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बुधवार, 4 मई 2011

चार कविताएं -कवि ठा० गोपाल शरण सिंह

कवि -ठाकुर गोपालशरण सिंह 
समयकाल [01-01-1891से 02-10-1960]
परिचय -
कुछ फूल खिलते हैं तो मंदिर की मूर्तियों पर चढ़ा दिये जाते हैं ,कुछ फूल खिलते हैं और लोगों के गले का हार बन जाते हैं लेकिन कुछ फूल खुशबू बाँटकर भी समय और  समाज की स्मृतियों से ओझल हो जाते हैं |आज हम ऐसे ही एक साहित्य मनीषी के बारे में बताएंगे जिसका हिन्दी खड़ी बोली कविता के विकास में अप्रतिम योगदान तो है लेकिन वक्त धीरे -धीरे उन्हें भूलता जा रहा है |हिन्दी खड़ी बोली के लिए द्विवेदी युग काफ़ी महत्वपूर्ण है यह वह काल खंड है जब गद्य और कविता दोनों में खड़ी बोली और विशुद्ध हिन्दी का प्रयोग प्रारम्भ हुआ |आज की हिन्दी इसी युग के प्रयास का सुंदर परिणाम है |हिन्दी खड़ी बोली कविता के विकास में  राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ,अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध ,निराला ,ठाकुर गोपाल शरण सिंह आदि का महत्वपूर्ण योगदान है |ठाकुर गोपल शरण सिंह के समकालीन कवियों को जो प्रसिद्धि मिली वह दुर्भाग्य से ठाकुर साहब को नहीं मिल सकी ,जबकि इनका योगदान तनिक भी कमतर नहीं आंका जा सकता है |इस कवि का जन्म रीवां से चौसठ किमी० दूर नई गढ़ी रियासत में 01जनवरी 1891को और निधन इलाहाबाद में 2 अक्टूबर 1960 को हुआ था |गोपाल शरण सिंह की शिक्षा हाईस्कूल तक हुई थी,लेकिन अंग्रेजी ,संस्कृत ,उर्दू और हिन्दी चार भाषाओं के ज्ञाता थे |हैरत इस बात की है कि जब सामंतवाद अपने चरम पर था , उस समय स्वयं ठाकुर साहब ने किसानों ,मजदूरों शोषितों ,पीडितों और असहायों को अपनी कविता का विषय बनाया |सामंती परिवार में पैदा होकर भी ठाकुर गोपाल शरण सिंह उन सभी कुरीतियों से दूर एक मनीषी ,एक आमजन की पीड़ा में छटपटाते कवि हुआ करते थे |रीवां नरेश महाराज गुलाब सिंह की कैबिनेट में जाने से उन्होंने इनकार कर दिया था |ठाकुर साहब शरीर सौष्ठव भी अद्भुत था उन्हें पहलवानी का भी शौक था |नई गढ़ी से इलाहाबद सिर्फ़ इसलिए आये ताकि बच्चों की शिक्षा -दीक्षा ठीक ढंग से हो सके |गोपाल शरण सिंह के घर पर निराला ,मैथिलीशरण गुप्त महादेवी वर्मा ,डॉ० रामकुमार वर्मा जैसे कवियों का आना -जाना होता था |ठाकुर साहब के पुत्रों में सोमेश्वर सिंह ,माधव सिंह ,चंद्रभूषण सिंह ,गोविन्द सिंह ,नागेश्वर सिंह ,मुकुंद सिंह ,और श्री अनिरुद्ध सिंह पुत्रियों में सरस्वती देवी ,इन्दुमती देवी और श्रीमती सुषमा सिंह हैं |वर्तमान में हमारे बीच केवल श्री अनिरुद्ध सिंह और श्रीमती सुषमा सिंह जी हैं, शेष लोग अब हमारे बीच नहीं हैं |गोपालशरण सिंह के बड़े पुत्र ठाकुर सोमेश्वर सिंह भी कवि थे और पांच पुस्तकों का सृजन किया था ,सबसे छोटी पुत्री सुषमा जी भी कवयित्री हैं |कृतियाँ -मानवी [१९३८ ]माधवी [१९३८]ज्योतिष्मती [१९३८]संचिता [१९३९] सुमना[१९४१ ]ग्रामिका [१९५१]जगदालोक [१९५२]प्रेमांजलि [१९५३]कादम्बिनी [१९५४]विश्वगीत [१९५५]सभी इंडियन प्रेस इलाहाबाद से प्रकाशित |सागरिका[१९४४] लीडर प्रेस इलाहाबाद से प्रकाशित |अप्रकाशित कृतियाँ मीरा ,शांति गीत |इसमें जगदालोक प्रबंध काव्य है |एक पुस्तक हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग से प्रकाशित है आधुनिक कवि -ठाकुर गोपालशरण सिंह |ठाकुर गोपाल शरण सिंह जी पर सामग्री उपलब्ध कराने में उनके सुपुत्र श्री अनिरुद्ध सिंह जी और उनकी लाडली बेटी कवयित्री सुषमा सिंह जी के हम विशेष आभारी हैं |हम इस साहित्य  मनीषी की चार कविताएं आप तक पहुंचा रहे है आप इन कविताओं को उस काल खंड के हिसाब से पढ़ें |हमें आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी -----

ठाकुर गोपालशरण सिंह का काव्य संसार 
एक 
शांति रहे पर क्रांति रहे !
फूल हँसें खेलें नित फूलें ,
पवन दोल पर सुख से झूलें 
किन्तु शूल को कभी न भूलें ,
स्थिरता आती है जीवन में 
यदि कुछ नहीं अशान्ति रहे 
शांति रहे पर क्रांति रहे !

यदि निदाघ क्षिति को न तपावे ,
तो क्या फिर घन जल बरसावे ?
कैसे जीवन जग में आवे ?

यदि न बदलती रहे जगत में ,
तो किसको प्रिय कांति रहे ?
शांति रहे पर कांति रहे !

उन्नति हो अथवा अवनति हो ,
यदि निश्चित मनुष्य की गति हो ,
तो फिर किसे क्रम में रति हो ?

रहे अतल विश्वास चित्त में ,

किन्तु तनिक सी भ्रान्ति रहे 
शांति रहे पर क्रांति रहे ?
[काव्य संग्रह सुमना से ]

दो  
माँ 
है जग -जीवन की जननी तू 
तेरा जीवन ही है त्याग |
है अमूल्य बैभव वसुधा का 
तेरा मूर्तिमान अनुराग |

धूल -धूसरित रत्न जगत का 
है तेरी गोदी का लाल |
है जग -बाल जलज का रक्षक 
माँ ,तेरा मृदु बाहु मृणाल |

कितनी घोर तपस्या करके 
पाती है तू यह वरदान ?
किन्तु विश्व को अनायास ही 
कर देती है उसे प्रदान |

है तुझसे ही लालित -पालित 
यह भोला -भला संसार |
करती है प्लावित वसुधा को 
तेरी प्रेम सुधा की धार |

तेरे दिव्य हृदय में जिसका 
रहता है सदैव संचार |
लिए अंक में मृदुल सुमन को 
लता दिखाती है वह प्यार |

वनस्थली के अंग -अंग में 
होता तेरा प्रेम- विकास |
नव- बसंत उसके आंगन में 
जब क्रीड़ा करता सोल्लास |

सुत वियोग -दुःख से विह्वल हो 
रोते हैं माँ तेरे प्राण |
किन्तु सभी कुछ सह लेती तू 
हो जिससे जग का कल्याण |
[काव्य संग्रह मानवी से लम्बी कविता का कुछ अंश ]

तीन 
प्रतिनिधि 
देव !तुम्हारे पास |
दिन दुखी जन का प्रतिनिधि बन ,
आया था यह दास |

लाया था उपहार रूप में ,
केवल दुःख निःश्वास |
पर आशा भी रही चित्त में 
और रहा विश्वास |

किन्तु तुम्हारी दशा देखकर ,
मन हो गया हताश |
जग की व्यथा -कथा सुनने का 
तुम्हें नहीं अवकाश |
[ज्योतिष्मती काव्य संग्रह से ]
चार 
दीन भारत के किसान 
कर रहे हैं ये युगों से 
ग्राम में अज्ञात-वास ,
अंग जीवन का बनी है 
जन्म से ही भूख- प्यास ,
किन्तु हरते क्लेश हैं निज 
देश को कर अन्न- दान 
दीन भारत के किसान |

हैं सदा संतुष्ट रहते 
क्लेश भी सहकर विशेष ,
लोभ को न कदापि देते 
चित्त में करने प्रवेश ,
याचना करते नहीं रख 
कर हृदय में स्वाभिमान 
दीन भारत के किसान |

विश्व परिवर्तित हुआ पर 
ये बदलते हैं न वेश ,
छोड़ते हैं ये नहीं निज 
अंध -कूपों का प्रदेश ,
बंद रखते हैं सदा किस 
मोह से निज आँख -कान 
दीन भारत के किसान |

भूमि के हैं भक्त ये जो 
नित्य देती अन्न -वस्त्र ,
बैल है सम्पत्ति इनकी 
और हल हैं दिव्य अस्त्र ,
ज्ञान -वृद्धि हुई बहुत पर 
रह गए भोले अजान 
दीन भारत के किसान |

घूमता है वारिदों के 
साथ इनका भाग्य -चक्र ,
रंग में इनके हृदय के 
है रंगा सुरचाप वक्र ,
यदि हुई पर्याप्त कृषि तो 
हो गए सम्पत्तिवान 
दीन भारत के किसान |

हो रहा विज्ञान का है 
विश्व में कब से विकास ?
पर न इनके पास अब तक 
है पहुंच पाया प्रकाश ,
देश की अवनत दशा पर 
मोह वश देते न ध्यान 
दीन भारत के किसान |

देश में क्या हो रहा है 
है इन्हें कुछ भी न ज्ञान ,
है इन्हें दिखता न जग में 
रुचिर नवयुग का विहान ,
निज पुराने राग का बस 
कर रहे हैं नित्य गान 
दीन भारत के किसान |
[काव्य संग्रह ग्रामिका से ]


ठा० गोपालशरण सिंह की हस्तलिपि [यह वाक्य ठा० साहब ने अपनी बड़ी बेटी सरस्वती को पुस्तक भेंट करते हुए लिखा था ]
सुनहरी कलम से 
ठाकुर गोपालशरण सिंह आधुनिक  हिन्दी काव्य के प्रमुख उन्नायकों और पथ प्रशस्त करनेवालों में हैं |ब्रजभाषा के स्थान पर आधुनिक हिन्दी का प्रयोग कर उन्होंने काव्य में न सिर्फ़ वही माधुर्य ,सरसता और प्रांजलता बनाये रखी ,जो ब्रजभाषा का वैशिष्ट्य था ,वरन उनकी प्रसाद अभिव्यंजना शैली में भी रमणीयता का सौंदर्य बना रहा |विषय प्रतिपादन में तल्लीनता और भाव विचार की सघनता उनकी कविता का एक और आकर्षक तत्व है |गाँव ,खेत खलिहान ,किसान ,मजदूर ,नदी पहाड़ ,झरने तालाब ,बाग -बगीचे ,दूर -दूर तक फैली हरीतिमा में पला -बढा कवि का जीवन परिवेश तो उसकी कविता में है ही ,अशिक्षा ,अज्ञान ,जात -पांत ,छुआछूत ,बालविवाह ,अनमेल विवाह ,प्रेमरहित दाम्पत्य ,नारी दुर्दशा और दलित वर्ग की निरीहता और सामाजिक विसंगतियों की करुणार्द अनुभूतियाँ भी वहाँ हैं | डॉ० सत्येन्द्र शर्मा
[भारतीय साहित्य के निर्माता ठाकुर गोपाल शरण सिंह लेखक डॉ० सत्येन्द्र शर्मा साहित्य अकादमी से प्रकाशित ]

16 टिप्‍पणियां:

  1. ठाकुर गोपालशरण जी का परिचय पढ़ कर बहत अच्छा लगा और उनकी चारों रचनाएँ बहुत ही सुन्दर इन पर प्रतिक्रिया व्यक्त करना ,स्यंवको सम्मानित करना जैसा है और आपका आभार

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  2. ठाकुर गोपाल शरण सिंह जी के बारे में विस्तृत आलेख पढ़ा | चारों रचनाएँ अति सुन्दर हैं ....

    परिचय करवाने का बहुत-बहुत आभार ....

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  3. ठाकुर गोपालशरण सिंह के बारे में और उनकी कविता से परिचय करा कर आपने बहुत अच्छा काम किया है। उन्होंने कविताओं और सवैयों में खड़ी बोली का बहुत ही मंजा हुआ रूप सामने लाया।

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  4. ठाकुर गोपालशरण सिंह के बारे में बताया और उनकी चंद कवितायें आपने साझा किया -आभार !
    निसंदेह वे उच्च कोटि के काव्य रस प्रेमी और मानवीय चेतना संपन्न मानव शिरोमणि थे !

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  5. साहित्य से जुड़े भूले भटके लोगों पर, ब्लॉग जगत में लेखन की परम्परा, लगभग न के बराबर है ! और कोई लिखे भी तो इन नीरस लेखों में अथवा दूसरों के बारे में जानने की रूचि यहाँ नगण्य ही है !

    आपका यह ब्लॉग कोई याद भले कम रखे मगर साहित्य के क्षेत्र में, समय के साथ, पहचान बनाने में समर्थ होगा ! आज पहली बार ठाकुर गोपाल शरण सिंह के बारे में पढ़ सका ...अच्छा लगा !

    मेरा अनुरोध है इस बेहतरीन ब्लॉग को थोडा रुचिकर बनाने के लिए कुछ मसाला डालने का प्रयत्न अवश्य करें :-(
    यहाँ स्वास्थ्य वर्धक खाना लोगों को अच्छा नहीं लगता !

    बेहतरीन कार्य के लिए शुभकामनायें आपको !!

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  6. भाई सतीश सक्सेना जी आपका कमेंट्स और सुझाव दोनों हृदयग्राही है |मेरी कोशिश होगी कि आपकी उम्मीदों पर खरा उतरूं |आपका बहुत बहुत आभार |

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  7. ठाकुर गोपाल शरण सिंह जी के बारे में विस्तृत जानकारियाँ मिली साथ ही उनकी भाव पूर्ण कविताओ को भी पढ़्ने का अवसर मिला। धन्यवाद ।

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  8. पुराने लेखकों का काम आप सामने ला रहें हैं ,हमें हमारी विरासत से परिचित करवा रहें हैं आपका आभार .

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  9. ठाकुर गोपाल शरण सिंह जी के बारे में विस्तृत जानकारियाँ मिली धन्यवाद ।

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  10. धन्यवाद आपका .अच्छी जानकारी

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  11. आज भी तुषार भाई भारत के किसान की वही दिशा है .जैतापुर में पहुंचे हैं कोंग्रेस के कथित चाणक्य मंद बुद्धि बालक के साथ जिस लोग कोंग्रेस का प्रिंस ऑफ़ चार्ल्स मान रहें हैं .सुन्दर मन में जगह बनाने वाली रचना पढवाने सामने लाने के लिए आपका आभार .

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  12. sabhi rachnayen sunder sabse achhi rachna maa lagi..........

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  13. मैंने पहले ही कहा था जिन्हें गंभीर साहित्य पसंद है यहाँ जरुर आयेंगे .आपका प्रयास रंग ला रहा है...पर लोग अपने में व्यस्त भी हो जाते हैं ..फिर सबकुछ भूल जाते हैं ...ठाकुर गोपालशरण सिंह को पढ़ना सुखद लगा .

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  14. बहुत ही उत्कृष्ट प्रयास. जयकृष्ण जी को इस ब्लॉग को लिए ढेर सारा साधुवाद.

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  15. ठाकुर गोपाल शरण सिंह जी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर बेहतरीन सामग्री है। पढ़कर बेहद अच्छा लगा।

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