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गुरुवार, 13 अक्तूबर 2011

विवेक निराला की कविताएँ

कवि -विवेक निराला 
सम्पर्क -09415289529
विवेक निराला समकालीन हिन्दी कविता के एक सशक्त और महत्वपूर्ण युवा हस्ताक्षर हैं |हिन्दी साहित्य के महान और कालजयी कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला की चौथी  पीढ़ी में जन्मा यह कवि उनके सबसे बड़े पौत्र  स्व० गिरिजा कान्त त्रिपाठी का बेटा है | महाप्राण निराला के एक पुत्र रामकृष्ण त्रिपाठी और एक पुत्री सरोज थीं जिनकी स्मृति में सरोज स्मृति की रचना की गयी थी |रामकृष्ण त्रिपाठी जी की चार संतानें हैं -स्व० गिरिजा कान्त त्रिपाठी ,श्री अवधेश त्रिपाठी ,श्री अमरेश त्रिपाठी और श्री अखिलेश त्रिपाठी |  विवेक निराला का जन्म 30 जून 1974 को इलाहाबाद में महाप्राण निराला के घर -आंगन में उनके प्रपौत्र के रूप में हुआ |इलाहबाद विश्व विद्यालय से एम० ए० [हिन्दी ]डी० फ़िल० की उपाधि हासिल कर विवेक निराला इस समय भवन्स मेहता महाविद्यालय भरवारी ,कौशाम्बी में अध्यापन कार्य कर रहे हैं |विवेक निराला उत्तर प्रदेश जनवादी लेखक संघ के संयुक्त सचिव भी हैं | स्वभाव से सौम्य और सहृदय इस कवि की कवितायें देश की लगभग सभी प्रतिस्ठित पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं | विवेक निराला की कविताओं में व्यवस्था का विरोध सहज ही देखा जा सकता है |जनवादी तेवर और कलेवर ,कबीर का फक्कड़पन ,समकालीन चेतना से लैस इनका काव्य संसार वाकई निराला है |साहित्य का संस्कार तो इन्हें अपने कुल -गोत्र से ही मिला है | कृतियाँ --निराला साहित्य में दलित चेतना ,एक बिम्ब है यह [काव्य संग्रह ]और अभी हाल ही में लोकभारती से निराला साहित्य में प्रतिरोध के स्वर प्रकाशित हुई है | इस विलक्षण और महत्वपूर्ण कवि की कुछ कविताओं से आज हम आपको परिचित करा रहे हैं -
समकालीन कविता के सशक्त हस्ताक्षर विवेक निराला की कविताएँ 
एक [महाप्राण निराला से ]
बाबा !
थोड़ा तो इंतज़ार किया होता 
न ज्यादा सही 
कम से कम 
मेरे पैदा होने तक |

मैं देख लेता 
तुम्हारा दिव्य उन्नत माथ 
तुम्हारा शब्द- शिल्पी हाथ |

उँगलियाँ पकड़कर 
चलना सिखा दिया होता 
यों गोद में उठा लिया होता 
तो सँवर जाता मैं |

बड़े जल्दबाज निकले बाबा !
थोड़ा रुक जाते 
कम से कम मेरे पैदा होने तक 
तो मैं जान पाता 
तुम्हारा दुःख 
कि तुम्हारी एक आँख में 
तैरता हुआ 
कोई लाल भभूका 
अंगार 
और दूसरी आँख में 
पानी की 
चमकदार बूंद क्यों है ?

तुम्हारा सुमिरन करते हुए 
मैं कहीं अन्दर तक 
उजास से भर जाता हूँ 
बाबा !
दो-बाबा और तानपूरा[ निराला जी के सुपुत्र रामकृष्ण त्रिपाठी के लिए ]
घर के एक कोने में 
खड़ा रहता था 
बाबा का तानपूरा 
एक कोने में 
बाबा पड़े रहते थे |

तानपूरा जैसे बाबा 
बाबा पूरे तानपूरा 
बुढ़ाते गए बाबा 
बूढ़ा होता गया तानपूरा 
झूलती गयी बाबा की खाल 
ढीले पड़ते गये 
तानपूरे के तार |

तानपूरे वाले बाबा 
बाबा वाला तानपूरा 
असहाय नहीं है 
इनमें से कोई भी 
बल्कि हमारी पीढ़ी में ही 
कोई साधक नहीं हुआ |
तीन -उस स्त्री के भीतर की स्त्री के बारे में 
उस स्त्री के भीतर 
एक घना जंगल था 
जिसे काटा -
उजाड़ा जाना तय था 

उस स्त्री के भीतर 
एक समूचा पर्वत था 
जिसे समतल 
कर दिया जाना था |

उस स्त्री के भीतर 
एक नदी थी 
बाढ़ की अनन्त 
संभावनाओं वाली 
जिसे बांध दिया जाना था |

उस स्त्री के भीतर 
एक दूसरी देह थी 
जिसे यातना देते हुए 
क्षत -विक्षत किया जाना था |

किन्तु उस स्त्री के भीतर 
एक और स्त्री थी 
जिसका कोई कुछ 
नहीं बिगाड़ सकता था |
चार -पृथ्वी उदास है 
एक दिन घूमते -घूमते 
अचानक पृथ्वी उदास हो गयी |
सहम गये ग्रह -उपग्रह -नक्षत्र सब 
खगोलशास्त्रियों ने 
टेलीस्कोप निकाले 
और आसमान ताकते रहे |

राष्ट्राध्यक्षों ने 
राष्ट्रीय ध्वज झुका लिए 
मगर पृथ्वी उदास रही |

कवियों ने गीत लिखे 
उदासमना पृथ्वी के लिए 
चित्रकार उल्लसित पृथ्वी की 
विभिन्न मुद्राएं बनाते रहे 
नर्तकों ने घुंघरू पाँवों से उतारे 
और शताब्दी को 
नर शताब्दी की संज्ञा देते हुए 
जी भर कर कोसा 
फिर भी पृथ्वी उदास रही |

पृथ्वी अब भी उदास है 
कि राजा जनक के बाद 
किसी किसान के हल का फल 
किसी घड़े से 
टकराया क्यों नहीं ?
पांच -प्रतीक 
भाषा में देश था 
देश में धर्म |

धर्म में नायक थे 
नायकों में राम |
राम में भय था |
भय का पार्टी से लेकर 
भेड़िये तक कई प्रतीक थे |

प्रतीकों में प्रेम नहीं था 
प्रेम का प्रतीक कोई नहीं था |
छः -ईश्वर [अपने गुरू सत्यप्रकाश मिश्र के लिए ]
लोग उसे ईश्वर कहते थे |


वह सर्वशक्तिमान हो सकता था 
झूठा और मक्कार 
मूक को वाचाल करने वाला 
पुराण -प्रसिद्ध ,प्राचीन |


वह अगम ,अगोचर और अचूक 
एक निश्छल और निर्मल हँसी 
खतरनाक चुप्पी में बदल सकता है |


मैं घृणा करता हूँ 
जो फटकार कर सच बोलने 
वाली आवाज घोंट देता है |


ऐसी वाहियात सत्ता को 
अभी मैं लत्ता करता हूँ |
सात - विवेक निराला की हस्तलिपि में एक कविता 

11 टिप्‍पणियां:

  1. बेहद संवेदनशील सभी की सभी. मुझे बाबा और स्त्री वाली बेहद पसंद आईं..दिल को छूने वाली अभिव्यक्ति.आभार आपका और निराला जी को नमन.

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  2. निराला जी की मशाल सही हाथों में पड़ी है... किसी ने इस विरासत को अपने ही तरीके से सम्हाल रक्खा है...विवेक को पढ़ कर बहुत अच्छा लगा...

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  3. मन को छू जाती निराला पर लिखी कवितायें।

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  4. बड़ा कठिन समय रहा होगा
    जब एक पीढ़ी ने कही होगी
    कोई कहानी, जिसे
    एक दूसरी पीढ़ी ने चुपचाप सुन लिया होगा

    एक स्पष्ट चित्र खींचने में सक्षम इन कविताओं को पढ़ कर खुशी हुई
    निराला जी को बधाई व साधुवाद

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  5. बहुत सुन्दर लगी सारी कवितायेँ ! शानदार प्रस्तुती!
    मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/
    http://seawave-babli.blogspot.com

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  6. गज़ब की प्रस्तुति तुषार जी !
    विवेक निराला जी की रचनाएं ह्रदय तक पहुँचती हैं |

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  7. सभी प्रस्तुतियाँ बेहद संवेदनशील ....... निराला जी का नामांश आपके साथ उचित प्रतीत होता है ......

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  8. बहुत ही उम्दा रचनायें पढ़वाई...आभार.

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  9. बेहद संवेदनशील रचनाएं ... व्यवस्था को छूती हुयी ... कालजयी रचनाएँ हैं सभी ...

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