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शनिवार, 8 अक्तूबर 2011

डॉ० श्रीपाल सिंह क्षेम का काव्य संसार

कवि -डॉ० श्रीपाल सिंह क्षेम 
समय -02-09-1922 से 22-08-2011
इतिहास में उत्तर प्रदेश के जनपद जौनपुर को सिराज़ -ए -हिन्द कहा जाता है |गोमती नदी के तट पर बसा यह शहर अपनी राजनैतिक ,सांस्कृतिक और साहित्यिक गतिविधियों के लिए सदैव सजग और सचेत रहा है |इस जनपद के कवियों में डॉ० श्रीपाल सिंह क्षेम का नाम बड़े आदर से लिया जाता है |विगत 22अगस्त 2011को इस साहित्य मनीषी का निधन हो गया |डॉ० श्रीपाल सिंह क्षेम का जन्म 02 सितम्बर 1922 को ग्राम -बशारतपुर ,सादनपुर जौनपुर में एक संभ्रांत क्षत्रिय परिवार में हुआ था | हिन्दी और संस्कृत विषय में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की उपाधि हासिल कर अपना शोध कार्य डॉ० श्रीपाल सिंह क्षेम ने काशी विद्यापीठ से संपन्न किया |डॉ० श्रीपाल सिंह क्षेम का जब काव्य जगत में पदार्पण हुआ तब हिन्दी कविता का छायावादी स्वर मुखरित था |यही स्वर डॉ० श्रीपाल सिंह क्षेम का भी आजीवन बना रहा |हिन्दी के काव्य मंचों पर बड़ी तन्मयता से डॉ० श्रीपाल सिंह क्षेम अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे |जौनपुर के इंग्लिश क्लब में इनकी उपस्थिति में भव्य कवि सम्मेलन हुआ करते थे ,जहाँ देश के नामी गिरामी कवि शामिल होते थे |डॉ० श्रीपाल सिंह क्षेम अध्ययन और अध्यापन के पेशे से जुड़े रहे |तिलकधारी स्नातकोत्तर महाविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त [लगभग तीस वर्ष पूर्व ]हुए थे |कृतियाँ -गीत और कविता ,नीलमतरी ,ज्योतितरी ,जीवनतरी ,संघर्ष -तरी ,रूप तुम्हारा प्रीति हमारी ,रुपगंधा ,गीतगंगा ,अंतर्ज्वाला ,रख और पाटल ,मुक्त कुन्तला ,मुक्त गीतिका ,गीत जन के परासर की सत्यवती और कृष्ण द्वैपायन महाकाव्य |गद्य -छायावाद की काव्य साधना ,छायावाद के गौरव चिन्ह ,तथा छायावादी काव्य की लोकतान्त्रिक पृष्ठभूमि [शोध प्रबंध ]उपाधियाँ -हिन्दी सेवा संस्थान प्रयाग से साहित्य महारथी ,हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग से साहित्य वाचस्पति की सर्वोच्च मानद उपाधि से विभूषित |वीर वहादुर सिंह पूर्वांचल  विश्व विद्यालय ,जौनपुर द्वारा पूर्वांचल रत्न उपाधि से सम्मानित |ठाकुर गोपाल शरण सिंह काव्य पुरस्कार के प्रथम विजेता ,रघुराज पुरस्कार ,उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के प्रतिस्ठित साहित्य भूषण सम्मान एवं अन्य कई पुरस्कारों से सम्मानित डॉ० श्रीपाल सिंह क्षेम का एक गीत एवं कृष्ण द्वैपायन महाकाव्य के कुछ छंद हम आप तक अंतर्जाल के माध्यम से पहुंचा रहे हैं -सम्पर्क -श्रीमती द्रौपदी क्षेम [क्षेम जी की धर्मपत्नी ]-09918441870 श्री शशि मोहन सिंह क्षेम  सुपुत्र [डॉ० श्रीपाल सिंह क्षेम] -09415207122

डॉ० श्रीपाल सिंह क्षेम अपनी द्वितीय धर्मपत्नी श्रीमती द्रौपदी क्षेम के साथ 
एक गीत -जभी से जगे रे भाई 

निंदिया घरों से देखो ,धूपिया मुंडेरा है |
जभी से जगो रे भाई ,तभी से सवेरा है ||

खिड़की के रंग छूटे ,सारे दर्पण टूटे 
कागजी  अनार झूठे ,भावी कचनार ठूँठे 
वनों में उजाली नाचे ,मनों में अँधेरा है |
जभी से जगे रे भाई ,तभी से सवेरा है ||

सिन्ध सुलगाये आग ,झेलम रचाये फाग 
होली -सी उठी रे लाग ,उड़ती अगेरी झाग 
हवा झंझाकारी उठी ,लपटों का घेरा है |
जभी से जगे रे भाई तभी से सवेरा है ||

आह कैसी अनरीति ,टूक -टूक हुई प्रीति 
सम्प्रदाय वाली नीति ,बाँट रही हिंसा भीति 
संत भी डकैती डाले ,पन्थ भी लुटेरा है |
जभी से जगे रे भाई ,तभी से सवेरा है ||

कश्मीरी लाम सोया ,तमिलों का धाम सोया 
बिगड़ा आसाम सोया ,चिढ़ा मिज़ोराम सोया 
सभी ऑंखें मूंदे सोये ,कोई न जगेरा है |
जभी से जगे रे भाई तभी से सवेरा है ||

जाति के प्रमाद जागे ,क्षेत्र के विवाद  जागे 
कुर्सियों के स्वाद जागे ,सौ -सौ उन्माद जागे 
व्याधी -अपराधी जागे ,न्याय ही निंदेरा है |
जभी से जगे रे भाई तभी से सवेरा है ||

नाग ये विवेकहीन ,नाच रहे पराधीन 
कोई तो बजाये बीन ,पाक हो कि कोई चीन 
पर्दे के पीछे छिपा दूर का सपेरा है |
जभी से जगे रे भाई ,तभी से सवेरा है ||

सड़ी छान फूस मांगे ,बेटू लेमनचूस मांगे 
रात -पानी पूस मांगे ,खेती बड़ा घूस मांगे 
सभी उपभोगी एक कृषक कमेरा है |
जभी से जगे रे भाई ,तभी से सवेरा है ||

बेटी -व्यवहार बिके ,तीज -त्यौहार बिके 
डोली के कहार बिके ,कवि -कलाकार बिके 
स्याही ने शपथ भेजी लेखनी ने टेरा है |
जभी से जगे रे भाई ,तभी से सवेरा है || 

हिंदू या मुसलमान ,सिक्ख हो या क्रिस्तान 
जिसमें भी हो ईमान ,उसी का है हिन्दुस्तान 
देश को रँगे जो ,वही देश का चितेरा है |
जभी से जगे रे भाई तभी से सवेरा है ||
दो 
कृष्ण द्वैपायन महाकाव्य के कुछ छंद 
तप -त्याग के है नख से निकली ,
किसी एक कमण्डलु की ही न थी |
कितनी ही जटाओं से पार हुई ,
कितनी हिम -घाटियों की है पथी ||
यह मुक्ति की धार न एक ही है ,
सबके श्रम से यह माही -मथी |
सबके हित में बहने दो इसे, 
सबके हित को यह भागीरथी ||

बनी धर्म का शास्त्र ;मनु स्मृति जो, ,
तम -बीच जो एक अँजोर बनी ||
विधि -रूप में धर्म प्रतिष्ठ हुआ ,,
अनुशासन की नई भोर बनी ||
जब राजस शक्ति मिली इसको ,
कुल -तन्त्र की तो दृग कोर बनी |
कुछ क्षेपक बीच में जोड़े गए ,
स्मृति तो फिर और कठोर बनी ||

यदि लोक है न्याय से वंचित तो -
इसके लिए नव्य निदान बने |
कोई ;शीश ;कोई भुज ,पेट कोई 
पद रूप कोई अवमान बने ||
यदि वर्ण -व्यवस्था हो कर्मणा तो ,
फिर कर्म न क्यों प्रतिमान बने |
यदि इष्ट हो राष्ट्र बलिष्ठता तो ,
स्मृति का नया एक विधान बने ||

किसी वर्ग विशेष की ही प्रभुता ,
हर क्षेत्र के बीच प्रधान बने |
समता का जहाँ गुरु ज्ञान न हो ,
जहाँ शासन ही अधिमान बने ||
अब एक ही है औचित्य यहाँ ,
स्मृति का कोई और विधान बने ||
तीन 
डॉ० श्रीपाल सिंह क्षेम की हस्तलिपि में एक छंद -


सम्मान ग्रहण करते डॉ० श्रीपाल सिंह क्षेम 

7 टिप्‍पणियां:

  1. पूर्वांचल ही क्यों भारत के साहित्यिक संसार के युग स्तम्भ रहे हैं क्षेम जी -आभार उन्हें यहाँ लाने के लिए !

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  2. अभी कुछ दिन पहले डॉ मनोज मिश्र ने भी उनकी याद दिलाई थी , आभार आपका क्षेम जी के बारे में जानकारी देने के लिए ! हस्तलिखित रचना देख अच्छा लगा !
    शुभकामनायें आपको !

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  3. इस साहित्य स्तम्भ को मेरा भी नमन और आपका आभार परिचय कराने के लिए.........

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  4. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

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  5. सबके हित में बहने दो इसे,
    सबके हित को यह भागीरथी |
    अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

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