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बुधवार, 20 जुलाई 2011

छः ग़ज़लें -कवि कमलेश भट्ट कमल

कवि -कमलेश भट्ट कमल 
संपर्क -09457097683
उत्तर प्रदेश का जनपद सुल्तानपुर अपनी साहित्यिक ,सांस्कृतिक और राजनैतिक गतिविधियों में अपनी एक अलग पहचान रखता है |यह जनपद मजरूह सुल्तानपुरी के नाते भी जाना और पहचाना जाता है |हिंदी गज़ल में एक चर्चित नाम है भाई कमलेश भट्ट कमल जी का |आधारशिला पत्रिका का गज़ल विशेषांक इनके ही अतिथि संपादन में प्रकाशित हुआ था |हल्द्वानी से प्रकाशित इस विशेषांक को आज भी लोग  अपनी स्मृतियों में संजोये हैं |बहुत ही सादगी या बिना लाग  लपेट के अपनी बात कहने वाले कमलेश भट्ट कमल का जन्म 13फरवरी 1959को सुल्तानपुर [उ० प्र० ]की कादीपुर तहसील के जफरपुर गांव में हुआ था | गणितीय सांख्यकी में 1979में लखनऊ विश्व विद्यालय से इन्होने एम० एस० सी० की उपाधि हासिल किया |देश की प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में इनकी कवितायेँ प्रकाशित होती रहती हैं |आकाशवाणी और दूरदर्शन से कविताओं का प्रसारण होता रहता है |मुख्यतः गज़ल हाइकु  कहानी लेख आदि इनकी लेखन विधा हैं | मैं नदी की सोचता हूँ,शंख, सीपी,रेत,पानी  इनके गज़ल संग्रह हैं अमलतास  हाइकु  संकलन है इसके साथ ही इनके तीन कथा संकलन भी हैं -त्रिवेणी एक्सप्रेस ,चिठ्ठी आयी है और नखलिस्तान |साक्षात्कार में कवियों लेखकों के इंटरव्यू संकलित हैं | इसके साथ ही संगमन संस्था के संस्थापक सदस्य और गीताभ संस्था के उपाध्यक्ष भी हैं |सम्प्रति उत्तर प्रदेश वाणिज्य कर विभाग में ज्वाइंट कमिश्नर के पद पर कानपुर में तैनात कमलेश भट्ट कमल की छः ग़ज़लें हम आप तक पहुंचा रहे हैं | संपर्क -631,गौड़ होम्स ,गोविन्दपुरम ,गाज़ियाबाद -201002[उ० प्र० ]
एक 
हमारे ख़्वाब की दुनियां ,हमारी आस की दुनिया
चुरा सकता नहीं हमसे कोई एहसास की दुनिया 

गमों पर मुस्कराती है खुशी पर खुश नहीं होती 
समझ में ही नहीं आती हमारे पास की दुनिया 

बनाने में लगे बरसों मिटाने में लगे पल भर 
अजब ही शै हुआ करती है ये विश्वास की दुनिया 

कई सच पूर्व जन्मों के कई सच बाद के होंगे 
हमारा सच मगर है यह हमारी श्वास की दुनिया

न कम होती है पीने से न प्यासा ही रहा जाए 
जहां भी है वहीं पर है मुसलसल प्यास की दुनिया
दो 
वो खुद ही जान जाते हैं बुलंदी आसमानों की 
परिंदों को नहीं तालीम दी जाती उड़ानों की 

जो दिल में हौसला हो तो कोई मंजिल नहीं मुश्किल 
बहुत कमजोर दिल ही बात करते हैं थकानों की 

महकना और महकाना है केवल काम खुशबू का 
कभी खुशबू नहीं मोहताज होती कद्रदानों की 

हमें हर हाल में तूफान से महफूज रखती है 
छतें मजबूत होती हैं उम्मीदों के मकानों की 
तीन 
समन्दर में उतर जाते हैं खुद ही तैरने वाले 
किनारे पर भी डरते हैं तमाशा देखने वाले 

जो खुद को बेच देते हैं बहुत अच्छे हैं वो फिर भी 
सियासत में कई हैं मुल्क तक को बेचने वाले 

चले थे गाँव से लेकर कई चाहत कई सपने 
कई फिक्रें लिए लौटे शहर से लौटने वाले 

बुराई सोचना है काम ,काले दिल के लोगों का 
भलाई सोचते ही हैं भलाई सोचने वाले 

यकीनन झूठ की यहाँ आबाद है लेकिन 
बहुत से लोग जिन्दा हैं अभी सच बोलने वाले 
चार 
दूध  को बस दूध ही पानी को पानी लिख सके 
सिर्फ़ कुछ ही वक्त की असली कहानी लिख सके 

झूठ है जिसका शगल दामन लहू से तर -ब -तर 
कौन है जो नाम उसका राजधानी लिख सके 

उम्र लिख देती है चेहरों पर बुढ़ापा एक दिन 
कोई -कोई ही बुढ़ापे में जवानी लिख सके 

उसको ही हक है कि सुबहों से करे कोई सवाल 
जो किसी के नाम खुद शामें सुहानी लिख सके 

मुश्किलों की दास्ताँ के साथ ये अक्सर हुआ 
कुछ लिखी कागज पे हमने कुछ जबानी लिख 

मौत तो कोई भी लिख देगा किसी के भाग्य में 
बात तो तब है कि कोई जिंदगानी लिख सके 
पांच 
पास रक्खेगी नहीं सब कुछ लुटाएगी नदी 
शंख ,सीपी ,रेत ,पानी जो भी लाएगी नदी 

आज है कल को कहीं यदि सूख जायेगी नदी 
होंठ छूने को किसी का छटपटाएगी नदी 

बैठना फुरसत से दो पल पास जाकर तुम कभी 
देखना अपनी कहानी खुद सुनाएगी नदी 

साथ है कुछ दूर तक ही फिर सभी को छोड़कर 
खुद समन्दर में किसी दिन डूब जाएगी नदी 

हमने वर्षों विष पिलाकर आजमाया है बहुत 
अब हमें भी विष पिलाकर आजमाएगी नदी 
छः -कमलेश भट्ट कमल की हस्तलिपि में एक गज़ल 
सुनहरी कलम  से 
गज़ल के शिल्प ने शुरू में मुझे बहुत उलझाया और परेशान किया ,लेकिन जब मैंने वज़न के समानांतर वज़न के आधार पर शिल्प की गुत्थी को सुलझा लिया तो यह विधा मेरे लिए सहज और सहजतर होती चली गयी |आज गज़ल यात्रा के दो दशक बीत जाने पर भी ऐसा लगता है कि मैं इसके विशाल समुद्र के किनारे ही हाथ -पैर मार रहा हूँ ,जबकि सारे मोती उसकी अतल गहराइयों में छिपे पड़े हैं |
कमलेश भट्ट कमल [आत्मकथ्य ]
कमलेश भट्ट कमल उन हिंदी गज़लकारों में से हैं जो बहुत तेजी से आगे बढ़े हैं |उन्हें हाइकू में भी महारत हासिल है |कमलेश गजल केवल दिल्लगी या मनोरंजन के लिए ग़ज़लें नहीं कहते हैं वरन वह पर्यावरण के प्रति भी गहरा लगाव रखते हैं नदी ,पानी सब कुछ उनकी कहन का विषय बनते हैं |
विज्ञान व्रत वरिष्ठ हिंदी गज़ल कवि एवं पेंटर 
कमलेश भट्ट कमल समकालीन गज़ल लेखन का एक जरूरी नाम हैं |कमलेश भट्ट कमल ने अपने समय से बोलते बतियाते हुए गज़ले कहीं हैं ,और अपने वक्त का मुहावरा ईजाद किया है |शायद इसीलिए उनकी गज़लों में हिंदी कविता का कथ्य सम्पूर्ण सघनता के साथ उजागर हुआ है ,और इसी शब्द की रौशनी में जिंदगी के बहुत सारे पेंचीदा मसअले तय किये हैं और मरहले पार किये हैं |
यश मालवीय  चर्चित गीत कवि 

12 टिप्‍पणियां:

  1. वो खुद ही जान जाते हैं बुलंदी आसमानों की
    परिंदों को नहीं तालीम दी जाती उड़ानों की
    सभी ग़ज़ल एक से से बढ़ कर एक आपका आभार

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  2. बहुत अच्छी ग़ज़लें पढ़वाने का आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर ग़ज़लें पढ़वाने का आभार। आप मे ब्लाघ में आए अच्छा लगा बहुत बहुत धन्यवाद.....

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  4. बहुत ही सुंदर गज़लों का संकलन....

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत-बहुत आभार ||
    आपको मेरी हार्दिक शुभकामनायें.
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  8. आद. तुषार जी,
    अच्छे अच्छे साहित्यकारों को लोगों तक पहुंचाने का आप जो वन्दनीय कार्य कर रहें हैं उसका ज़वाब नहीं !
    सुकवि कमलेश भट्ट कमल की ग़ज़ले वाकई बहुत ही अच्छी हैं !
    वो खुद ही जान जाते हैं बुलंदी आसमानों की
    परिंदों को नहीं तालीम दी जाती उड़ानों की
    वाह !क्या मुकम्मल मतला है ,कृपया मेरी दाद कमलेश जी तक पहुँचाने की कृपा करें !
    आभार !

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  9. कमलेश भट्ट कमल की ग़ज़लें सहजता के साथ बहुत महनीय बात कहने के लिए जानी जाती हैं। सकारात्मक पक्ष कमलेश जी की ग़ज़लों की दूसरी बड़ी विशेषता है। कमलेश जी का बहुत पुराना (2004-2005) ब्लाग है "ग़ज़ल कमल" www.gajalkamal.blogspot.com
    जहाँ उनकी बेहतरीन ग़ज़लों को देखा जा सकता है। "सुनहरी कलम से" पर कमलेश जी की ग़ज़ले देखकर सुखद आनन्द की अनुभूति हो रही है।

    "हमारे ख़्वाब की दुनियां ,हमारी आस की दुनियां
    चुरा सकता नहीं हमसे कोई एहसास की दुनियां "

    इसमें (दुनियां) मे वर्तनीगत त्रुटि है इसे कृपया "दुनिया" कर दें।
    कमलेश जी को हार्दिक वधाई और "सुनहरी कलम से " ब्लाग का आभार कि बहुत अच्छा साहित्य प्रस्तुत कर रहे हैं।

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