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शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

कवि केदारनाथ अग्रवाल की प्रतिनिधि कविताएँ

कवि -केदारनाथ अग्रवाल 
समय [01-04-1911से 22-06-2000]
केदारनाथ अग्रवाल का काव्य संसार विविधताओं से भरा है |इनकी काव्य -यात्रा 1930-31शुरू होती है |प्रारम्भ के छः -सात वर्षों तक की उनकी कविताएँ केवल भाववादी रुझान की हैं ,लेकिन बाद में वह जीवन की विसंगतियों ,राजनीति और वक्त से मुठभेंड़ करते दिखाई देते हैं |1937 से आगे का समय उनकी कविताओं में बदलाव का समय है |केदारनाथ अग्रवाल का जन्म 1अप्रैल 1911में बाँदा,उत्तर प्रदेश  [गाँव -कमासिन ]में हुआ था |स्नातक की शिक्षा इलाहबाद विश्वविद्यालय और एल०एल०बी० की शिक्षा डी० ए० वी० कालेज कानपुर से हुई थी |निधन 22 जून 2000 को हुआ |अब तक अनुवाद सहित कुल 29 कृतियाँ प्रकाशित हैं -युग की गंगा ,नींद के बादल ,लोक और अलोक ,फूल नहीं रंग बोलते हैं ,आग का आईना ,गुलमेहंदी ,आधुनिक कवि ,पंख और पतवार ,हे मेरी तुम ,मार प्यार की थापें ,बम्बई का रक्त स्नान ,कहें केदार खरी -खरी ,जमुन जल तुम ,अपूर्वा ,बोले बोल अबोल ,जो शिलाएँ तोड़ते हैं ,आत्म -गंध ,अनहारी हरियाली खुली आँखें खुले डैने ,पुष्प दीप ,बसन्त में प्रसन्न हुई पृथ्वी ,कुहकी कोयल खड़े पेड़ की देह अनुवाद -देश -देश की कविताएँ ,समय -समय पर ,विचार बोध विवेक- विवेचन उपन्यास -पतिया  यात्रा -वृतान्त बस्ती खिले गुलाबों की [रूस की यात्रा का वृतान्त ],पत्र -साहित्य ,मित्र -संवाद पुरस्कार सोवियत लैंड नेहरु पुरस्कार उत्तर -प्रदेश हिंदी संस्थान का विशिष्ट पुरस्कार अपूर्वा पर 1986 का साहित्य अकादमी सम्मान मध्य प्रदेश साहित्य परिषद भोपाल का तुलसी सम्मान और मैथिलीशरण गुप्त सम्मान से सम्मानित इस कवि के रचना संसार से आज हम आपको परिचित कराने की एक कोशिश कर रहे हैं -
एक 
आज नदी बिलकुल उदास थी ,
सोयी थी अपने पानी में ,
उसके दर्पण पर 
बादल का वस्त्र पड़ा था |

मैंने उसको नहीं जगाया ,
दबे पाँव घर वापस आया | 10-03-58
दो 
हम न रहेंगे -
तब भी तो यह खेत रहेंगे ,
इन खेतों पर घन घहराते 
शेष रहेंगे 
,
जीवन देते ,
प्यास बुझाते 
माटी को मद-मस्त बनाते ,
श्याम बदरिया के 
लहराते केश रहेंगे !

हम न रहेंगे -
तब भी तो रति- रंग रहेंगे ,
मधु के दानी 
मोद मनाते ,
भूतल को रससिक्त बनाते ,
लाल चुनरिया में 
लहराते अंग रहेंगे |10-03-58
तीन 
मार हथौड़ा ,
कर कर चोट 
लाल हुए काले लोहे को 
जैसा चाहे वैसा मोड़ |

मार हथौड़ा 
कर कर चोट 
थोड़े नहीं -अनेकों गढ़ ले 
फौलादी नरसिंह करोड़ |

मार हथौड़ा 
कर कर चोट 
लोहू और पसीने से ही 
बंधन की दीवारें तोड़ |

मार हथौड़ा 
कर कर चोट 
दुनिया की जाती ताकत हो 
जल्दी छवि से नाता जोड़ !
चार 
माँझी !न बजाओ वंशी 
माँझी !न बजाओ वंशी मेरा मन डोलता 
मेरा मन डोलता है जैसे जल डोलता 
जल का जहाज जैसे पल -पल डोलता 
माँझी !न बजाओ वंशी मेरा प्रन टूटता 
मेरा प्रन टूटता है जैसे त्रिन टूटता 
त्रिन का निवास जैसे बन बन टूटता 
माँझी !न बजाओ वंशी मेरा तन झूमता 
मेरा तन झूमता है तेरा तन झूमता 
मेरा तन तेरा तन एक बन झूमता -1946
पांच 
मेरी कविताएँ गायेगी जनता सस्वर 
नहीं सहारा रहा 
धरम का और करम का 

एक सहारा है 
बस मुझको नेक करम का ,
जरा -मरण से हार न सकते 
मेरे अक्षर 
मेरी कविताएँ गायेगी 
जनता सस्वर |28-05-85
छः 
न आग है 
न पानी ,
देश की राजनीति 
बिना आग -पानी के 
खिचड़ी पकाती है 
जनता हवा खाती है |
सात -केदारनाथ अग्रवाल की हस्तलिपि में एक कविता [यह कविता हस्तलिपि में हमें प्रोफेसर संतोष भदौरिया जी ने दिया है जो कि अंतर्राष्ट्रीय महात्मा गाँधी हिंदी विश्व विद्यालय वर्धा में हिंदी के प्रोफेसर हैं |हम उनके आभारी हैं -
सुनहरी कलम से 
केदारनाथ अग्रवाल हिंदी की प्रगतिशील काव्यधारा के ख्यातनाम कवि है |केदार जी के यहाँ समाज की विद्रूपताओं के अनेक बिम्ब मिलते हैं उनके जन्म शताब्दी वर्ष में उनकी कविताओं का पुनः पाठ और पुनर्मूल्यांकन जरूरी है |देश के छोटे से कस्बे [बुन्देलखण्ड के ]में रहकर उन्होंने व्यापक सरोकारों की कविता लिखी |केदार बुन्देलखण्ड की जमीन और जनता से आजीवन मुखातिब रहे और वहाँ की तकलीफों को अपनी कविताओं का विषय बनाया |
प्रोफेसर संतोष भदौरिया प्रोफेसर अंतर्राष्ट्रीय महात्मा गाँधी हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा 
केदारनाथ अग्रवाल तल्खियों को जीवन में ढाल देने वाले कुछ विरल कवियों में से एक हैं |वे लोहे जैसे बिम्ब को उठाते हैं और उसे बुन्देलखण्ड क्षेत्र की महिलाओं के जीवन संघर्ष से जोड़कर उसे लोहा जैसे गलते ,ढलते और फिर गोली जैसे चलते देखते हैं |यह कवि की ही दृष्टि है जो लोहे को करोड़ों फौलादी नरसिंह में बदलकर इस दुनिया को भय ,अत्याचार और अन्याय से मुक्त कर एक बेहतरीन समाज की रचना हेतु प्रतिबद्ध दिखायी पड़ती है |केदार जी की कविताओं में देशज और ग्राम्य गंधा प्रकृति का सहज साक्षात्कार किया जा सकता है |जिसके बिना लोक ,जन और भारतीयता की परिभाषा अपूर्ण है |
संतोष चतुर्वेदी संपादक अनहद एवं जाने माने युवा  कवि 

11 टिप्‍पणियां:

  1. मार हथौड़ा ,
    कर कर चोट
    लाल हुए काले लोहे को
    जैसा चाहे वैसा मोड़ |

    इस ब्लॉग के माध्यम से हिंदी साहित्य की बेहतरीन सेवा कर रहे हैं आप

    उत्तर देंहटाएं
  2. वंदना जी आपके इस स्नेह और उत्साहवर्धन हेतु आभार

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  3. केदार जी की लेखनी के बारे मे कुछ कहने योग्य तो नहीं , मगर इस ब्लोग के ज़रीए अछी रचनाएँ पढने को मिलती हैं, और हमेशा इंतज़ार रहता है , कुछ नये का... बहुत शुक्रिया तुषार जी...

    अर्श

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  4. जितना पढ़ रहा हूँ, प्रभावित हो रहा हूँ।

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  5. आदरणीय प्रवीण पाण्डेय जी अर्श जी आप सभी के उत्साहवर्धन के कारण ही हम कुछ कर पा रहे हैं |हम और भी बेहतर कोशिश करेंगे |

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  6. j. k. Tushar ji

    sundar prastuti ke liye badhai sweekaren.
    मेरी १०० वीं पोस्ट , पर आप सादर आमंत्रित हैं

    **************

    ब्लॉग पर यह मेरी १००वीं प्रविष्टि है / अच्छा या बुरा , पहला शतक ! आपकी टिप्पणियों ने मेरा लगातार मार्गदर्शन तथा उत्साहवर्धन किया है /अपनी अब तक की " काव्य यात्रा " पर आपसे बेबाक प्रतिक्रिया की अपेक्षा करता हूँ / यदि मेरे प्रयास में कोई त्रुटियाँ हैं,तो उनसे भी अवश्य अवगत कराएं , आपका हर फैसला शिरोधार्य होगा . साभार - एस . एन . शुक्ल

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  7. बहुत अच्छी प्रस्तुति....इस ब्लॉग के माध्यम से हिंदी साहित्य की बेहतरीन रचनाए पढ़्ने को मिली है... आभार

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  8. केदार जी मेरे प्रिय कवियों में से एक हैं. उनके बारे में इस महत्वपूर्ण प्रस्तुति के लिए आभार.

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  9. डॉ० मिश्र जी ,डॉ० शरद जी और आदरणीय माहेश्वरी कनेरी जी आप सभी का आभार

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  10. एक महान कवि की रचनायें शेयर करने के लिए धन्यवाद...

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