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मंगलवार, 6 सितंबर 2011

छः नवगीत -कवि मयंक श्रीवास्तव

कवि -मयंक श्रीवास्तव 
संपर्क -09977121221
सुहाग का  प्रतीक खनखनाती विविध रंगी  चूड़ियों का शहर फिरोज़ाबाद और झीलों -तालों का शहर भोपाल जिसकी मिट्टी में सांस्कृतिक विविधता और साहित्य के विविध रंग रचे -बसे हैं |इसी शहर की आबोहवा में हिन्दी नवगीत के वरिष्ठ कवि मयंक श्रीवास्तव बहुत दिनों से कुछ गुनगुनाते चले आ रहे हैं |मयंक श्रीवास्तव ने  प्रेसमेन वीकली के माध्यम से हिन्दी नवगीत को काफी समृद्ध किया |सीधे -सादे व्यक्तित्व वाले इस कवि का जन्म 11-04-1942 को उत्तर प्रदेश के फिरोज़ाबाद के  ऊंदनी गांव में हुआ था |मयंक जी का वास्तविक नाम सुरेशचंद्र श्रीवास्तव है |माध्यमिक शिक्षा सेवा मंडल मध्य प्रदेश में लम्बे समय तक सहायक सचिव के महत्वपूर्ण पद पर रहे किन्तु बाद में स्वैक्षिक सेवानिवृत्ति ले लिए |मयंक जी के गीत डॉ० शम्भुनाथ सिंह जी द्वारा सम्पादित नवगीत अर्धशती में भी प्रकाशित हैं |कृतियाँ   -सूरज दीप धरे ,सहमा हुआ घर ,इस शहर में आजकल और उँगलियाँ उठतीं रहें सभी नवगीत संग्रह हैं ,अभी हाल में पहले पहल प्रकाशन भोपाल से एक गीतिका /गज़ल संग्रह रामवती  प्रकाशित हुआ है |मयंक जी बिना किसी खेमे /गुट के ही अपने सृजन के पथ पर अग्रसर हैं |हम आज अंतर्जाल के माध्यम से मयंक श्रीवास्तव के छः  गीत आप तक पहुंचा रहे हैं 
एक 

आग लगती जा रही है 
अन्न -पानी में |
और जलसे हो रहे हैं 
राजधानी में |


रैलियाँ पाबंदियों को 
जन्म देती हैं ,
यातनाएं आदमी को 
बांध लेती हैं ,
हो रहे रोड़े बड़े 
पैदा रवानी में |


खेत में लाशें पड़ी हैं 
बन्द है थाना ,
भव्य भवनों ने नहीं 
यह दर्द पहचाना ,
क्यों बुढ़ापा याद आता 
है जवानी में |


लोग जो भी इस 
ज़माने में बड़े होंगे ,
हाँ हुजूरी की नुमाइश 
में खड़े होंगे ,
सुख दिखाया जा रहा 
केवल कहानी में |
दो 
आह भरती है नदी 
टेर उठती है नदी 
और मौसम है कि उसके 
दर्द को सुनता नहीं |

रेत बालू से अदावत 
मान बैठे हैं किनारे 
जिंदगी कब तक बितायें 
शंख -सीपी के सहारे 
दर्द को सहती नदी 
चीखकर कहती नदी 
क्या समुन्दर में नया 
तूफान अब उठता नहीं ?

मन मरुस्थल में दफ़न है 
देह पर जंगल उगे हैं 
तन बदन पर किश्तियों के 
खून के धब्बे लगे हैं 
आज क्यों चुप है सदी 
प्रश्न करती है नदी 
क्या नदी का दुःख 
सदी की आंख में चुभता नहीं ?

घाट के पत्थर उठाकर 
फेंक आयी हैं हवाएं 
गोंद में निर्जीव लेटी 
पेड़ -पौधों की लताएं 
वक्त से पिटती नदी 
प्राण खुद तजती नदी 
क्योकि आंचल से समूचा 
जिस्म अब ढंकता नहीं ?

तीन 
मेरे गांव घिरे ये बादल 
जाने कहां -कहां बरसेंगे 

अल्हड़पन लेकर पछुआ का 
घिर आयीं निर्दयी घटाएं 
दूर -दूर तक फ़ैल गयीं हैं 
घाटी की सुरमई जटाएं 
ऐसे मदमाते मौसम में 
जाने कौन -कौन तरसेंगे 

मछुआरिन की मस्ती लेकर 
मेघों की चल पड़ी कतारें 
कहीं बरसने की तैयारी 
कहीं -कहीं गिर पड़ी फुहारें 
कितने का तो दर्द हरेंगे 
कितनों को पीड़ा परसेंगे 

मेरे गांव अभागिन संध्या 
रोज -रोज रह जाती प्यासी 
जिसके लिए जलाए दीपक 
उसका ही उपहार उदासी 
जाने किसका हृदय दुखेगा 
जाने कौन -कौन हरषेगें 
चार 
पता नहीं है ,लोगों को 
क्यों अचरज होता है 
जब भी कोई गीत प्यार का 
मैं गा देता हूँ |


प्यार कूल है प्यार शूल है 
प्यार फूल भी है 
प्यार दर्द है प्यार दवा है 
प्यार भूल भी है 
मेरे लिए प्यार की इतनी 
भागीदारी है 
इसको लेकर अपनी रीती 
नैया खेता हूँ |


प्यार एक सीढ़ी है 
इस पर चढ़ना ही होता 
प्यार एक पुस्तक है 
इसको पढ़ना ही होता 
धरती का कण -कण जब मुझसे 
रूठा लगता है 
गा कर गीत प्यार के ही 
मन समझा लेता हूँ |


प्यार दया है प्यार धर्म है 
प्यार फ़र्ज भी है 
प्यार एक जीवन की लय है 
प्यार मर्ज़ भी है 
जब भी किया प्यार पर मैंने 
न्योछावर खुद को 
मुझे लगा है सब हारे 
मैं एक विजेता हूँ  |
पांच 
एक अरसे बाद 
फिर सहमा हुआ घर है |
आदमी गूंगा न बन जाये 
यही डर है |

याद फिर भूली हुई 
आयी कहानी है ,
एक आदमखोर 
मौसम पर जवानी है ,
हाथ जिसका आदमी के 
खून से तर है |

सोच पर प्रतिबंध का 
पहरा कड़ा होगा ,
अब बड़े नाख़ून वाला 
ही बड़ा होगा ,
वक्त ने फिर से किया 
व्यवहार बर्बर है |

पूजना होगा 
सभाओं में लुटेरों को 
मानना होगा हमें 
सूरज अंधेरों को ,
प्राणहंता आ गया 
तूफान सर पर है |

कोंपलें तालीम लेकर 
जब बड़ी होंगीं ,
पीढ़ियां की पीढ़ियां 
ठंडी पड़ी होंगी ,
वर्णमाला का दुखी 
हर एक अक्षर है |

छः  -मयंक श्रीवास्तव की हस्तलिपि में एक गीत 


सुनहरी कलम से 
मयंक श्रीवास्तव अपनी लम्बी गीत यात्रा के स्वयं साथी रहे हैं |महाप्राण निराला ने  नवगति ,नव लय ,ताल ,छंद नव की जो बात की है ,इस बात की रोशनी में उनका नवगति ही मयंक जी के गीतों की पृष्ठभूमि बना है |गीत में नवता का आग्रह उन्हें अधुनातन संवेदनाओं का संवाहक सिद्ध करता है |उन्होंने प्रेसमेन के माध्यम से हिन्दी नवगीत की जो अलख जगायी है उस गूंज -अनुगूँज में बहुत सारे नवगीत के कवि अपने समय और समाज का चेहरा स्पष्ट रूप से देख सके | यश मालवीय सुप्रसिद्ध गीत कवि 

प्रेसमेन के साहित्यिक संपादक के रूप में मयंक जी का योगदान सतत स्मरणीय रहेगा |लगभग पूरे भारत के समर्थ छान्दस कवियों को प्रेसमेन के मंच पर लाकर उन्होंने गीत ,गज़ल , और दोहा विधा को प्रतिष्ठित किया |भारतीय गांवों का समग्र परिवेश उभर कर आया है मयंक के गीतों में ,अनेक आयामों से गुजरते हुए उनके गीत हमें धरती से जोड़ते हैं |उनमें संस्कारों की मिठास है ,माटी की गंध है ,सूखती नदी और टूटते मचानों की करुना है |श्री मयंक श्रीवास्तव गीत विधा के समर्पित कवि हैं |
यतीन्द्रनाथ राही प्रसिद्ध हिन्दी गीत कवि 

17 टिप्‍पणियां:

  1. एक अरसे बाद
    फिर सहमा हुआ घर है |
    आदमी गूंगा न बन जाये
    यही डर है |
    हर कविता अपने में सुन्दरता लिए हुए एक साथ इतनी सुंदर रचनाएँ पढ़वाने के लिए आपका आभार

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  2. स्तरीय कवितायें, पढ़कर आनन्द आया।

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  3. bahut bahut hi behatreen xhanikayenhain ,sir...kisko kisse behtar kahun.bhavvpravan shabdon kasampreshan jaadu sa man par kar gaya.bahut hi achha laga.
    itnishndar rachnayen padhvane ke liye kavivar mayank ji ko hardik abhinandan v aapko bhi bahut bahut badhai
    dhanyvaad sahit
    poonam

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  4. एक अरसे बाद
    फिर सहमा हुआ घर है |
    आदमी गूंगा न बन जाये
    यही डर है |
    रेत बालू से अदावत
    मान बैठे हैं किनारे
    जिंदगी कब तक बितायें
    शंख -सीपी के सहारे
    दर्द को सहती नदी
    चीखकर कहती नदी
    क्या समुन्दर में नया
    तूफान अब उठता नहीं ?

    streeya sangrh

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  5. ये ऐसे नवगीत हैं जिन्हें बार बार पढ़ने को मन करेगा| इन नवगीतों का प्रवाह, इन की छंदबद्धता और इन का भाव सम्प्रेषण सहज ही प्रभावित कर जाता है पाठक को| ऐसे सुंदर नगीनों को पढ़वाने के लिए बहुत बहुत आभार तुषार भाई|

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  6. खेत में लाशें पड़ी हैं
    बन्द है थाना ,
    भव्य भवनों ने नहीं
    यह दर्द पहचाना ,
    क्यों बुढ़ापा याद आता
    है जवानी में ...

    Very touching lines...Thanks for introducing us with such a great poet.

    .

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  7. सभी रचनाये एक से बढकर एक हैं।

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  8. आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    चर्चा मंच-631,चर्चाकार --- दिलबाग विर्क

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  9. आनन्द आया...आभार इस प्रस्तुति का.

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  10. मयंक जी प्रतिष्ठित गीतकार है उनके गीतों को पढने और जीने आनंद ही कुछ और है उन्हें ब्लॉग पर देख कर बहुत ख़ुशी हुई |

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  11. मयंक जी के चारो नवगीत बहुत अच्छे और बोलते हुये नवगीत हैं। तुषार जी को वधाई कि मयंक जी के नवगीत पढ़ने का अवसर दिया। मयंक जी को हार्दिक वधाई।
    डा० व्योम

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  12. मयंक जी के नवगीत नवभारत में खूब पढ़े हैं। मयंक जी के नवगीत पढ़ने का अवसर देने के लिए आभार ....

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  13. मयंक श्रीवास्तव जी के गीत क्या अनमोल मोती ही हैं.
    सुन्दर प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत आभार आपका.

    मेरे ब्लॉग पर आप आये,इसके लिए भी आभार.
    एक बार फिर से आईयेगा.
    नई पोस्ट जारी की है.

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