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सोमवार, 22 अगस्त 2011

छः नवगीत -कवि नचिकेता

कवि -नचिकेता
संपर्क -09835260441
 हिंदी नवगीत विधा को जिन कवियों ने अपने तेवर और कलेवर से समृद्ध किया है उनमें नचिकेता का नाम बड़े आदर से लिया जाता है |नचिकेता जनवादी तेवर के प्रमुख गीतकार हैं |मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक होने के नाते ये अपने गीतों को समय के साँचे में ढालने में सिद्धहस्त हैं |नचिकेता का जन्म सावन पूर्णिमा के दिन [सन 1945]केउर, जहानाबाद बिहार में हुआ था |नचिकेता के द्वारा अंतराल ,बीज ,अलाव ,परस्पर [पत्रिकाएँ ]हरित वसुंधरा का गीत अंक ,शिनाख्त [जनवादी गीतों का समीक्षात्मक अध्ययन ]पंख -पंख आसमान [शान्ति सुमन के एक सौ एक प्रतिनिधि गीत ]गीत- वसुधा [वर्ष 1960के बाद के प्रतिनिधि गीत शीघ्र प्रकाश्य ]नचिकेता की प्रमुख कृतियाँ -आदमकद खबरें ,सुलगते पसीने ,पसीने के रिश्ते ,लिक्खेंगे इतिहास ,बाइस्कोप का गीत ,सोये पलाश दहकेंगे,नचिकेता के भजन ,रंग मैले नहीं होंगे ,कोई क्षमा नहीं ,मकर चांदनी का उजास ,तासा बज रहा है ,पर्दा अभी उठेगा ,रंग न खोने दें ,जेठ में मधुमास ,रेत में खोई नदी [सभी गीत संग्रह ]आइना दरका हुआ [गज़ल संग्रह ]गीत रचना की नयी जमीन [आलोचना ]|आज हम अंतर्जाल के माध्यम से नचिकेता के छः गीत आप तक पहुँचा रहे हैं -
एक 
नमन उसे सौ बार 
साथियों नमन उसे सौ बार 

जिसने पहली बार धरा था 
हल पर अपना हाथ 
हँसिये और हथौड़े का था 
जिसका पहला साथ 
जिसने पहली बार 
गढ़ा था उत्पादन औजार 

खान -खदानों में था -
जिसने पहले किया प्रवेश 
इस्पातों से जिसने पाया 
जीवन का सन्देश 
श्रम को ही जिसने माना 
उत्पादन का आधार 

शोषण -उत्पीड़न का 
जिसने पहले किया विरोध 
वर्गविहीन समाज रचाने का 
पहला परिशोध 
जिसने पहली बार उठाया 
हाथों में हथियार 
साथियों ,नमन उसे सौ बार 
दो 
प्यार नहीं रुक सकता भाई 
कभी किसी के रोके 

प्यार सुबह की नयी किरण है 
मुक्त हंसी बच्चों की 
चिड़ियों की है चहक 
महक वनफूलों के गुच्छों की 
प्यार धूप में ही खिलता है 
अपना आपा खोके 

प्यार कमाई है मिहनत की 
रोटी गरम -गरम है 
होंठों की मुस्कान 
खनक चूड़ी की नरम -नरम है 
प्यार हमेशा दर्द बांटता 
दीन और दुखियों के 

प्यार पसीना है ,घट्टा है 
पांवों का छाला है 
प्यार बुढ़ापे की लाठी है  
यौवन की हाला है 
प्यार छलकता है बचपन की 
आँखों में खुश होके 

जीवन का संघर्ष प्यार है 
लोकगीत की भाषा 
आजादी के लिए प्यार है 
मुक्ति युद्ध का तासा 
एका का बल प्यार 
प्यार है गर्म हवा के झोंके 
तीन 
जब कभी भी मैं 
तुम्हारा नाम लिक्खूंगा  
स्वप्न -जल से धुला 
सालिग्राम लिक्खूंगा 

जब कभी मेरा -
तुम्हारा तन छुआ होगा 
सात रंगों के धनुष -सा 
मन हुआ होगा 
उस छुवन का 
रसभरा पैगाम लिक्खूंगा 

जब महकती 
फूलकर कचनार काया थी 
जल -तरंगों -सी बजी 
हर बार काया थी 
उस गुलाबी गंध का 
अंजाम लिक्खूंगा 

गुलमुहर की डाढ़ जैसा 
गदगदाना तुम 
शगुन पंछी -सा
हमेशा चहचहाना तुम 
मैं महावर रचा दिन 
अविराम लिक्खूंगा 
चार 
हम भटकते रोज अन्हुआये 
सुरंगों में 

ठंड से ठिठुरी 
सुबह की कनपटी धीपी 
इस कुहासे में कंहरते 
शंख औ सीपी 
झर रहा तम का बुरादा 
कई रंगों में 

वन पखेरू घोसलों में 
हैं नहीं सोये 
जो गये थे गीत के जल से 
सदा धोये 
है न ऊष्मा स्वरलहरियों की 
उमंगों में 

हांककर जो ले गये 
दिन के उजालों को 
पी गये दो घूंट में ही 
नदी -तालों को 
वे नहीं शामिल हुए 
दिन के प्रसंगों में 
पांच 
संभव हो 
तो रखें बचाकर कविता की 
लय ,स्वर ,सरगम 
हर दुर्दिन के 
मुँह पर छापें 
हल्दी सनी हथेली हम 

संभव हो तो 
रखें बचाकर खेतों में 
हरियाली हम 
बचपन के होंठों से 
गायब होती जाती 
लाली हम 
लिक्खें पतझर में झरते 
पत्तों पर 
कोयल का पंचम 

संभव हो 
तो रखें बचाकर साँझा 
चूल्हा ,आंगन हम 
गिरवीं होने 
कभी नहीं दें सावन -
भादों ,अगहन हम 
नहीं मिलावट से 
हो जायें जहरीले 
सारे मल्हम 

संभव हो 
तो रखें बचाकर 
हक ,इज्जत ,आज़ादी हम 
मरुआये होंठों पर 
खिलने दें 
मुस्काने सादी हम 
तह करके रख दें 
बक्से में नहीं 
मुक्तिवाले परचम 
छः नचिकेता की हस्तलिपि में एक गीत 

सुनहरी कलम से 
नचिकेता के गीतों में ऐसे जन की तस्वीर उभरती है जिनकी अंतड़ियाँ भूख से ऐंठ रही हैं खून खौल रहा है ,त्योरी चढ़ी हुई है ,ऑंखें लाल हैं और वह कसी हुई मुठ्ठी ताने सत्ता को ललकार रहा है |
डॉ० मैनेजर पाण्डेय 
नचिकेता हमारे समय के एक बड़े गीतकार हैं ,एक जनगीतकार हैं और इनके गीत हमें उद्वेलित करते हैं 
डॉ० शिवशंकर मिश्र 
नचिकेता के गीतों की एक बड़ी ताकत है इनमें प्रयुक्त व्यंग्यात्मक शैली |इन व्यंग्य गीतों को पढ़कर कबीर ,भारतेन्दु और नागार्जुन की व्यंग्य कविताओं की यादें ताजा हो जाती हैं |नचिकेता ने बहुत जटिल और गंभीर राजनितिक बातों को भी बड़े आसान शब्दों में व्यक्त किया है |मतलब है कि नचिकेता और रमेश रंजक हमारे समय के प्रतिरोध के सबसे बड़े गीतकार हैं -प्रोफेसर वशिष्ठ अनूप 

9 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छा लगता है...जब कोई आम आदमी की बात इस प्रभावशाली तरीके से कहता है...नचिकेता जी तो पढवाने के लिए आभार...

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  2. संभव हो
    तो रखें बचाकर साँझा
    चूल्हा ,आंगन हम
    गिरवीं होने
    कभी नहीं दें सावन -
    भादों ,अगहन हम
    नहीं मिलावट से
    हो जायें जहरीले
    सारे मल्हम

    समाजवादी स्वर के साथ कोमल श्रृंगार ...पढवाने के लिए आभार

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  3. पृथक भाव के अच्छे गीत है.

    यदि मीडिया और ब्लॉग जगत में अन्ना हजारे के समाचारों की एकरसता से ऊब गए हों तो मन को झकझोरने वाले मौलिक, विचारोत्तेजक हेतु पढ़े आलेख-
    अन्ना हजारे के बहाने ...... आत्म मंथन http://sachin-why-bharat-ratna.blogspot.com/2011/08/blog-post_24.html

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  4. सारी की सारी गहन अभिव्यक्तियों के सुर हैं।

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  5. चूड़ियों की खनक और वो भी नरम नरम। इसी को कहते हैं शब्द लालित्य। आनंद आया ऐसे सुंदर नवगीतों को पढ़ कर। तुषार जी आप को भी बहुत बहुत बधाई।

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  6. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  7. नचिकेता जी के गीत पढ़ कर बहुत अच्छा लगा . नचिकेता जी को सुनहरी कलम में प्रस्तुत करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद् .

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