़ना हमें सिखा दें |

घर -आंगन ,
आकाश नयन में 
थके पांव थे ,
बीच सहन में 
तुतलाते हकलाते सपने 
हुए प्रज्ज्वलित 
छल से अपने 
धूप बनो ,तारों से चमको 
इन शोलों को 
सभी हवा दें |
छः -डॉ० प्रेमशंकर की हस्तलिपि में एक गीत 

16 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छी पोस्ट आभार ! मेरे पोस्ट पर आपका स्वागत है । धन्यवाद।

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  2. स्तरीय साहित्य साधना से परिचय कराने का आभार..

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  3. डॉ प्रेमशंकर के व्यक्ति और कृति अंश से साक्षात्कार अच्छा लगा

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  4. बेहद संवेदनशील...रचनायें...

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  5. apane samay ke aham kavi aur unaki rachanaon ko blog ke zariye logon tak pahunchane ka mahati kaary hai. sadhuvaad.

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  6. पोखरे का
    जल गंदीला
    मछलियाँ प्यासी
    ये
    किसानी आंख
    मानो ,
    अनधुली बासी
    कह रही ज्यों
    हम कहाँ ,
    किस ठौर जा बस लें |
    _______________

    bahut achchhe prayog hain.

    उत्तर देंहटाएं
  7. डॉ० प्रेम शंकर जी से परिचय और उनकी स्तरीय रचनाएँ पढ़वाने का आभार!!!!

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  8. पंख लिए हैं -
    उड़ने वाले
    जाल तोड़ना हमें सिखा दें |bahut sundar.

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  9. डॉ. प्रेम शकर जी के बारे में सुन्दर जानकारी दी है आपने.
    उनकी रचना पढकर बहुत प्रसन्नता मिली.
    सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार.

    मेरे ब्लॉग पर आईयेगा.
    नई पोस्ट पर हार्दिक स्वागत है.

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  10. डॉ. प्रेम शकर जी के बारे में बताने का आभार

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  11. बहुत सुंदर प्रस्तुति । मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद। ।

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  12. प्रिय जय कृष्ण राय तुषार जी बहुत सुन्दर रहे ये नवगीत और डॉ प्रेम शंकर के बारे में जानकारी ..ये मंजर और भी सुन्दर बनता जाए ...बधाई हो
    भ्रमर ५

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  13. अहा! आपके इस ब्लॉग का काव्य संग्रह तो दुर्लभ है!

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  14. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।
    मेरा शौक
    मेरे पोस्ट में आपका इंतजार है,
    आज रिश्ता सब का पैसे से

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  15. डॉ० प्रेमशंकर जी के गीतों को पसंद करने के लिए आप सभी का आभार |

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