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सोमवार, 16 मई 2011

एक गज़ल /चार गीत -कवि वसु मालवीय

कवि वसु मालवीय [समय -10-11-1965से 16-05-1997]
कवि वसु मालवीय की पुण्य तिथि 16 मई पर विशेष प्रस्तुति 

कवि /कथाकार वसु मालवीय का जन्म 10 नवम्बर 1965 को कानपुर में हुआ था |पिता उमाकांत मालवीय से साहित्यिक संस्कार ग्रहण कर वसु ने बहुत छोटी उम्र में अपनी राष्ट्रीय उपस्थिति दर्ज की थी |वसु कहानियाँ लिखते थे और कहानियाँ लिखते -लिखते स्वयं एक कहानी हो  गए  |उनका कहानी संग्रह सूखी नहीं है नदी उनके न रहने के बाद प्रकाशित हुआ है |बालगीत संग्रह अक्ल ठिकाने आई पर उन्हें उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा सम्मानित किया गया था गीत -गज़ल और दोहा जैसी रचनात्मक विधाओं में वह अपने आप को विलक्षण अंदाज में प्रस्तुत करते थे |अपने अंतिम दिनों में वह कथाकार कमलेश्वर के साथ टी० वी० धारावाहिक आल्हा में काम कर रहे थे |मुंबई में 16 मई   1997को सड़क दुर्घटना में उनका दुखद अवसान हो गया |मात्र 31वर्ष की अल्पायु में उन्होंने इतना विपुल लेखन किया है कि आश्चर्यचकित हो जाना पड़ता है |वसु के गीतों का संकलन एक प्रतिनिधि चीख शीघ्र प्रकाशित होने वाला है |उनकी एक गज़ल और हस्तलिपि सहित चार गीत आपके समक्ष प्रस्तुत हैं |उम्मीद है अनुज वसु को आप भी मेरी तरह ही जिंदा अनुभव कर सकेंगे |[यह परिचय  वसु मालवीय के बड़े भाई गीतकार यश मालवीय के द्वारा लिखा गया है ]
एक -गज़ल 

वो तो कठपुतली है बाबू 
खुद अपनी चुगली है बाबू 

तुम उसको ठंडा कहते हो 
कितने दिन उबली है बाबू 

तुम शौक़ीन गोश्त के होगे 
लेकिन वो दुबली है बाबू 

सबसे पहले वो कटती है 
डिब्बे की सुतली है बाबू 

उसने अपना जिस्म दिखाया 
तब सिल्वर जुबली है बाबू 
दो -गीत 
पीहर से आये 
आलता लगाये 
भाभी के पांव |

खेतों से चूल्हे तक 
बजरे की गंध 
खनक लोकगीतों की 
महके सम्बन्ध 
सोंधापन घोले 
चुप -चुप कुछ बोले 
घर -आंगन गाँव |

चुहुल से शरारत तक 
रूठना -मनाना 
बिना बात का गुस्सा 
आँख से दिखाना 
टकटकी लगाये 
कहीं हाथ आये 
खोज रहे दाँव |

ऐपन के हाथ सुबह 
चुनते शेफाली 
तुलसी का बिरवा औ 
पूजा की थाली 
धूप -दीप वाले 
आरती सम्भाले 
आंचल की छाँव |
तीन-गीत  
बहुत दिन से नहीं आये घर 
कहो अनवर !क्या हुआ ?
आ गया क्या बीच अपने भी 
छह दिसम्बर क्या हुआ ?

वो सिवइयां प्यार से 
लाना टिफिन में 
दस मुलाकातें हमारी 
एक दिन में 
और अब चुप्पी तुम्हारी 
तोड़ती जाती निरंतर क्या हुआ ?

तुम्हें मस्जिद से 
हमें कब देवथानों से ?
हमें बेहद मोह था 
अपने मकानों से 
जब बनी है खीर घर पर 
पूछती है माँ बराबर 
याद है जब खेलते थे साथ छत पर 
क्यों बिरादर क्या हुआ ?

टूटने को बहुत कुछ 
टूटा ,बचा क्या ?
छा गयी है देश के ऊपर 
अयोध्या 
फोड़कर दीवार अब उगने लगा है 
कुछ परस्पर 
धर्म ग्रंथों से निकलकर 
हो रहे तलवार अक्षर 
कहो अनवर !क्या हुआ 

चार -गीत 
किसे देखा है पिघलते 
मैं नहीं था 
बर्फ़ के आधार वाले और होंगे |

भूख माथे पर सजाकर 
गर्दनों पर सिर टिकाकर 
दूर तक ठंडी सड़क पर 
आग भीतर की गँवाकर 
इस तरह चुपचाप चलते 
मैं नहीं था 
युद्ध से इनकार वाले और होंगे |

नहीं देते गालियाँ जो 
क्रोध भी कर नहीं पाते 
शब्द जिनकी अर्चना में 
पैलगी -परनाम गाते 
किसे देखा हाथ मलते 
मैं नहीं था 
याचना स्वीकार वाले और होंगे |

बेसुरे से इस समय में 
चलो अपना राग गा दें 
एक प्रतिनिधि चीख होकर 
कान के परदे उड़ा दें 
नहीं मैं सचमुच नहीं था 
किसे देखा होंठ सिलते 
मैं नहीं था 
काठ की तलवार वाले और होंगे |
पांच -वसु मालवीय की हस्तलिपि में एक गीत 


सुनहरी कलम से 

मैंने जब भी वसु को देखा रचनात्मक उन्मेष से भरा हुआ पाया | राजेन्द्र यादव 

ऐसा तो मैंने कोई परिवार ही नहीं देखा कि एक रचनाकार पिता हो और उसकी तीन की तीनों संतानें भी रचनाकार हो जाएँ |उन तीनों संतानों में वसु मालवीय की अपनी अलग सुगंध थी |कमलेश्वर 

वसु में उमाकांत की सांसे लेती नजरआती हैं-कन्हैयालाल नंदन 

वसु का जाना हमारे समय की एक बड़ी क्षति है |यह युवा रचनाकार गीत और कहानी के बीच एक पुल तैयार कर रहा था |उसके हर गीत में एक कहानी और एक कहानी में कई कई गीत झिलमिलाते दिखते हैं ज्ञानरंजन 

वसु नईम साहब की काष्ठ कला की प्रदर्शनी के दौरान मुंबई की जहाँगीर आर्ट गैलरी में मिले थे ,बहुत देर तक उससे एक किनारे पर खड़े होकर गुफ़्तगू होती रही थी |उनके न रहने का समाचार सुनकर उम्मीद साहब का यह शेर याद हो आया -
कल उसकी आँखों ने क्या जिंदा गुफ़्तगू की थी 
गुमान तक न हुआ वो बिछुड़ने वाला है --निदा फाजली 
अयोध्या प्रसंग में गीत के छंद में लिखी गयी वसु मालवीय की कविता कहो अनवर !एक बड़ी कविता है -नईम 

7 टिप्‍पणियां:

  1. वसु को ईश्वर ने हुनर दिया तो उम्र देने में कोताही कर दी |इस कवि /कथाकार का सर्वोत्तम आना अभी बाकी था |

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  2. वसु जी की रचनाएं
    हमारे अमूल्य साहित्य में
    धरोहर का रूतबा रखती हैं ...

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  3. वसु मालवीय जी की कालजयी रचनाएं उन्हें साहित्य में सदा अमर रखेंगी ....

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  4. वसु मालवीय जी को पढ़कर आनन्द आ गया.

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  5. वसु जी कि सभी रचनाएँ बहुत बढ़िया लगी
    आभार तुषार जी .....

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  6. बहुत दिन से नहीं आये घर
    कहो अनवर !क्या हुआ ?
    आ गया क्या बीच अपने भी
    छह दिसम्बर क्या हुआ ?
    ... ...
    टूटने को बहुत कुछ
    टूटा ,बचा क्या ?
    छा गयी है देश के ऊपर
    अयोध्या
    फोड़कर दीवार अब उगने लगा है
    कुछ परस्पर
    धर्म ग्रंथों से निकलकर
    हो रहे तलवार अक्षर
    कहो अनवर !क्या हुआ

    वसु की ये गीत-पंक्तियाँ उनकी अनूठी काव्य-प्रतिभा को रेखांकित करने हेतु पर्याप्त हैं| कई वर्ष पूर्व जब कवि-पत्रकार मंगलेश डबराल ने गीतिकविता के सामाजिक उत्तरदायित्त्वबोध को 'वागर्थ'-७४ में प्रकाशित साक्षात्कार में प्रश्नांकित किया था, तब मैंने इन्हीं पंक्तियों का हवाला देते हुए उनकी परिसीमित गीत-दृष्टि का उत्तर दिया था|
    कुमार रवीन्द्र

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  7. आदरणीय कुमार रवीन्द्र जी सादर नमन !आप अपने से बहुत छोटे लोगों का उत्साहवर्धन करने में तनिक भी संकोच नहीं करते और यहीं आप अपने समकालीन कवियों /गीतकारों से बहुत आगे निकल जाते हैं |वसु पर की गयी आपकी टिप्पड़ी हमारे लिये अमूल्य है |आगे भी आपके आशीर्वाद की अपेक्षा रहेगी |आभार

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