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बुधवार, 18 मई 2011

छः गज़लें -कवि हस्तीमल हस्ती

कवि -हस्तीमल हस्ती 
सम्पर्क -09820590040
जिसने तपती हुई रेत में प्यास से व्याकुल हिरणों को दौड़ते -भागते देखा हो ,जिसने समन्दर की लहरों को उसी में भींगते हुए गिना हो ,जिसने ऊँट पर सवारी कर मृगमरीचिका को देखा हो ,जो लोक संस्कृति की गोंद में पला -बढा हो ,जिसने महानगरीय संस्कृति के इन्द्रधनुषी रंगों को आत्मसात किया हो ,जो उस शहर में कविता की मशाल जलाये हो जहाँ नियान की चमकती रोशनियों में दिन और रात का फर्क ही खत्म हो जाता है |जिसने प्यार को एक नई परिभाषा देकर लिखा हो -प्यार का पहला खत लिखने में वक्त तो लगता है ,उस नामचीन शायर /कवि का नाम है हस्तीमल  हस्ती | हस्तीमल हस्ती का जन्म 11मार्च  1946 को आमेट, जिला राजसमन्द राजस्थान में हुआ ,लेकिन इनका कर्म  स्थान है मुंबई | हस्तीमल हस्ती की शायरी में बारूद के धमाकों का शोरगुल तो नहीं है लेकिन उनकी शायरी माचिस की उस तीली की तरह है जो हजारों चिरागों को रोशन कर सकती है |इनकी गज़लों में रिश्तों की महक ,सामाजिक सन्दर्भों का स्वर ,विचारों की खुशबू और एक अच्छी शायरी का हुनर मौजूद है |सम्प्रेषणीयता इनकी गज़लों की एक अद्भुत विशेषता है |साहित्य को समर्पित इस शायर ने जिन्दगी में तमाम उतार -चढ़ाव देखे हैं लेकिन हालत से डरे बिना अपने काम को अंजाम देते रहे |हिन्दी साहित्य में युगीन काव्या के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है |अभी हाल में इसका पचासवां अंक प्रेम विशेषांक के रूप में हमारे बीच मौजूद है |हस्तीमल हस्ती जितने अच्छे शायर हैं उतने अच्छे सम्पादक और उतने ही अच्छे इंसान हैं |सुदर्शन फाकिर जैसे ख्यातिलब्ध शायर से इनका गहरा रिश्ता था | हस्तीमल हस्ती का शोध ग्रंथों में उल्लेख है ,कई गज़ल संग्रहों में गज़लें संग्रहीत हैं ,तमाम नामचीन पत्र -पत्रिकाओं में इनकी रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं |मशहूर गज़ल गायक जगजीत सिंह और पंकज उधास ने इनकी गज़लों को अपना रेशमी सुर दिया है |इस शायर के दो गज़ल संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं- 1-क्या कहें किससे कहें [महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी से पुरष्कृत 2-कुछ और तरह से भी [अम्बिका प्रसाद दिव्य पुरष्कार से सम्मानित ]दूरदर्शन और आकाशवाणी से इनकी कविताओं का प्रसारण होता रहता है |हम हिन्दी गज़ल को समर्पित इस शायर /कवि की कुछ गज़लें आप तक पहुँचा रहे हैं |आपसे इस पोस्ट के साथ ही कुछ दिन के लिये विदा ले रहे हैं -
हस्तीमल हस्ती की गज़लें 
एक 
प्यार का पहला खत लिखने में वक्त तो लगता है 
नये परिंदों को उड़ने में वक्त तो लगता है 

जिस्म की बात नहीं थी उनके दिल तक जाना था 
लम्बी दूरी तय करने में वक्त तो लगता है 

गाँठ अगर लग जाये तो फिर रिश्ते हों या डोरी 
लाख करें कोशिश खुलने में वक्त तो लगता है 

हमने इलाजे जख्में दिल का ढूंढ लिया लेकिन 
गहरे जख्मों को भरने में वक्त तो लगता है
[इस गज़ल को महान गज़ल गायक जगजीत सिंह जी ने अपना सुर दिया है ]
दो  

खुशनुमाई देखना ना क़द किसी का देखना 
बात पेड़ों की कभी आये तो साया देखना 

खूबियाँ पीतल में भी ले आती हैं कारीगरी 
जौहरी की आँख से हर एक गहना देखना 

झूठ के बाज़ार में ऐसा नजर आता है सच 
पत्थरों के बाद जैसे कोई शीशा देखना 

जिंदगानी इस तरह है आजकल तेरे बगैर 
फासले से जैसे कोई मेला तनहा देखना 

देखना आसां है दुनियाँ का तमाशा साहबान 
है बहुत मुश्किल मगर अपना तमाशा देखना 
तीन 
सबकी सुनना ,अपनी करना 
प्रेम नगर से जब भी गुजरना 

अनगिन बूंदों में कुछ को ही 
आता है फूलों पे ठहरना 

बरसों याद रक्खें ये मौजें 
दरिया से यूँ पार उतरना 

फूलों का अंदाज सिमटना 
खुशबू का अंदाज बिखरना 

अपनी मंज़िल ध्यान में रखकर 
दुनियाँ की राहों से गुजरना 
चार 
झील का बस एक कतरा ले गया 
क्या हुआ जो चैन दिल का ले गया 

मुझसे जल्दी हारकर मेरा हरीफ़ 
जीतने का लुत्फ़ सारा ले गया 

एक उड़ती सी नज़र डाली थी बस 
वो न जाने मुझसे क्या -क्या ले गया 

देखते ही रह गये तूफान सब 
खुशबुओं का लुत्फ़ झोंका ले गया 
पांच 
चिराग हो के न हो दिल जला के रखते हैं 
हम आंधियों में भी तेवर बला के रखते हैं 

मिला दिया है पसीना भले ही मिट्टी में 
हम अपनी आँख का पानी बचा के रखते हैं 

हमें पसंद नहीं जंग में भी मक्कारी 
जिसे निशाने पे रक्खें बता के रखते हैं 

कहीं खुलूस कहीं दोस्ती कहीं पे वफ़ा 
बड़े करीने से घर को सजा के रखते हैं 

अना पसंद है हस्ती जी सच सही लेकिन 
नज़र को अपनी हमेशा झुका के रखते हैं 
छह -हस्तीमल हस्ती की हस्तलिपि में एक गज़ल 
सुनहरी कलम से -
हस्तीमल हस्ती गज़ल के बहुत सशक्त हस्ताक्षर हैं |वह बहुत अच्छा लिख रहे हैं |युगीन काव्या को मैं पढता रहता हूँ |हस्ती जी ने गज़ल के लिये काम भी बहुत किया है |मुंबई में कई बार उनसे मिला भी हूँ वह एक अच्छे शायर और एक अच्छे इंसान भी हैं |हस्तीमल हस्ती अपने क्षेत्र की एक हस्ती हैं -
अदम गोंडवी [सुप्रसिद्ध गज़ल कवि ]

हस्तीमल हस्ती न केवल एक बेहतरीन शायर हैं बल्कि एक कुशल सम्पादक भी हैं |व्यावसायिक परिवार से ताल्लुकात रखने के बावजूद भी इन्होंने लेखन कर्म को प्राथमिकता दिया |इनके कहन में उत्तरोत्तर निखार आया है |इन्होंने प्रारम्भ में एक पत्रिका युगीन काव्या का सम्पादन शुरू किया जो आज भी सफलतापूर्वक प्रकाशित हो रही है |
विज्ञान व्रत [सुप्रसिद्ध गजलकार और पेंटर दिल्ली ]

हस्तीमल हस्ती की समूची शख्सियत ही गज़ल जैसी है |वह हिन्दी गज़ल या उर्दू गज़ल के पचड़े में न पड़कर उस ज़बान में गज़लें कहते हैं ,जिसे आम हिन्दुस्तानी बोलता है ,इस तरह से कह सकते हैं कि उन्होंने हिन्दुस्तानी गज़ल का चेहरा ही और अधिक स्पष्ट एवं रौशन किया है |जगजीत सिंह की रेशमी आवाज में जब ;प्यार का पहला खत लिखने में वक्त तो लगता है जैसी गज़ल मंजरे आम पर आयी तब तो जैसे गज़ल विधा को ही एक नया मुहावरा मिल गया |उनकी कहन में सादगी का हुस्न है ,उनके शील में उस्तादाना रंग है |कविता की स्तरीय पत्रिका ;युगीन काव्या के पचास अंक अपने सम्पादन में निकालकर भी उन्होंने एक ऐतिहासिक कार्य किया है |अपने ढंग की निराली और यह पत्रिका विशेषकर छंद को समर्पित रही है ,साथ ही इसने सम्वेदनशील मुक्त छंद कविता का भी सम्मान किया है |हस्ती को पढ़ना ,गुनना एवं सुनना हर बार एक नया आस्वाद दे जाता है |
सुप्रसिद्ध गीत कवि यश मालवीय 
हस्तीमल हस्ती सघन अनुभूतियों के सहृदय व् सरल रचनाकार एवं सम्पादक हैं |गज़ल के लिये हिन्दी में सृजनात्मक स्तर पर कार्य करनेवालों में उनका महत्वपूर्ण स्थान है |युगीन काव्या के माध्यम से उन्होंने हिन्दी गज़ल ही नहीं काव्य की अन्य विधाओं के भी उत्थान एवं प्रचार -प्रसार की दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया है |पत्रिका का पचासवां अंक प्रेम विशेषांक के रूप में  एक अनुपम प्रस्तुति है |
कमलेश भट्ट कमल सुप्रसिद्ध हिन्दी गज़ल कवि 

मंगलवार, 17 मई 2011

पांच गीत -कवि कौशलेन्द्र

कवि -कौशलेन्द्र 
सम्पर्क -09839059139

डॉ० शम्भुनाथ सिंह ने नवगीत दशक और नवगीत अर्धशती में जिन महत्वपूर्ण कवियों को प्रकाशनार्थ चुना था उन सभी कवियों ने आगे चलकर गीत विधा को और हिन्दी कविता को अपनी लेखनी से समृद्ध किया |उन्हीं नवगीतकारों में एक प्रमुख कवि है कौशलेन्द्र [पूरा नाम कौशलेन्द्र प्रताप सिंह ]कौशलेन्द्र के गीतों में ग्राम्य संस्कृति रची -बसी है |आंचलिकता भी इनकी प्रमुख विशेषता है |घर -परिवार ,रिश्ते -नाते ,सामाजिक संदर्भ ,पर्व -त्यौहार इनके गीतों के सहज विषय होते हैं |इस कवि का जन्म 20 अगस्त  1948 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जनपद के ढेमा गाँव में हुआ था | हलांकि अब यह पूरी तरह से इलाहाबाद में ही रच -बस गये हैं |इलाहाबाद विश्वविद्यालय से भूगोल में स्नातकोत्तर उपाधि हासिल कर अध्यापन के पेशे से जुड़ गये और जवाहरलाल नेहरु इंटर कालेज जारी के प्रधानाचार्य के पद से सन 2010 में सेवानिवृत्त हो गये |हिन्दी की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में इनकी रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं |आकाशवाणी और इलाहाबाद दूरदर्शन से कविताओं का प्रसारण होता रहता है |कौशलेन्द्र के काव्य में केवल नवगीत नहीं बल्कि उनके स्वभाव में भी नवगीत रचा -बसा है| दिन ढले और पत्ते पियराये इनके शीघ्र प्रकाशित होने वाले संग्रह हैं |हम अंतर्जाल के माध्यम से इस कवि के पांच गीत आप तक पहुंचा रहे हैं -
एक 

चूल्हे की 
जलती रोटी सी 
तेज आंच में जलती माँ !
भीतर -भीतर 
बलके फिर भी 
बाहर नहीं उबलती माँ !

धागे -धागे 
यादें बुनती ,
खुद को 
नई रुई सा धुनती ,
दिन भर 
तनी तांत सी बजती 
घर -आंगन में चलती माँ !

सिर पर 
रखे हुए पूरा घर 
अपनी -
भूख -प्यास से ऊपर ,
घर को 
नया जन्म देने में 
धीरे -धीरे गलती माँ !

फटी -पुरानी 
मैली धोती ,
साँस -साँस में 
खुशबू बोती ,
धूप -छाँह में 
बनी एक सी 
चेहरा नहीं बदलती माँ !
दो 
जिन गलियों में 
बचपन बीता 
धूल खेलकर हुए सयाने |
आज शहर से 
घर आने पर 
वे ही पूछ रहीं पहचाने |

मंगरू काका 
लल्ली बुआ 
उन रिश्तों का 
अब क्या हुआ 
हाथ बढ़ाकर 
सिर सहलाकर 
आशीषों ने नहीं छुआ 
जैसे भूल गये क्या होता 
गाँव -गली अपनों के माने |

खिड़की खुली 
बन्द दरवाजे 
देहरी पर -
दुश्मनी विराजे 
भीतर से दारिद्रय झाँकता 
बाहर से राजे -महराजे ,
अब कोई फल -
नहीं दे रहे 
पिता सरीखे पेड़ पुराने |

घर छोटे 
परिवार बड़े हैं ,
सिर के बल 
सब लोग खड़े हैं 
मुँह पुश्तैनी 
बदबू देता 
और सोने से दांत मढ़े हैं ,
कल जो -
सिरहाने बैठे थे 
आज वही बैठे पैताने |
तीन 
फिर निकली 
धूप चटख क्वार की |

आँखों में उतर गयी 
सावनी नदी ,
पथराये होंठों के घाट 
रिनिहा का गदराया 
धान कट चुका 
सपने सब खेत के उचाट ,
राख झरी 
बुझते अंगार की |

धरती की छाती फिर 
हरी हो गयी 
आँखों में झलका उन्माद ,
कागज पर स्याही- सी 
सूख गयी है 
सूखे की बाढ़ों की याद ,
खंजन चिठ्ठी आयी 
प्यार की |
चार 
मौसम की मर्जी है 
पत्ते पियराये |

सुग्गे का भजन और 
मैना की गज़लें ,
बागों में फैली है 
पात बन सुनहले ,
पछुआ ने अगिनबान 
जी भर बरसाये |

टहनी के हरे पत्र 
टूटते -सुखाते ,
छूने से थे रिश्ते 
बहुत चरमराते ,
सोच रही है कोयल 
कौन राग गाये |

मीठे फल के सपने 
लिये गंध भीने 
दौड़ आये फागुन 
चैत के महीने ,
घुटने पर सिर टेके 
बरगद पछताये |
पांच -कौशलेन्द्र की हस्तलिपि में एक गीत 
सुनहरी कलम से -
गंवई गंध से सनी मिट्टी को परखने और उसमें जुड़े निश्छल जीवन में आई विकृतियों को शब्दांकित करने में कौशलेन्द्र सिद्धहस्त हैं |घर -परिवार आंगन ,दालान की की सहज अभिव्यक्ति उनके नवगीतों की पहचान है |प्रयोगशील प्रसंगों में भी उन्होंने छंद की डोर नहीं छोड़ी है | गुलाब सिंह वरिष्ठ हिन्दी नवगीत कवि 
कौशलेन्द्र हिन्दी नवगीत के उजले नक्षत्र हैं | रमेश रंजक सुप्रसिद्ध नवगीतकार ने उनके भीतर छुपे जनसरोकारों को बहुत करीब से पहचाना था और अपने सम्पादन में 'गंगा 'जैसी पत्रिका में उनका यह गीत प्रकाशित किया था -'दिन ढले इस शहर में पत्ते नहीं हिलते '|डॉ० शम्भुनाथ सिंह ने भी नवगीत अर्धशती में उनके गीत अत्यन्त सम्मान के साथ शामिल किये हैं | यश मालवीय  सुप्रसिद्ध गीत कवि 

शनिवार, 14 मई 2011

चार नवगीत -कवि कुमार रवीन्द्र


कवि -कुमार रवीन्द्र
सम्पर्क -09416993264
नबाबों के शहर लखनऊ में जन्म ,शिक्षा अंग्रेजी में अध्यापन अंग्रेजी में लेकिन मन ,वचन और कर्म से हिन्दी गीत और साहित्य को समर्पित कवि का नाम है कुमार रवीन्द्र |हमारे देश में  कई ऐसे शिखर पुरुष हुए हैं जिन्होंने शिक्षा और पठन -पाठन के लिए तो अंग्रेजी साहित्य को चुना लेकिन आजीवन हिन्दी भाषा और साहित्य को समृद्ध किया ,फ़िराक गोरखपुरी ,हरिवंशराय बच्चन ,रमेशचन्द्र शाह ,और कुमार रवीन्द्र जी इसी श्रेणी के अलबेले और अप्रतिम कवि हैं |कुमार रवीन्द्र जी ने नवगीत में अभिनव प्रयोग किये हैं |कथ्य शिल्प ,संवेदना सहित तमाम साहित्यिक विशिष्टियों को समेटे यह उदारमना कवि आज भी हिन्दी नवगीत और साहित्य को समृद्ध कर रहा है |कुमार रवीन्द्र जी का जन्म 10 जून 1940 को लखनऊ में हुआ था |सन 1958 में इन्होंने लखनऊ विश्व विद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधि हासिल किया |सन 2000में दयानंद कालेज हिसार हरियाणा से अंग्रेजी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हो गये |कृतियाँ -आहत हैं वन ,चेहरों के अंतरीप ,पंख बिखरे रेत पर ,सुनो तथागत ,और हमने संधियाँ की[ नवगीत संग्रह] लौटा दो पगडंडियाँ कविता संग्रह |एक और कौन्तेय ,गाथा आहत संकल्पों की ,अंगुलीमाल ,कटे अंगूठे का पर्व ,कहियत भिन्न न भिन्न  काव्य नाटक | THE SAT IS STILL GREENअंग्रेजी कविताओं का संग्रह है जो प्रतिष्ठित राइटर्स वर्कशाप से प्रकाशित |इसके आलावा नवगीत दशक भाग दो और नवगीत अर्धशती समेत अनेक समवेत संकलनों में कविताएं प्रकाशित |कुमार रवीन्द्र जी के गीत कानपुर और हरियाणा के विश्वविद्यालयों में एम० ए० के पाठ्यक्रम में शामिल |उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान हरियाणा साहित्य अकादमी और अन्य पुरष्कारों द्वारा पुरष्कृत इस कवि की कविताएं /गीत देश की प्रतिष्ठित पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं |सादा जीवन उच्च विचार के दर्शन में आस्था रखने वाले कुमार रवीन्द्र जी के पांच गीत हम आप तक पहुंचा रहे हैं -
एक 

आग की पगडंडियों पर 
मोम के जंगल 
क्या करेंगे जल ?

जल रही बारूदघर में 
लाख की 
मीनार ,
सुर्ख लावे की सुरंगें 
किस तरह हो 
पार ?
गर्म आवों के शहर में है 
है बड़ी हलचल 
क्या करेंगे जल ?

ताल प्यासे पूछते हैं 
गाँव भर की 
खैर ,
दूर लपटों में 
झुलसकर 
लौट आये पैर ,
राख होना है सभी को 
आज हों या कल ,
क्या करेंगे जल ?
दो 
चोंच खोल 
दिन को गुहराते 
चिड़ियों के बच्चे |

तिनके -तिनके जोड़ 
बना है नीड़ 
उजाले का ,
सोये घर की 
नींद तोड़ता 
शंख शिवाले का ,
नन्हें पांव 
उभर आये हैं 
आंगन में कच्चे |

तुलसी चौरे पर 
बरगद की 
लम्बी छाँव पड़ी ,
फगुनाहट 
पिछली मुंडेर पर 
ओढ़े धूप खड़ी ,
भोली चितवन के 
दुलार सब 
हैं कितने सच्चे |
तीन 
सजनी देखो 
लौट आये हैं 
चिड़ियों के बतियाने के दिन |

आम्रकुंज से सुबह -सुबह 
कोयल ने टेरा ,
तोता आसमान का देखो 
लगा रहा फेरा ,
छत पर बैठा 
कौवा कहता 
हुए किसी के आने के दिन |

गौरैया के जोड़े ने फिर 
चहचह से घर को भर डाला ,
पिडुकी बुला रही पिडुके को 
जहाँ धूप का फैला जाला ,
जन्म हो रहा 
नये सूर्य का 
ये है सोहर गाने के दिन |

उधर टिटहरी रोई 
फिर कविता है जागी ,
लगन सगुन पंछी होने की 
मन में लागी ,
हाँ सजनी 
ये मन को है 
वंशीवट से उलझाने के दिन |
चार -कुमार रवीन्द्र की हस्तलिपि में एक गीत 
सुनहरी कलम से 
विगत दो दशकों में नवगीत साहित्य -चिंता केन्द्र में सर्वाधिक चर्चित विधा रही है और कुमार रवीन्द्र उस विधा के अत्यन्त महत्वपूर्ण हस्ताक्षर रहे हैं |नये गीत में अनुभूति और संवेदना के जो नये से नये आयाम उद्घाटित हुए हैं उन पर कुमार रवीन्द्र की कल्पना की दस्तकें बखूबी सुनी जा सकती हैं |जैसे चित्रमय बिम्बों की आद्योपांत एक तानता उनके गीतों में लक्षित है ,वैसी मुझे समकालीन नवगीतकारों में दुर्लभ प्रतीत होती है |
देवेन्द्र शर्मा इंद्र [वरिष्ठ हिन्दी गीत कवि ] नवगीत संग्रह पंख बिखरे रेत पर [1992] के फ्लैप से 
कुमार रवीन्द्र हिन्दी नवगीत की दूसरी पीढ़ी के अत्यन्त महत्वपूर्ण रचनाकार हैं |बिम्बधर्मिता उनकी रचनाओं की एक अद्भुत विशेषता है |अंग्रेजी साहित्य के गहन अध्येता होने के कारण उन्होंने आपने गीतों में कथ्य और शिल्प के ऐसे प्रयोग किये हैं जो उन्हें आपने समकालीनों से अलग करते हैं |उनकी भाषा में एक ऐसी सहज पारदर्शिता है जो सम्प्रेषणीयता को सहज बनाती है |कहीं -कहीं उनमें कबीर की सामाजिक चेतना भी झलकती है |
माहेश्वर तिवारी [वरिष्ठ हिन्दी गीत कवि ]
कुमार रवीन्द्र नवगीत के प्रमुख कवियों में हैं |जो पिछले पांच दशक से अधिक समय से गीत लेखन कर रहे हैं |अपनी इस गीत यात्रा में उन्होंने अपने काव्य विवेक और गीत चेतना को निरंतर विकसित किया है इनके पूर्ववर्ती गीत मूलतः बिम्बधर्मी हुआ करते थे ,किन्तु कुमार जी ने शायद यह महसूस किया कि बिम्बधर्मी गीतों की एक सीमा होती है और फिर इन्होंने उस सीमा का बखूबी अतिक्रमण किया |इनके परवर्ती गीतों में इनकी राग दीप्त चेतना और जीवन से समय से गहरा लगाव देखने को मिलता है | 
सत्यनारायण [वरिष्ठ हिन्दी गीत कवि ]
हिन्दी नवगीत की भाषिक संरचना ,जातीय अस्मिता एवंम सम्वेदनात्मक तरलता के संदर्भ में कुमार रवीन्द्र के गीत अपनी अलग पहचान रखते हैं |उनका साधु -सरल व्यक्तित्व 'साधों 'की अभिव्यंजना में उनके अनेक गीतों में बोलता है ,जहाँ वह समाज के साथ -साथ स्वयं को भी सम्बोधित कर रहे होते हैं |निश्चित ही उनके नवगीतों ने इस विधा -विशेष को नयी भंगिमाएं एवं नया कथ्य -शिल्प देकर हिन्दी गीत के आसमान को कुछ और अधिक विस्तृत किया है |
 यश मालवीय  [सुप्रसिद्ध गीत कवि ]
[यह पोस्ट ब्लागर की त्रुटि से गायब हो गयी और पुनह वापस नहीं हुई ,इसमें आपके बहुमूल्य कमेंट्स भी गायब हो गये इसका हमें दुःख है |हम इस पोस्ट को दुबारा प्रकाशित कर रहे हैं |आपके सहयोग की अपेक्षा के साथ ]

बुधवार, 4 मई 2011

चार कविताएं -कवि ठा० गोपाल शरण सिंह

कवि -ठाकुर गोपालशरण सिंह 
समयकाल [01-01-1891से 02-10-1960]
परिचय -
कुछ फूल खिलते हैं तो मंदिर की मूर्तियों पर चढ़ा दिये जाते हैं ,कुछ फूल खिलते हैं और लोगों के गले का हार बन जाते हैं लेकिन कुछ फूल खुशबू बाँटकर भी समय और  समाज की स्मृतियों से ओझल हो जाते हैं |आज हम ऐसे ही एक साहित्य मनीषी के बारे में बताएंगे जिसका हिन्दी खड़ी बोली कविता के विकास में अप्रतिम योगदान तो है लेकिन वक्त धीरे -धीरे उन्हें भूलता जा रहा है |हिन्दी खड़ी बोली के लिए द्विवेदी युग काफ़ी महत्वपूर्ण है यह वह काल खंड है जब गद्य और कविता दोनों में खड़ी बोली और विशुद्ध हिन्दी का प्रयोग प्रारम्भ हुआ |आज की हिन्दी इसी युग के प्रयास का सुंदर परिणाम है |हिन्दी खड़ी बोली कविता के विकास में  राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ,अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध ,निराला ,ठाकुर गोपाल शरण सिंह आदि का महत्वपूर्ण योगदान है |ठाकुर गोपल शरण सिंह के समकालीन कवियों को जो प्रसिद्धि मिली वह दुर्भाग्य से ठाकुर साहब को नहीं मिल सकी ,जबकि इनका योगदान तनिक भी कमतर नहीं आंका जा सकता है |इस कवि का जन्म रीवां से चौसठ किमी० दूर नई गढ़ी रियासत में 01जनवरी 1891को और निधन इलाहाबाद में 2 अक्टूबर 1960 को हुआ था |गोपाल शरण सिंह की शिक्षा हाईस्कूल तक हुई थी,लेकिन अंग्रेजी ,संस्कृत ,उर्दू और हिन्दी चार भाषाओं के ज्ञाता थे |हैरत इस बात की है कि जब सामंतवाद अपने चरम पर था , उस समय स्वयं ठाकुर साहब ने किसानों ,मजदूरों शोषितों ,पीडितों और असहायों को अपनी कविता का विषय बनाया |सामंती परिवार में पैदा होकर भी ठाकुर गोपाल शरण सिंह उन सभी कुरीतियों से दूर एक मनीषी ,एक आमजन की पीड़ा में छटपटाते कवि हुआ करते थे |रीवां नरेश महाराज गुलाब सिंह की कैबिनेट में जाने से उन्होंने इनकार कर दिया था |ठाकुर साहब शरीर सौष्ठव भी अद्भुत था उन्हें पहलवानी का भी शौक था |नई गढ़ी से इलाहाबद सिर्फ़ इसलिए आये ताकि बच्चों की शिक्षा -दीक्षा ठीक ढंग से हो सके |गोपाल शरण सिंह के घर पर निराला ,मैथिलीशरण गुप्त महादेवी वर्मा ,डॉ० रामकुमार वर्मा जैसे कवियों का आना -जाना होता था |ठाकुर साहब के पुत्रों में सोमेश्वर सिंह ,माधव सिंह ,चंद्रभूषण सिंह ,गोविन्द सिंह ,नागेश्वर सिंह ,मुकुंद सिंह ,और श्री अनिरुद्ध सिंह पुत्रियों में सरस्वती देवी ,इन्दुमती देवी और श्रीमती सुषमा सिंह हैं |वर्तमान में हमारे बीच केवल श्री अनिरुद्ध सिंह और श्रीमती सुषमा सिंह जी हैं, शेष लोग अब हमारे बीच नहीं हैं |गोपालशरण सिंह के बड़े पुत्र ठाकुर सोमेश्वर सिंह भी कवि थे और पांच पुस्तकों का सृजन किया था ,सबसे छोटी पुत्री सुषमा जी भी कवयित्री हैं |कृतियाँ -मानवी [१९३८ ]माधवी [१९३८]ज्योतिष्मती [१९३८]संचिता [१९३९] सुमना[१९४१ ]ग्रामिका [१९५१]जगदालोक [१९५२]प्रेमांजलि [१९५३]कादम्बिनी [१९५४]विश्वगीत [१९५५]सभी इंडियन प्रेस इलाहाबाद से प्रकाशित |सागरिका[१९४४] लीडर प्रेस इलाहाबाद से प्रकाशित |अप्रकाशित कृतियाँ मीरा ,शांति गीत |इसमें जगदालोक प्रबंध काव्य है |एक पुस्तक हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग से प्रकाशित है आधुनिक कवि -ठाकुर गोपालशरण सिंह |ठाकुर गोपाल शरण सिंह जी पर सामग्री उपलब्ध कराने में उनके सुपुत्र श्री अनिरुद्ध सिंह जी और उनकी लाडली बेटी कवयित्री सुषमा सिंह जी के हम विशेष आभारी हैं |हम इस साहित्य  मनीषी की चार कविताएं आप तक पहुंचा रहे है आप इन कविताओं को उस काल खंड के हिसाब से पढ़ें |हमें आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी -----

ठाकुर गोपालशरण सिंह का काव्य संसार 
एक 
शांति रहे पर क्रांति रहे !
फूल हँसें खेलें नित फूलें ,
पवन दोल पर सुख से झूलें 
किन्तु शूल को कभी न भूलें ,
स्थिरता आती है जीवन में 
यदि कुछ नहीं अशान्ति रहे 
शांति रहे पर क्रांति रहे !

यदि निदाघ क्षिति को न तपावे ,
तो क्या फिर घन जल बरसावे ?
कैसे जीवन जग में आवे ?

यदि न बदलती रहे जगत में ,
तो किसको प्रिय कांति रहे ?
शांति रहे पर कांति रहे !

उन्नति हो अथवा अवनति हो ,
यदि निश्चित मनुष्य की गति हो ,
तो फिर किसे क्रम में रति हो ?

रहे अतल विश्वास चित्त में ,

किन्तु तनिक सी भ्रान्ति रहे 
शांति रहे पर क्रांति रहे ?
[काव्य संग्रह सुमना से ]

दो  
माँ 
है जग -जीवन की जननी तू 
तेरा जीवन ही है त्याग |
है अमूल्य बैभव वसुधा का 
तेरा मूर्तिमान अनुराग |

धूल -धूसरित रत्न जगत का 
है तेरी गोदी का लाल |
है जग -बाल जलज का रक्षक 
माँ ,तेरा मृदु बाहु मृणाल |

कितनी घोर तपस्या करके 
पाती है तू यह वरदान ?
किन्तु विश्व को अनायास ही 
कर देती है उसे प्रदान |

है तुझसे ही लालित -पालित 
यह भोला -भला संसार |
करती है प्लावित वसुधा को 
तेरी प्रेम सुधा की धार |

तेरे दिव्य हृदय में जिसका 
रहता है सदैव संचार |
लिए अंक में मृदुल सुमन को 
लता दिखाती है वह प्यार |

वनस्थली के अंग -अंग में 
होता तेरा प्रेम- विकास |
नव- बसंत उसके आंगन में 
जब क्रीड़ा करता सोल्लास |

सुत वियोग -दुःख से विह्वल हो 
रोते हैं माँ तेरे प्राण |
किन्तु सभी कुछ सह लेती तू 
हो जिससे जग का कल्याण |
[काव्य संग्रह मानवी से लम्बी कविता का कुछ अंश ]

तीन 
प्रतिनिधि 
देव !तुम्हारे पास |
दिन दुखी जन का प्रतिनिधि बन ,
आया था यह दास |

लाया था उपहार रूप में ,
केवल दुःख निःश्वास |
पर आशा भी रही चित्त में 
और रहा विश्वास |

किन्तु तुम्हारी दशा देखकर ,
मन हो गया हताश |
जग की व्यथा -कथा सुनने का 
तुम्हें नहीं अवकाश |
[ज्योतिष्मती काव्य संग्रह से ]
चार 
दीन भारत के किसान 
कर रहे हैं ये युगों से 
ग्राम में अज्ञात-वास ,
अंग जीवन का बनी है 
जन्म से ही भूख- प्यास ,
किन्तु हरते क्लेश हैं निज 
देश को कर अन्न- दान 
दीन भारत के किसान |

हैं सदा संतुष्ट रहते 
क्लेश भी सहकर विशेष ,
लोभ को न कदापि देते 
चित्त में करने प्रवेश ,
याचना करते नहीं रख 
कर हृदय में स्वाभिमान 
दीन भारत के किसान |

विश्व परिवर्तित हुआ पर 
ये बदलते हैं न वेश ,
छोड़ते हैं ये नहीं निज 
अंध -कूपों का प्रदेश ,
बंद रखते हैं सदा किस 
मोह से निज आँख -कान 
दीन भारत के किसान |

भूमि के हैं भक्त ये जो 
नित्य देती अन्न -वस्त्र ,
बैल है सम्पत्ति इनकी 
और हल हैं दिव्य अस्त्र ,
ज्ञान -वृद्धि हुई बहुत पर 
रह गए भोले अजान 
दीन भारत के किसान |

घूमता है वारिदों के 
साथ इनका भाग्य -चक्र ,
रंग में इनके हृदय के 
है रंगा सुरचाप वक्र ,
यदि हुई पर्याप्त कृषि तो 
हो गए सम्पत्तिवान 
दीन भारत के किसान |

हो रहा विज्ञान का है 
विश्व में कब से विकास ?
पर न इनके पास अब तक 
है पहुंच पाया प्रकाश ,
देश की अवनत दशा पर 
मोह वश देते न ध्यान 
दीन भारत के किसान |

देश में क्या हो रहा है 
है इन्हें कुछ भी न ज्ञान ,
है इन्हें दिखता न जग में 
रुचिर नवयुग का विहान ,
निज पुराने राग का बस 
कर रहे हैं नित्य गान 
दीन भारत के किसान |
[काव्य संग्रह ग्रामिका से ]


ठा० गोपालशरण सिंह की हस्तलिपि [यह वाक्य ठा० साहब ने अपनी बड़ी बेटी सरस्वती को पुस्तक भेंट करते हुए लिखा था ]
सुनहरी कलम से 
ठाकुर गोपालशरण सिंह आधुनिक  हिन्दी काव्य के प्रमुख उन्नायकों और पथ प्रशस्त करनेवालों में हैं |ब्रजभाषा के स्थान पर आधुनिक हिन्दी का प्रयोग कर उन्होंने काव्य में न सिर्फ़ वही माधुर्य ,सरसता और प्रांजलता बनाये रखी ,जो ब्रजभाषा का वैशिष्ट्य था ,वरन उनकी प्रसाद अभिव्यंजना शैली में भी रमणीयता का सौंदर्य बना रहा |विषय प्रतिपादन में तल्लीनता और भाव विचार की सघनता उनकी कविता का एक और आकर्षक तत्व है |गाँव ,खेत खलिहान ,किसान ,मजदूर ,नदी पहाड़ ,झरने तालाब ,बाग -बगीचे ,दूर -दूर तक फैली हरीतिमा में पला -बढा कवि का जीवन परिवेश तो उसकी कविता में है ही ,अशिक्षा ,अज्ञान ,जात -पांत ,छुआछूत ,बालविवाह ,अनमेल विवाह ,प्रेमरहित दाम्पत्य ,नारी दुर्दशा और दलित वर्ग की निरीहता और सामाजिक विसंगतियों की करुणार्द अनुभूतियाँ भी वहाँ हैं | डॉ० सत्येन्द्र शर्मा
[भारतीय साहित्य के निर्माता ठाकुर गोपाल शरण सिंह लेखक डॉ० सत्येन्द्र शर्मा साहित्य अकादमी से प्रकाशित ]