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शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

सात ग़ज़लें -कवि सुरेन्द्र सिंघल

कवि -सुरेन्द्र सिंघल 
संपर्क -09760007588
सुरेन्द्र सिंघल हिंदी गज़ल में एक जाना पहचाना नाम है | 25 मई 1948 को बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश में जन्मे इस कवि की ग़ज़लें  देश की विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में प्रकाशित होतीं रही हैं | डी .एच .लारेंस की कविताओं पर समीक्षा पुस्तक Where the Demon Speaks प्रकाशित हो चुकी है | सुरेन्द्र सिघल की इंग्लिश में लिखी कविताएँ अंग्रेजी की पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं हैं | जे .वी .जैन पी .जी .कालेज के अंग्रेजी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत सुरेन्द्र सिंघल रामधारी सिंह दिनकर सम्मान सहित कई सम्मानों से सम्मानित हो चुके |हिंदी गज़ल में सुरेन्द्र सिघल का अंदाज बिलकुल निराला है | सवाल ये है  गज़ल पर इनकी चर्चित पुस्तक है जो मेधा बुक्स, दिल्ली से प्रकाशित है : सुरेन्द्र सिंघल जी की सात ग़ज़लें आज हम आपके साथ साझा कर रहे हैं .
एक ......
सवाल ये तो नहीं है कि उसने देखा क्या
सवाल ये है गवाही में वो कहेगा क्या

अगर ये घर है, तो घर जैसा क्यों नहीं लगता 
अगर नहीं है ,तो अब और इसमें रहना क्या 

मैं सावधान हूँ तुझसे तू मुझसे चौकन्ना 
तनिक तो सोच कि ये भी है कोई रिश्ता क्या 

न मिलने पर है खुशी ,और न गम बिछुड़ने का 
गुजर गया है तेरे मेरे बीच ऐसा क्या 

जवाब सोच कर आया है सब सवालों के 
गिला गर उससे करूँ भी तो इससे क्या होगा 
दो 
खामुशी ओढ़ ली ,ख़ामोशी बिछा ली मैंने 
अजनबी शोर में ऐसे ही निभा ली मैंने 

देख बंजर में तेरी याद उगा ली मैंने 
देख कंदील हवाओं में जला ली मैंने 

यूँ नज़र तेरी निगाहों से चुरा ली मैंने 
जैसे खुद प्यास समन्दर से छुपा ली मैंने 

दिल बहलता ही नहीं कितना अकेलापन है 
फिर किसी दर्द को आवाज़ लगा ली मैंने 

जाने क्या सोच के महफ़िल में चला आया था 
जाने क्या देख के महफ़िल से विदा ली मैंने 
तीन 
औरत से बस धोखा कर 
फिर उसको ही रुसवा कर 

फ़तवों का कर इस्तेमाल 
औरत को इमराना कर 

वो क्या चाहे है ,मत पूछ 
हर औरत को गुड़िया कर 

औरत जिंस है तेरे लिए 
रोज़ ख़रीदा बेचा कर 

औरत मर्द बराबर हैं 
हाँ -हाँ कह कर ना -ना कर 

नर्क बना इस जीवन को 
उसमें स्वर्ग का वादा कर 
चार 
मैं इतने शोर शराबे में बात क्या करता 
बिता भी देता तेरे घर में रात क्या करता 

मैं चाहता था तेरे साथ जीना और मरना 
तेरे बगैर  हुई वारदात क्या करता 

तुम एक डाल पर खुश हो तो तुमसे क्या शिकवा 
मुझे तो डोलना था पात -पात क्या करता 

वो जंग लड़ता तो मैं सामना करता उसका 
पर उसने मुझपे लगाई थी घात क्या करता 

मैं जिंदगी को मुहब्बत ही मानता हूँ दोस्त 
मैं फिर किसी को भी शह और मात क्या करता 
पांच 
जिंदगी तुझसे मैं साँसों के सिवा चाहूँ हूँ 
वरना तू साथ मेरा छोड़ क्षमा चाहूँ हूँ 

तू खुदा है तो अलग रह के ही तनहाई झेल 
आदमी है तो तेरे साथ जुड़ा चाहूँ हूँ 

तंग दिल ,तंग -नज़र ,तंग -खयालों वाले 
घेर कर मुझको खड़े हैं ,मैं हवा चाहूँ हूँ 

यूँ  तेरे रहमों करम पर मैं जियूँ ,नामंजूर 
मैं खुदा फिर से बगावत की सजा चाहूँ हूँ 

कोई दीवाना भी हो इतने सयानों में यहाँ 
गर नहीं है तो यहाँ से मैं उठा चाहूँ हूँ 
छः 
खुद अपने आप पे मुझको था ऐतबार बहुत 
अब अपने आप से रहता हूँ होशियार बहुत 

वो जिसने कोई भी वादा नहीं किया मुझसे 
उस एक शख्स का रहता है इंतज़ार बहुत 

वो खुद तो मेरी पहुँच से निकल गया बाहर 
जता रहा है मगर मुझपे इख़्तियार बहुत 

शरीक दिल से खुशी में न हो सका मेरी गी 
वो लग रहा था मुझे मेरा गमगुसार बहुत 

तमाम उम्र तजुर्बों में काट दी मैंने 
मैं जिन्दगी का रहा हूँ कसूरवार बहुत 
सात -सुरेन्द्र सिंघल जी की हस्तलिपि में एक गज़ल 
सुनहरी कलम से 
गज़ल का हर अच्छा शाइर अपने लिए नई जमीन तोड़ता है और नई जमीन तोड़ना उस समय तक संभव नहीं होता है जब तक कि शाइर को पुरानी जमीन की पूरी जानकारी न हो |दरअसल गज़ल की सबसे बड़ी शक्ति उसकी परम्परा है और परम्परा को जाननेवाला ही प्रयोग कर सकता है |डॉ० सुरेन्द्र सिंघल इसी परम्परा और प्रयोग की एक मजबूत कड़ी हैं |
 असगर वजाहत -प्रसिद्ध कथाकार एवं प्रोफेसर जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी दिल्ली 
सुरेन्द्र सिंघल हिन्दुस्तानी जबान के एक बड़े शायर हैं |उनके भीतर हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओँ का रंग गंगा -जमुना के पानी की तरह मिल  जाता है |इसलिए कहा जा सकता है कि वो एक पुल हैं ,जिस पर हमारी आधुनिक तहजीब दिल खोलकर संवाद कर सकती है |मैं इसी रंग में सुरेन्द्र सिंघल के रचना कर्म को देखता हूँ |
यश मालवीय सुप्रसिद्ध गीत कवि 

14 टिप्‍पणियां:

  1. हर ग़ज़ल बहुत उम्दा...सुन्दर तथा अनमोल रचनाओं के संग्रहण और ब्लॉग पर प्रकाशन का आपका प्रयास स्तुत्य है। धन्यवाद और बधाई

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  2. मैं इतने शोर शराबे में बात क्या करता
    बिता भी देता तेरे घर में रात क्या करता

    मैं चाहता था तेरे साथ जीना और मरना
    तेरे वगैर हुई वारदात क्या करता

    तुम एक डाल पर खुश हो तो तुमसे क्या शिकवा
    मुझे तो डोलना था पात -पात क्या करता

    वो जंग लड़ता तो मैं सामना करता उसका
    पर उसने मुझपे लगाई थी घात क्या करता

    मैं जिंदगी को मुहब्बत ही मानता हूँ दोस्त
    मैं फिर किसी को भी शह और मात क्या करता ...

    Awesome ghazal by Surendra ji . Thanks for sharing with us.

    .

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  3. सुरेन्द्रजी को पढ़कर बुत ही अच्छा लगा, चिन्तन में पगी हैं उनकी पंक्तियाँ।

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  4. सुरेन्द्रजी की इन खूबसूरत गजलों को पढ़वाने के लिए आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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  5. सिंघल जी से मुखातिब करने का शुक्रिया...

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  6. आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 01-08-2011 को चर्चामंच http://charchamanch.blogspot.com/ पर सोमवासरीय चर्चा में भी होगी। सूचनार्थ

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  7. आप सभी लोगों को मेरा प्रयास अच्छा लगा इसके लिए आप सभी का आभार |

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  8. सुन्दर संग्रह...
    सभी गजलें उम्दा...
    सादर आभार....

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  9. अगर ये घर है, तो घर जैसा क्यों नहीं लगता
    अगर नहीं है ,तो अब और इसमें रहना क्या

    वो जंग लड़ता तो मैं सामना करता उसका
    पर उसने मुझपे लगाई थी घात क्या करता

    वो जिसने कोई भी वादा नहीं किया मुझसे
    उस एक शख्स का रहता है इंतज़ार बहुत

    मेरा घर खेत छीनने वाले
    मुझसे चम्बल की घाटियाँ भी छीन
    एक से बढ़कर एक ....शानदार संग्रह

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  10. मैं सावधान हूँ तुझसे तू मुझसे चौकन्ना
    तनिक तो सोच कि ये भी है कोई रिश्ता क्या

    औरत मर्द बराबर हैं
    हाँ -हाँ कह कर ना -ना कर

    तू खुदा है तो अलग रह के ही तनहाई झेल
    आदमी है तो तेरे साथ जुड़ा चाहूँ हूँ

    तमाम उम्र तजुर्बों में काट दी मैंने
    मैं जिन्दगी का रहा हूँ कसूरवार बहुत

    इन शेरों के अलावा हस्त लिखित तो पूरी की पूरी गजल दिल के बहुत क़रीब महसूस हुई| तुषार जी सिंघल जी तक हमारा नमन पहुंचाने की कृपा करें|

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  11. सुन्दर संग्रह... सिंघल जी तक हमारा नमन...

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  12. सभी रचनाएं एक से बढकर एक
    शानदार संकलन

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