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बुधवार, 16 नवंबर 2011

हिन्दी के लोकप्रिय नवगीतकार शतदल

कवि -शतदल 
सम्पर्क -e-mail-rshatdal@gmail.com
राम प्रकाश शुक्ल शतदल का काव्य संसार 

हिन्दी गीत /नवगीत विधा के सौम्य और सरस कवि शतदल नवगीत के बहुत ही  लोकप्रिय कवि हैं | शतदल जी का पूरा नाम राम प्रकाश शुक्ल है जो सरकारी कामकाज तक ही सीमित है |हिन्दी के इस लोकप्रिय कवि का जन्म 25 अक्टूबर  1944 को कानपुर में हुआ था |सबसे पहली कविता कानपुर से प्रकाशित साप्ताहिक पत्रिका सहयोगी में प्रकाशित हुई थी |सन 1963 में मेरठ के नौचन्दी में प्रथम बार काव्य पाठ में शामिल हुए |लन्दन से प्रकाशित बी० बी० सी० हिंदी पत्रिका में गीत प्रकाशित [यह पत्रिका अब बन्द हो चुकी है ] शतदल जी देश के विभिन्न आकाशवाणी केन्द्रों से कविता पाठ कर चुके हैं |दो बार नेपाल यात्रा भी कर चुके हैं |लेखन की मूल विधा गीत /नवगीत /गज़ल है |लेकिन संस्मरण ,यात्रा वृतान्त फीचर आदि में भी सक्रिय लेखन है |गीत कविता की प्रतिष्ठा और स्थापना के लिए सन 1977 में श्रृंगार संध्या की स्थापना और उसका संचालन लगभग बारह वर्षों तक |सम्पादन -चलौ मोती उगाऊ [लोकगीतों का संकलन ]श्रृंगार संध्या वार्षिक पत्रिका ,उमाकान्त मालवीय स्मृतियों के गवाक्ष [मालवीय जी पर साहित्यकारों के लेखों का संकलन ]कविकुल के गज़लगो कवि [गज़ल संकलन ,स्मृति वार्षिक पत्रिका ,कवि त्रयी [तीन कवियों की कविताओं का संकलन |साझा संकलन -श्रेष्ठ हिन्दी गीत संचयन -सम्पादक कन्हैयालाल नन्दन ,बंजर धरती पर इन्द्रधनुष -सम्पादक नन्दन ग़ज़लें रंगारंग सम्पादक डॉ० शेरजंग गर्ग ,धार पर हम ,कानपुर के कवि संपादक डॉ० प्रतीक मिश्र ,संयोग साहित्य [उत्तर प्रदेश काव्य विशेषांक -संपादक मुरलीधर पाण्डेय ,दूसरी पीढ़ी के प्रेम गीत संपादक कृष्ण गोपाल गौतम |कृतियाँ --पवन गया नीली घाटी में [गीत संग्रह 1967] तीन कृतियाँ प्रकाशनाधीन |शतदल जी अन्तर्जाल पर भी अपने ब्लॉग के माध्यम से सक्रिय हैं |भारतीय डाक विभाग से शतदल जी अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं |हम अपने पाठकों /मित्रों को अन्तर्जाल के माध्यम से शतदल जी के काव्य संसार से आज परिचित करा रहे हैं -
एक 
फूल रोशनी के 
खिलते हैं 
घने अँधेरे में |

आँखों में जल घिरे 
कि इनमें सूनापन डोले 
अधर तुम्हारे आगे 
मीठी बानी ही बोले 
हिम से ढके 
स्नेह शिखरों ने 
ताप सहा लेकिन 
नदियों से लहराते अपने 
केश नहीं खोले |

तुम्ही बता पाओगे 
मुझको तुम्हीं बताओगे 
चिन्ह तुम्हारे 
क्यों मिलते हैं 
घने अँधेरे में ?
दो 
भीड़ों के मरुथल में हमसे 
सपने हरे -भरे मिलते हैं |

सपनों के हम सौदागर हैं 
गागर में सिमटे सागर हैं ,
जीवन को महकाने वाले 
हम सरगम के कोमल स्वर हैं ,

मन महके तो अँधियारों में 
फूल रोशनी के खिलते हैं |

सपने जिस दिन पास न होंगे 
हम अपना आभास न होंगे ,
सपने जिनके साथ नहीं वो 
जीवन भर आकाश न होंगे ,

दुःख के फटे पुराने कपड़े 
सपने ही आखिर सिलते हैं |
तीन 
दिन ठहरते नहीं हैं 
किसी मोड़ पर |
क्या करें आँसुओं से 
इन्हें जोड़कर |

तुम मिले तो हुए दिन उमंगों भरे 
चाँदनी से धुले लाख रंगों भरे ,
जी रहे थे हमें भी अनूठे प्रहर 
अनगिनत गुनगुनाते प्रसंगों भरे ,

प्राण से प्राण ही 
सुन रहे थे मगर 
उठ गए तुम 
अधूरी कथा छोड़कर |

दिन फिसलते हुए जा रहे हैं जहाँ 
आदमी की जरूरत नहीं है वहाँ 
एक पल हम भले शीश पर बांध लें 
पर समय को कभी बांध पाए कहाँ ?

सोच कर देख लो 
क्या मिलेगा तुम्हें 
प्यार के गुनगुने 
आचरण छोड़ कर |
चार 
कौड़ी -कौड़ी माया जोड़ी 
बादर देख गगरिया छोड़ी |

गागर की चादर तानी थी 
चादर जो पानी -पानी थी ,
चादर ने ही समझाया फिर 
बेमतलब है भागा -दौड़ी |

अधरों -अधरों खेल तमाशे 
पानी आगे पीछे प्यासे ,
साँसों की जंजीर हवा सी 
आखिर इक दिन सबने तोड़ी |

झूठे -सच्चे सपन दिखाए 
कठपुतली सा नाच नचाए ,
उम्र मिली थी कितनी थोड़ी 
वह भी रही न साथ निगोड़ी |

जितनी भी जिनगानी पाई 
हँसते -रोते ,खेल बिताई ,
उसका नाच -नाच दुनिया में 
जिसने तुझसे डोरी जोड़ी |
पांच -गज़ल 
जिस सिम्त नज़र जाए ,वो मुझको नज़र आए 
हसरत है कि अब यूँ ही ,ये उम्र गुजर जाए |

आसार हैं बारिश के ,तूफां का अंदेशा है 
मौसम का तकाजा है अब कोई न घर जाए |

तामीरो -तरक्की का ये दौर तो है लेकिन 
ये सोच के डरता हूँ एहसास न मर जाए |

हो जिसका जो हक ले -ले गुलशन में बहारों से 
ये मौसम ए गुल यारों कल जाने किधर जाए |
छः -गज़ल 
वो जो थोड़ी मुश्किलों से हो के आजिज मर गए 
उनसे क्या उम्मीद थी और देखिए क्या कर गए |


उस इमारत को भला पुख्ता इमारत क्या कहें 
नींव में जिनकी लगाए मोम के पत्थर गए |


उम्र भर अन्धी गुफ़ाओं में रहे दरअस्ल हम 
इसलिए कल धूप में साये से अपने डर गए |


फूल खिलते हैं बड़ी उम्मीद से देखो इन्हें 
उम्र थोड़ी ,मुस्करा कर डालियों से झर गए |


बंट रहा है तेल मिट्टी का किसी ने जब कहा 
छोड़कर बच्चे मदरसा अपने -अपने घर गए |


हम किसी को क्या समझ पाते कि करते एहतराम 
हम तो अपने वक्त से पहले ही यारों मर गए |
सात -शतदल की हस्तलिपि में एक गीत 


14 टिप्‍पणियां:

  1. बड़ी गहरी कवितायें, पढ़कर आनन्द आ गया। आभार परिचय कराने का।

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  2. सुन्दर रचनायें!
    प्रस्तुति के लिए आभार!

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  3. लाजवाब कवितायेँ और ग़ज़ल...मज़ा आ गया...

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  4. आसार हैं बारिश के ,तूफां का अंदेशा है
    मौसम का तकाजा है अब कोई न घर जाए |
    वाह .. क्या कमाल की ग़ज़लें अहि ... और कवितायें तो लाजवाब है ही ...

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  5. बहुत अच्छा लिखा आपने !
    इसके लिए आपको बहुत बहुत बधाई !
    अब आपके ब्लॉग को फोलो कर रह हूँ तो आपकी रचनाओं को पड़ने लके लिए ब्लॉग पर आना होता रहगा
    मेरे ब्लॉग पर आये
    manojbijnori12 .blogspot.com

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  6. Behad sarthak kavitayen!

    आपकी पोस्ट बेहद पसंद आई! इसलिए आपको बधाई और शुभकामनाएं!

    आपका हमारे ब्लॉग
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    पर हार्दिक स्वागत है!

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  7. बहुत सुदर। यहां मै देखता हूं कि लेखन की गरिमा बनी हुई है।



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  8. बहुत सुंदर कविता लिखी आपने..बधाई.....
    मेरे ब्लॉग में आपका स्वगत है

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  9. आप सभी शुभचिन्तकों का सुनहरी कलम पर आने के लिए आभार |

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  10. दिन ठहरते नहीं हैं
    किसी मोड़ पर |
    क्या करें आँसुओं से
    इन्हें जोड़कर |
    _____________


    सचमुच.................

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  11. जिन मित्रों को कवितायें पसंद आयीं, उनका आभार. आज देखा तो अच्छा लगा कि मेरे प्रयास कुछ मित्रों को पसंद आये हैं.

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