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रविवार, 27 मार्च 2011

एक गज़ल और तीन नवगीत: कवि-अमरनाथ श्रीवास्तव


कवि -अमरनाथ श्रीवास्तव 
समय [21-06-1937 से 15-11-2009]

जिस जनपद की मिट्टी में मशहूर कथाकार /उपन्यासकार राही मासूम रज़ा का उपन्यास आधा गांव देश भर में ख्याति बटोरता है , उसी मिट्टी में जन्म लेते हैं हिन्दी के सुप्रसिद्ध नवगीतकार अमरनाथ श्रीवास्तव | अमरनाथ श्रीवास्तव का जन्म गाज़ीपुर जनपद में 21 जून 1937 में ग्राम बौरवा में हुआ था | हिन्दी के इस अप्रतिम गीतकार का15 नवम्बर 2009 को निधन हो गया | अमरनाथ श्रीवास्तव जी का जन्म हुआ तो गाज़ीपुर में किन्तु उनकी कर्मस्थली बना प्रयाग | जीविका के लिए जी० इ० सी० कम्पनी में काम किया बाद में स्वैक्षिक सेवानिवृत्ति लेकर कुछ दिनों तक माया प्रेस से जुड़े रहे | एक बार गाज़ीपुर से इलाहाबाद आने के बाद अमरनाथ जी यहीं रच -बस गये | अमरनाथ श्रीवास्तव ने नवगीत को ही अपनी लेखनी का विषय बनाया | अमरनाथ श्रीवास्तव विसंगतियों के गीतकार हैं | डॉ० शम्भुनाथ सिंह द्वारा सम्पादित नवगीत दशक और नवगीत अर्धशती में बड़े आदर के साथ अमरनाथ जी के गीतों को भी सम्मिलित किया गया है | देश भर की  प्रतिष्ठित पत्र -पत्रिकाओं में इस कवि की रचनाएँ प्रकाशित होती रही हैं | उत्तर-प्रदेश के प्रतिष्ठित निराला सम्मान से दो बार और साहित्य भूषण से एक बार अमरनाथ श्रीवास्तव को सम्मानित किया जा चुका है  | कृतियाँ- गेरू की लिपियाँ [१९९०], दोपहर में गुलमोहर [१९९५ ], आदमी को देखकर [गज़ल संग्रह -२००२] मैं न कहूँ तो आदि हैं |

गज़ल
एक-
इस तरह मौसम बदलता है बताओ क्या करें 
शाम को सूरज निकलता है बताओ क्या करें 
यह शहर वो है कि जिसमें आदमी को देखकर 
आइना चेहरे बदलता है बताओ क्या करें 
आदतें मेरी किसी के होंठ कि मुस्कान थीं 
अब इन्हीं से जी दहलता है बताओ क्या करें 
दिल जिसे हर बात में हँसने कि आदत थी कभी 
अब वो मुश्किल से बहलता है बताओ क्या करें 
इस तरह पथरा गयीं आँखें कि इनको देखकर 
एक पत्थर भी पिघलता है है बताओ क्या करें 
ले रहा है एक नन्हा दिया मेरा इम्तहान 
हवा के रुख पर सफलता है बताओ क्या करें 
दोस्त मुझको देखकर विगलित हुए तो सह्य था 
दुश्मनों का दिल बदलता है बताओ क्या करें 

नवगीत

दो-
कहता है पका हुआ फल 
देह नहीं है मेरी सीमा 
मुझसे है आगामी कल |

चुभो रहे हैं जैसे पिन 
वृन्त पर टिके मेरे दिन 
जाने कब कौन सी हवा 
ले जाए मेरे पल छिन 
स्वागत में  आया मेरे 
समय लिए त्यौरी पर बल |

हठयोगी तरु का मैं व्रत 
पूर्णकाम है यह तन श्लथ 
साथ -साथ चलते हैं अब 
ऋतुओं के जितने तीरथ 
रस अब तो पंचामृत है 
भाव हो गये तुलसी दल |

अंतहीन खुशबू का छोर 
मंजरियों पर उगती भोर 
धुंधली आँखों देखा है 
रंग चढ़ी रेशे कि डोर 
फिर होगी धरती सुफला 
सांचे में धूप रही ढल |

तीन-
सम्बन्धों के ठंढे घर में 
वैसे तो सबकुछ है लेकिन 
इतने नीचे तापमान पर 
रक्तचाप बेहद खलता है |

दिनचर्या कोरी दिनचर्या 
घटनायें कोरी घटनायें 
पढ़ा हुआ अखबार उठाकर 
हम कब तक बेबस दुहरायें 
नाम मात्र को सुबह हुई है 
कहने भर को दिन ढलता है |

सहित ताप अनुकूलित घर में 
मौसम के प्रतिमान ढूंढते 
आधी उमर गुजर जाती है 
प्याले में तूफान ढूंढते 
गर्म खून वाला तेवर भी 
अब तो सिर्फ हाथ मलता है |

सजे हुए दस्तरख्वानों पर 
मरी भूख के ताने -बाने 
ठहरे हुए समय सी टेबुल 
टिकी हुई बासी मुस्कानें 
शिष्टाचार डरे नौकर सा 
अक्सर दबे पांव चलता है |

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चार
अमरनाथ श्रीवास्तव कि हस्तलिपि में एक गीत 
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विशेष -
नवगीत नई कविता की प्रतिक्रिया नहीं है |नवगीत और नई कविता में विधागत भेद तो है ही शिल्पगत और कथ्यगत भी है |गद्यात्मकता दुरुहता आधुनिकता के नाम पर समसामयिक बल्कि क्षणिकता ,छंदहीनता या छान्दिक अज्ञान के कारण छंद मुक्ति ,अंधानुकरण ,आरोपित नवीनता ,जाली और और घिसे हुए बिम्ब प्रतीक नकली अनुभूति और अप्रचलित भाषा जो नई कविता में है ,नवगीत में नहीं है |बल्कि है लय ,एक बदली हुई काव्योचित लय ,सहजता जातीय संस्कृति ,भावोदभूति और ताजगी पूर्ण बिम्बप्रतीक ,टटकी भाषा |अंततः नितांत सद्यः प्रस्तुत दृश्य और वास्तविक जीवन की गहन अनुभूति ,युग सम्पृक्ति और आज की विषमता और जटिलता से चटकते हुए व्यक्ति के लिए एक सांत्वनाप्रद सहलाता हुआ आत्मिक स्पर्श |नवगीत की दृष्टि में जीवन की सम्पूर्णता है | कवि - अमरनाथ श्रीवास्तव 
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आपकी कलम से -
1. अमरनाथ जी ने नवगीत और अतुकांत कविता के भेद को मिटाते हुए एक नई शैली निर्मित की | इसी कारण उनकी रचनाएँ अपनी अलग पहचान बनाती हैं | उन्होंने प्रवृत्तियों को घटनाओं के स्थान पर महत्व देते हुए नवगीत का एक दर्शन निर्मित किया | इसी कारण अपनी पीढ़ी के अत्यंत महत्वपूर्ण नवगीतकारों में अमरनाथ जी का स्थान सदैव स्मरणीय रहेगा | - गुलाब सिंह [वरिष्ठ हिन्दी नवगीत कवि]

2. अमरनाथ जी परम्परा और आधुनिक बोध  का अद्भुत समन्वय हैं | उनकी पूरी गीत यात्रा जीवन के अहं संघर्षों से प्रेरणा पाती रही है | गहरी संवेदना और अनुभूति उनके कृतित्व और व्यक्तित्व दोनों में समान रूप से दिखाई देती है | उनका सम्पूर्ण काव्य मानवता और करुना से ओतप्रोत है |- वरिष्ठ गीत कवि विनोद श्रीवास्तव 

3. अमरनाथ श्रीवास्तव हिन्दी नवगीत का  बहुत चुप -चुप मगर बेहद बोलता चेहरा रहे हैं | उस चेहरे पर उल्लास और उदासी का धूप छाहीं बादल जीवन पर्यन्त रहा , कभी-कभी कोई इन्द्रधनुष भी झिलमिला जाता रहा | इन्हीं रंग रूपों  के बीच से जिंदगी और रचना के बिंदुओं की तलाश की | इस तलाश में  दी सम्वेदना  और वैचारिकता के सच से रचनाकार का साक्षात्कार हुआ | यही सच ही कालान्तर में अमरनाथ जी के नवगीतों में नवगति की तरह खिल उठा है |- यश मालवीय 


4.अमरनाथ श्रीवास्तव गीत चेतना के महत्ववपूर्ण कवि थे |उनकी गीत यात्रा घर -आंगन पास -पड़ोस से होती हुई अपने समय और समाज तक जाती है |हालाँकि अमरनाथ जी को जो पहचान मिलनी चाहिए थी वह शायद नहीं मिल पाई |उनकी यह पंक्तियाँ शायद यूँ ही नहीं हैं --
चिंता के गहरे सागर में 
काली रात उतर आती है 
थके वाद्य यंत्रों पर मन की 
सारी व्यथा पसर जाती है 
मुझको मुख्य पात्र होना था 
लेकिन यह तब पता चला है 
जब चरित्र अभिनय में अपनी 
सारी उमर गुजर जाती है |  सत्यनारायण [वरिष्ठ हिन्दी नवगीत कवि पटना ]
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9 टिप्‍पणियां:

  1. "कहता है पका हुआ फल /देह नहीं है मेरी सीमा /मुझसे है आगामी कल |" इस प्रकार की सकारात्मक सोच को परिभाषित करते अमरनाथ श्रीवास्तव के गीत समय- रेखाओं को चीरते हुए आज भी अपनी सार्थकता को सिद्ध कर रहे हैं. एक रचनाकार के लिए इससे बड़ी बात क्या हो सकती है. उन्होंने जिस प्रकार से कालजयी गीत लिखे उसी तरह से लिखीं है गज़लें. यहाँ पर दी गयी ग़ज़ल को यदि ध्यान से पढ़ा जाय तो महसूस होगा कि कितनी गंभीरता से यह कवि रचनाकर्म करता है. आज यह कलमकार हमारे बीच नहीं है, इसका हमें दुःख तो है, किन्तु उनकी रचनाएँ हमारे पास है, जिनको पढ़कर इस विशिष्ट रचनाकार की यादें ताजा हो जाती हैं. गीत-ग़ज़ल के इस पुरोधा को मेरा नमन. -अवनीश सिंह चौहान

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  2. एक बेहतरीन रचनाकार और उसकी रचनाओं से यहाँ रुबरू कराने का बहुत बहुत आभार.

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  3. एक बेहतरीन रचनाकार और उसकी रचनाओं से यहाँ रुबरू कराने का बहुत बहुत धन्यवाद्|

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  4. kavi amarnathji ke samvedansheel prichay ke liye dhanyavad

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  5. दोस्त मुझको देखकर विगलित हुए तो सह्य था
    दुश्मनों का दिल बदलता है बताओ क्या करें
    kya gahri bat kahi hai aapne...bhavnaon ki ulajhan ki parakashtha hai ye...bahut sunder..

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  6. अमरनाथ जी के बारे मे इतनी जानकारी और उनकी बेशकीमती रचनाये यहाँ शेयर की... आपका धन्यवाद ..एक सुन्दर पोस्ट... वाह

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  7. मानवता और करुना से ओतप्रोत सुन्दर पोस्ट..मेरा नमन अमरनाथजी को ...धन्यवाद

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  8. amarnath ji ka parichay sath me unaki sabhi rachnaye bahut sunder .....dhanyavad.

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  9. भाई अमरनाथ श्रीवास्तव एक सहज-सरल व्यक्ति थे | उनसे व्यक्तिगत संपर्क के पल तो मुझे कम ही मिले, किन्तु 'नवगीत दशक'-दो में उनका सहयात्री होने का सौभाग्य मुझे मिला था और उसके बाद हुए पत्राचार से उनके व्यक्तित्त्व की कई अनूठी परतें मेरे सामने उजागर हुईं, जो उनके आत्मीय रागात्मक व्यक्तित्त्व से मुझे जोड़ती गईं | नवगीत के स्तर पर उनका अवदान निश्चित ही विशिष्ट रहा | यहाँ प्रस्तुत उनकी विशिष्ट कहन की बानगी सुखद रही मेरे लिए | जोड़ गयी यह मुझे कई-कई स्मृतियों से | स्मृतिशेष इस अग्रज को मेरा नमन !
    कुमार रवीन्द्र

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