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रविवार, 28 अगस्त 2011

लोकप्रिय कवि दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लें

लोकप्रिय कवि -दुष्यन्त कुमार 
समय [01-09-1933से 30-12-1975]
एक सितम्बर दुष्यन्त कुमार के  जन्म दिन पर विशेष प्रस्तुति 
                                                                                
हिन्दी साहित्याकाश में दुष्यन्त सूर्य की तरह देदीप्यमान हैं |समकालीन हिन्दी कविता विशेषकर हिन्दी गज़ल के क्षेत्र में जो लोकप्रियता दुष्यन्त कुमार को मिली वो दशकों बाद विरले किसी कवि को नसीब होती है |दुष्यन्त एक कालजयी कवि हैं और ऐसे कवि समय काल में परिवर्तन हो जाने के बाद भी प्रासंगिक रहते हैं |दुष्यन्त का लेखन का स्वर सड़क से संसद तक गूँजता है |इस कवि ने आपात काल में बेख़ौफ़ कहा था मत कहो आकाश में कुहरा घना है /यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है |इस कवि ने कविता ,गीत ,गज़ल ,काव्य नाटक ,कथा आदि सभी विधाओं में लेखन किया लेकिन गज़लों की अपार लोकप्रियता ने अन्य विधाओं को नेपथ्य में डाल दिया |दुष्यन्त कुमार का जन्म बिजनौर जनपद [यू० पी० ]के ग्राम राजपुर नवादा में 01सितम्बर  1933 को और निधन भोपाल में 30दिसम्बर 1975 को हुआ था |इलाहबाद विश्व विद्यालय से शिक्षा प्राप्त करने के उपरांत कुछ दिन आकाशवाणी भोपाल में असिस्टेंट प्रोड्यूसर रहे बाद में प्रोड्यूसर पद पर ज्वाइन करना था लेकिन तभी हिन्दी साहित्याकाश का यह सूर्य अस्त हो गया |इलाहबाद में कमलेश्वर ,मार्कण्डेय और दुष्यन्त की दोस्ती बहुत लोकप्रिय थी वास्तविक जीवन में दुष्यन्त बहुत ,सहज और मनमौजी व्यक्ति थे |कथाकार कमलेश्वर बाद में दुष्यन्त के समधी भी हुए |दुष्यन्त का पूरा नाम दुष्यन्त कुमार त्यागी था |प्रारम्भ में दुष्यन्त कुमार परदेशी के नाम से लेखन करते थे |कृतियाँ -सूर्य का स्वागत ,आवाज़ों के घेरे ,जलते हुए वन का वसंत [ सभी कविता संग्रह ] साये में धूप [गज़ल संग्रह ]एक कंठ विषपायी [काव्य नाटक ]आदि दुष्यन्त की प्रमुख कृतियाँ हैं |आज हम अपने देश -परदेश में बैठे अपने सहृदय पाठकों और दुष्यन्त प्रेमियों के साथ दुष्यन्त कुमार की कुछ ग़ज़लें हस्तलिपि और कुछ दुर्लभ चित्र साझा कर रहे हैं |हम दुष्यन्त कुमार के सुपुत्र श्री अलोक त्यागी और श्री राजुरकर राज उद्घोषक आकाशवाणी भोपाल और निदेशक -दुष्यन्त कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय ,भोपाल के विशेष आभारी हैं जिन्होंने हमें दुष्यन्त कुमार से सम्बंधित दुर्लभ फोटोग्राफ और हस्तलिपि उपलब्ध कराया |संपर्क -राजुरकर राज -09425007710संपर्क आलोक त्यागी -09755020066

चित्र में बायें  राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर दायें दुष्यन्त कुमार 
एक 
हो गई है पीर पर्वत -सी पिघलनी चाहिए ,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए |


आज यह दीवार ,परदों की तरह हिलने लगी ,
शर्त लेकिन थी कि ये  बुनियाद हिलनी चाहिए |


हर सड़क पर ,हर गली में ,हर नगर ,हर गाँव में ,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए |


सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं 
मेरी कोशिश है कि ये  सूरत बदलनी चाहिए |


मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही 
हो कहीं भी आग ,लेकिन आग जलनी चाहिए |
दो 
मैं जिसे ओढ़ता -बिछाता हूँ ,
वो गज़ल आपको सुनाता हूँ |


एक जंगल है तेरी आँखों में 
मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ |

तू किसी रेल सी गुजरती है ,
मैं किसी पुल -सा थरथराता हूँ |

हर तरफ़ एतराज़ होता है ,
मैं अगर रोशनी में आता हूँ |

एक बाजू उखड़ गया जब से ,
और ज़्यादा वज़न उठाता हूँ |

मैं तुझे भूलने की कोशिश में ,
आज कितने करीब पाता हूँ |

कौन ये फासला निभाएगा ,
मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूँ |
तीन 
तुम्हारे पाँवों के नीचे कोई ज़मीन नहीं ,
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यकीन नहीं |

मैं बेपनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहूँ 
मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं |

तेरी जुबान है झूठी जम्हूरियत की तरह 
तू एक ज़लील सी गाली से बेहतरीन नहीं |

तुम्हीं से प्यार जताएँ तुम्हीं को खा जायें ,
अदीब यों तो सियासी है पर कमीन नहीं |

तुझे क़सम है खुदी को बहुत हलाक न कर ,
तू इस मशीन का पुर्ज़ा है ,तू मशीन नहीं |

बहुत मशहूर हैं आयें जरुर आप यहाँ 
ये मुल्क देखने के लायक़ तो है ,हसीन नहीं |

ज़रा सा तौर -तरीकों में हेर -फेर करो ,
तुम्हारे हाथ में कालर हो आस्तीन नहीं |
चार 
कहाँ तो तय था चिरागाँ हरेक घर के लिए ,
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए |

यहाँ दरख्तों के साये में धूप लगती है ,
चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए |

खुदा नहीं ,न सही ,आदमी का ख़्वाब सही ,
कोई हसीन नज़ारा तो हो नज़र के लिए |

वे मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता ,
मैं बेकरार हूँ आवाज़ में असर के लिए |

तेरा निज़ाम है सिल दे जुबान शायर को 
ये एहतियात ज़रुरी है इस बहर के लिए |

जिएँ तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले ,
मरें तो गैर की गलियों में गुलमोहर के लिए |
पांच 
ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा 
मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा  हुआ होगा |

यहाँ तक आते -आते सूख जाती हैं कई नदियाँ ,
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा |

ग़ज़ब ये है कि अपनी मौत कि आहट नहीं सुनते,
वो सब -के -सब परीशाँ हैं वहाँ पर क्या हुआ होगा |

तुम्हारे शहर में ये शोर सुन -सुनकर तो लगता है ,
कि इंसानों के जंगल में कोई हाँका हुआ होगा |

कई फ़ाके बिताकर मर गया ,जो उसके बारे में ,
वो सब कहते हैं अब ऐसा नहीं ,ऐसा हुआ होगा |

यहाँ तो सिर्फ़ गूँगे और बहरे लोग बसते हैं ,
खुदा जाने यहाँ पर किस तरह जलसा हुआ होगा |

चलो अब यादगारों की अँधेरी कोठरी खोलें ,
कम -अज़ -कम एक वो चेहरा तो पहचाना हुआ होगा |
छः 
ये जो शहतीर है पलकों पे उठा लो यारों ,
अब कोई ऐसा तरीका भी निकालो यारों |

दर्दे दिल वक्त का पैगाम  भी पहुँचाएगा , 
इस कबूतर को जरा प्यार से पालो यारों |

लोग हाथों में लिए बैठे है अपने पिंजरे ,
आज सय्याद को महफ़िल में बुला लो यारों |

आज सीवन को उधेड़ो तो जरा देखेंगे ,
आज संदूक से वो खत तो निकालो यारों |

रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया ,
इस बहकती हुई दुनिया को संभालो यारो |

कैसे आकाश में सुराख नहीं हो सकता ,
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो |

लोग कहते थे कि ये बात नहीं कहने की ,
हमने कह दी है तो कहने की सजा लो यारो |
सात 
बाढ़ की संभावनाएँ सामने हैं ,
और नदियों के किनारे घर बने हैं |

चीड़ -वन में आंधियों की बात मत कर,
इन दरख्तों के बहुत नाजुक तने हैं |

इस तरह टूटे हुए चेहरे नहीं है ,
जिस तरह टूटे हुए ये आईने हैं |

आपके कालीन देखेंगे किसी दिन ,
इस समय तो पाँव कीचड़ में सने हैं |

जिस तरह चाहो बजाओ इस सभा में 
हम नहीं हैं आदमी ,हम झुनझने हैं |

अब तड़पती सी गज़ल कोई सुनाए ,
हमसफ़र ऊँघे हुए हैं ,अनमने हैं | 
आठ -दुष्यन्त कुमार की हस्तलिपि में एक गीत 

दुष्यन्त की हस्तलिपि में एक चर्चित गज़ल 

दुष्यन्त कुमार के माता -पिता एवं परिवार के अन्य सदस्य 
आत्मकथ्य -
कि उर्दू और हिंदी अपने -अपने सिंहासन से उतरकर जब आम आदमी के पास आती हैं तो उनमें फर्क कर पाना बड़ा मुश्किल होता है |मेरी नीयत और कोशिश यह रही है कि इन दोनों भाषाओँ को ज़्यादा  से ज़्यादा करीब ला सकूँ |इसलिए ये ग़ज़लें उस भाषा में कही गई हैं ,जिसे मैं बोलता हूँ |.......और कमलेश्वर !वह इस अफ़साने में न होता तो ये सिलसिला शायद यहाँ तक न आ पाता |मैं तो -
हाथों में अंगारों को लिये  सोच रहा था ,
कोई मुझे अंगारों की तासीर बताए | दुष्यन्त कुमार  [साये में धूप की भूमिका से ]
सुनहरी कलम से 
दुष्यन्त कुमार को इलाहबाद बहुत ही प्रिय था |इलाहबाद छोड़ने के बाद भी अक्सर यहाँ आते थे अपने दोस्तों से मिलने |दुष्यन्त एक खुशमिजाज और मनमौजी व्यक्ति थे| कमलेश्वर और मार्कण्डेय दुष्यन्त के घनिष्ठ मित्र थे इन तीनों में दुष्यन्त की आर्थिक स्थिति सबसे अच्छी थी |तीनों का बैठना -उठाना मेरे यहाँ [लोकभारती ]और काफ़ी हॉउस में होता था |एक बार मैं भोपाल गया और एक कंठ विषपायी प्रकाशित करने की इच्छा प्रकट की तो दुष्यन्त ने मुझे सहज भाव से अनुमति दे दिया |एक कंठ विषपायी से आचार्य नन्द दुलारे वाजपेयी बहुत प्रभावित हुए और कई आलेख लिखे और इस काव्य नाटक कोउन्होंने  भारती के अंधायुग से अच्छा बताया |
दिनेश ग्रोवर प्रकाशक लोकभारती इलाहबाद 
दुष्यन्त अपने जीवनकाल में ही एक किंवदंती बन गए थे |आज जब हम उन्हें याद करते हैं ,तो लगता है हम अपने जीवन सूत्रों को ही जन्दा शक्ल में अपने आस -पास महसूस करते हैं |उनकी लोकप्रियता का अनुमान केवल इतनी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले चुनावों में आमने -सामने दो विरोधी पार्टियां एक ही तख्ती लगाये चल रही थी ;सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं /मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए |हम फख्र से कह सकते हैं कि हिंदी ने मीर ,ग़ालिब भले न पैदा किये हों मगर दुष्यन्त कुमार को पैदा किया है और यही हमारी हिंदी कि जातीय अस्मिता की एक बहुत बड़ी विजय है |
लोकप्रिय कवि यश मालवीय 
दुष्यन्त की कविता जिन्दगी का बयान है |जिन्दगी के सुख- दुःख में उनकी कविता अनायास याद आ जाती है |विडम्बनायें उनकी कविता में इस तरह व्यक्त होती हैं कि आम आदमी को वे अपनी आवाज लगने लगती हैं |समय को समझने और उससे लड़ने की ताकत देती ये कवितायें हमारे समाज में हर संघर्ष में सर्वाधिक उद्धरणीय कविताएँ हैं |सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं //मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए |यह मात्र एक शेर नहीं जिन्दगी का एक दर्शन है फलसफा है चूँकि दुष्यन्त की कविताएँ जनता के जुबान पर चढ़ी हुई हैं इसलिए मिडिया के लोग भी विशेष मौकों पर अपनी बात जन तक पहुँचाने के लिए ,उनके दिलों में उतार देने के लिए दुष्यन्त की शायरी का इस्तेमाल करते हैं |दुष्यन्त की ग़ज़लें कठिन समय को समझने के लिए शास्त्र और उनसे जूझने के लिए शस्त्र की तरह हैं |
 अरुण आदित्य जाने -माने  कवि /उपन्यासकार सम्पादक साहित्य अमर उजाला नोयडा[ अरुण आदित्य दुष्यन्त पुरस्कार से सम्मानित कवि हैं ]
[इस पोस्ट में प्रकाशित चित्र और पांडुलिपियाँ हमें दुष्यन्त कुमार पाण्डुलिपि संग्रहालय भोपाल के निदेशक राजुरकर राज से प्राप्त हुई हैं |दुष्यन्त कुमार के पुत्र श्री अलोक त्यागी और श्री राजुरकर राज के हम विशेष आभारी हैं |भोपाल संग्रहालय की अनुमति के बिना इनका उपयोग वर्जित है ]

28 टिप्‍पणियां:

  1. आज दुष्यंत कुमार जी के बारे में यहाँ बहुत सी सुन्दर जानकारियाँ पढ़ने को मिली.उनके सशक्त लेखन को मेरा सादर नमन.

    इस शानदार प्रस्तुति के लिए आपका बहुत बहुत आभार.
    बार बार पढ़ने का मन करता है.

    समय मिलनेपर मेरे ब्लॉग पर आईयेगा.
    भक्ति व शिवलिंग पर अपने सुविचार प्रस्तुत
    करके अनुग्रहित कीजियेगा.

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  2. गज़लों की गहराई और धार ने सदा ही प्रभावित किया है।

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  3. आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा दिनांक 29-08-2011 को सोमवासरीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  4. दुष्यंत 'ग़ज़ल' उपन्यास के वो नायक हैं जिन्होंने हर मिथक को खत्म करके हिंदी ग़ज़ल को एक नया फलक प्रदान किया |

    आपकी इस अतुलनीय मेहनत को सलाम
    इस यादगार अंक के लिए आपको ढेर सारी बधाई व् साधुवाद

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  5. dushyant ji ka bahut sundar parichay diya hai aapne tushar ji.bahut bahut aabhar.

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  6. बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल! दुष्यंत जी से परिचय करवाने के लिए धन्यवाद! उम्दा प्रस्तुती !
    मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://seawave-babli.blogspot.com/
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

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  7. दुष्यंत जी को जितनी बार पढ़ा जाय , नवीनता बोलती है.आपको आभार.

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  8. बेहतरीन गजल ...दुष्यंत जी से विस्तारपूर्वक परिचय कराने के लिए आपका आभार

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  9. दुष्यंत जी को उनके जन्म दिन पर याद करवाके आपने एक नेक काम किया है तुषार जी .आज भी कितने मौजू हैं दुष्यंत -"गज़ब है सच को सच कहते नहीं हैं ,सियासत के कई चोले हुए हैं ,हमारा कद सिमट के घट गया है ,हमारे पैरहन झोले हुएँ हैं .

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  11. mr.ojaswi kaushal i can not permit you are any one to publish thsese posts .thanks jai krishna rai tushar state law officer high court allahabad

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  12. सभी गजलें एक से बढ़कर एक हैं प्रस्‍तुति के लिये आपका आभार ।

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  13. तेरा निज़ाम है सिल दे जुबान शायर को
    ये एहतियात ज़रुरी है इस बहर के लिए ...

    Great couplets ! It's nice to know about the great poet Dushyant ji.

    .

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  14. दुष्यंत एक फेनामेना हैं ,एक लीजेंड हैं ...
    आपने उनकी चुनिन्दा गजलों को जो सुनाया तो यही लगा -
    अब तड़पती सी गज़ल कोई सुनाए ,
    हमसफ़र ऊँघे हुए हैं ,अनमने हैं |

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  15. सचमुच हिन्दी साहित्याकाश में दुष्यन्त सूर्य की तरह देदीप्यमान हैं. मेरी विनम्र श्रृद्धांजलि.....

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  16. हमेशा की तरह बढ़िया रचनाओं का संकलन !
    बहुत बहुत आभार तुषार जी,.....

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  17. डॉ० वर्षा जी दुष्यन्त के जन्मदिन पर ये रचनाएँ दी गयीं हैं अतएव श्रद्धांजलि देने की आपसे भूल वश त्रुटि हो गयी है |

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  18. बढ़िया रचनाओं का संकलन !....बहुत बहुत आभार तुषार जी,.....

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  19. साहित्य जगत के अनुपम व्यक्तित्व को सादर नमन

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  20. बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल! दुष्यंत जी से परिचय करवाने के लिए धन्यवाद!

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  21. sahitya ki duniya ke betaj badshah "dusyant" ji se parichany karane ke liye bahut bahut aabhar ...........sunder gajale...........

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  22. अच्छी प्रस्तुति ........आभार

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  23. दुष्यंत जी को जी भरकर पढ़ा ...मज़ा आ गया ....आभार !

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  24. महानतम विचारों की शानदार अभिव्यक्ति

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  25. जो तेवर मुझे दुष्यंत की ग़ज़ल में मिला,शायद ही कहीं मिले...वो गजल कहने का अंदाज वो बेख़ौफ़ सब कह देना..कोई चाटुकारिता नही..ऐसे शाइर सदी में एक बार आते।आप के अतुल्यनीय प्रयास को नमन।

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