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शनिवार, 5 नवंबर 2011

डॉ० विनोद निगम के गीत -नवगीत

कवि -डॉ० विनोद निगम 
सम्पर्क -09425642597
डॉ० विनोद निगम हिन्दी नवगीत विधा के प्रमुख हस्ताक्षर हैं |ये अपने आसपास विखरी हुई अनुभूतियों को ग्रहण कर उसे छन्द में ढाल कर गीत -नवगीत का सृजन करते हैं |यह सृजन बिना किसी हो हल्ला या शोरगुल के हो जाता है |बहुत ही शान्त और सहज लेखनी के धनी विनोद निगम स्वभाव से भी सहज और निर्मल हैं |विनोद निगम अधिक नहीं लिखते हैं लेकिन जो कुछ लिखते हैं वह सार्थक सृजन है |इनके नवगीत नवगीत दशक ,नवगीत अर्द्धशती ,कन्हैयालाल नन्दन द्वारा सम्पादित श्रेष्ठ हिन्दी गीत संचयन और स्वान्तः सुखाय जैसे समवेत संकलनों में संकलित हैं | जारी हैं यात्रायें लेकिन इनका नवगीत संकलन और अगली सदी हमारी होगी [कोरस गीतों का संकलन है ] डॉ० विनोद निगम का जन्म मशहूर शायर खुमार बाराबंकी के गृह जनपद बाराबंकी उत्तर प्रदेश में 10 अगस्त 1944 को हुआ |शिक्षा एम० ए० ,एम० काम० है |लोकप्रिय हिन्दी नवगीतकार उमाकांत मालवीय के व्यक्तित्व और कृतित्व पर 1994 में विनोद निगम ने पी० एच० डी०  की उपाधि हासिल किया |विनोद निगम के गीत देश की प्रतिष्ठित पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं | दूरदर्शन और आकशवाणी से इनकी कविताओं का प्रसारण होता रहता है |काव्य मंचों पर भी अपने गीतों से जन से जुड़ने का कार्य अब भी जारी है |जीवन के प्रारम्भिक कुछ वर्ष नवभारत टाईम्स मुम्बई में पत्रकारिता करने के बाद अध्यापन के पेशे से जुड़े विनोद निगम गवर्नमेंट्स गर्ल्स पी० जी० कालेज होशंगाबाद से वर्ष 2006 में विनोद निगम सेवानिवृत्त हो गए और हमेशा के लिए होशंगाबाद के ही हो गए |हम आज अंतर्जाल के माध्यम से विनोद निगम के रचना संसार से आपको परिचित करा रहे हैं -
डॉ० विनोद निगम के गीत -नवगीत 
एक 
इन चलते फिरते लोगों में भीड़ -भाड़ में 
याद तुम्हारी आ जाती है यह क्या कम है |

कितनी हैं उलझनें यहाँ रोटी -पानी की 
नहीं नशीले छंद ,जिंदगी ,रख सकते हैं 
मौसम की रंगीनी पेट नहीं भर सकती 
और नहीं ये सपने तन को ढक सकते हैं 

इतनी उड़ती गर्द ,धूल में अन्धकार में 
छवि न तुम्हारी मिट पाती है यह क्या कम है |

कोई उत्सव नहीं व्यर्थ की चहल -पहल है 
दौड़ रहे हैं लोग नहीं फिर भी थकते हैं 
छिड़ा हुआ संघर्ष यहाँ आगे जाने का 
गिर जाने की छूट न लेकिन रुक सकते हैं 

इतने शोर -शराबे में इस कोलाहल में 
हर ध्वनि तुमको गा जाती है यह क्या कम है |

आवागमन नहीं है लेकिन प्रगति नहीं है 
पहुँच रहे हैं लोग सभी बस एक विन्दु पर 
इतनी कुंठाओं में इतने बिखरेपन में 
हवा तुम्हें दुहरा जाती है यह क्या कम है |
दो 
और नहीं ,भीड़ भरा यह सूनापन 
आओ घर लौट चलें ओ मन !

आमों में डोलने लगी होगी गन्ध 
अरहर के आसपास ही होगें छन्द 
टेसू के दरवाजे होगा यौवन 
आओ घर लौट चलें ओ मन !

सरसों के पास ही खड़ी होगी 
मेड़ों पर अलसाती हुई बातचीत 
बंसवट में घूमने लगे होंगे गीत 
महुओं ने घेर लिया होगा आंगन 

खेतों में तैरने लगे होंगे दृश्य 
गेहूँ के घर ही होगा अभी भविष्य 
अंगड़ाता होगा खलिहान में सृजन 
आओ घर लौट चलें ओ मन !
तीन
सर पर तपती टीन ,पांव हैं दहके पत्थर में |
रोटी मुझे खींच लाई है ,इस जलते घर में |

एक खुशनुमा आंगन से ,मैं आया था चलकर 
सांसों में थे फूल ,हवा ,खुशबू के हस्ताक्षर 
दृग में भी भाषा चन्दन की ,वंशी कानों में 
एक नदी बहती थी मुझमें .एक मुझे छूकर 

घुटन ,पसीना ,हाँफ रहे क्षण ,धुआँ खिड़कियों भर 
अब तो यही कहानी है ,इस झुलसे छप्पर में |

वर्तमान ने मुझे दिया है यह सूखा मंजर 
वे सब आये हैं भविष्य से आतंकित होकर 
सूखे होंठ ,झूलते कन्धे बोझ किताबों के 
एक सदी जकड़े पाँवों को ,एक सदी सर पर 

साथी हम चौराहे तक ,फिर सफर अकेला है 
शहरों के हिंसक जंगल में ,सूखे सागर में |
चार 
घाटियों में ऋतु सुखाने लगी है 
मेघ धोये वस्त्र अनगिन रंग के 
आ गए दिन धूप के सत्संग के |

पर्वतों पर छंद फिर बिखरा दिये हैं 
लौटकर जाती घटाओं ने |
पेड़ फिर पढ़ने लगे हैं धूप के अखबार 
फुरसत से दिशाओं में |
निकल फूलों के रसीले बार से 
लड़खड़ाती है हवा 
पांव दो पड़ते नहीं हैं ढंग के |

बंध न पाई ,निर्झरों की बाँह ,उफनाई नदी 
तटों से मुँह जोड़ बतियाने लगी है |
निकल जंगल की भुजाओं से ,एक आदिम गन्ध 
आंगन की तरफ आने लगी है |

आँख में आकाश की चुभने लगी है 
दृश्य शीतल ,नेह -देह प्रसंग के |
पांच 
सड़कों से जुड़ना भर ,नियमों से टूटना ,
केवल उपलब्धि यही ,यह ही करते बना |

सुबह घुली बासी खबरों में 
धूप चढ़ी बिगड़े क्रम रोते ,
काली पड़ गयीं सभी शामें 
खालीपन कन्धों पर ढोते 

व्यर्थों से जुड़ना 
संदर्भों से छूटना ,
लेखे चर्चाओं के ,यह ही करते बना |

पग -पग पर समझौते -
चाहे -अनचाहे 
पी गए भविष्य ,भीड़ पीते चौराहे ,
वर्तमान ने भोगा हमको कुछ ऐसे 
होते हम हवन ,दूसरे गए सराहे |

आमों को बोना ,
लेकिन बबूल काटना ,
यह ही करते रहे ,यह ही करते बना |
छः 
अब घर के सारे दरवाजे खोल दो ,
किरणों को अन्दर तक आने को बोल दो |

पानी के मौसम में बन्द पड़े कमरे हैं 
भारी मजबूरी में लोग यहाँ ठहरे हैं ,
पर्दों पर छीटों के दाग अभी गहरे हैं 
भीतर की  सीलन में धूप जरा घोल दो |

मन कब से भारी है रिसते गीलेपन से 
कितने क्षण बंधा रहूँ भींगे घर -आंगन से ,
ठहरी सी रही हवा ,लिपटी -लिपटी तन से 
पी लें ख़ामोशी ,पल ऐसे अनमोल दो |

पिघले दीवारों पर जमा हुआ सूनापन 
धूल के ,उदासी के ,मेज़ों पर बिखरे कन ,
फैले उजियारे का आकर्षण ,सम्मोहन 
रोशनी समेटो सारे बन्धन खोल दो |
सात  -विनोद निगम की हस्तलिपि में एक गीत 

13 टिप्‍पणियां:

  1. एक से एक सुन्दर कवितायें। आभार परिचय का।

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  2. इस सशक्त कलम का परिचय कराने के लिए आभार आपका !

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  3. कविताओं के माध्यम से डा. विनोद निगम से परिचय करवाने के लिए धन्यवाद...

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  4. एक से बढ़कर एक कवितायेँ! बढ़िया लगा!
    मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://seawave-babli.blogspot.com/
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.com/

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  5. वाह यहाँ आकार दिल खुश हो गया एक एक पंक्ति सच्चाई बयाँ करती हुई बहुत ही खूबसूरत रचना |डॉ० विनोद निगम जी का परिचय करवाने और उनकी खूबसूरत कवितायेँ पढाने का शुक्रिया |

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  6. खेतों में तैरने लगे होंगे दृश्य
    गेहूँ के घर ही होगा अभी भविष्य
    अंगड़ाता होगा खलिहान में सृजन
    आओ घर लौट चलें ओ मन !

    ___________________________

    काश लौट पाते हम भी ....

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  7. बहुत सुंदर दिल को भाती रचनाये
    डा० विनोद निगम से परिचय करने
    एवं उनकी रचनाये पढाने का आभार

    मेरे नए पोस्ट-वजूद-में स्वागत है ...

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  8. tushar ji,aap bahut mahattvapoorn karya kar rahe hai,meri hardik badhai.
    anand aagaya in geeto ko padh kar.aabhaar

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