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शनिवार, 9 अप्रैल 2011

कवि -अरुण आदित्य और उनका काव्य संसार

अरुण आदित्य 
 e-mail-adityarun@gmail.com
उत्तर प्रदेश का जनपद प्रतापगढ़ अपनी ,राजनैतिक ,सांस्कृतिक और साहित्यिक चेतना के लिए बाखूबी जाना और पहचाना जाता है |हिन्दी के ख्यातिलब्ध कवि हरिवंश राय बच्चन जी की जड़े भी प्रतापगढ़ से जुड़ी हैं |प्रतापगढ़ खूबसूरत आंवले के फलों और यक्ष के प्रश्नों के लिए भी विख्यात है |अज्ञातवास के दौरान यहीं पर पांडवों को यक्ष के प्रश्नों के उत्तर देने पड़े थे |आज हम ऐसे ही समकालीन कविता के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर /उपन्यासकार /पत्रकार भाई अरुण आदित्य के बारे में बताने जा रहे हैं ,जिनका प्रतापगढ़ से जन्म का रिश्ता है |इस कवि का जन्म 2 मार्च 1965 को प्रतापगढ़ जनपद में हुआ था | अवध विश्व विद्यालय से विज्ञान में स्नातक उपाधि हासिल कर अरुण आदित्य पत्रकारिता के पेशे से जुड़ गये और काफी समय तक इंदौर में दैनिक भाष्कर  से जुड़े रहे |अरुण आदित्य की कविताएं देश की ख्यातिलब्ध पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं |असद जैदी के  बरस और कर्मेंदु शिशिर के समय की आवाज में कविताएं संकलित हैं |आधार प्रकाशन से प्रकाशित उपन्यास उत्तर वनवास ने अरुण आदित्य को एक चर्चित उपन्यासकार की श्रेणी में ला खड़ा किया |इस कवि को यह सब रोज नहीं होता कविता संग्रह के लिए मध्य प्रदेश के साहित्य अकादमी के दुष्यन्त सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है |सम्प्रति अरुण आदित्य अमर उजाला हिन्दी दैनिक में सम्पादक साहित्य के  पद पर आसीन हैं |अ आ के माध्यम से यह कवि अंतर्जाल पर भी सक्रिय है |हम अरुण आदित्य की चार कविताएं आप तक पहुंचा रहे हैं |आशा है आप अपना कीमती समय अवश्य देंगे |

आश्रय 
एक ठूँठ के नीचे दो पल के लिए रुके वे 
फूल पत्तों से लदकर झूमने लगा ठूँठ 
अरसे से सूखी नदी पर बैठे ही थे 
कि लहरें उछल -उछलकर मचानें लगीं शोर 

सदियों पुराने एक खंडहर में शरण ली 
और उस वीराने में गूंजने लगे मंगलगान 

भटक जाने के लिए वे रेगिस्तान में भागे 
पर आपने पैरों को पीछे छोड़ते गये 
हरी - भरी दूब के निशान 


थक हारकर वे एक अँधेरी सुरंग में घुस गये 
और हजारों सूर्यों की रोशनी से नहा उठी सुरंग 

प्रेम एक चमत्कार है या तपस्या 
पर अब उनके लिए एक समस्या है 
कि एक गांव बन चुकी ,इस दुनियां में 
कहाँ और कैसे छुपाये अपना प्रेम ?

इतिहास 
[असद जैदी के लिए ]
इतिहास 
एक घोड़ा है 
जिसकी पीठ पर तना बैठा है जालिम 
जालिम के हाथ में कोड़ा है |

वहाँ कुछ सिर हैं 
बाकी सब पांव 
गौर से देखो 
हर पांव में फोड़ा है 

एक मुड़ा -तुड़ा पीला पड़ा कागज है 
जिस पर आपस में उलझी चंद सतरें हैं 
जिन्हें सुलझाते - सुलझाते 
खुद उलझ जाता है वर्तमान 
इन्हीं उलझी सतरों 
और सुलझाने के खतरों के बीच 
एक कवि 
तलाशता है अपना खोया हुआ सामान |

स्त्री -विमर्श में एस एम् एस की भूमिका
दिल्ली परिवहन निगम की ठसाठस भरी बस में

असहजता के सहज बिम्ब सी खड़ी लड़की 
चारों ओर से चुभती निगाहें 
अनायास का आभास देते सायास का स्पर्श 
ढीठ फब्तियाँ कसने वाले मवाली 
और मददगार बनकर प्रकट होने वाले 
कुछ ज्यादा ही उदार लोग 

इन सबके बीच ऐसा कुछ भी तो नहीं है 
कि एक लड़की के होठों पर थिरकने की 
हिम्मत कर सके मुस्कान 
पर मुस्करा रही है वह 
कि अभी -अभी आया है एक एस ०एम० एस० 
और वह भूल गयी है डी० टी० सी० की बस 
चुभती निगाहें ,ढीठ और अति उदार लोगों की उपस्थिति 

आखिर क्या लिखा होगा उस एस० एम० एस० में 
कि तमाम असहज परिस्थितियों को ठेंगा दिखाते हुए 
मुस्कराये जा रही है वह लगातार 

कोई नौकरी मील गई है उसे 
माँ- बाप ने ढूँढ लिया है सपनों का कोई राजकुमार 
किसी सहेली ने कोई चुटकुला फारवर्ड किया है 
या किसी लड़के ने किया है प्रेम का इजहार ?
या ...या ..या ?
एक एस० एम० एस० में छिपी हैं अनंत सम्भावनाएं 
स्त्री सशक्तिकरण के इतिहास में 
क्या दर्ज होगी इस एस० एम् ० एस० की भूमिका 
कि इसके आते ही एक लड़की के लिए 
किसी भुनगे- सी हो गयी है जालिम दुनियां |

कालीन 
कालीन 
गर्व की तरह होता है इसका बिछा होना 
छुप जाती है बहुत सारी गंदगी इसके नीचे 
आने वाले को दिखती है 
सिर्फ़ आपकी सम्पन्नता और सुरुचि 
इस तरह बहुत कुछ दिखाने 
और उससे ज्यादा छिपाने के काम आता है कालीन 

आम राय है कि कालीन बनता है ऊन से 
पर जहीर अंसारी कहते हैं 
ऊन से नहीं जनाब खून से 

ऊन दिखता है 
चर्चा होती है उसके रंग की 
बुनाई के ढंग की 
पर उपेक्षित रह जाता है खून 
बूंद - बूंद टपकता है 
अपना रंग खोता ,काला होता चुपचाप 

आपकी सुरुचि और सम्पन्नता के बीच 
इस तरह खून का आ टपकना 
आपको अच्छा तो नहीं लगेगा 
पर क्या करूं ,सचमुच वह खून ही था 
जो कबीर अबीर भल्लू और मल्लू की उँगलियों से 
टपका था बार - बार 
इस खूबसूरत कालीन को बुनते हुए 

पश्चाताप के ताप में इस तरह क्यों झुलसने लगे जनाब ?
आप अकेले नहीं हैं 
सुरुचि सम्पन्नता के इस खेल में 

साक्षरता अभियान के मुखिया के घर में भी 
दीवार पर टंगा है एक खूबसूरत कालीन 
जिसमें लूम के सामने खड़ा है एक बच्चा 
और तस्वीर के ऊपर लिखा है -
मुझे पढ़ने दो मुझे बढने दो 

वैष्णव कवि और क्रांति कामी आलोचक के 
घरों में बिछे हैं खूबसूरत कालीन 
जिनमें झलकता है उनका सौंदर्य बोध 

कवि को मोहित करते हैं 
कालीन के कढे फूल -पत्ते 
जिनमें तलाशता है वह वानस्पतिक गन्ध 
और मानुस गन्ध की तलाश करता हुआ  आलोचक 
उतरता है कुछ और गहरे 
और उछालता है एक वक्तव्यनुमा सवाल 
जिस समय बुना जा रहा था यह कालीन 
घायल हाथ कुछ सपने भी बुन रहे थे साथ -साथ 
कालीन तो बन -बुन गया 
पर सपने जहां के तहाँ हैं 
ऊन - खून और खंडित सपनों के बीच 
हम कहाँ हैं ?

आलोचक खुश होता है 
कि उत्तर से दक्षिण तक 
दक्षिण से वाम तक 
वाम से आवाम तक 
गूंज रहा है उसका सवाल 
अब तो नहीं होना चाहिए 
कबीर ,अबीर भल्लू और मल्लू को कोई मलाल |
पांच -
गाँवों की पगडंडी जैसे
टेढ़े अक्षर डोल रहे है
अम्मा की ही है यह चिट्ठी
एक -एक कर बोल रहे हैं 

अड़तालीस घंटे से छोटी
अब तो कोई रात नहीं है
पर आगे लिखती है अम्मा
घबराने की बात नहीं है 


दीया -बत्ती माचिस सब है
बस थोड़ा सा तेल नहीं है
मुखिया जी कहते इस जुग में
दिया जलाना खेल नहीं है

गाँव -देश का हाल लिखूं क्या
ऐसा तो कुछ खास नहीं है
चारो ओर खिली है सरसों
पर जाने क्यों वास नहीं

केवल धड़कन ही गायब है
बाकी सारा गाँव वही है
नोन -तेल सब कुछ महंगा है
इंसानों का भाव वही है

रिश्तों की गर्माहट गायब
जलता हुआ अलाव वही है
शीतलता ही नहीं मिलेगी
आम -नीम की छाँव वही है

टूट गया पुल गंगा जी का
लेकिन अभी बहाव वही है 

मल्लाहा तो बदल गया पर
छेदों वाली नाव वही है

बेटा सुना शहर में तेरे
मारकाट का दौर चल रहा
कैसे लिखूं यहाँ आ जाओ
उसी आग में गाँव जल रहा

कर्फ्यू यहाँ नहीं लगता
पर कर्फ्यू जैसा लग जाता है
रामू का वह जिगरी जुम्मन
मिलने से अब कतराता है

चौराहों पर यहाँ -वहां
रिश्तों पर कर्फ्यू लगा हुआ है
इनकी नज़रों से बच जाना
यही प्रार्थना यही दुआ है

तेरे पास चाहती आना
पर न छूटती है यह मिटटी
आगे कुछ भी लिखा न जाये
जल्दी से तुम देना चिट्ठी


सुनहरी कलम से 
समकालीन समय और समाज अरुण आदित्य की कविताओं में हमेशा से ही मुखर रहे हैं |उनका गद्य हो या कविता दोनों ही विधाओं में सामान्य आदमी की उपस्थिति शिद्दत से महसूस की जा सकती है |आपने ताजा उपन्यास उत्तर वनवास में तो उन्होंने आपने सरोकारों को महत्तम रूप में अभिव्यक्त किया है |यही नहीं !कविता भी उनकी कलम की धार पाकर एक हथियार की शक्ल धारण कर लेती है |अभी हाल में उन्होंने कुछ विलक्षण कविताएं रची हैं |मेरे लिए उन्हें कवि या गद्यकार दोनों ही रूपों में देखना और पढ़ना सुखद लगता है  |
 यश मालवीय 

गांवों की पगडण्डी जैसे/टेढ़े अक्षर डोलरहे हैं
अम्मा की ही है यह चिट्ठी/ एक-एक कर बोल रहे हैं
अड़तालीस घंटे से छोटी/ अब तो कोई रात नहीं है
पर आगे लिखती है अम्मा /घबराने की बात नहीं है
अम्मा की चिट्ठी शीर्षक से अरुण आदित्य की यह कविता खुद-बखुद अरुण की संवेदनशीलता का बयान कर देती है। रमकलिया,रोज़ ही होता था यह सब, लोटे, काग़ज़ का आत्मकथ्य, कारगिल आदि कई कविताएँ हैं जो अरुण के कवि की सरलता को बयान बयान करती हैं। विषय साधारण सा हो या जटिल, अरुण की कविता बिना किसी हड़बड़ी के केवल सरल से शब्दों में बात करती है। अरुण जितने सहज कवि हैं उतने ही सहज गीतकार और ग़ज़लकार भी। और यदि आप उनसे परिचित हैं, तो उतने ही सहज और आत्मीय दोस्त भी। प्रदीपकांत [ सुप्रसिद्ध गज़ल कवि,इंदौर] 

देशज सम्वेदनाएँ जो महानगरों में दिखाई नहीं देतीं, उन्हें अरुण आदित्य की कविताओं में आसानी से देखा जा सकता है |गांव तलाश करने वालों के लिए कविता में अरुण आदित्य जगह बनाते हैं और उनके लिए खाद का काम करते हैं | प्रताप सोमवंशी [कवि  /कार्यकारी सम्पादक दैनिक हिन्दुस्तान नई दिल्ली]  
[सभी कविताएं बया पत्रिका से साभार ]

16 टिप्‍पणियां:

  1. नमस्कार !
    अच्छी रचनाओं के लिए साधुवाद .
    आभार !
    सादर !

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  2. भाई सुनील जी आदरणीय शास्त्री जी सुनहरी कलम पर आकर हमारा उत्साहवर्धन करने के लिए आप सबका आभार |

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  3. सुन्दर रचनाएं
    बहुत बहुत धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  4. गर्व की तरह होता है इसका बिछा होना
    छुप जाती है बहुत सारी गंदगी इसके नीचे
    आने वाले को दिखती है
    सिर्फ़ आपकी सम्पन्नता और सुरुचि

    वाह .....

    अच्छी रचनायें हैं ....
    आम विषयों से हट कर पढ़ना अच्छा लगा ....
    चाहे स्त्री -विमर्श में एस एम् एस की भूमिका हो या कालीन ...
    रचनायें पढने को विवश करती हैं ....

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  5. .

    तुषार जी ,

    एक से एक अनमोल मोती चुनकर लाते हैं आप। आदित्य जी की उत्कृष्ट रचनायें , ह्रदय को मथ रही हैं। इन खूबसूरत रचनाओं से रूबरू करवाने के लिए बहुत-बहुत आभार।

    .

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  6. अरुण आदित्य जी की सभी रचनाएँ बहुत अच्छी लगीं इसके साथ साथ आपका प्रयास भी बहुत अच्छा और सराहनीय है...

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  7. बहुत ही उत्कृष्ट रचनाएं
    अरुण जी के कलम से परिचय करवाने का आभार

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  8. तुषार जी , आपको नहीं लगता कि उत्तम साहित्य या गंभीर लेखन पढ़ने वालों की संख्या कम है . पहली बार यहाँ आई तो अन्दर से निराश हो गयी . कितने कम लोग यंहा आते हैं .औरों का भी हाल देख लीजिये वहां ट्रेफिक जाम रहता है. क्षमा चाहती हूँ ह्रदय में उठी तो कह दिया .कारण भावातिरेक हो सकता है . मैं मंत्रमुग्ध हो जाती हूँ यहाँ आकर . बहुत-बहुत धन्यवाद .अरुण आदित्य जी की सभी रचनाएँ बहुत अच्छी है.

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  9. बहुत ही सुंदर और सच बात अमृता जी आपने कह दिया है |ब्लॉग पर अगर निराला जी की कविताएं दे दी जाय तो ब्लोगर उसे भी नकार देंगे लेकिन इससे निराश होने की जरूरत नहीं है |सार्थक साहित्य पर सार्थक और सृजनात्मक लोगों की कुछ टिप्पणियाँ बहुत मायने रखती हैं |आपका आभार

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  10. adarniy Arunji ki kavitayen samkaleen kavita ki mahatvapoorn kavitayen hain, aam aadami aur uski peeda ko prabhavpoorn tariqe se vyakt kartin sashakt rachnaon ke liye Arunji ko bahut-bahut badhaiyan.
    - Yogendra Verma 'Vyom'

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  11. आप मेरे ब्लॉग पर आये तो आपसे परिचय हुआ
    आपके ब्लॉग पर आके बहुत सुखद अनुभव हुआ
    बस यूँ ही आना जाना बनाये रखियेगा
    और अपनी सुन्दर पोस्टों से,
    महान हस्तियों से भी परिचय करवाते रहिएगा
    शानदार प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत आभार आपका.

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