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मंगलवार, 17 मई 2011

पांच गीत -कवि कौशलेन्द्र

कवि -कौशलेन्द्र 
सम्पर्क -09839059139

डॉ० शम्भुनाथ सिंह ने नवगीत दशक और नवगीत अर्धशती में जिन महत्वपूर्ण कवियों को प्रकाशनार्थ चुना था उन सभी कवियों ने आगे चलकर गीत विधा को और हिन्दी कविता को अपनी लेखनी से समृद्ध किया |उन्हीं नवगीतकारों में एक प्रमुख कवि है कौशलेन्द्र [पूरा नाम कौशलेन्द्र प्रताप सिंह ]कौशलेन्द्र के गीतों में ग्राम्य संस्कृति रची -बसी है |आंचलिकता भी इनकी प्रमुख विशेषता है |घर -परिवार ,रिश्ते -नाते ,सामाजिक संदर्भ ,पर्व -त्यौहार इनके गीतों के सहज विषय होते हैं |इस कवि का जन्म 20 अगस्त  1948 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जनपद के ढेमा गाँव में हुआ था | हलांकि अब यह पूरी तरह से इलाहाबाद में ही रच -बस गये हैं |इलाहाबाद विश्वविद्यालय से भूगोल में स्नातकोत्तर उपाधि हासिल कर अध्यापन के पेशे से जुड़ गये और जवाहरलाल नेहरु इंटर कालेज जारी के प्रधानाचार्य के पद से सन 2010 में सेवानिवृत्त हो गये |हिन्दी की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में इनकी रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं |आकाशवाणी और इलाहाबाद दूरदर्शन से कविताओं का प्रसारण होता रहता है |कौशलेन्द्र के काव्य में केवल नवगीत नहीं बल्कि उनके स्वभाव में भी नवगीत रचा -बसा है| दिन ढले और पत्ते पियराये इनके शीघ्र प्रकाशित होने वाले संग्रह हैं |हम अंतर्जाल के माध्यम से इस कवि के पांच गीत आप तक पहुंचा रहे हैं -
एक 

चूल्हे की 
जलती रोटी सी 
तेज आंच में जलती माँ !
भीतर -भीतर 
बलके फिर भी 
बाहर नहीं उबलती माँ !

धागे -धागे 
यादें बुनती ,
खुद को 
नई रुई सा धुनती ,
दिन भर 
तनी तांत सी बजती 
घर -आंगन में चलती माँ !

सिर पर 
रखे हुए पूरा घर 
अपनी -
भूख -प्यास से ऊपर ,
घर को 
नया जन्म देने में 
धीरे -धीरे गलती माँ !

फटी -पुरानी 
मैली धोती ,
साँस -साँस में 
खुशबू बोती ,
धूप -छाँह में 
बनी एक सी 
चेहरा नहीं बदलती माँ !
दो 
जिन गलियों में 
बचपन बीता 
धूल खेलकर हुए सयाने |
आज शहर से 
घर आने पर 
वे ही पूछ रहीं पहचाने |

मंगरू काका 
लल्ली बुआ 
उन रिश्तों का 
अब क्या हुआ 
हाथ बढ़ाकर 
सिर सहलाकर 
आशीषों ने नहीं छुआ 
जैसे भूल गये क्या होता 
गाँव -गली अपनों के माने |

खिड़की खुली 
बन्द दरवाजे 
देहरी पर -
दुश्मनी विराजे 
भीतर से दारिद्रय झाँकता 
बाहर से राजे -महराजे ,
अब कोई फल -
नहीं दे रहे 
पिता सरीखे पेड़ पुराने |

घर छोटे 
परिवार बड़े हैं ,
सिर के बल 
सब लोग खड़े हैं 
मुँह पुश्तैनी 
बदबू देता 
और सोने से दांत मढ़े हैं ,
कल जो -
सिरहाने बैठे थे 
आज वही बैठे पैताने |
तीन 
फिर निकली 
धूप चटख क्वार की |

आँखों में उतर गयी 
सावनी नदी ,
पथराये होंठों के घाट 
रिनिहा का गदराया 
धान कट चुका 
सपने सब खेत के उचाट ,
राख झरी 
बुझते अंगार की |

धरती की छाती फिर 
हरी हो गयी 
आँखों में झलका उन्माद ,
कागज पर स्याही- सी 
सूख गयी है 
सूखे की बाढ़ों की याद ,
खंजन चिठ्ठी आयी 
प्यार की |
चार 
मौसम की मर्जी है 
पत्ते पियराये |

सुग्गे का भजन और 
मैना की गज़लें ,
बागों में फैली है 
पात बन सुनहले ,
पछुआ ने अगिनबान 
जी भर बरसाये |

टहनी के हरे पत्र 
टूटते -सुखाते ,
छूने से थे रिश्ते 
बहुत चरमराते ,
सोच रही है कोयल 
कौन राग गाये |

मीठे फल के सपने 
लिये गंध भीने 
दौड़ आये फागुन 
चैत के महीने ,
घुटने पर सिर टेके 
बरगद पछताये |
पांच -कौशलेन्द्र की हस्तलिपि में एक गीत 
सुनहरी कलम से -
गंवई गंध से सनी मिट्टी को परखने और उसमें जुड़े निश्छल जीवन में आई विकृतियों को शब्दांकित करने में कौशलेन्द्र सिद्धहस्त हैं |घर -परिवार आंगन ,दालान की की सहज अभिव्यक्ति उनके नवगीतों की पहचान है |प्रयोगशील प्रसंगों में भी उन्होंने छंद की डोर नहीं छोड़ी है | गुलाब सिंह वरिष्ठ हिन्दी नवगीत कवि 
कौशलेन्द्र हिन्दी नवगीत के उजले नक्षत्र हैं | रमेश रंजक सुप्रसिद्ध नवगीतकार ने उनके भीतर छुपे जनसरोकारों को बहुत करीब से पहचाना था और अपने सम्पादन में 'गंगा 'जैसी पत्रिका में उनका यह गीत प्रकाशित किया था -'दिन ढले इस शहर में पत्ते नहीं हिलते '|डॉ० शम्भुनाथ सिंह ने भी नवगीत अर्धशती में उनके गीत अत्यन्त सम्मान के साथ शामिल किये हैं | यश मालवीय  सुप्रसिद्ध गीत कवि 

6 टिप्‍पणियां:

  1. कमाल का काम कर रहे हैं आप ! हिंदी ब्लॉग जगत आपका आभारी होगा ! शुभकामनायें

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  2. भाई सतीश जी हम तो आपके आभारी हैं |क्योंकि बिना आप सब के प्रोत्साहन के यह काम हम बखूबी नहीं कर सकते हैं |आप सबका सहयोग हमारा मनोबल ऊँचा करता है |

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  3. तुषार जी,
    उम्दा फनकारोंकी उम्दा रचनाएँ
    पढ़वानेका बहुत बहुत आभार
    कवि कौशलेन्द्र जी कि रचनाएँ
    पढ़कर मेरा भी बचपन का ग्राम्य जीवन
    याद आ गया ! आभार ........

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  4. भाई तुषार जी,
    'सुनहरी कलम' शीर्षक आपकी ब्लॉग-पत्रिका भविष्य के नवगीत के लिए निश्चित ही एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि तैयार करने की भूमिका निभा रही है| कौशलेन्द्र जी की रचनाओं से मैं काफी अरसे से परिचित रहा हूँ| यहाँ प्रस्तुत उनके सभी गीत श्रेष्ठ नवगीत की बानगी देते हैं| मेरा हार्दिक साधुवाद आप दोनों को|
    कुमार रवीन्द्र

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  5. बहुत सुंदर प्रस्तुति. कौशलेन्द्र जी की कवितायेँ मनको छू लेती है. धन्यबाद.

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  6. तुषार जी ,
    ब्लागजगत में जहाँ बहुत से आत्ममुग्ध हैं , आपका अच्छे रचनाकारों और उनकी सुन्दर रचनाओं से बराबर रूबरू कराना अति सराहनीय है |
    कौशलेन्द्र जी के सभी नवगीत प्यारे लगे....किन्तु पहला नवगीत 'माँ ' तो ह्रदय में उतर गया |
    बहुत-बहुत आभार....

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