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गुरुवार, 10 नवंबर 2011

गोपीकृष्ण गोपेश का काव्य संसार -गंगा से वोल्गा तक

प्रोफ़ेसर गोपीकृष्ण गोपेश 
समय -11-11-1925से 04-09-1974
जन्मदिन 11 नवम्बर पर विशेष प्रस्तुति 
परिचय -
इलाहाबाद के साहित्यिक उपवन को आज जो सुवासित संसार मिला है इनमें उन फूलों का विशेष योगदान है जो हवा के झोकों के साथ यहाँ आये और यहीं के हो गए |हिन्दी के लगभग सारे बड़े कवि /लेखक इलाहाबाद के नाते जाने -पहचाने जाते हैं ,लेकिन इनमें शायद ही किसी का जन्म इलाहाबाद की मिट्टी में हुआ हो |इसकी मिट्टी जन्मदात्री से अधिक पालनहार है |आज मैं जिस महान कवि /अनुवादक से आपको परिचित कराने जा रहा हूँ वह भी इलाहाबाद के नाते जाना और पहचाना जाता है लेकिन इस कवि का जन्म भी कहीं और ही हुआ  था |गंगा से वोल्गा तक का सफर तय करने वाले कवि /अनुवादक प्रोफेसर गोपी कृष्ण गोपेश जी का जन्म 11नवम्बर 1925[पुस्तक में जन्म 1923लिखा है जो गलत है ] को फरीदपुर [पीताम्बरपुर ]बरेली उत्तर प्रदेश में हुआ था और निधन 4सितम्बर  1974 को |इलाहाबाद विश्व विद्यालय से हिन्दी में स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल कर गोपेश जी शोध में दाखिला लिए लेकिन वह अपूर्ण ही रह गया |स्नातक से ही युवा कवि के रूप में पहचान मिल गयी थी |जाने माने हिन्दी के कवि हरिवंशराय बच्चन जी का गुरु के रूप में गोपेश जी को सानिध्य मिला और इलाहाबाद के सभी बड़े साहित्यकारों का आशीर्वाद गोपेश जी को उस समय मिला |भारती और डॉ० जगदीश गुप्त गोपेश जी के परम मित्रों में थे |जीवन के प्रारम्भिक दिनों में गोपेश जी आकाशवाणी इलाहाबाद से जुड़े फिर यहीं से आकाशवाणी कलकत्ता चले गए |कलकत्ता से मास्को चले गए वहाँ भी रेडियो मास्को में डेपुटेशन पर वापस लौटकर आकाशवाणी दिल्ली में कुछ दिन रहे |बाद में इलाहाबाद और दिल्ली विश्व विद्यालयों में रुसी भाषा का अध्यापन किये |मास्को में रहते हुए गोपेश जी मास्को विश्वविद्यालय में हिन्दी भी पढाते थे और वहाँ के प्रतिस्ठित पीपुल्स पब्लिशिंग हॉउस से भी जुड गए थे |पीपुल्स पब्लिशिंग हॉउस में रहते हुए गोपेश जी ने अनुवाद के क्षेत्र में अविस्मरणीय कार्य किया |प्रकाशित कृतियाँ ---किरन- काव्य संग्रह ,धूप की लहरें कविता संग्रह ,सोने की पत्तियाँ काव्य संग्रह [गीत और कवितायेँ ] तुम्हारे लिए- कविता संग्रह ,विदेशों के महाकाव्य अनुवाद ,पूँजीपति जार्ज गिसिंग की कहानियों का हिन्दी अनुवाद ,अर्वाचीन और प्राचीन नाटक ,कार्य और कारण [अपट्रेंस उपित्स के उपन्यास का अनुवाद इंसान का नसीबा शोलोखोव के उपन्यास का अनुवाद ,सोवियत संघ का संक्षिप्त इतिहास ,दास्तान चलती है अनातोली कुज्नेत्सोव के उपन्यास का अनुवाद ,हिन्दी कविता बदलती दिशाएं समीक्षा ,रातें रुपहली दिन सी दोस्तेपेव्सकी के उपन्यास का अनुवाद ,धीरे बहो दोन रे शोलोखोव के उपन्यास का अनुवाद ,वे बेचारे ला मिजरेबुल्स का अनुवाद अपूर्ण और अप्रकाशित |आज हम अंतर्जाल के माध्यम से प्रोफेसर गोपीकृष्ण गोपेश के रचना कर्म से आपको परिचित करा रहे हैं |गोपेश जी पर सामग्री उपलब्ध कराने के लिए  सुपरिचित कथाकार एवं इलाहाबाद विश्व विद्यालय के प्राणी विज्ञान विभाग में प्रोफेसर अनीता गोपेश [जो गोपेश जी की बड़ी लाडली बेटी हैं]के हम विशेष आभारी हैं - 
प्रोफ़ेसर गोपी कृष्ण गोपेश मास्को प्रवास के दौरान अपने सहकर्मी महिला दोस्तों के साथ 
कविताएँ -
एक 
पीले हाथ करती हैं सोने की पत्तियाँ 
पेड़ों से झरती हैं सोने की पत्तियाँ 

सुनते हैं बहुरि -बहुरि यह वसन्त आता है 
ज्यादा बीमार नहीं होने की पत्तियाँ 

बुलबुल के बोलों और कोयल की छेड़ों पर 
हर गिज़ हर बार नहीं रोने की पत्तियाँ 

साँसों ने झेला है ,गंधों का मेला है 
जादू के फूल और टोने की पत्तियाँ 

बात नहीं मानी है ,अबकी जिद ठानी है 
मन के साथ तन को नहीं ढोने की पत्तियाँ 

चाहो तो शबनम के आँसू पी डालो तुम 
हीरे कहाँ इतने पिरोने की पत्तियाँ 

नस -नस अलसानी है ,चेहरे पर पानी है 
मुँह का गुलाल नहीं धोने की पत्तियाँ 

चैत का महीना है रिस -रिस कर जीना है 
अपनी मुस्कान नहीं खोने की पत्तियाँ 
दो 
मैंने कभी 
इन्द्रधनुष देखा तो 
उसके सातो रंग झटके से चुरा लिए 
और उन्हें रेखाओं में छिपा दिया !

परन्तु 
तुम्हें मेरी यह हरकत सदा ही खली -
और तुमने 
कभी यह रंग पोंछ डाला ,
तो कभी वह ,
तो कभी वह |

आज स्थिति यह है 
कि इस प्रकार 
सात में पाँच रंग घुल चुके हैं ,
केवल दो शेष हैं |
मेरा प्रस्ताव है कि इनमें से भी एक को 
तुम रंग वाले डिब्बे में भर दो ,
और गली -मुहल्ले के बच्चों को दे दो 
कि अगली होली में 
वे इसे कंडाल भर पानी में घोल लें ,
और ,आने -जाने वाले 
हर परिचित - अपरिचित पर डाल दें |

बचा एक -
उसे तुम 
पालतू बना डालो .....
कुछ ऐसा करो 
कि उसे पिंजड़े की तीलियों से प्यार हो जाए |
वही उसके आकाश का सम्पूर्ण विस्तार हो जाए |

इसके बाद 
समान है तुम्हारे लिए -
सावन मास रोये या भादों मास गाये |
तुम तो महज वह करो 
जो तुम्हें रास आये |
तीन 
तुम्हें याद है ,
हुए बहुत दिन ,इसी पेड़ के नीचे ,
किसी शक्ति ने -
किसी शक्ति से प्राण हमारे खींचे .....
तब से यह बादल ,यह पानी 
भरी -भरी बरसात ,
मुझको लगती है ,जैसे हो किसी प्यार की रात 
घायल सपने खड़े हुए हों 
भरी आँख के पास |
आज कि पहिला पानी बरसा 
मन हो गया उदास |

तुम्हें याद है ,
हुए बहुत दिन इसी पेड़ के नीचे ,
हमने -तुमने 
सुधियों के कितने ही विरवे सींचे -
तब से उमड़े -घुमड़े बादल 
रूम झूम घनघोर 
अक्सर बहा -बहा ले जाते हैं पलकों की कोर 
और मुझे लगता है ,मेरे प्राण 
कि पिघली प्यास |
आज कि पहिला पानी बरसा 
मन हो गया उदास 
तुम्हें याद है 
हुए बहुत दिन तुम रोई मैं रोया 
और आँसुओं पर 
सर धर सोने का बादल सोया -
आज कि कल की बात लग गई 
जाने कैसे दिखने 
और अचानक बैठ गया हूँ 
मैं यह कविता लिखने 
डर है कहीं न उग आए 
मेरी साँसों पर घास |
आज कि पहिला पानी बरसा 
जन हो गया उदास 
मन हो गया उदास |
चार 
सूरज नहीं चाहिए हमको 
अब उधार की ज्वाला -
शक्ति हमारी देखो ,
हमने नया चाँद गढ़ डाला |

तुम्हें बहुत अभिमान कि तुमने 
तम का काजल छांटा 
इतने -इतने नक्षत्रों को 
सदा उजाला बाँटा |

हमने भी कुछ किया मगर 
हमको अभिमान नहीं है 
मानव मानव है ,मानव 
कोई भगवान नहीं है |

हम धरती पर बसनेवाले 
हमको धरती प्यारी -
चाँद गढ़ गया ,सूर्य देवता 
शीघ्र तुम्हारी बारी |

मानव ने धीरे -धीरे सब कुछ 
गढ़ने की ठानी -
क्या धरती ,क्या आसमान ,
क्या आगी औ क्या पानी |

देखो सपनों की सच्चाई 
तासीरें ,तदबीरें ,
देशकाल की सीमाओं की 
टूट गिरीं जंजीरें |

एक हिमालय -काकेशस है 
एक वोल्गा गंगा 
मानव मन में उभर रहा है 
इन्द्रधनुष सतरंगा |

भेद -विषमता और कलह की 
केंचुल छूट रही -
नई जिंदगी 
करवट लेती है ,
पौ फूट रही |
पांच 
मुझसे मेरा नाम न पूछो 

तुमको अनगिन चिन्तायें हैं ,तुम दुनिया के विचित्र मानव 
सह न सकेंगे दुर्बल जर्जर ,मेरी अंतर्ध्वनियों का स्वर 
अपना उजड़ा सा घर देखो 
मेरा उजड़ा ग्राम न पूछो 
मुझसे मेरा नाम न पूछो |

तुमको अपनी सौ साधे हैं ,तुमको अपने सौ धन्धे हैं 
मेरी साधे शव हैं जिनको दूभर मिलने दो कन्धे हैं 
मत पूछो मैं क्यों आया हूँ 
काम बढ़ेगा काम न पूछो 
मुझसे मेरा नाम न पूछो |

छः -प्रोफेसर गोपीकृष्ण गोपेश की हस्तलिपि में एक गीत अंश 

मास्को का लाल चौक -सबसे बाएं रुसी इन्टरप्रेटर
इसके बाद स्नेहलता गोपेश गोपेश जी की पत्नी ,गोपेश जी ,
डॉ० महेंद्र और आखिर में प्रभात गोपेश जी के पुत्र 

10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बहुत आभार गोपेश जी से और उनके रचना संसार से विस्तृत परिचय करने का.
    कवितायेँ दिल पर दस्तक देती हैं. आगे और कड़ियों का बेसब्री से इंतज़ार है.

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  2. कविता मन में तरंग छोड़ जाती हैं।

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...पढ़ कर आनंद आया ..

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  4. हमने भी कुछ किया मगर
    हमको अभिमान नहीं है
    मानव मानव है ,मानव
    कोई भगवान नहीं है |
    बहुत सुन्दर!
    सभी कवितायेँ हृदयस्पर्शी है!

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  5. इलाहाबाद का गौरव बढ़ाने वाले लोगों से मिल कर ख़ुशी होती है...गोपेश जी से रु-ब-रु करने के लिए...धन्यवाद...

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  6. आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा आज दिनांक 11-11-2011 को शुक्रवारीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  7. बहुत बहतरीन प्रस्तुती..गोपेश जी का परिचय कराने के लिए आभार ...
    मेरे पोस्ट में स्वागत है ....

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  8. bahut hi acchi prastuti hai...
    bahut hi sundar rachana hai...

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